भाग 1
—अगर बहू को पेट लेकर इतना ही नाटक करना था, तो शादी से पहले इतनी सीधी बनने की जरूरत नहीं थी —सावित्री देवी ने ड्राइंग रूम से कहा, जबकि उनकी 8 महीने की गर्भवती बहू रसोई में झुकी हुई, कांपते हाथों से तेल लगे बर्तन धो रही थी।
अर्जुन ने यह वाक्य उसी पल सुना, जब उसने रात 10:35 पर दिल्ली के लक्ष्मी नगर वाले अपने 2 कमरों के फ्लैट का दरवाजा खोला।
वह पूरी तरह टूट चुका था। ओखला की एक लॉजिस्टिक्स कंपनी में उसने 12 घंटे माल के डिब्बे उठाए थे, बिल चेक किए थे, ट्रक खाली करवाए थे और मालिक की डांट भी चुपचाप सह ली थी, क्योंकि महीने के आखिर में उसे किराया देना था, बिजली का बिल भरना था, मां की दवाइयां लानी थीं और अपने आने वाले बच्चे के लिए पैसे बचाने थे।
उसकी हथेलियों में छाले पड़ गए थे। कमर ऐसे जल रही थी जैसे किसी ने गरम सरिया रख दिया हो। लेकिन घर लौटते वक्त उसके मन में सिर्फ 1 ही तस्वीर थी—मीरा का चेहरा, उसका गोल पेट, और वह छोटा-सा बच्चा जो हर रात अर्जुन की हथेली के नीचे हल्का-सा लात मारता था।
वही लात अर्जुन की दुनिया थी।
लेकिन उस रात दरवाजा खुलते ही उसे घर नहीं, किसी बेपरवाह बारात के बाद छोड़ा हुआ मंडप लगा।
फर्श पर समोसे के टुकड़े बिखरे थे। सेंटर टेबल पर छोले भटूरे की खाली प्लेटें पड़ी थीं। कोने में कोल्ड ड्रिंक गिरकर चिपचिपी परत बन चुकी थी। सोफे पर डिस्पोजेबल गिलास उलटे पड़े थे। टीवी इतनी तेज आवाज में चल रहा था कि दीवारें कांप रही थीं।
सावित्री देवी सोफे पर पैर फैलाकर बैठी थीं, जैसे वह फ्लैट उन्हीं की जागीर हो। उनके हाथ में चिप्स का पैकेट था और चेहरे पर वही पुराना घमंड, जिसे अर्जुन बचपन से “मां का स्वभाव” समझकर माफ करता आया था।
उनकी 3 बेटियां भी वहीं थीं।
निशा नए मोबाइल से रील बना रही थी, वही मोबाइल जिसकी EMI अर्जुन भर रहा था।
पायल कान में ईयरबड लगाकर हंस रही थी और बगल में आधा खाया बर्गर पड़ा था।
सबसे छोटी तान्या ने सोफे पर पैर चढ़ा रखे थे और मुंह बनाकर कह रही थी कि बिरयानी में मसाला कम था।
किसी के चेहरे पर शर्म नहीं थी।
किसी को यह चिंता नहीं थी कि यह सब साफ कौन करेगा।
अर्जुन ने बैग दरवाजे के पास रखा और धीमी आवाज में पूछा:
—मीरा कहां है?
निशा ने बिना सिर उठाए जवाब दिया:
—किचन में होगी। बहू है, थोड़ी-बहुत सफाई तो करेगी ही।
पायल हंसी।
—भैया, इतनी चिंता मत करो। प्रेग्नेंट है, शीशे की गुड़िया नहीं।
सावित्री देवी ने लंबी सांस ली, जैसे वही सबसे ज्यादा दुख झेल रही हों।
—आजकल की लड़कियां 2 बर्तन धो लें तो दुनिया खत्म हो जाती है। जब मैं तेरे पेट में थी, अर्जुन, तब सुबह 5 बजे उठकर चूल्हा जलाती थी, कुएं से पानी लाती थी, फिर भी कभी तेरे बाप से शिकायत नहीं की।
अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसके भीतर कुछ काला और भारी उठने लगा।
वह रसोई की तरफ बढ़ा।
पहले उसे पानी की तेज आवाज सुनाई दी।
फिर स्टील के बर्तन के टकराने की खनखनाहट।
फिर एक धीमी सिसकी।
अर्जुन दरवाजे पर जाकर जम गया।
मीरा नंगे पैर ठंडे फर्श पर खड़ी थी। उसका बड़ा पेट सिंक से लग रहा था। एक हाथ गंदे पानी में डूबा था, दूसरे हाथ से वह अपनी कमर दबा रही थी। उसकी साड़ी का पल्लू आधा भीगा हुआ था। माथे पर पसीना था। चेहरे का रंग उड़ चुका था। होंठ सूख गए थे। आंखें लाल थीं, जैसे वह बहुत देर से रो रही हो।
वह रो भी ऐसे रही थी जैसे आवाज निकालने का भी उसे अधिकार न हो।
अर्जुन की छाती में कुछ टूट गया।
—मीरा…
मीरा बुरी तरह चौंक गई।
उसने जल्दी से आंचल से चेहरा पोंछा और जबरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश की।
—तुम आ गए? बस 5 मिनट। मैं तुम्हारे लिए दाल गरम कर देती हूं।
