
भाग 1
शादी के तीसरे दिन ही लखनऊ की उस तंग, तपती रसोई में नई बहू नंदिनी के हाथ जल गए, और उसकी ननद मीरा ने थाली पटककर कहा, “अमीर बाप की बेटी से गरीब घर की रोटी भी नहीं बनती।”
यह बात पूरे घर में पत्थर की तरह गिरी।
नंदिनी वही लड़की थी जिसने दिल्ली के अपने बड़े बंगले, गाड़ी, नौकर और ठंडी हवा वाले कमरों को छोड़कर समर से शादी की थी। समर साधारण नौकरी की तलाश में भटकता हुआ लड़का था, लेकिन उसका दिल साफ था। कॉलेज के दिनों से नंदिनी उससे प्यार करती थी। उसके पिता राजीव मल्होत्रा ने साफ कहा था, “उस घर में तेरे लिए इज्जत नहीं, संघर्ष है।”
नंदिनी ने उसी दिन जवाब दे दिया था, “जहां समर होगा, वहीं मेरा घर होगा।”
लेकिन शादी के बाद जब वह सचमुच समर के घर आई, तो उसे एहसास हुआ कि प्यार और गरीबी के बीच की दूरी किताबों में जितनी छोटी लगती है, असल जिंदगी में उतनी नहीं होती। घर छोटा था। रसोई में पंखा नहीं था। बर्तन पुराने थे। डिब्बों में बस दाल, चावल, आटा, आलू और थोड़ी सी हल्दी-मिर्च थी।
समर की मां सावित्री विधवा थीं। वह सिलाई करके अपने दोनों बच्चों को पाल चुकी थीं। उनका स्वभाव कठोर नहीं था, लेकिन गरीबी ने उनकी आवाज में हमेशा थकान भर दी थी। उन्होंने नंदिनी से प्यार से कहा, “बहू, घर में सामान कम है, लेकिन तू चिंता मत कर। जो है, उसी से घर चलता है। आज दाल, चावल, आलू की सब्जी और रोटी बना ले।”
नंदिनी ने सिर हिला दिया, पर उसके भीतर डर दौड़ गया। उसके मायके में उसने कभी गैस के सामने 20 मिनट भी नहीं बिताए थे। खाना बनाना थोड़ा-बहुत जानती थी, मगर रोटी उसके लिए हमेशा मजाक थी। वह आटा गूंधती तो चिपक जाता, बेलती तो भारत का नक्शा बन जाता, सेंकती तो आधी कच्ची, आधी जली निकलती।
उस दिन उसने जैसे-तैसे खाना बनाया। दाल फीकी थी, सब्जी में नमक कम था और रोटियां टेढ़ी-मेढ़ी थीं। मीरा ने पहला कौर मुंह में डालते ही व्यंग्य किया, “भाभी, आपके घर में नौकर खाना बनाते होंगे, लेकिन यहां हर दिन आपको ही बनाना पड़ेगा। यहां प्यार से पेट नहीं भरता।”
नंदिनी की आंखें भर आईं, लेकिन सावित्री ने मीरा को डांट दिया, “पहले दिन कोई जन्म से रसोइया नहीं आता।”
उस रात नंदिनी तकिए में चेहरा छिपाकर रोई। समर ने उसका हाथ पकड़ा, “थोड़ा समय दे दो, सब ठीक हो जाएगा।”
लेकिन अगले ही सुबह सावित्री ने आटा उसके सामने रख दिया।
“आज जब तक 3 गोल रोटियां नहीं बनेंगी, तू रसोई से बाहर नहीं जाएगी।”
नंदिनी ने चौंककर सावित्री को देखा। बाहर जून की धूप थी, अंदर चूल्हे की आग। और दरवाजे पर खड़ी मीरा मुस्कुरा रही थी, जैसे कोई तमाशा शुरू होने वाला हो।
भाग 2
