
भाग 1
—आज रात कोई भी दरवाजा खटखटाए, मत खोलना… चाहे वह कहे कि उसे तुम्हारे पति ने भेजा है।
यह बात सुनकर सावित्री के हाथ से चाय का गिलास लगभग छूट गया, क्योंकि यह चेतावनी उसे उसी बूढ़े आदमी ने दी थी जिसे उसने कुछ घंटे पहले दया खाकर अपने आंगन में सोने दिया था।
सावित्री 43 साल की थी। वह उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर के बाहरी इलाके पनकी के पास एक तंग मगर पक्के 2 मंजिला मकान में अपने पति रघुवीर के साथ रहती थी। बाहर से देखने वालों को उसकी जिंदगी सीधी-सादी लगती थी। सुबह 5 बजे वह घर के बाहर ठेला लगाती, गरम कचौड़ी, आलू की सब्जी, जलेबी और अदरक वाली चाय बेचती। मोहल्ले वाले उसे “सावित्री दीदी” कहते थे, क्योंकि वह उधार भी दे देती थी और किसी के बच्चे को भूखा लौटाती नहीं थी।
रघुवीर पास की फर्नीचर फैक्ट्री में काम करता था। कम से कम वह यही कहता था। पिछले 6 महीनों से उसकी रात की ड्यूटी बढ़ गई थी। कभी रात 9 बजे निकलता, कभी 11 बजे। कभी सुबह 4 बजे लौटता, कभी दोपहर तक नहीं आता। सावित्री ने शुरू में सवाल किए थे, पर हर सवाल झगड़े में बदल जाता।
—तुम्हें हर बात में शक क्यों होता है?
—घर चल रहा है ना? फिर चुपचाप रहने में दिक्कत क्या है?
14 साल की शादी ने सावित्री को इतना सिखा दिया था कि कई बार औरत सवाल नहीं छोड़ती, बस आवाज धीमी कर देती है। लेकिन उसके भीतर कुछ दिनों से अजीब डर पल रहा था। रघुवीर की कमीज से लकड़ी की खुशबू नहीं आती थी। कभी डीजल जैसी गंध आती, कभी किसी महंगे इत्र जैसी, कभी पुरानी सीलन और लोहे की गंध।
उस रात हल्की बारिश हो रही थी। बिजली बार-बार जा रही थी। ठेले के बर्तन धोकर सावित्री ने जैसे ही दरवाजा बंद किया, बाहर से 3 धीमी दस्तकें सुनाई दीं।
ठक। ठक। ठक।
उसने झिरी से देखा। एक बूढ़ा आदमी भीगा खड़ा था। दुबला शरीर, कंधे पर गंदी कपड़े की थैली, सफेद दाढ़ी, आंखों में थकान और चेहरा ऐसा जैसे कई रातों से ठीक से सोया न हो।
—बिटिया, बरामदे में सोने दे दे। सुबह होते ही चला जाऊंगा। कहीं जगह नहीं मिली।
सावित्री डर गई। आजकल दया भी सोचकर करनी पड़ती थी। पर बूढ़े की आंखों में चालाकी नहीं थी। उसे अपने पिता की याद आई, जो बनारस से कानपुर आते समय स्टेशन पर बीमार पड़े थे और किसी अजनबी ने उन्हें पानी पिलाया था।
—घर के अंदर नहीं आना। बरामदे में चटाई है, वहीं लेट जाओ। सुबह चाय दे दूंगी।
बूढ़े ने सिर हिलाया। लेकिन लेटने से पहले उसने घर की दीवारों को बहुत ध्यान से देखा। खासकर बैठक की उस दीवार को, जहां 2 साल पहले रघुवीर ने मरम्मत करवाई थी और सावित्री को पास तक नहीं फटकने दिया था।
—यह दीवार नई बनी है? बूढ़े ने धीमे से पूछा।
—सीलन थी। मेरे पति ने ठीक करवाई थी।
बूढ़े की आंखों में एक पल के लिए डर चमका। फिर वह चुपचाप चटाई पर लेट गया।
उस रात सावित्री को नींद नहीं आई। कभी लगा बरामदे में कोई चल रहा है, कभी लगा बैठक की दीवार के भीतर से हल्की खरोंच जैसी आवाज आ रही है। उसने 3 बजे उठकर देखा। बूढ़ा वैसे ही सिकुड़ा पड़ा था, आंखें बंद, सांस धीमी। फिर भी सावित्री के सीने में कोई पत्थर रखा हुआ लग रहा था।
सुबह जब वह कड़ाही चढ़ा रही थी, बूढ़ा चुपचाप बैठक की दीवार के सामने बैठा था।
—तुम यहां कब से रहती हो?
