14 घंटे की ड्यूटी के बाद एक नर्स ने ढाबे में खून से लथपथ अजनबी की जान बचाई, लेकिन 3 घंटे बाद एजेंसियों ने बताया—वह कोई आम आदमी नहीं था… और उसके पीछे पड़े लोग अस्पताल तक पहुँच चुके थे!

भाग 1

आधी रात के 2 बजे, दिल्ली के करोल बाग में स्थित एक छोटे से ढाबे में सब कुछ अचानक बदल गया, जब एक अजनबी आदमी दरवाज़ा तोड़ते हुए अंदर घुसा और फर्श पर गिर पड़ा।

उसकी गर्दन से काला, गाढ़ा तरल बह रहा था। लोग चीखने लगे। एक वेट्रेस के हाथ से चाय का कप गिरकर टूट गया। लेकिन कोने की मेज़ पर बैठी डॉली शर्मा अपनी जगह से नहीं डरी।

डॉली पिछले 14 घंटे से अस्पताल की इमरजेंसी में काम करके निकली थी। उसकी आँखों में थकान थी, शरीर टूट रहा था, लेकिन जैसे ही उसने घायल आदमी को देखा, उसके भीतर कुछ जाग उठा।

वह बिजली की तरह दौड़ी।

“एम्बुलेंस बुलाओ!” उसने चीखकर कहा।

आदमी तड़प रहा था। उसके हाथ इतने ताकतवर थे कि वह दर्द में भी डॉली को धक्का देने की कोशिश कर रहा था। लेकिन डॉली ने उसकी परवाह नहीं की। उसने घायल हिस्से को देखा और एक पल में समझ गई कि मामला बहुत गंभीर है।

अगर अगले कुछ मिनटों में खून नहीं रोका गया तो आदमी मर जाएगा।

ढाबे में मौजूद किसी व्यक्ति को समझ नहीं आया कि डॉली क्या कर रही थी। उसने अपने हाथ सीधे घाव के अंदर डाल दिए और पूरी ताकत से दबाव बनाया।

आदमी दर्द से चीख उठा।

लेकिन डॉली नहीं रुकी।

उसके हाथ कांप रहे थे। उंगलियाँ सुन्न हो रही थीं। फिर भी वह दबाव बनाए रही।

चार मिनट बाद एम्बुलेंस पहुंची।

पैरामेडिक्स ने दृश्य देखा तो दंग रह गए।

“तुमने यह कैसे किया?” उनमें से एक ने पूछा।

डॉली ने केवल इतना कहा, “वह अभी ज़िंदा है, बस यही काफी है।”

उसे लगा मामला वहीं खत्म हो जाएगा।

लेकिन वह गलत थी।

तीन घंटे बाद उसे पुलिस स्टेशन के एक कमरे में बैठाया गया।

वहाँ दो अधिकारी उसका इंतजार कर रहे थे।

वे सामान्य पुलिस वाले नहीं थे।

वे भारत की एक गुप्त केंद्रीय एजेंसी से थे।

उनमें से एक ने मेज़ पर एक फाइल फेंकी।

“डॉली शर्मा,” उसने कहा, “हमें नहीं लगता कि तुम सिर्फ एक नर्स हो।”

डॉली का चेहरा शांत रहा।

लेकिन उसके भीतर दबी हुई एक पुरानी दुनिया अचानक जागने लगी।

और जब अधिकारी ने अगला वाक्य बोला, तो कमरे की हवा जैसे जम गई।

“जिस आदमी की जान तुमने बचाई है, वह भारतीय नौसेना की एक अत्यंत गोपनीय विशेष इकाई का अधिकारी है… और उसे मारने वाले लोग अभी भी ज़िंदा हैं।”

भाग 2

कमरे में सन्नाटा छा गया।

अधिकारी अर्जुन राठौड़ ने बताया कि घायल व्यक्ति का नाम करण मल्होत्रा है। वह एक गुप्त सैन्य अभियान का हिस्सा था। जिस तरीके से डॉली ने उसकी जान बचाई थी, वह सामान्य मेडिकल ट्रेनिंग से कहीं आगे की बात थी।

उन्होंने डॉली का पूरा रिकॉर्ड खंगाल लिया था।

2019 से पहले उसका कोई डिजिटल इतिहास नहीं था।

कोई पुरानी तस्वीर नहीं।

कोई कॉलेज रिकॉर्ड नहीं।

कुछ भी नहीं।

डॉली ने शांत स्वर में कहा कि यह पहचान चोरी का मामला था, लेकिन अधिकारी उसकी बात पर विश्वास नहीं कर रहे थे।

तभी डॉली ने अचानक पूछा, “करण अस्पताल में है न?”