उसकी आवाज बीच में ही टूट गई।
अर्जुन ने आगे बढ़कर उसके हाथ से स्क्रबर छीन लिया और नल बंद कर दिया।
—अब तुम 1 भी बर्तन नहीं धोओगी।
मीरा की आंखों में डर उतर आया। उसने गर्दन घुमाकर ड्राइंग रूम की तरफ देखा।
—प्लीज, अर्जुन, अभी कुछ मत बोलना। मम्मी जी नाराज हो जाएंगी। मैं कर लूंगी।
—तुम कांप रही हो।
—थोड़ी थक गई हूं बस।
—थोड़ी नहीं। तुम टूट गई हो।
—मैं ठीक हूं।
—मेरी तरफ देखो।
मीरा ने उसकी तरफ देखा, मगर 2 सेकंड से ज्यादा खुद को संभाल नहीं पाई। उसका चेहरा मुड़ा और वह अर्जुन के सीने से लगकर फूट पड़ी।
—तुम्हारी मां कहती हैं कि मैं बोझ हूं —वह सुबकते हुए बोली—तुम्हारी बहनें कहती हैं कि तुम मर-मरकर कमाते हो और मैं पेट का बहाना बनाकर रानी बनी बैठी हूं। मैंने कोशिश की, अर्जुन। सच में कोशिश की। मैं चाहती थी वे मुझे अपना लें।
अर्जुन का गला सूख गया।
—ये कब से चल रहा है?
मीरा ने सिर झुका लिया।
—लगभग 2 महीने से।
अर्जुन को लगा जैसे पूरे फ्लैट की हवा किसी ने खींच ली हो।
2 महीने।
2 महीने से वह बाहर पसीना बहाकर सोच रहा था कि वह अपने परिवार को संभाल रहा है, और उसी दौरान उसका परिवार उसकी पत्नी को अंदर से तोड़ रहा था।
—तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?
मीरा ने कांपते हुए कहा:
—क्योंकि तुम पहले ही बहुत परेशान रहते हो। कर्ज है, किराया है, मां की दवा है। मुझे लगा अगर मैं बोलूंगी तो तुम बीच में फंस जाओगे। और मम्मी जी कहती थीं कि मैं तुम्हें तुम्हारे परिवार से अलग करना चाहती हूं।
अर्जुन ने दांत भींच लिए।
ड्राइंग रूम से टीवी की आवाज अब भी आ रही थी। वहां हंसी चल रही थी। यहां उसकी पत्नी सांस लेने के लिए संघर्ष कर रही थी।
तभी मीरा अचानक कराह उठी।
उसने दोनों हाथ पेट पर रखे और आगे झुक गई।
सिंक के किनारे रखा एक गिलास गिरकर फर्श पर टूट गया।
—मीरा!
अर्जुन ने उसे पकड़ लिया। उसका शरीर ठंडा था, मगर माथा पसीने से भीगा था।
ड्राइंग रूम से तान्या की आवाज आई:
—क्या गिरा दिया अब?
फिर पायल हंसी।
कोई उठा नहीं।
कोई पूछने नहीं आया।
सावित्री देवी ने टीवी की आवाज और बढ़ा दी।
अर्जुन ने मीरा को बांहों में उठाया। वह भारी नहीं लगी, बल्कि इतनी कमजोर लगी कि जैसे हवा से भी टूट जाएगी। वह उसे बेडरूम में ले गया और धीरे से बिस्तर पर लिटाया। मीरा अभी भी कह रही थी कि वह ठीक है, मगर उसकी सांसें छोटी-छोटी हो रही थीं।
अर्जुन ने तुरंत डॉक्टर रश्मि को फोन किया, जो मीरा की प्रेग्नेंसी देख रही थीं।
इस बार उसने कुछ नहीं छिपाया।
उसने बताया कि मीरा 8 महीने की गर्भवती है, घंटों खड़ी रही, पूरे घर का गंदा बर्तन धोती रही, उसे अपमान सहना पड़ा, और अब पेट में दर्द हो रहा है।
फोन के दूसरी तरफ डॉक्टर की आवाज सख्त हो गई।
—अर्जुन, अभी से पूरा बेड रेस्ट। कोई तनाव नहीं। कोई सफाई नहीं। कोई झुकना नहीं। अगर दर्द दोबारा बढ़े, पानी जैसा कुछ निकले या ब्लीडिंग हो, तो तुरंत अस्पताल लेकर आना। ऐसे हालात बच्चे और मां दोनों के लिए खतरनाक हो सकते हैं।
अर्जुन की उंगलियां फोन पर जम गईं।
उसने मीरा के पैरों के नीचे तकिया रखा। पानी दिया। माथा पोंछा। मीरा बार-बार माफी मांग रही थी, जैसे गलती उसी की हो।
—मुझे माफ कर दो —वह बुदबुदाई—मैं मजबूत नहीं निकली।
अर्जुन की आंखें भर आईं।
—मजबूत तुम हो। अंधा मैं था।
मीरा ने आंखें बंद कर लीं।
अर्जुन उसके पास बैठा रहा। जब वह थोड़ी देर के लिए नींद में गई, तो वह उसके सिरहाने तकिया ठीक करने लगा। तभी उसकी नजर बिस्तर के नीचे रखी एक छोटी नीली डायरी पर पड़ी।
मीरा की आंख तुरंत खुल गई।
उसने घबराकर हाथ बढ़ाया।
—वो मत देखो।
अर्जुन रुक गया।
—इसमें क्या है?