—10 साल से ज्यादा।
—इस घर में कभी फर्श या दीवार तोड़ी गई?
सावित्री ठिठक गई।
—आप क्यों पूछ रहे हैं?
बूढ़े ने उसकी ओर देखा। उसकी आवाज बहुत धीमी थी।
—क्योंकि रात भर उस दीवार के पास आवाज आई। चूहा नहीं था। पाइप नहीं था। वहां कुछ छिपाया गया है। और आज रात लोग उसे लेने आएंगे।
सावित्री को गुस्सा भी आया और डर भी।
—मेरे पति शरीफ आदमी हैं। आप बिना जाने ऐसी बातें मत कीजिए।
बूढ़े ने बहस नहीं की। उसने अपनी थैली से पीतल की एक पुरानी चाबी निकाली। चाबी के सिर पर तिरछा त्रिशूल बना था।
—इसे रख लो। अगर कोई डिब्बा मिले तो यही खुलेगा। और याद रखना, शाम के बाद दरवाजा मत खोलना।
—आप कौन हैं?
बूढ़ा जवाब दिए बिना उठा। जाते-जाते उसने वही बात दोहराई।
—आज रात कोई भी दरवाजा खटखटाए, मत खोलना… चाहे वह कहे कि उसे तुम्हारे पति ने भेजा है।
फिर वह गली के मोड़ पर गायब हो गया।
दिन भर सावित्री ने ठेला लगाया, पर हाथ मशीन की तरह चल रहे थे। कचौड़ी तलती रही, चाय डालती रही, पैसे लौटाती रही, पर मन उसी दीवार में अटका था। दोपहर में उसने बैठक साफ करते हुए दीवार पर उंगलियां रखीं। वहां से अजीब गंध आ रही थी, सीलन, लोहे और पुराने कागज की मिली-जुली गंध। उसने हल्के से थपथपाया।
दीवार खोखली लगी।
शाम को रघुवीर अचानक जल्दी घर आ गया। चेहरा पसीने से भीगा था, आंखें इधर-उधर भाग रही थीं।
—आज रात मैं फिर बाहर जा रहा हूं। तुम दरवाजा बंद रखना। किसी को मत खोलना। चोरी-डकैती बढ़ गई है।
सावित्री के भीतर कुछ टूटकर गिरा। वही चेतावनी, पर इस बार उसके पति के मुंह से।
—किसी को भी नहीं?