“हाँ, आईसीयू में,” अर्जुन ने कहा।

डॉली की आँखें सिकुड़ गईं।

“तो वह सुरक्षित नहीं है।”

अधिकारी चौंक गए।

डॉली ने कहा कि अगर हमलावर पेशेवर थे, तो वे अस्पताल तक ज़रूर पहुंचेंगे।

कुछ ही मिनट बाद तीनों अस्पताल के लिए रवाना हुए।

वहाँ पहुँचते ही डॉली ने देखा कि आईसीयू के बाहर तैनात सुरक्षाकर्मी मृत पड़े थे।

कमरा अंधेरे में डूबा हुआ था।

अंदर एक व्यक्ति डॉक्टर की वर्दी में करण के बिस्तर के पास खड़ा था।

उसके हाथ में एक सिरिंज थी।

अर्जुन ने उसे रोकने की कोशिश की।

लेकिन अगले ही पल गोलियां चल गईं।

और उसी क्षण डॉली को समझ आ गया कि उसका पुराना जीवन फिर लौट आया है।

भाग 3

गोलियों की आवाज पूरे गलियारे में गूंज उठी।

अर्जुन के कंधे में गोली लगी और वह पीछे गिर पड़ा।

हमलावर बिजली की गति से आगे बढ़ा।

लेकिन डॉली उससे भी तेज निकली।

उसने पास रखा ऑक्सीजन सिलेंडर उठाया और पूरी ताकत से हमलावर पर दे मारा।

वह आदमी दीवार से टकराया, मगर गिरा नहीं।

उसने तुरंत चाकू निकाल लिया।

अगले कुछ सेकंड किसी फिल्म की तरह नहीं बल्कि जानलेवा संघर्ष की तरह बीते।

डॉली और हमलावर अस्पताल के फर्श पर लड़ते रहे।

सिरिंजें, दवाइयाँ और मेडिकल उपकरण चारों तरफ बिखर गए।

चाकू उसकी पसलियों को छूता हुआ निकल गया।

दर्द हुआ।

लेकिन उसने दर्द को नज़रअंदाज़ कर दिया।

एक सही मौके पर उसने डिफिब्रिलेटर मशीन उठाई और हमलावर के चेहरे पर दे मारी।

भारी आवाज के साथ वह आदमी बेहोश होकर गिर पड़ा।

कुछ क्षण तक डॉली वहीं बैठी रही।

उसकी साँसें तेज थीं।

हाथ कांप रहे थे।

लेकिन करण बच गया था।

अर्जुन उसे घूर रहा था।

अब वह समझ चुका था कि उसके सामने खड़ी महिला कोई साधारण नर्स नहीं थी।

“तुम असल में हो कौन?” उसने पूछा।

डॉली कुछ देर चुप रही।

फिर उसने खिड़की में दिखती अपनी परछाईं को देखा।

वह परछाईं उसे उन दिनों की याद दिला रही थी जिन्हें उसने वर्षों पहले दफना दिया था।

आखिरकार उसने धीरे से कहा,

“6 साल पहले लद्दाख के एक गुप्त अभियान में एक हेलिकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। सरकार ने घोषणा की थी कि उसमें मौजूद सभी लोग मारे गए।”

अर्जुन की आँखें फैल गईं।

डॉली मुस्कुराई नहीं।

“लेकिन उनमें से एक नहीं मरी थी।”

कमरे में खामोशी छा गई।

अर्जुन अब सब समझ चुका था।

देश की सबसे खतरनाक विशेष इकाइयों में काम कर चुकी एक महिला एजेंट वर्षों से नई पहचान लेकर नर्स बनकर जी रही थी।

उसने युद्ध छोड़ा था।

हिंसा छोड़ी थी।

अपना अतीत छोड़ दिया था।

लेकिन अतीत ने उसे नहीं छोड़ा।

कुछ देर बाद करण को होश आया।

उसने कमजोर आँखों से डॉली को देखा।

“तुमने फिर जान बचा ली,” उसने धीमे से कहा।

डॉली ने कोई जवाब नहीं दिया।

वह सिर्फ मुस्कुराई।

सुबह होने लगी थी।

अस्पताल की खिड़कियों से पहली धूप अंदर आ रही थी।

अर्जुन ने पूछा, “अब क्या करोगी?”

डॉली ने अपनी नर्स आईडी कार्ड को देखा।

वही कार्ड जिसने उसे पाँच साल तक एक सामान्य जीवन दिया था।

उसने कार्ड को बीच से तोड़ दिया।

फिर कूड़ेदान में फेंक दिया।

“डॉली शर्मा यहीं खत्म हो गई,” उसने शांत स्वर में कहा।

“अब?”

“अब जो लोग करण को मारना चाहते थे, उन्हें पता चलेगा कि उन्होंने गलत इंसान को जगाया है।”

वह मुड़ी और कमरे से बाहर निकल गई।

बरसात अभी भी हो रही थी।

लेकिन अब उसके कदमों में कोई हिचकिचाहट नहीं थी।

वर्षों पहले उसने अंधेरे से भागकर एक नई जिंदगी बनाई थी।

आज वह उसी अंधेरे में वापस जा रही थी।

फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार वह भाग नहीं रही थी।

इस बार अंधेरा उससे डरने वाला था।

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