नंदिनी ने पहली रोटी बेले तो वह चांद जैसी नहीं, टूटी हुई झील जैसी बनी। दूसरी रोटी गैस पर डालते ही जल गई। तीसरी इतनी मोटी थी कि सावित्री ने उसे देखकर कहा, “इसे रोटी नहीं, तकिया कहेंगे।” मीरा हंस पड़ी। नंदिनी का चेहरा पसीने और अपमान से भीग गया। वह रोते हुए बोली, “मां जी, मुझसे नहीं होगा। मैं सच में नहीं कर पाऊंगी।” सावित्री ने उसका हाथ पकड़ा, पहली बार नरमी से कहा, “रोने से घर नहीं चलता, सीखने से चलता है। तू अमीर घर से आई है, इसलिए नहीं डांट रही। तू मेरी बहू है, इसलिए सिखा रही हूं।” फिर सावित्री ने उसके हाथ पर अपना हाथ रखकर बेलन चलाया। 40 मिनट बाद एक रोटी सचमुच गोल बनी, फूल भी गई। नंदिनी उसे देखकर बच्चे की तरह खुश हो गई। उसने तुरंत समर को आवाज दी। समर ने रोटी देखी तो उसकी आंखों में गर्व आ गया। उस दिन नंदिनी ने पहली बार महसूस किया कि गरीबी में भी कोई उसे गिराने नहीं, उठाने वाला है। पर मीरा यह सब देख नहीं पा रही थी। उसे लगने लगा कि उसकी मां अब भाभी को बेटी से ज्यादा चाहने लगी है। कुछ दिनों बाद मोहल्ले में मध्यमवर्गीय बहुओं के लिए वेशभूषा प्रतियोगिता की घोषणा हुई, इनाम था 1 लाख। सावित्री ने कहा, “मेरी बहू जीतेगी। उसकी पोशाक मैं सिलूंगी।” 10 दिनों तक सावित्री ने रात-रात भर जागकर रंगीन कपड़ों से अद्भुत पोशाक बनाई। प्रतियोगिता से एक रात पहले मीरा चुपके से नंदिनी के कमरे में गई, कैंची उठाई और पूरी पोशाक ऐसे काट दी जैसे चूहों ने कुतर दी हो। सुबह नंदिनी ने वह पोशाक देखी और चीख पड़ी।
भाग 3
नंदिनी जमीन पर बैठ गई। उसके हाथ में वही कपड़ा था, जिसे सावित्री ने अपनी कमजोर आंखों और कांपती उंगलियों से सिला था। हर कटे हुए हिस्से में जैसे किसी ने सिर्फ कपड़ा नहीं, सावित्री की मेहनत, नंदिनी की उम्मीद और उस घर की इज्जत काट दी थी।
“मां जी…” नंदिनी की आवाज टूट गई, “अब मैं नहीं जा पाऊंगी।”
सावित्री ने पोशाक उठाई। उनकी आंखें एक पल के लिए ठिठक गईं। घर में चूहे नहीं थे, यह बात वह अच्छी तरह जानती थीं। मीरा दरवाजे के पास खड़ी थी, चेहरा नीचे, लेकिन आंखों में अजीब घबराहट थी। सावित्री सब समझ गईं, पर उस समय उन्होंने कुछ नहीं कहा।
“बहू,” उन्होंने धीमे से कहा, “जिस घर की औरत रोकर बैठ जाए, वह घर वहीं हार जाता है। तू उठ। अभी दिन खत्म नहीं हुआ।”
“लेकिन मां जी, पोशाक तो खत्म हो गई।”
सावित्री ने कटे हुए कपड़े को मोड़ा और बोलीं, “सिलाई वाली औरत के हाथ में कपड़ा खत्म हो सकता है, हुनर नहीं।”
वह बाहर निकलीं। गली में सब्जी वाला अपनी ठेली लेकर गुजर रहा था। ठेली पर हरी पत्ता गोभी रखी थी। सावित्री अचानक उसके सामने आ गईं।
“भैया, सारी पत्ता गोभी कितने की?”
सब्जी वाला चौंका, “सारी?”