रघुवीर ने उसे घूरा।
—मतलब समझती क्यों नहीं? जो कहा है, वही करो।
वह जल्दी-जल्दी नहाया, बिना खाना खाए निकला और जाते-जाते बैठक की दीवार पर एक नजर डाल गया। वह नजर सावित्री से छिपी नहीं।
रात 9 बजे घर में सन्नाटा था। बारिश फिर शुरू हो गई थी। सावित्री ने रसोई से छोटा चाकू लिया और दीवार की दरार पर खुरचने लगी। प्लास्टर झड़ने लगा। अंदर सीमेंट नहीं था, खाली जगह थी।
उसका हाथ कांप रहा था। उसने हाथ भीतर डाला और लोहे का एक काला डिब्बा बाहर खींच लिया।
डिब्बे पर ताला था। ताले का आकार बिल्कुल उसी तिरछे त्रिशूल जैसा था।
सावित्री ने अभी चाबी निकाली ही थी कि दरवाजे पर 3 धीमी दस्तकें हुईं।
ठक। ठक। ठक।
बाहर से एक भारी आवाज आई।
—सावित्री जी, दरवाजा खोलिए। हमें रघुवीर भैया ने भेजा है।
सावित्री का खून जम गया।
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भाग 2
सावित्री ने बत्ती नहीं जलाई। वह नंगे पांव दरवाजे तक गई और झिरी से बाहर देखा। गली की पीली स्ट्रीट लाइट के नीचे 2 आदमी खड़े थे। एक लंबा, काले रेनकोट में; दूसरा छोटा, हाथ में मोबाइल लिए किसी से संदेश पढ़ रहा था। लंबे आदमी ने फिर कहा। —दरवाजा खोलिए, भाभी। रघुवीर भैया ने कहा है कि बैठक की दीवार से एक सामान लेना है। हम चुपचाप लेकर चले जाएंगे। सावित्री पीछे हट गई। उन्होंने उसका नाम नहीं पूछा था, उन्हें सब पता था। उसके हाथ में डिब्बा भारी नहीं था, पर उस पल उसे लगा जैसे उसकी 14 साल की शादी उसी लोहे में बंद है। उसने दरवाजा नहीं खोला। वह कमरे में भागी, कुंडी लगाई और फोन उठाया। सिग्नल गायब था। जैसे पूरी गली को दुनिया से काट दिया गया हो। बाहर से गेट पर जोर का धक्का पड़ा। —समझदारी इसी में है कि चीज दे दो। यह तुम्हारी नहीं है। सावित्री ने कांपते हाथों से बूढ़े की चाबी ताले में लगाई। चाबी बिना अटके घूम गई। डिब्बे के भीतर पैसे या जेवर नहीं थे। एक पुरानी डायरी, एक छोटा मोबाइल और काली पेन ड्राइव थी। उसने डायरी खोली। पहली ही पंक्ति रघुवीर की लिखावट में थी: “7 अगस्त: सामान दीवार में रखा। घर वाली को कुछ पता नहीं।” सावित्री की सांस अटक गई। अगले पन्नों पर नाम, रकम, ट्रक नंबर, गोदामों के पते और कुछ अजीब कोड लिखे थे। फिर एक लाइन ने उसका दिल चीर दिया: “अगर सावित्री पूछे तो झूठ बोलना। अगर उसे डिब्बा मिल जाए तो उसी रात घर से हटाना।” बाहर से फिर आवाज आई। —भाभी, जितनी देर करोगी, उतना बुरा होगा। सावित्री ने डिब्बा पलंग के नीचे धकेला, डायरी ब्लाउज में छिपाई और पेन ड्राइव मुठ्ठी में दबा ली। कुछ मिनट बाद बाहर सन्नाटा हो गया, पर जाते-जाते छोटे आदमी ने कहा। —अगर उसने खोल लिया है, तो बात अब हाथ से निकल गई। सावित्री ने टीवी के पीछे पेन ड्राइव लगाई। स्क्रीन पर कई वीडियो खुले। एक वीडियो में रघुवीर कानपुर देहात के किसी गोदाम में खड़ा था। उसके सामने सफेद कुर्ते वाला आदमी था। रघुवीर कह रहा था। —मेरी बीवी को कुछ समझ नहीं आता। वह सुबह ठेला लगाती है, रात को सो जाती है। यहां कोई नहीं