एक माँ को बच्चों से मिलना था, पर एक “दयालु” अजनबी उसे तहखाने में जंजीरों से बाँध गया… 4 महीने बाद जब उसने भरोसे का नाटक किया, वही दरवाजा खुला जहाँ 3 और लड़कियाँ मौत का इंतजार कर रही थीं

भाग 1

पहली रात ही कविता ने उस गड्ढे को देखकर समझ लिया था कि यह कोई तहखाना नहीं, उसकी अपनी कब्र बनने वाली जगह है।

दिल्ली की सर्दी उस शाम हड्डियों में उतर रही थी। कविता 25 साल की थी, 3 छोटे बच्चों की माँ, और पिछले 1 साल से अपनी जिंदगी वापस पाने की कोशिश कर रही थी। शराबी पति छोड़कर जा चुका था, किराए का कमरा छिन गया था, और बच्चों को अस्थायी तौर पर एक संस्था में रखा गया था। सरकारी मैडम ने साफ कहा था—अगर नौकरी, कमरा और स्थिर जिंदगी दिखा दी, तो बच्चों को वापस पाने का रास्ता खुल सकता है। इसी उम्मीद ने कविता को जिंदा रखा था।

उस रात उसे पैसों की जरूरत थी। अगले दिन बच्चों से मिलने जाना था, उनके लिए मिठाई और ऊनी टोपी खरीदनी थी। पुरानी दिल्ली की सुनसान सड़क पर जब एक चमचमाती सफेद कार तीसरी बार उसके पास से गुजरी, तो उसे अजीब लगा। कार रुकी। अंदर बैठा आदमी करीब 45 साल का था, दुबला, दाढ़ी वाला, साधारण कुरता-पायजामा पहने, लेकिन हाथ में महंगी घड़ी और गले में सोने की चेन।

उसने अपना नाम गिरिश मल्होत्रा बताया।

—थोड़ी देर साथ चलोगी? पहले चाय पी लेते हैं, फिर पैसे दे दूँगा।

कविता ने पहले मना किया। मगर जब उसने रकम दोगुनी कर दी, तो उसकी आँखों के सामने बच्चों के चेहरे घूम गए। वह कार में बैठ गई। रास्ते भर गिरिश बहुत सामान्य लगा। उसने मंदिर, दान, गरीबों की मदद और अपने अकेलेपन की बातें कीं। उसने बताया कि वह कभी सेना के अस्पताल में नर्सिंग असिस्टेंट था, बाद में मानसिक बीमारी के कारण नौकरी छोड़नी पड़ी। फिर हँसकर बोला—

—लोग मुझे पागल कहते हैं, पर पैसा कमाना मुझसे सीखें।

कार पुरानी दिल्ली से निकलकर गाजियाबाद की एक तंग, आधी-उजड़ी कॉलोनी में पहुँची। घर बाहर से साधारण था, पर दरवाजे पर अजीब ताला लगा था। गिरिश ने आधी कटी हुई चाबी निकाली। कविता ने पूछा तो उसने कहा—

—यह ताला सिर्फ मेरी बात मानता है।

अंदर घर बिखरा हुआ था। दीवारों पर सिक्के चिपके थे, सीढ़ियों के पास पुराने नोट चिपकाए गए थे, टीवी बहुत तेज आवाज में चल रहा था। कविता को बेचैनी हुई, पर उसने खुद को समझाया कि बस थोड़ी देर की बात है।

कुछ देर बाद जब वह जाने लगी, गिरिश ने अचानक उसके गले के पीछे हाथ कस दिया। दुनिया धुंधली होने लगी। कविता ने छटपटाकर बच्चों के नाम लिए, मगर आवाज गले में ही अटक गई। जब होश लौटा, उसके हाथ पीछे बंधे थे।

गिरिश शांत आवाज में बोला—

—डरो मत। तुम अच्छी रहोगी तो तुम्हें कुछ नहीं होगा। मुझे बस अपना परिवार बनाना है।

वह उसे घसीटता हुआ नीचे तहखाने में ले गया। सीलन, बदबू, लोहे की पाइपें, रेत की बोरियाँ, और बीच में टूटी जमीन के नीचे बना एक गहरा गड्ढा। उसने कविता के टखने में लोहे का क्लैंप लगाया, चेन पाइप से बाँधी और उसे गड्ढे में धकेल दिया। ऊपर लकड़ी का पटरा रखकर मिट्टी की बोरियाँ चढ़ा दीं।

कविता चीखी, रोई, बच्चों की कसम दी, पर ऊपर रेडियो की आवाज और तेज कर दी गई। घंटों बाद जब पटरा हटा, गिरिश हाथ में डंडा लेकर खड़ा था।