मीरा की पलकों पर फिर आंसू आ गए।
—मैं पागल नहीं हूं, ये साबित करने के लिए लिखती थी।
अर्जुन ने धीरे से डायरी खोली।
पहला पन्ना।
सोमवार, रात 9:15।
मम्मी जी ने कहा, “पेट लेकर घर में पड़ी रहेगी तो बच्चे भी आलसी पैदा होंगे।”
बुधवार, रात 11:00।
निशा दीदी ने मेरा वीडियो बनाया, जब मैं झाड़ू लगा रही थी। बोलीं, “देखो, हमारी घर की नौकरानी प्रेग्नेंसी पैकेज में आई है।”
शुक्रवार, शाम 7:40।
पायल ने मेरी कुर्सी हटा दी। बोली, “इतना बैठेगी तो मोटी ही होगी।”
रविवार, रात 10:05।
तान्या ने कोल्ड ड्रिंक फर्श पर गिराई और कहा, “भाभी, तुम्हारा काम तैयार है।”
हर लाइन अर्जुन के चेहरे पर तमाचे जैसी पड़ रही थी।
लेकिन अगला पन्ना खोलते ही उसका खून जम गया।
मीरा उठने की कोशिश करने लगी।
—नहीं, अर्जुन… वो मत पढ़ो।
अर्जुन पढ़ता गया।
मम्मी जी ने कहा कि बच्चा पैदा होते ही वह उसे अपने कमरे में सुलाएंगी। बोलीं कि मीरा दिमाग से कमजोर है। अगर मीरा ने विरोध किया, तो वह रिश्तेदारों से कहेंगी कि बहू बच्चे के लिए खतरा है। बोलीं, “बच्चा हमारा खून है। मीरा तो बाहर की लड़की है।”
अर्जुन ने धीरे से नजर उठाई।
—इसका मतलब क्या है?
मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।
—तुम्हारी मां कहती हैं कि मुझे मां बनना नहीं आता। वह कहती हैं कि अगर मैंने बच्चे को खुद पालने की जिद की, तो वे सबको बोलेंगी कि मैं मानसिक रूप से ठीक नहीं हूं। उन्होंने कहा कि बच्चा उनके पास रहेगा… मैं चाहूं तो मायके चली जाऊं।
अर्जुन को मिचली-सी आने लगी।
यह सिर्फ ताने नहीं थे।
यह सिर्फ सास-बहू का झगड़ा नहीं था।
यह एक योजना थी।
वे मीरा को पहले कमजोर साबित करना चाहती थीं, फिर उससे उसका बच्चा छीनना चाहती थीं।
—कोई सबूत है? —अर्जुन ने मुश्किल से पूछा।
मीरा ने कांपते हाथों से मोबाइल अनलॉक किया।
उसमें ऑडियो थे।
वीडियो थे।
मैसेज थे।
अर्जुन ने पहला ऑडियो चलाया।
सावित्री देवी की आवाज कमरे में गूंजी।
—बच्चा पैदा हो जाए, फिर देखना। मीरा अगर ज्यादा बोलेगी तो उसे मायके भेज देंगे। बच्चा यहीं रहेगा। आखिर पोता हमारा है।
अर्जुन की मुट्ठियां कांपने लगीं।
दूसरा ऑडियो।
निशा हंस रही थी।
—रिकॉर्ड कर, रिकॉर्ड कर। इतनी बड़ी तोंद लेकर बर्तन धो रही है। वायरल हो जाएगी।
तीसरा ऑडियो।
पायल की आवाज आई।
—भैया को मत बताना। वो तो अपनी देवी बहू के आगे अंधा है।
अर्जुन ने फोन बंद कर दिया।
उसका चेहरा शांत था, मगर आंखों में वह खामोशी थी जो तूफान से पहले आती है।
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
—प्लीज, कुछ गलत मत करना।
अर्जुन ने उसकी पेशानी चूमी।
—गलत उन्होंने किया है।
वह उठा। एक हाथ में डायरी थी, दूसरे में मोबाइल।
ड्राइंग रूम से अब भी हंसी की आवाज आ रही थी।
अर्जुन दरवाजे पर रुका, पीछे मुड़कर अपनी पत्नी को देखा, और पहली बार उसे समझ आया कि उस रात वह सिर्फ पति नहीं था।
वह अपने घर की आखिरी दीवार था।
और अगर वह अब नहीं खड़ा हुआ, तो उसकी पत्नी और उसका बच्चा हमेशा के लिए टूट जाएंगे।
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भाग 2