ढूंढेगा। दूसरे वीडियो में ट्रकों से बोरियां उतर रही थीं, जिनमें नकदी और फाइलें छिपी थीं। तीसरे में कुछ पुलिस वाले, एक स्थानीय नेता और फैक्ट्री मालिक साथ बैठे थे। सावित्री को पूरी बात समझ नहीं आई, पर इतना समझ आ गया कि यह चोरी से बड़ा खेल था। तभी उसका फोन बजा। अज्ञात नंबर। —डिब्बा खोल लिया ना? वही आवाज थी। —जो रघुवीर ने छिपाया है, वह हमें दे दो। तुम जिंदा रहोगी। सावित्री ने फोन काट दिया। आखिरी पन्ने पर लिखा था: “सब बिगड़े तो पुराने बस अड्डे वाले बाबा को ढूंढना। सबूत सही जगह वही पहुंचा सकता है।” बूढ़ा। वह भिखारी नहीं था। सावित्री ने डायरी, मोबाइल और पेन ड्राइव थैले में डाली और पिछली गली से भागी। बारिश उसके चेहरे पर चुभ रही थी। गली के मोड़ पर अचानक एक बाइक आकर रुकी। बाइक पर रघुवीर था। पीछे वही छोटा आदमी बैठा था। —सावित्री, थैला दे दो। रघुवीर का चेहरा राख जैसा था। —तुम मुझे भी बेचने वाले थे? वह फट पड़ी। रघुवीर ने नजरें झुका लीं। पीछे बैठा आदमी हंसा। —भाभी, यह अब पति-पत्नी का झगड़ा नहीं है। सावित्री ने थैला सीने से चिपका लिया और दौड़ पड़ी। पुराने बस अड्डे की टूटी दीवार के पास वही बूढ़ा उसका इंतजार कर रहा था। ❤️नमस्ते, प्यारे रीडर्स! अगर आप अगले पार्ट के लिए तैयार हैं, तो प्लीज़ नीचे “Yes” लिखें, और मैं इसे तुरंत भेज दूँगा। मैं उन सभी के अच्छे स्वास्थ्य और खुशी की कामना करता हूँ जिन्होंने यह कहानी पढ़ी और पसंद की है! 💚
भाग 3
बूढ़े ने सावित्री को देखते ही दरवाजा खोला। वह पुराने बस अड्डे के पीछे बनी एक छोटी कोठरी में उसे ले गया। बाहर से वह जगह कबाड़खाना लगती थी, पर अंदर मेज, लोहे की अलमारी, बैटरी वाला रेडियो, अखबारों की कतरनें और दीवार पर लगे नक्शे थे। सावित्री हांफ रही थी। उसके कपड़े भीग चुके थे और चप्पल कीचड़ से भर गई थी।
—आप कौन हैं? उसने रोते हुए पूछा। —और रघुवीर किस मुसीबत में है?
बूढ़े ने दरवाजे पर 2 कुंडियां चढ़ाईं।
—मेरा नाम नारायण त्रिपाठी है। कभी स्पेशल टास्क फोर्स में था। 9 साल पहले मुझे नौकरी से हटाया गया, क्योंकि मैंने उन लोगों की फाइल खोल दी थी जिन्हें कोई छूना नहीं चाहता था।
सावित्री ने थैला कसकर पकड़ा।
—रघुवीर ने लिखा है कि आप सबूत सही जगह पहुंचा सकते हैं।
नारायण ने सिर हिलाया।
—रघुवीर शुरू में अपराधी नहीं था। वह कमजोर आदमी था। फर्क समझो। उसे पहले कुछ पैकेट रखने को कहा गया। फिर फोन। फिर फाइलें। फिर नकदी। उसने सोचा थोड़े पैसे मिलेंगे, कर्ज उतर जाएगा। जब समझा कि यह नेताओं, ठेकेदारों, नकली दवाओं और हवाला पैसों का जाल है, तब तक देर हो चुकी थी।
—तो उसने मेरे घर में सब क्यों छिपाया?
नारायण की आवाज धीमी हो गई।
—क्योंकि उसे लगा कि एक कचौड़ी बेचने वाली औरत की दीवार कौन तोड़ेगा।
यह वाक्य सावित्री के भीतर हथौड़े की तरह लगा। रघुवीर ने सिर्फ झूठ नहीं बोला था। उसने उसे छोटा समझा था, इतना छोटा कि उसके नाम, उसके घर, उसके श्रम और उसकी जिंदगी को ढाल बना दिया।
—वह मुझे बचाना चाहता था या खुद को?