—चिल्लाओगी तो कोई नहीं सुनेगा। यहाँ सब मेरे कर्जदार हैं।

कविता ने पहली बार समझा कि वह सिर्फ बंदी नहीं थी। वह किसी बीमार सपने का हिस्सा बना दी गई थी।

और अगली सुबह, जब उसने तहखाने की छोटी खिड़की से बाहर झाँककर मदद के लिए पुकारा, उसे बचाने कोई नहीं आया। बल्कि पीछे से गिरिश की आवाज आई—

—अब मुझे तुम्हें और मजबूत बाँधना पड़ेगा।

भाग 2

कविता ने उसी दिन तय कर लिया कि अगर वह ताकत से नहीं जीत सकती, तो दिमाग से जीतेगी। उसने रोना कम किया, सुनना शुरू किया। गिरिश उससे अपने टूटे बचपन, अदालतों, पत्नी के भाग जाने और बच्चों को छीन लेने वाली दुनिया के बारे में बोलता रहता। वह कहता था कि उसे 10 औरतों से बच्चे चाहिए, ताकि कोई सरकार, कोई परिवार, कोई कानून उसके “घर” को तोड़ न सके। कुछ दिनों बाद वह एक और लड़की लाया—संध्या। वह 24 साल की थी, पास के दिव्यांग सेवा केंद्र में काम सीखती थी, दिमाग से बच्ची जैसी मासूम। वह गिरिश को “भैया” मानती थी, क्योंकि वह उसे कभी समोसा खिलाने, कभी झूला दिखाने ले जाता था। अब वही संध्या उसके पैरों में चेन बाँधते हुए रो रही थी। कविता ने उसे सीने से लगाकर फुसफुसाया—चुप रहो, अभी जिंदा रहना ही जीत है। फिर रूबी आई, 19 साल की माँ, जिसे अपने छोटे बेटे की चिंता खाए जा रही थी। फिर देविका आई, तेज, गुस्सैल, किसी से न डरने वाली। देविका ने आते ही गिरिश को लात मारी और बाकी लड़कियों पर चिल्लाई कि वे डरकर क्यों बैठी हैं। उसके साहस ने तहखाने में आग भी भरी और खतरा भी। गिरिश ने सबको एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करना शुरू किया। जो चुप रहती, उसे थोड़ी रोटी मिलती; जो विरोध करती, उसे गड्ढे में धकेल दिया जाता। संध्या धीरे-धीरे बीमार पड़ने लगी। बुखार से काँपती संध्या खाना नहीं खा पा रही थी, पर गिरिश इसे नाटक समझता रहा। एक सुबह उसकी साँसें धीमी होकर थम गईं। गिरिश ने केवल इतना कहा—मेरा बच्चा फिर चला गया। कविता भीतर से टूट गई, मगर बाहर से पत्थर बनी रही। उसी रात देविका ने फुसफुसाकर कहा—अब या तो वह मरेगा, या हम। और तभी गिरिश तहखाने की सीढ़ियों पर खड़ा सुन रहा था।

भाग 3

उस रात तहखाने में जो सन्नाटा उतरा, वह चीख से भी ज्यादा डरावना था। देविका की आँखों में आग थी, रूबी काँप रही थी, संध्या की जगह खाली पड़ी थी, और कविता जानती थी कि अब हर सांस उधार की है। गिरिश नीचे आया तो उसके हाथ में चाबी नहीं थी, सिर्फ एक पुराना पेचकस और मुस्कान थी। उसने चारों ओर देखा, जैसे कोई पिता बिगड़े बच्चों को समझा रहा हो।

—मुझे सब सुनाई देता है। तुम लोग सोचती हो मैं मूर्ख हूँ?

देविका ने थूककर कहा—

—तू आदमी नहीं, शैतान है।

गिरिश का चेहरा एक पल में बदल गया। उसने देविका को फिर गड्ढे में बंद कर दिया और रूबी को धमकाया कि अगर उसने आवाज उठाई तो उसका बेटा कभी अपनी माँ को नहीं देखेगा। कविता ने चाहकर भी कुछ नहीं कहा। उसे पता था कि एक गलत हरकत सबको खत्म कर सकती है।

कुछ दिनों बाद एक और लड़की लाई गई—जया, 18 साल की। वह बस अड्डे के पास खड़ी थी, घर लौटने के लिए लिफ्ट तलाश रही थी। गिरिश ने उसे बेटी के जन्मदिन का केक दिखाकर भरोसा दिलाया कि वह रास्ते में छोड़ देगा। जया के तहखाने में आते ही कविता उसके पास घुटनों के बल सरकी और धीरे से बोली—