अर्जुन ड्राइंग रूम में पहुंचा तो सावित्री देवी ने बिना उसकी तरफ देखे कहा कि बहू का नाटक खत्म हो गया हो तो सुबह रसोई ठीक से चमकनी चाहिए। अर्जुन ने टीवी का प्लग निकाल दिया। अचानक पूरे कमरे में चुप्पी छा गई। निशा ने मोबाइल नीचे किया, पायल ने आंखें तरेरीं, तान्या ने मुंह बनाया, लेकिन अर्जुन ने किसी को बोलने का मौका नहीं दिया। उसने मीरा की डायरी टेबल पर रखी और मोबाइल से वह ऑडियो चला दिया जिसमें सावित्री देवी साफ कह रही थीं कि बच्चा पैदा होने के बाद मीरा चाहे तो मायके चली जाए, मगर पोता घर में रहेगा। सावित्री देवी का चेहरा एक पल को पत्थर हो गया, फिर वह तुरंत रोने की आवाज बनाकर बोलीं कि बात को तोड़ा-मरोड़ा गया है। अर्जुन ने पहली बार बिना चिल्लाए कहा कि अब कोई नाटक नहीं चलेगा। उसने किराया, राशन, बिजली, गैस, इंटरनेट, दवाइयां, बहनों की EMI और उनके खर्चों की पूरी सूची गिनाई। फिर उसने पूछा कि इस घर में योगदान किसने दिया, और मीरा को रुलाने का अधिकार किसने दिया। किसी ने जवाब नहीं दिया। उसी समय तान्या की आंखें भर आईं। वह सबसे छोटी थी, और शायद पहली बार उसे समझ आया कि मामला मजाक से आगे जा चुका है। उसने कांपती आवाज में सच उगल दिया कि मां ने मीरा के अस्पताल और बच्चे के सामान के लिए रखे 75,000 रुपये भी निकाल लिए थे। अर्जुन जैसे जमीन में धंस गया। वह पैसे मीरा ने महीनों तक अपनी दवाइयों में कटौती करके, अपनी जरूरतें रोककर, और मायके से आए छोटे-छोटे लिफाफे बचाकर रखे थे। सावित्री देवी ने कहा कि घर की जरूरत थी, लेकिन अर्जुन ने उनके पर्स से आधे पैसे, सोने की छोटी चेन की रसीद और एक लोकल फाइनेंसर की पर्ची निकालकर देखा तो सच्चाई और गहरी थी। पैसा पायल के नए फोन, निशा के मेकअप कोर्स और सावित्री देवी के गुप्त कर्ज में गया था। तभी दरवाजे पर जोर से दस्तक हुई। बाहर वही फाइनेंसर के 2 आदमी खड़े थे, जो पैसे मांगने आए थे। उनमें से एक ने धमकी दी कि अगर आज भुगतान नहीं हुआ तो घर से सामान उठेगा। सावित्री देवी ने घबराकर अर्जुन की तरफ देखा, जैसे हमेशा की तरह बेटा बचा लेगा। मगर इस बार अर्जुन ने दरवाजा पूरा खोल दिया और शांत आवाज में कहा कि कर्ज जिसने लिया है, बात उसी से होगी। उसी पल सावित्री देवी समझ गईं कि उनका बेटा पहली बार सचमुच उनका बेटा नहीं, मीरा और अजन्मे बच्चे का पिता बनकर खड़ा है। ❤️नमस्ते, प्यारे रीडर्स! अगर आप अगले पार्ट के लिए तैयार हैं, तो प्लीज़ नीचे “Yes” लिखें, और मैं इसे तुरंत भेज दूँगा। मैं उन सभी के अच्छे स्वास्थ्य और खुशी की कामना करता हूँ जिन्होंने यह कहानी पढ़ी और पसंद की है! 💚
भाग 3
फाइनेंसर के आदमी दरवाजे पर खड़े थे और पूरे फ्लैट में ऐसी खामोशी फैल गई थी जैसे हर दीवार ने अपनी सांस रोक ली हो।
सावित्री देवी का चेहरा पीला पड़ चुका था। कुछ मिनट पहले तक जो औरत अपनी गर्भवती बहू को नौकरानी से भी बदतर समझ रही थी, अब उसी बहू के पति की तरफ ऐसी नजरों से देख रही थी जैसे वही उसका आखिरी सहारा हो।
अर्जुन ने पहली बार उस नजर को पहचान लिया।
वह ममता की नजर नहीं थी।
वह आदत की नजर थी।
वर्षों से सावित्री देवी ने अर्जुन को अपनी गलती का इलाज समझा था। बेटियां खर्च करें, अर्जुन भरे। मां कर्ज ले, अर्जुन चुकाए। घर में झगड़ा हो, अर्जुन चुप रहे। बहू रोए, अर्जुन समझौता कराए। और हर बार एक ही वाक्य उसके गले में फंदे की तरह डाला जाता:
—मैं तेरी मां हूं।
इस बार वह फंदा टूट गया।
फाइनेंसर के आदमी में से एक ने कड़क आवाज में कहा:
—सावित्री जी कौन हैं? 90,000 का हिसाब बाकी है। आज बात साफ होनी चाहिए।
निशा के हाथ से मोबाइल गिरते-गिरते बचा। पायल ने मां की तरफ देखा। तान्या रो रही थी।
सावित्री देवी ने अर्जुन की तरफ हाथ बढ़ाया।
—बेटा, तू अंदर चल। ये लोग बदतमीज हैं। तू इनसे बात कर ले।
अर्जुन ने कहा:
—जिसने उधार लिया है, बात वही करेगी।
—तू अपनी मां को सड़क पर खड़ा तमाशा बनते देखेगा?