“हां, सारी। जल्दी बताओ। मेरी बहू की इज्जत दांव पर है।”
कुछ ही देर में पूरी रसोई हरी पत्तियों, धागों, पुराने सुनहरे किनारों, मोतियों और कपड़े के टुकड़ों से भर गई। नंदिनी समझ नहीं पा रही थी कि सावित्री क्या करने वाली हैं। सावित्री ने उससे एक पुराना सादा गाउन मांगा। फिर पत्ता गोभी की बड़ी-बड़ी पत्तियों को साफ किया, हल्का सुखाया, उन्हें कपड़े पर परतों की तरह जमाया, बीच-बीच में सुनहरी किनारी लगाई और ऊपर छोटे-छोटे कांच के टुकड़ों से चमक दी।
मीरा दरवाजे के पीछे खड़ी यह सब देख रही थी। उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था। उसे उम्मीद थी कि पोशाक कटने के बाद नंदिनी टूट जाएगी, प्रतियोगिता में नहीं जाएगी, और घर में फिर वही पुरानी मीरा सबसे खास बन जाएगी। पर यहां तो उसकी मां अपने हाथों से असंभव को संभव बना रही थीं।
नंदिनी ने तैयार पोशाक पहनी तो वह किसी राजसी बाग की रानी जैसी लग रही थी। हरी पत्तियों की परतें घाघरे की तरह फैल रही थीं, सुनहरी किनारी धूप में चमक रही थी, और उसके चेहरे पर डर की जगह आत्मविश्वास था। सावित्री ने उसके माथे पर काजल का छोटा सा टीका लगाया।
“अब जा,” उन्होंने कहा, “आज लोग तेरे कपड़े नहीं, तेरी कहानी देखेंगे।”
समर ने पहली बार अपनी मां के पैर छुए और बोला, “मां, आपने सच में कमाल कर दिया।”
सावित्री मुस्कुराईं, “कमाल मैंने नहीं किया। कमाल तो तब होगा जब यह लड़की अपने डर को हराकर मंच पर चलेगी।”
प्रतियोगिता शहर के सामुदायिक भवन में थी। वहां कई बहुएं आई थीं। किसी ने महंगी राजस्थानी पोशाक पहनी थी, किसी ने फिल्मी रानी जैसा लहंगा, किसी ने मोर के पंखों जैसी सजावट। नंदिनी जब मंच के पीछे पहुंची, तो कुछ महिलाओं ने हंसकर कहा, “यह क्या पहनकर आई है? सब्जी मंडी से सीधी मंच पर?”
किसी ने फुसफुसाकर कहा, “गरीब घर की बहू है न, शायद असली कपड़े खरीदने के पैसे नहीं रहे होंगे।”
नंदिनी का आत्मविश्वास फिर से डगमगाया। उसे अपने पिता की बात याद आई, “उस घर में तुझे सिर्फ कमी मिलेगी।” उसे लगा शायद वह सचमुच गलत थी। शायद प्यार करके उसने अपनी दुनिया छोटी कर ली थी।
तभी सावित्री ने पीछे से उसका कंधा दबाया।
“जिसके पास सब कुछ हो, वह महंगी चीज पहनकर सुंदर लग सकती है। लेकिन जिसके पास कुछ न हो, वह अपनी हिम्मत पहनकर ही जीतता है।”
नंदिनी ने गहरी सांस ली और मंच पर चली गई।
रोशनी उसके ऊपर पड़ी। पहले दर्शकों में हल्की हंसी उठी। फिर संचालक ने पूछा, “आपकी पोशाक का विचार क्या है?”
नंदिनी ने माइक पकड़ा। उसका हाथ कांप रहा था, लेकिन आवाज साफ थी।
“यह पोशाक मेरी सास ने बनाई है। यह पत्ता गोभी की पत्तियों से बनी है, लेकिन इसकी असली सिलाई त्याग, जुगाड़ और मां के हाथों से हुई है। मैं अमीर घर से आई थी, लेकिन मैंने इस घर में सीखा कि कम चीजों में भी इज्जत बनाई जा सकती है। यह पोशाक बताती है कि मध्यमवर्ग की औरतें कमी को शर्म नहीं, कला बना देती हैं।”
सामुदायिक भवन में कुछ पल सन्नाटा छा गया। फिर तालियां गूंज उठीं। जो महिलाएं हंस रही थीं, वही अब हैरानी से उसे देख रही थीं। निर्णायकों ने पोशाक को पास से देखा। एक ने पूछा, “क्या यह सचमुच आज सुबह बनी है?”
सावित्री ने पीछे से कहा, “हां, बेटी रो रही थी, तो मां को जल्दी करनी पड़ी।”
यह सुनते ही कई औरतों की आंखें भर आईं।
नतीजा घोषित हुआ। तीसरे स्थान पर मोर वाली पोशाक, दूसरे स्थान पर राजस्थानी पोशाक, और पहला स्थान नंदिनी को मिला। 1 लाख का इनाम उसके हाथ में रखा गया। समर की आंखें भर आईं। सावित्री ने हाथ जोड़कर आसमान की तरफ देखा, जैसे अपने दिवंगत पति से कह रही हों कि बहू ने घर की लाज रख ली।
मगर उसी पल मीरा के भीतर कुछ टूट गया।
वह भीड़ से निकलकर मंच के पास आई। उसके चेहरे पर घबराहट, शर्म और पछतावा था। उसने नंदिनी के सामने हाथ जोड़ दिए।
“भाभी, मुझे माफ कर दो।”
नंदिनी चौंकी। सावित्री ने आंखें बंद कर लीं, जैसे वह जानती थीं कि यह क्षण आएगा।
मीरा रोते हुए बोली, “वह पोशाक चूहों ने नहीं काटी थी। मैंने काटी थी। मुझे लगा था मां आपसे ज्यादा प्यार करने लगी हैं। जब से आप आईं, सब आपको समझाने लगे, बचाने लगे, सिखाने लगे। मुझे लगा मेरा घर मुझसे छिन रहा है। मैं जल गई थी। मैंने सोचा अगर आपकी पोशाक खराब हो जाएगी तो आप सबके सामने हार जाएंगी।”
पूरा हॉल शांत हो गया।
नंदिनी के हाथ में पकड़ा इनाम भारी लगने लगा। समर ने गुस्से से मीरा की तरफ देखा, “तूने मां की 10 दिन की मेहनत काट दी?”