नारायण ने सीधे जवाब नहीं दिया।
—कभी-कभी डरपोक आदमी प्यार को भी बहाना बना लेता है।
सावित्री ने पेन ड्राइव मेज पर रखी, मगर हाथ उससे हटाया नहीं।
—मैं इसे किसी को दूंगी तो पहले जानना चाहती हूं कि यह जाएगा कहां।
नारायण ने अलमारी से एक पुराना फोन निकाला।
—एक अधिकारी है, अनन्या राव। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो में। 2 साल से इस गिरोह पर काम कर रही है। लेकिन उसके पास कड़ी नहीं थी। यह पेन ड्राइव वही कड़ी है।
सावित्री ने खिड़की से बाहर देखा। दूर से बाइक की आवाज आ रही थी।
—वे आ गए।
नारायण ने लाइट बंद कर दी। कोठरी अंधेरे में डूब गई। कुछ सेकंड बाद दरवाजे पर 2 साफ दस्तकें हुईं। इस बार डरावनी नहीं, नापी हुई।
—त्रिपाठी जी, दरवाजा खोलिए। हम लोग हैं।
नारायण ने सावित्री को देखा।
—फैसला तुम्हारा है। भागते रहना है या सच के सामने खड़ा होना है।
सावित्री थक चुकी थी। डर अभी भी था, पर डर के नीचे गुस्सा ज्यादा था। उसने दरवाजा खोला।
बाहर सफेद सादा कुर्ता पहने एक मध्यम उम्र का आदमी खड़ा था और उसके साथ नीली जैकेट में एक महिला। महिला ने तुरंत पहचान पत्र दिखाया।
—मैं अनन्या राव, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो।
सावित्री ने पहचान पत्र को ऐसे देखा जैसे कागज भी झूठ बोल सकता हो।
—आज रात हर कोई खुद को किसी का आदमी बता रहा है। मैं आप पर क्यों भरोसा करूं?
अनन्या ने शांत स्वर में कहा।
—क्योंकि अगर हम तुम्हें पकड़ना चाहते, तो दरवाजा नहीं खटखटाते।
नारायण ने पहचान पत्र गौर से देखा, फिर सिर हिलाया।
—ये सही हैं।
अनन्या की नजर पेन ड्राइव पर गई।
—इसमें 11 लोगों को गिराने की ताकत है। 3 फैक्ट्री मालिक, 2 अधिकारी, 1 नेता और बाकी उनके बिचौलिए। लेकिन अगर यह गलत हाथ में गई, तो तुम्हारा नाम सुबह तक किसी झूठे हादसे में बदल जाएगा।
सावित्री हंसी, पर हंसी में कड़वाहट थी।
—मेरा नाम पहले ही मेरे पति ने दीवार में बंद कर दिया था।
अनन्या के चेहरे पर हल्की पीड़ा आई।
—हमें तुम्हारा बयान चाहिए। लेकिन उससे पहले तुम्हें सुरक्षित जगह ले जाना होगा।
सावित्री ने तुरंत कहा।
—पहले रघुवीर। मैं उसकी आंखों में देखकर सुनना चाहती हूं कि उसने मेरे साथ क्या किया।
अनन्या कुछ बोलती, उससे पहले बाहर से तेज आवाज आई। लोहे का दरवाजा धक्के से खुला। वही 2 आदमी अंदर घुसे। लंबे आदमी के हाथ में पिस्तौल थी। उसके पीछे रघुवीर था, होंठ फटा हुआ, आंखों के नीचे नीले निशान।
—सावित्री! कुछ मत देना! वह चिल्लाया।
लंबे आदमी ने पिस्तौल अनन्या की तरफ घुमाई।
—सरकारी खेल खत्म। पेन ड्राइव दो।
नारायण त्रिपाठी बिल्कुल नहीं घबराया। उसने बहुत धीमे स्वर में कहा।
—तुम लोग हमेशा एक गलती करते हो। तुम सोचते हो कि डरते हुए लोग अकेले होते हैं।