—जिस रात आपने मेरी 8 महीने की पत्नी को दर्द में छोड़कर टीवी की आवाज बढ़ाई थी, उस रात तमाशा आपने बनाया था।
सावित्री देवी तिलमिला उठीं।
—उस लड़की ने तुझे मेरे खिलाफ कर दिया है।
अर्जुन की आवाज पहली बार सख्त हुई।
—उस लड़की का नाम मीरा है। वह मेरी पत्नी है। मेरे बच्चे की मां है। और इस घर में अगर किसी ने मुझे किसी के खिलाफ किया है, तो वह आपकी अपनी हरकतें हैं।
फाइनेंसर के आदमी अब समझ गए थे कि मामला घर का है। अर्जुन ने उन्हें अंदर नहीं आने दिया। उसने सावित्री देवी से वहीं दरवाजे पर कहा कि वह लिखित में बताएंगी कि कर्ज उनका है, अर्जुन का नहीं। आदमी ने जेब से कागज निकाला। सावित्री देवी पहले मना करती रहीं, मगर जब अर्जुन ने साफ कहा कि वह पुलिस को बुलाएगा और रिकॉर्डिंग भी देगा, तो उनके हाथ कांपने लगे।
—तू पुलिस बुलाएगा? अपनी मां पर?
—अपनी पत्नी और बच्चे की सुरक्षा के लिए मैं किसी पर भी बुलाऊंगा।
यह सुनकर पायल चीख पड़ी।
—भैया, तुम बदल गए हो!
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
—हां। बहुत देर से बदला हूं।
उसने उसी रात अपने पुराने दोस्त विवेक को फोन किया, जो अब एक वकील था। उसने सब बताया—मीरा की डायरी, ऑडियो, चोरी हुए 75,000, फाइनेंसर का कर्ज, धमकियां और बच्चे को छीनने की बात। विवेक ने साफ कहा कि पहले मीरा को सुरक्षित रखो, फिर कानूनी नोटिस और पुलिस में शिकायत की तैयारी करो।
अर्जुन ने फोन रखते ही फैसले लेने शुरू कर दिए।
उसने बहनों के मोबाइल की EMI बंद कर दी। अपनी अतिरिक्त बैंक कार्ड ब्लॉक कर दी। घर की अलमारी का लॉक बदला। ऑनलाइन पेमेंट के पासवर्ड बदल दिए। डॉक्टर रश्मि को फिर कॉल करके बताया कि मीरा को तनाव से दूर रखना है। फिर उसने मीरा के मायके फोन किया।
मीरा के पिता, हरिओम शर्मा, रात 12 बजे भी फोन उठाकर घबरा गए।
—बेटा, मीरा ठीक है न?
अर्जुन का गला भर आया।
—पापा, मीरा ठीक नहीं थी। और मेरी गलती है कि मुझे देर से पता चला। क्या आप सुबह आ सकते हैं?
हरिओम कुछ देर चुप रहे। फिर बोले:
—सुबह नहीं। मैं अभी निकल रहा हूं।
मीरा यह सब सुन रही थी। उसकी आंखों में डर और राहत दोनों थे।
—अर्जुन, पापा को परेशान मत करो।
—तुमने 2 महीने तक सब अकेले सहा। अब कोई अकेला नहीं रहेगा।
सुबह 4 बजे हरिओम और मीरा की मां, सुनीता, गाजियाबाद से ऑटो और मेट्रो बदलते हुए पहुंचे। सुनीता ने बेटी को देखा तो उनके चेहरे से खून उतर गया। मीरा की सूजी आंखें, पीला चेहरा, कांपते हाथ और पेट पर रखा डर—सब कुछ मां ने बिना शब्दों के पढ़ लिया।
सुनीता ने मीरा को गले लगाया।
—बिटिया, तूने हमें क्यों नहीं बताया?