—मेरी बात सुनो। गुस्सा मत करो। मैं तुम्हें बाहर निकालूँगी, पर अभी जिंदा रहो।

जया की आँखों में अविश्वास था। वही अविश्वास धीरे-धीरे सबकी आँखों में कविता के लिए जमने लगा। क्योंकि गिरिश अब कविता से अलग तरह से पेश आने लगा था। कभी उसे ऊपर ले जाकर चाय बनाने को कहता, कभी साफ कपड़े देता, कभी कहता—

—तुम समझदार हो। बाकी सब मुझे दुश्मन मानती हैं, तुम मुझे समझती हो।

कविता हर बार सिर झुका देती। भीतर से उसे खुद से घिन आती, पर वह जानती थी कि गिरिश को विश्वास चाहिए, और उसी विश्वास में दरार बन सकती है।

गिरिश की दुनिया अजीब थी। वह सुबह अखबार में शेयर बाजार देखता, दोपहर में भगवान की बात करता, शाम को तहखाने में राक्षस बन जाता। उसने घर में “सेवा प्रार्थना मंडल” का बोर्ड लगा रखा था। आस-पड़ोस के कुछ गरीब, दिव्यांग और अकेले लोग पहले उसके घर भजन सुनने आते थे। उन्हें लगता था गिरिश दानी आदमी है। किसी को नहीं पता था कि उसी घर के नीचे औरतें चेन से बँधी पड़ी हैं।

संध्या के परिवार ने कई बार उसे खोजा। उसकी माँ और बहन घर के बाहर आईं, दरवाजा पीटा, पर रेडियो की आवाज तेज थी। गिरिश ने बाद में संध्या के हाथ से जबरन लिखवाया हुआ पत्र भेज दिया था—“मैं ठीक हूँ, चिंता मत करना।” परिवार को शक था, मगर पुलिस ने कहा—

—वह बालिग है। शायद अपनी मर्जी से कहीं गई होगी।

रूबी की माँ ने भी थाने के चक्कर काटे। उसने कहा कि उसकी बेटी अपने 3 साल के बच्चे को छोड़कर कभी नहीं जाती। जवाब मिला—

—लड़कियाँ कभी-कभी घर से भाग जाती हैं। इंतजार कीजिए।

कविता को यह सब गिरिश की बातों से पता चलता। वह हर बार भीतर से जल उठती। बाहर की दुनिया इतनी पास थी, फिर भी इतनी बहरी।

फिर वह दिन आया जिसने तहखाने को हमेशा के लिए बदल दिया। गिरिश ने देविका और जया को गड्ढे में बंद किया था। नीचे थोड़ा पानी भर गया था, शायद रिसाव से, शायद जानबूझकर। गिरिश एक टूटा हुआ बिजली का तार लेकर आया। उसने उसे चेन के पास लहराया। कविता ने उसका हाथ पकड़ने की हिम्मत नहीं की, पर उसकी आवाज फट गई—

—ऐसा मत करो। अगर वे मर गईं तो तुम्हारा परिवार कैसे बनेगा?

गिरिश ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में पागलपन से ज्यादा हिसाब था।

—तुम्हें मेरी चिंता है?

कविता ने तुरंत सिर हिलाया।

—हाँ। इसलिए कह रही हूँ। डर से कोई परिवार नहीं बनता।

कुछ पल के लिए वह रुका। फिर जैसे उसे अपनी कमजोरी पर गुस्सा आ गया। उसने तार चेन से छुआ दिया। चीखों ने दीवारें हिला दीं। रूबी ने आँखें बंद कर लीं। कविता ने भगवान का नाम लिया। जब गिरिश ने तार हटाया, देविका की आवाज बंद हो चुकी थी।

जया रो रही थी—

—दीदी… देविका नहीं उठ रही।

गिरिश ने पटरा हटाया, देविका को बाहर खींचा और बहुत देर तक घूरता रहा। फिर बोला—

—अब शांति रहेगी।

उस रात कविता के भीतर कुछ मर गया, पर उसी मरी हुई जगह से एक और चीज पैदा हुई—ठंडी, धैर्य वाली हिम्मत। उसने फैसला कर लिया कि अब उसे सिर्फ भागना नहीं, बाकी लड़कियों को भी बचाना है।