मीरा फूट-फूटकर रो पड़ी, “भैया, मुझे सजा दे दो, लेकिन भाभी से कहो मुझे इस घर से अलग मत कर देना।”
सावित्री आगे बढ़ीं। उनके चेहरे पर दुख था, पर क्रोध नहीं। उन्होंने मीरा के गाल पर हल्की चपत मारी।
“बेटी को मां का प्यार कम नहीं होता, जब घर में बहू आती है। घर बड़ा होता है। तूने यह बात नहीं समझी।”
मीरा सावित्री के पैरों में बैठ गई। “मां, मैं गलत थी।”
नंदिनी कुछ देर तक चुप रही। उसे वह पहला दिन याद आया जब मीरा ने उसकी रोटियों पर हंसी उड़ाई थी। वह तपती रसोई याद आई जहां उसका पसीना अपमान में घुल गया था। उसे यह भी याद आया कि इसी घर ने उसे रोटी बनानी सिखाई, टूटने पर उठना सिखाया, और आज मंच पर बोलना सिखाया।
वह धीरे से मीरा के पास गई और उसे उठाया।
“मैं तुम्हें माफ करती हूं,” नंदिनी ने कहा, “लेकिन एक शर्त पर।”
मीरा ने रोते हुए पूछा, “क्या?”
“कल से हम दोनों साथ में रोटी बनाएंगे। तुम मुझे तुम्हारे घर की आदतें सिखाओगी, और मैं तुम्हें यह सिखाऊंगी कि भाभी दुश्मन नहीं होती।”
हॉल में तालियां बज उठीं। सावित्री की आंखों से आंसू बह निकले। समर ने नंदिनी को देखा तो उसे पहली बार समझ आया कि उसने सिर्फ पत्नी नहीं, इस घर की धड़कन चुनी थी।
उस दिन वे 1 लाख लेकर घर लौटे। नंदिनी ने उस पैसे से सबसे पहले रसोई में पंखा लगवाया, नया तवा खरीदा, सावित्री के लिए अच्छी सिलाई मशीन ली और मीरा के लिए पढ़ाई का नया कोर्स भरवाया। जब उसने अपने पिता को यह खबर भेजी कि उसने प्रतियोगिता जीती है, तो उन्होंने बस इतना पूछा, “खुश हो?”
नंदिनी ने जवाब दिया, “हां पापा, क्योंकि यहां कमी है, लेकिन अपनापन भी है।”
कुछ महीनों बाद वही घर बदल चुका था। रसोई में अब गर्मी कम लगती थी। मीरा सचमुच नंदिनी के साथ रोटियां बनाती थी। कभी रोटी टेढ़ी बनती तो दोनों हंस पड़तीं। सावित्री उन्हें देखकर कहतीं, “जिस घर की औरतें साथ बैठकर हंसने लगें, उस घर का भाग्य खुल जाता है।”
एक शाम नंदिनी ने गोल-गोल फूली रोटियां बनाईं। उसने पहली रोटी तवे से उतारी, उस पर घी लगाया और सावित्री की थाली में रख दी।
सावित्री ने कौर तोड़ा, खाया और मुस्कुराकर बोलीं, “अब तो मेरी बहू सच में इस घर का स्वाद बन गई है।”
नंदिनी की आंखें भर आईं। उसने बाहर देखा। गली में वही सब्जी वाला ठेला लेकर जा रहा था। पत्ता गोभी फिर हरी-हरी चमक रही थी। वह मुस्कुरा दी, क्योंकि अब उसे पता था कि जिंदगी भी पत्ता गोभी जैसी ही होती है—ऊपर से साधारण, पर परतें खोलो तो हर परत में एक नई कहानी छिपी होती है।
उस दिन घर की छत पर सावित्री, नंदिनी, मीरा और समर ने साथ बैठकर खाना खाया। हवा हल्की थी, आसमान साफ था, और नंदिनी को पहली बार लगा कि उसने अपने पिता का महल नहीं छोड़ा, उसने अपने हिस्से का घर पा लिया है।