मीरा बच्ची की तरह रो पड़ी।
—मां, मुझे लगा मेरी वजह से अर्जुन का घर टूट जाएगा।
हरिओम ने अर्जुन की तरफ देखा। उस नजर में गुस्सा भी था और दर्द भी।
अर्जुन ने सिर झुका लिया।
—गलती मेरी है, पापा। मैंने पैसे भेजे, बिल भरे, लेकिन घर के अंदर क्या हो रहा है, नहीं देखा।
हरिओम ने भारी आवाज में कहा:
—गलती देखना बंद करने की थी। अब सुधारना बंद मत करना।
यही वाक्य अर्जुन के भीतर हथौड़े की तरह लगा।
उस दिन दोपहर तक घर में सब कुछ बदल चुका था।
सावित्री देवी और उनकी 3 बेटियों को साफ कह दिया गया कि वे 48 घंटे में घर खाली करेंगी। अर्जुन ने यह फ्लैट किराए पर अपने नाम से लिया था। घर का हर बिल उसके खाते से जाता था। उसने वकील से बात करके लिखित नोटिस तैयार करवाया। मीरा की मेडिकल स्थिति का प्रमाण डॉक्टर से लिया गया। चोरी हुए पैसों और मानसिक उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराने की तैयारी हुई।
सावित्री देवी पहले रोईं।
—मैंने तुझे 9 महीने पेट में रखा था।
अर्जुन ने धीमे से कहा:
—मीरा भी मेरे बच्चे को 8 महीने से पेट में रखे हुए है। फर्क इतना है कि आपने उसे आराम नहीं, अपमान दिया।
फिर वह गुस्से में आईं।
—बुढ़ापे में मां को निकाल देगा? लोग थूकेंगे तुझ पर।
—लोगों ने मुझे नहीं देखा था जब मेरी पत्नी रसोई में दर्द से झुक रही थी और आप टीवी देख रही थीं।
फिर उन्होंने रिश्तेदारों को फोन किया।
दोपहर तक चाचा, मामा, बुआ, 2 पड़ोसी और कुछ “समझदार” लोग आ गए। भारतीय घरों में सच से पहले पंचायत आ जाती है। हर कोई अर्जुन को समझाने लगा।
—मां है, गलती हो जाती है।
—बहू को भी थोड़ा सहना चाहिए।
—बच्चा होने वाला है, ऐसे समय घर तोड़ना ठीक नहीं।
—औरतें आपस में बोलती रहती हैं, आदमी को बीच में नहीं पड़ना चाहिए।
अर्जुन सब सुनता रहा।
फिर उसने टीवी के सामने मोबाइल रखा और ऑडियो चला दिया।
सावित्री देवी की आवाज साफ सुनाई दी:
—मीरा दिमाग से कमजोर है। बच्चा पैदा होते ही उसे अलग कर देंगे। बच्चा हमारे पास रहेगा।
कमरे में बैठे सभी लोगों की गर्दनें झुकने लगीं।
फिर उसने दूसरा ऑडियो चलाया।
—बच्चा हमारा खून है, वह बाहर की लड़की है।
सुनीता ने मुट्ठी भींच ली। हरिओम की आंखें लाल हो गईं। एक पड़ोसन, जो अब तक सावित्री देवी की तरफ थी, धीरे से बोली:
—ये तो बहुत गलत है।
सावित्री देवी चिल्लाईं।
—ये सब रिकॉर्डिंग करके बहू ने घर में जासूसी की है!
मीरा पहली बार खुद बोली।
उसकी आवाज कमजोर थी, मगर साफ थी।
—मैंने जासूसी नहीं की। मैंने सबूत रखा, क्योंकि आप रोज मुझे पागल कहती थीं।
कमरे में सन्नाटा फैल गया।
मीरा ने अपनी डायरी खोली। वह रोते हुए नहीं, बल्कि कांपते साहस के साथ पन्ने पढ़ने लगी। हर तारीख, हर ताना, हर अपमान। वह दिन जब उसे खाना नहीं दिया गया क्योंकि उसने बैठकर रोटी बेलने की हिम्मत की थी। वह रात जब निशा ने कहा था कि मां बनने के बाद वह और मोटी हो जाएगी। वह शाम जब पायल ने दवा छिपाकर कहा था कि इतनी दवाइयां गरीब घर की बहुओं को नहीं मिलतीं। वह सुबह जब सावित्री देवी ने कहा था कि बच्चे को दूध भी वह अपने हिसाब से पिलवाएंगी।
अर्जुन ने पहली बार देखा कि सच बोलती हुई मीरा कैसी लगती है।
कमजोर नहीं।
टूटी हुई नहीं।
बल्कि राख से उठती हुई।
सावित्री देवी की कहानी वहीं ढहने लगी।
48 घंटे बाद वे सचमुच घर से निकलीं।
निशा ने जाते-जाते कहा:
—भैया, तुम पछताओगे।
अर्जुन ने जवाब दिया:
—मैं पहले ही पछता रहा हूं। फर्क बस इतना है कि अब सही वजह से पछता रहा हूं।
पायल ने सूटकेस खींचते हुए गाली दी। तान्या दरवाजे पर रुक गई। उसकी आंखों में शर्म थी।
—भाभी… मैं माफ़ी के लायक नहीं हूं।
मीरा ने कुछ नहीं कहा। सिर्फ उसे देखा।
तान्या ने सिर झुकाया और चली गई।
सावित्री देवी सबसे आखिरी में निकलीं। उनके चेहरे पर अब भी हार मानने का भाव नहीं था। जाते-जाते उन्होंने अर्जुन से कहा:
—उसने तुझे मुझसे छीन लिया।
अर्जुन ने दरवाजा पकड़ते हुए कहा:
—नहीं मां। आपने मुझे उसी दिन खो दिया था, जिस दिन आपने मेरे बच्चे की मां को नौकरानी समझा।
दरवाजा बंद हुआ।
उस आवाज के बाद फ्लैट में पहली बार शांति थी।
अजीब, भारी, अनजान शांति।
अर्जुन ने चारों तरफ देखा। गंदगी अभी भी थी। फर्श चिपचिपा था। रसोई भरी थी। सोफे पर दाग थे। लेकिन पहली बार उस घर में डर नहीं था।
उसने झाड़ू उठाई।
मीरा ने बिस्तर से आवाज दी:
—तुम थके हो।
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
—आज तक गलत जगह थकता रहा। अब सही जगह काम कर रहा हूं।
उसने पूरे घर को साफ किया। बर्तन धोए। फर्श पोछा। पुराने गत्ते फेंके। सोफे के कवर बदले। फिर चाय बनाई और मीरा के पास बैठ गया।
कप पकड़ते हुए उसकी उंगलियां कांपीं।
—मुझे माफ कर दो, मीरा।
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
—तुमने मुझे मारा नहीं, अपमान नहीं किया, पैसे नहीं चुराए।
—लेकिन मैं मौजूद नहीं था।
मीरा की आंखें भर आईं।
—तुम लौट आए। कुछ लोग कभी नहीं लौटते।
अर्जुन रो पड़ा। वह रोना किसी बच्चे जैसा था, जिसे पहली बार समझ आया हो कि मजबूत बनने के चक्कर में उसने अपने ही घर की चीखें नहीं सुनीं।
अगले 3 हफ्ते कठिन थे, मगर सुरक्षित थे।
हरिओम और सुनीता कुछ दिन वहीं रहे। डॉक्टर रश्मि नियमित जांच करती रहीं। मीरा को पूरा आराम मिला। अर्जुन ने कंपनी से आधी छुट्टियां लीं, कुछ दिन बिना वेतन भी रहा, मगर पहली बार उसे पैसों से ज्यादा जिंदगी की कीमत समझ आई।
सावित्री देवी ने रिश्तेदारों में बातें फैलाईं।
—बहू ने बेटा छीन लिया।
—मीरा नाटक करती है।
—बच्चा पैदा होगा तो देखना, वही पछताएंगे।
लेकिन इस बार अर्जुन हर बात का जवाब देने नहीं भागा। उसे समझ आ गया था कि जो लोग सच सुनकर भी झूठ के साथ खड़े रहना चाहते हैं, उन्हें समझाना अपनी आत्मा को थकाना है।
3 हफ्ते बाद, एक बरसाती रात को मीरा को प्रसव पीड़ा शुरू हुई।
अर्जुन ने उसे अस्पताल पहुंचाया। रास्ते भर मीरा उसका हाथ पकड़े रही। उसके चेहरे पर दर्द था, मगर उस दर्द में वह पुराना डर नहीं था। इस बार वह अकेली नहीं थी।
अस्पताल के कमरे के बाहर अर्जुन बेचैन घूमता रहा। हरिओम मंत्र बुदबुदा रहे थे। सुनीता रो-रोकर भगवान से प्रार्थना कर रही थीं। सुबह 5:18 पर बच्चे की पहली रोने की आवाज आई।
नर्स बाहर आई और मुस्कुराकर बोली:
—बेटा हुआ है। मां और बच्चा दोनों सुरक्षित हैं।
अर्जुन दीवार से टिक गया। उसके घुटने कमजोर पड़ गए। वह जमीन पर बैठ गया और दोनों हाथों से चेहरा ढककर रोने लगा।
यह खुशी थी।
यह डर का अंत था।
यह उस गलती का बोझ था जिसे वह जिंदगी भर याद रखने वाला था।
जब उसने अपने बेटे को पहली बार गोद में लिया, तो बच्चा छोटी-सी मुट्ठी बांधे हुए था, जैसे दुनिया से पहले ही कह रहा हो कि वह झुकेगा नहीं।
मीरा थकी हुई मुस्कुरा रही थी।
—देखो, बिल्कुल तुम्हारी तरह जिद्दी है।
अर्जुन ने बच्चे की हथेली चूमी।
—नहीं। यह अपनी मां जैसा मजबूत है।
मीरा की आंखों से आंसू बह निकले।
कुछ दिनों बाद वे घर लौटे। वही फ्लैट अब बदल चुका था। दरवाजे पर छोटा-सा तोरण था। कमरे में बच्चे का पालना था। रसोई साफ थी। दीवार पर मीरा ने पीले रंग का छोटा-सा सूरज बनाया था, जिसके नीचे लिखा था—“घर वही जहां डर खत्म हो।”
अर्जुन ने बेटे का नाम आरव रखा।
आरव की किलकारियों ने उस घर की खामोशी भर दी। मीरा धीरे-धीरे फिर हंसने लगी। वह अब बात करते हुए इजाजत नहीं मांगती थी। वह खाना बनाती तो प्यार से, मजबूरी से नहीं। बैठती तो अपराधबोध से नहीं, आराम से। बच्चे को गोद में उठाती तो सावित्री देवी की धमकी याद नहीं आती, बल्कि अपने भीतर की जीत याद आती।
अर्जुन भी बदल गया।
अब वह घर लौटते ही पहले बिल नहीं देखता था।
पहले मीरा को देखता था।
पहले आरव को गोद लेता था।
पहले पूछता था:
—आज तुमने आराम किया?