अगले 2 दिन गिरिश ने उसे ऊपर ही रखा। शायद उसे लगा कि कविता अब पूरी तरह टूटकर उसके पक्ष में आ चुकी है। उसने उसे बताया कि पुलिस उसे कभी नहीं पकड़ सकती। उसने कहा कि अगर कभी पकड़ा गया तो अदालत में पागल बन जाएगा। उसने यह भी कहा कि उसने अपने जैसे लोगों को बहुत देखा है—डॉक्टर, जज, पुलिस, सब कागज देखते हैं, आँखें नहीं।

कविता ने हर बात याद रखी—ताले की बनावट, दरवाजे का रास्ता, चाबी किस जेब में रहती है, पास की चाय की दुकान, सड़क का मोड़, पेट्रोल पंप, पुलिस चौकी की दूरी। वह बोलती कम, सुनती ज्यादा। गिरिश को यह आज्ञाकारिता लगती रही।

एक शाम उसने अचानक कहा—

—मुझे एक और लड़की चाहिए। घर खाली लग रहा है।

कविता की रीढ़ में बर्फ उतर गई। लेकिन उसी पल उसे मौका दिखा। उसने धीमे से कहा—

—मैं मदद करूँगी। पर फिर मुझे अपनी मौसी से मिलना होगा। वे मुझे ढूँढ़ रही होंगी। अगर वे शांत हो गईं तो कोई शक नहीं करेगा।

गिरिश ने उसे देर तक देखा। फिर मुस्कराया।

—तुम सच में मेरी हो गई हो।

कविता ने नजरें झुका लीं, ताकि उसकी आँखों में जलती नफरत न दिखे।

उस रात वे कार लेकर निकले। बस अड्डे के पास उन्हें नसीमा मिली, 23 साल की, जो पहले कविता के साथ एक सिलाई केंद्र में काम कर चुकी थी। नसीमा ने कविता को देखकर भरोसा कर लिया। कविता का गला सूख गया, पर उसने चेहरा पत्थर रखा। घर पहुँचते ही गिरिश ने नसीमा को भी तहखाने में बाँध दिया। रूबी और जया ने कविता को ऐसी नजर से देखा जैसे वह अब दुश्मन हो।

कविता उनके सामने टूट जाना चाहती थी, पर नहीं टूटी। वह जानती थी, अगर उसने सच बता दिया तो गिरिश सब सुन लेगा।

ऊपर लौटते ही गिरिश ने कहा—

—देखा? आसान था। कल एक और लाएँगे।

कविता ने धीमे से कहा—

—पहले मेरी मौसी। वरना वे सच में थाने जाएँगी।

गिरिश ने कार निकाली। रात गहरी थी। सड़कें खाली थीं। कविता की धड़कन इतनी तेज थी कि उसे लगा गिरिश सुन लेगा। उसने रास्ते में एक पुरानी गली की तरफ इशारा किया।

—यहीं रोक दो। आगे मेरा घर है। तुम साथ चलोगे तो लोग सवाल करेंगे। मैं पहले समझा दूँगी कि तुम मेरे होने वाले पति हो। फिर तुम्हें बुला लूँगी। कोने पर चाय की दुकान है, वहाँ इंतजार कर लो।

गिरिश ने सोचा। फिर बोला—

—10 मिनट।

कविता कार से उतरी। उसने खुद को दौड़ने नहीं दिया। वह धीरे-धीरे चली, जैसे सचमुच घर जा रही हो। मोड़ पार करते ही उसकी चाल तेज हुई। फिर वह भागी। पैर काँप रहे थे, टखने का पुराना घाव जल रहा था, मगर वह भागती रही। कोने पर एक छोटी मेडिकल दुकान खुली थी। अंदर फोन था।

—भैया, पुलिस को फोन करना है। अभी!

दुकानदार ने पहले संदेह से देखा। कविता ने अपनी सलवार उठाकर टखने के काले घाव दिखाए। उसके हाथ काँपने लगे।

फोन मिलते ही कविता फूट पड़ी—

—एक आदमी ने मुझे महीनों तहखाने में बाँधकर रखा था। वहाँ 3 लड़कियाँ अभी भी जिंदा हैं। अगर वह लौट गया तो उन्हें मार देगा। कृपया तुरंत आइए।

पुलिस ने पहले वही सवाल पूछे जिनसे वह डरती थी। नाम? पता? सबूत? वह कौन थी? वहाँ कैसे पहुँची? कविता चीखी नहीं। उसने एक-एक बात साफ बताई—सफेद कार, आधी कटी चाबी, सिक्कों वाली दीवार, तेज रेडियो, तहखाने का गड्ढा, चेन, रूबी, जया, नसीमा।

जब पुलिस जीप आई, कविता ने उन्हें पेट्रोल पंप के पास खड़ी कार दिखाई। गिरिश वहीं था, चाय का गिलास हाथ में। पुलिस ने उसे घेरा तो उसने बिल्कुल शांत होकर पूछा—

—क्या बात है साहब? कोई गलतफहमी है क्या?