उसी पल बाहर से कई कदमों की आवाज आई। बिना सायरन की गाड़ियां पहले से घेराबंदी कर चुकी थीं। 4 अधिकारी पीछे के रास्ते से अंदर घुसे। लंबे आदमी ने पिस्तौल उठाने की कोशिश की, पर अनन्या ने बिजली जैसी तेजी से उसका हाथ मोड़ दिया। पिस्तौल जमीन पर गिर गई। छोटा आदमी भागा, पर दरवाजे पर ही पकड़ा गया।
रघुवीर वहीं घुटनों पर गिर पड़ा।
—सावित्री, मुझे माफ कर दे।
सावित्री ने उसे देखा। वह आदमी जिसे उसने 14 साल तक अपना घर समझा था, आज किसी टूटे हुए खंभे जैसा लगा। उसे याद आया कैसे वह सुबह 4 बजे उठती थी, आटा गूंथती थी, चाय उबालती थी, सर्दियों में ठंडे पानी से बर्तन धोती थी। रघुवीर कई बार उसके हाथों की दरारों को देखता था, पर कभी उनका दर्द नहीं समझता था। और उसी आदमी ने उसकी मेहनत से बने घर की दीवार में मौत छिपा दी थी।
—क्यों किया? उसने पूछा। आवाज में चीख नहीं थी, सिर्फ राख थी।
रघुवीर रो पड़ा।
—कर्ज था। फैक्ट्री बंद होने वाली थी। मां के इलाज में पैसे गए। पहले उन्होंने कहा बस 1 बैग रखना है। फिर कहा 2 दिन के लिए फोन रख दो। फिर फोटो दिखाए तुम्हारे ठेले की, तुम्हारे आने-जाने की। कहा कि अगर मना किया तो तुम्हें उठा लेंगे। मैं डर गया।
—तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?
—मैं सोचता रहा सब ठीक कर दूंगा।
—नहीं, रघुवीर। तुमने सोचा कि मैं जानूंगी तो सवाल करूंगी। और तुम्हें सवालों से डर लगता था।
रघुवीर ने सिर झुका लिया।
—मैंने तुझे कभी नुकसान नहीं पहुंचाना चाहा।
सावित्री की आंखें भर आईं, पर आवाज ठोस रही।
—किसी को ढाल बनाना भी नुकसान होता है। पत्नी कोई दीवार नहीं होती जिसमें तुम अपना पाप छिपा दो।
कमरे में कुछ पल तक कोई नहीं बोला।
अनन्या ने पेन ड्राइव ली, फिर नारायण की ओर देखा।
—बैकअप?
नारायण ने अपनी पुरानी थैली से प्लास्टिक में लिपटी दूसरी पेन ड्राइव निकाली।
—मैंने एक निर्दोष औरत को चाबी दी थी, बोझ नहीं। असली खेल की 3 कॉपी हैं।
सावित्री ने पहली बार बूढ़े को ठीक से देखा। वह भिखारी बनकर उसके घर आया था, पर असल में वह महीनों से उस जाल के पीछे था। उसे रघुवीर पर शक था, पर सबूत दीवार के भीतर थे। वह जानता था कि घर में घुसने का एकमात्र रास्ता दया थी, और सावित्री ने वही दरवाजा खोला था।
उस रात सावित्री को सुरक्षित जगह ले जाया गया। उसका बयान सुबह 6 बजे तक चलता रहा। उसने सब बताया: बारिश, बूढ़ा, चाबी, दीवार, 3 दस्तकें, फोन की धमकी, बाइक पर रघुवीर, और वह पंक्ति जिसमें लिखा था कि अगर वह सच जान जाए तो उसे घर से हटाया जाए।