मीरा कभी हंसकर कहती:
—हां, कप्तान साहब।
कभी कहती:
—थोड़ा नहीं किया, तो क्या जेल भेजोगे?
अर्जुन मुस्कुराता, मगर उसके भीतर एक वादा हमेशा जागता रहता।
1 साल बाद तान्या वापस आई।
दरवाजे पर खड़ी थी। हाथ में डायपर का पैकेट था, आंखों में पछतावा।
—भाभी, मैं अंदर आने का हक नहीं मांग रही। बस ये देना था। और कहना था कि उस दिन… मुझे बहुत पहले बोल देना चाहिए था।
मीरा ने दरवाजे पर खड़े-खड़े उसे देखा।
—सच बोलने में देर हुई, लेकिन तुमने बोला।
तान्या रो पड़ी।
—क्या कभी माफ कर पाओगी?
मीरा ने तुरंत हां नहीं कहा। उसने झूठी महानता नहीं दिखाई।
—माफ़ी आसान शब्द है, तान्या। भरोसा धीरे-धीरे लौटता है।
तान्या ने सिर हिलाया।
—मैं इंतजार करूंगी।
अर्जुन ने तान्या को अंदर आने दिया, मगर शर्तों के साथ। कोई ताना नहीं। कोई पुरानी चाल नहीं। कोई सावित्री देवी की तरफ से संदेश नहीं।
तान्या ने आरव को दूर से देखा और रोते हुए मुस्कुरा दी।
सावित्री देवी कभी वापस नहीं आईं। वे रिश्तेदारों में अब भी यही कहती रहीं कि मीरा ने अर्जुन को बदल दिया। वह हर शादी-ब्याह में यही कहानी सुनातीं कि बहू ने मां-बेटे के बीच दीवार खड़ी कर दी।
और सच तो यह था कि अर्जुन सचमुच बदल गया था।
वह अब वह बेटा नहीं था जो मां की हर बात को धर्म समझता था।
वह अब वह भाई नहीं था जो बहनों की हर लापरवाही को जिम्मेदारी मानकर भरता था।
वह अब वह पति नहीं था जो सोचता था कि पैसे कमाना ही सुरक्षा है।
उसे समझ आ गया था कि घर सिर्फ किराया भरने से नहीं चलता।
घर तब चलता है जब रसोई में रोती हुई पत्नी की आवाज टीवी से ऊंची सुनाई दे।
जब मां का सम्मान बहू के अपमान पर खड़ा न हो।
जब “परिवार” शब्द का इस्तेमाल किसी को चुप कराने के लिए न किया जाए।
जब बच्चा पैदा होने से पहले ही यह तय कर लिया जाए कि उसे डर की विरासत नहीं दी जाएगी।
एक रात, आरव 1 साल का हो चुका था। वह चलना सीख रहा था। डगमगाते कदमों से वह मीरा से अर्जुन की तरफ आया। अर्जुन ने हाथ फैलाए। आरव लड़खड़ाया, गिरा नहीं। फिर हंस पड़ा।
मीरा ने कहा:
—देखा? संभल गया।
अर्जुन ने बेटे को उठाकर सीने से लगाया और खिड़की से बाहर दिल्ली की रोशनियों को देखा।
उसे वह रात याद आई जब इसी घर में मीरा ठंडे फर्श पर नंगे पैर बर्तन धो रही थी।
उसे वह डायरी याद आई।
वह आवाज याद आई—“बच्चा हमारा है, वह बाहर की लड़की है।”
अर्जुन ने आरव के कान के पास फुसफुसाया:
—तेरी मां कभी बाहर की नहीं थी। हम ही देर से घर पहुंचे थे।
मीरा ने यह सुन लिया।
वह कुछ नहीं बोली।
बस चुपचाप अर्जुन के कंधे पर सिर रख दिया।
उस घर में अब टीवी की आवाज तेज नहीं होती थी।
अब वहां बच्चे की हंसी गूंजती थी।
और कभी-कभी रात को, जब सब सो जाते, अर्जुन उठकर रसोई में जाता, खाली सिंक देखता, साफ फर्श देखता, फिर बेडरूम में लौटकर मीरा और आरव को देखता।
हर बार उसके मन में 1 ही बात आती।
उसने अपनी मां को उस दिन नहीं खोया था।
उसने अपनी आंखें उस दिन पाई थीं।
और सावित्री देवी ने अपना बेटा उस रात खोया था, जब उन्होंने 8 महीने की गर्भवती बहू को दर्द से झुकते देखा…
और मदद करने के बजाय टीवी की आवाज बढ़ा दी।