कविता जीप के पीछे बैठी थी। गिरिश की नजर उससे मिली। पहली बार उसके चेहरे पर डर नहीं, पछतावा नहीं, सिर्फ गुस्सा था। जैसे वह सोच रहा हो कि उसे कविता पर भरोसा नहीं करना चाहिए था।

घर का दरवाजा तोड़ने में पुलिस को समय लगा। अंदर रेडियो कान फाड़ने वाली आवाज में बज रहा था। गर्मी बहुत तेज कर रखी थी, फिर भी घर में सीलन और सड़ांध थी। नीचे तहखाने में जब पुलिस पहुँची, रूबी और जया एक पुराने गद्दे पर दुबकी थीं। उनके पैर चेन से बँधे थे। नसीमा गड्ढे में थी, बेहोशी और डर के बीच अटकी हुई।

पहले उन्हें लगा गिरिश कोई नया खेल खेल रहा है। फिर जब एक महिला कॉन्स्टेबल ने अपनी शॉल रूबी के कंधे पर रखी, रूबी चीखकर रो पड़ी—

—हम बच गए?

जया ने नसीमा को पकड़ा। नसीमा काँपते हुए बाहर आई। ऊपर भीड़ जमा हो चुकी थी। पड़ोसी फुसफुसा रहे थे, कुछ सिर झुकाए खड़े थे, कुछ कह रहे थे कि उन्हें हमेशा उस घर से आवाजें सुनाई देती थीं पर लगा टीवी चलता होगा।

कविता वहीं खड़ी रही। उसकी आँखें लड़कियों पर थीं। रूबी ने उसे देखा। कुछ पल तक उसके चेहरे पर वही पुराना आरोप था। फिर जब पुलिस ने बताया कि कविता ने फोन किया था, रूबी लड़खड़ाती हुई उसके पास आई और उसे कसकर पकड़ लिया।

—मैंने समझा तू हमें बेच आई।

कविता रो पड़ी।

—मैं खुद को भी यही समझा रही थी… ताकि बच सकूँ।

अस्पताल में डॉक्टर ने कहा कि कविता कमजोर है, घायल है, लेकिन वह गर्भवती नहीं है। यह सुनकर उसने पहली बार खुलकर साँस ली। कुछ दिनों बाद उसने अपने 3 बच्चों को देखा। सबसे छोटा पहले उसे पहचान नहीं पाया। बड़ा बेटा चुपचाप आया और उसके घाव वाले टखने को देखने लगा। फिर उसने बहुत धीरे से पूछा—

—माँ, अब आप कहीं जाओगी तो नहीं?

कविता ने उसे सीने से लगा लिया।

—नहीं। अब कोई मुझे तुमसे दूर नहीं रखेगा।

मामला अदालत तक गया। गिरिश ने सचमुच पागलपन का बहाना बनाया। कभी चुप रहता, कभी भजन गाता, कभी कहता कि उसने परिवार बनाने की कोशिश की थी। मगर कविता, रूबी, जया और नसीमा ने गवाही दी। संध्या की माँ अदालत में हर दिन संध्या की पुरानी चुन्नी लेकर बैठती थी। देविका का कोई परिवार सामने नहीं आया, पर कविता ने उसकी तरफ से भी बयान दिया—

—वह डरी नहीं थी। उसने हमें याद दिलाया था कि हम अभी इंसान हैं।

अदालत ने गिरिश को दोषी ठहराया। उसके बाद भी कविता की रातें आसान नहीं हुईं। तेज रेडियो सुनते ही उसकी सांस अटक जाती। बंद कमरा देखकर हाथ काँपते। मगर वह जिंदा थी, और उसके कारण 3 और जिंदगियाँ अंधेरे से बाहर आई थीं।

सालों बाद जब कविता ने एक छोटे से कमरे में सिलाई मशीन लगाई, दीवार पर उसने अपने बच्चों की तस्वीरों के साथ 2 और चीजें टाँगीं—एक पुरानी चाबी, और देविका के नाम से लिखा कागज। कोई पूछता तो वह बस इतना कहती—

—कुछ दरवाजे ताकत से नहीं खुलते। उनके लिए डर को जेब में रखकर मुस्कुराना पड़ता है।

और हर रात सोने से पहले वह खिड़की खुली छोड़ देती थी, ताकि उसके घर में कभी किसी की चीख दीवारों में बंद न हो जाए।

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