अगले 2 दिनों में छापे पड़े। फर्नीचर फैक्ट्री के पीछे छिपा कमरा मिला। नकली दवाओं की खेप, हवाला रजिस्टर, अधिकारियों को दी गई रकम की सूची और कई गायब फाइलें बरामद हुईं। खबर चैनलों पर चली, पर सावित्री का नाम छिपाया गया। मोहल्ले में फिर भी बातें फैल गईं। किसी ने कहा रघुवीर का किसी और औरत से चक्कर था। किसी ने कहा सावित्री खुद गिरोह में थी। किसी ने कहा बूढ़ा तांत्रिक था। लोगों को सच से ज्यादा कहानी पसंद आती है, और औरत की चुप्पी पर सबसे ज्यादा।
जब सावित्री 5 दिन बाद घर लौटी, बैठक की दीवार टूटी हुई थी। अंदर का खाली हिस्सा अब खुला पड़ा था। उसने उस जगह हाथ रखा। उसे डर नहीं लगा। बस बहुत गहरा दुख लगा। यह घर कभी उसका आश्रय था, फिर उसका धोखा बना, और आखिर में उसकी गवाही।
रघुवीर को न्यायिक हिरासत में भेजने से पहले उसने मिलने की गुजारिश की। सावित्री गई, प्यार से नहीं, बल्कि अपने भीतर की आखिरी गांठ खोलने।
रघुवीर बहुत दुबला लग रहा था। आंखें सूजी थीं।
—सावित्री, मैंने सच में तुझसे प्यार किया था।
सावित्री ने शांत होकर कहा।
—प्यार किया होगा। पर प्यार वह नहीं जो औरत को अंधेरे में रखे और खुद को मजबूर कहे।
—क्या तू मेरा इंतजार करेगी?
सावित्री ने उसकी ओर लंबे समय तक देखा। फिर बोली।
—मैंने बहुत रातें तेरे इंतजार में काटीं, यह सोचकर कि तू काम कर रहा है। अब मैं किसी झूठ का इंतजार नहीं करूंगी।
रघुवीर रोता रहा। सावित्री मुड़ गई। इस बार उसने पीछे नहीं देखा।
नारायण त्रिपाठी 2 हफ्ते बाद गायब हो गया। बस एक सुबह उसके ठेले पर वही पुरानी कपड़े की थैली मिली। अंदर पीतल की चाबी थी और एक पर्ची।
“अच्छे लोग हमेशा इनाम नहीं पाते, पर कभी-कभी उन्हें दूसरी जिंदगी मिलती है। इसे डर में मत गंवाना।”
सावित्री ने वह घर बेच दिया। पैसे से उसने कानपुर के किदवई नगर के पास छोटा सा नाश्ते का दुकान किराए पर लिया। अब वह कचौड़ी के साथ पूरी-सब्जी, पोहा और चाय भी बेचती थी। 2 और औरतों को काम पर रखा, जिनमें से एक पति से अलग रह रही थी और दूसरी विधवा थी। दुकान के बाहर उसने बड़ा बोर्ड लगवाया: “सावित्री नाश्ता घर।”
लोग पूछते थे।
—दीदी, आप रात को जल्दी बंद क्यों कर देती हैं?
वह मुस्कुरा देती।
—क्योंकि अब मेरी जिंदगी सिर्फ कमाने के लिए नहीं है, जीने के लिए भी है।
कभी-कभी शाम को दुकान बंद करते समय कोई दरवाजे पर 3 बार दस्तक दे देता। ठक। ठक। ठक। उसके हाथ एक पल को ठिठक जाते। फिर वह खुद को याद दिलाती कि अब वह वही औरत नहीं रही जो डरकर चुप बैठ जाए।
उसने दीवारों पर भरोसा करना छोड़ दिया था। अब वह चेहरों को पढ़ती थी, खामोशियों को सुनती थी और अपने नाम को किसी के रहस्य का ताला बनने नहीं देती थी।
क्योंकि सावित्री ने उस रात समझ लिया था कि धोखा हमेशा बाहर से नहीं आता। कभी-कभी वह तुम्हारे साथ खाना खाता है, तुम्हारी थकान देखता है, तुम्हें पत्नी कहता है, और फिर तुम्हारी ही दीवार में ऐसा सच छिपा देता है जो तुम्हारी जान ले सकता है।
