जब डॉक्टर ने मेरी 7 महीने की गर्भवती पत्नी की पसली पर नीला निशान देखा, उसने चुपचाप इमरजेंसी बटन दबाया—“यह गिरने की चोट नहीं है”; पुलिस मुझे ले गई, मगर असली राज हमारे घर के कागज़ों में छिपा था और बच्चा डर में कांपता रहा

PART 1

दिल्ली की इमरजेंसी वार्ड की एक अलग ही गंध होती है।

फिनाइल, मशीन वाली बासी कॉफी, दवाइयों की कड़वाहट और कच्चे डर की मिली-जुली गंध।

मैंने यह गंध पहले भी कई बार महसूस की थी, लेकिन उस मंगलवार की सुबह 3 बजे जो डर मेरे सीने में उतरा, उसके लिए मैं बिल्कुल तैयार नहीं था।

डॉक्टर ने बात करते-करते अचानक बोलना बंद कर दिया। उसकी आँखें मेरी पत्नी नेहा की पसलियों पर जमी थीं। फिर उसने धीरे-धीरे मेरी तरफ देखा और बिना एक शब्द बोले अपना हाथ लोहे की मेज़ के नीचे सरका दिया।

मेरी पत्नी नेहा 7 महीने की गर्भवती थी। हमारा पहला बच्चा आने वाला था। हमने उसका नाम पहले ही सोच लिया था—आरव। हमारा छोटा-सा फ्लैट गुरुग्राम के सेक्टर 57 में था, जहाँ बच्चे के कपड़ों के डिब्बे, छोटी नीली टोपी, दूध की बोतलें और हमारे लैब्राडोर शेरू के खिलौने हर कमरे में बिखरे रहते थे।

सब कुछ ठीक लग रहा था।

कम से कम मुझे यही लगता था।

उस रात मैं गहरी नींद में था, जब बाथरूम की तरफ से एक भारी-सी आवाज आई।

धप्प।

मैं घबराकर उठा। पैर चादर में उलझ गए, लेकिन मैं भागता हुआ बाथरूम तक पहुँचा।

नेहा ठंडे टाइल्स पर बैठी थी। उसका एक हाथ पेट पर था और दूसरा दाईं पसली पर। चेहरे का रंग उड़ चुका था।

—मैं फिसल गई, रोहन —उसने काँपती आवाज में कहा—। पानी गिरा हुआ था… पैर निकल गया।

मैं उसके पास घुटनों के बल बैठ गया। मेरा गला सूख गया था।

—नेहा, दर्द कहाँ है? बच्चा ठीक है न?

—आरव हिल रहा है… पर यहाँ बहुत दर्द हो रहा है।

मैंने उसे धीरे से उठाया। वह दर्द से सिकुड़ गई। मैंने तुरंत उसकी शॉल उठाई, कार की चाबी ली और उसे नीचे पार्किंग तक ले गया।

बाहर हल्की बारिश हो रही थी। गुरुग्राम की सड़कें खाली थीं। कार की शीशे पर पानी की बूंदें गिर रही थीं और नेहा चुपचाप सीट पर बैठी अपने पेट को दोनों हाथों से पकड़े थी।

मैं हर कुछ सेकंड बाद उसे देखता।

—बस पहुँच गए, नेहा। कुछ नहीं होगा। मैं हूँ न।

वह मेरी तरफ देखती भी नहीं थी। बस धीरे-धीरे साँस ले रही थी।

हम पास के एक बड़े निजी अस्पताल पहुँचे। इमरजेंसी में भीड़ कम थी। लगभग 20 मिनट बाद हमें एक छोटे-से जांच कक्ष में भेज दिया गया।

सफेद रोशनी बहुत तेज थी। दीवार पर भगवान धन्वंतरि की छोटी-सी तस्वीर लगी थी। नेहा बेड के किनारे बैठी थी और मैं दरवाज़े के पास खड़ा अपनी ठंडी उंगलियाँ आपस में रगड़ रहा था।

तभी डॉक्टर मेहरा अंदर आए।

करीब 50 साल के होंगे। आँखों के नीचे काले घेरे, बालों में सफेदी, लेकिन आवाज शांत और भरोसा देने वाली।

—घबराइए मत —उन्होंने फाइल देखते हुए कहा—। गर्भावस्था में संतुलन बिगड़ना आम बात है। हम माँ और बच्चे दोनों को देख लेते हैं।

मेरे सीने से एक लंबी साँस निकली।

डॉक्टर ने नेहा का ब्लड प्रेशर देखा, धड़कन सुनी, फिर पेट की हल्की जाँच की। सब सामान्य लग रहा था। फिर उन्होंने कहा—

—अब चोट वाली जगह देखनी पड़ेगी।

नेहा ने धीरे से कुर्ती ऊपर की।

मैंने देखा तो मेरा दिल बैठ गया।

उसकी दाईं पसलियों के नीचे गहरा बैंगनी निशान था। किनारे पीले पड़ने लगे थे, जैसे चोट नई भी हो और पुरानी भी।

डॉक्टर मेहरा ने भौंहें सिकोड़ लीं।

—काफी तेज चोट है —उन्होंने धीमे से कहा—। गहरी साँस लेने पर दर्द बढ़ता है?

—थोड़ा —नेहा ने होंठ भींचकर कहा।

डॉक्टर धीरे-धीरे उंगलियों से चोट के आसपास दबाने लगे। वह बात भी करते जा रहे थे।

—बच्चे का नाम सोच लिया?

—आरव —मैंने जवाब दिया—। नेहा को यह नाम बहुत पसंद है।

डॉक्टर हल्का मुस्कुराए।

लेकिन अगले ही पल उनकी उंगलियाँ पसली के निचले हिस्से पर एक जगह ठहर गईं।

वह मुस्कान गायब हो गई।

कमरे में जैसे हवा रुक गई।

डॉक्टर की आँखें फैल गईं। उन्होंने फिर वही जगह बहुत धीरे से छुई, जैसे किसी भयानक बात की पुष्टि कर रहे हों।

नेहा ने आँखें बंद कर लीं।

डॉक्टर ने मेरी तरफ देखा।

वह सामान्य चिंता नहीं थी।

वह डर था।

साफ, ठंडा, असली डर।

—डॉक्टर? —मैं आगे बढ़ा—। बच्चा ठीक है न?

उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।

उनका चेहरा पीला पड़ चुका था। उन्होंने नेहा से एक कदम दूरी बनाई। दाएँ हाथ से फाइल पर कुछ लिखने का नाटक किया, लेकिन उनकी बाईं हथेली लोहे की मेज़ के नीचे चली गई।

मैंने साफ देखा।

मेज़ के नीचे लाल इमरजेंसी बटन था।

डॉक्टर मेहरा ने मेरी आँखों में देखते हुए उसे चुपचाप दबा दिया।

PART 2
पाँच मिनट भी नहीं बीते होंगे कि अस्पताल के बाहर पुलिस जीप के ब्रेक की आवाज गूँज उठी।
दो पुलिसवाले तेज कदमों से कमरे में घुसे। आगे वाले इंस्पेक्टर की वर्दी पर नाम लिखा था—सिंह। उसकी आँखें सीधे मुझ पर टिक गईं, जैसे फैसला पहले ही हो चुका हो।
—स्थिति क्या है, डॉक्टर? —उसने पूछा।
डॉक्टर मेहरा ने गहरी साँस ली और नेहा के सामने खड़े हो गए।
—मुझे गर्भवती महिला पर गंभीर शारीरिक हिंसा का संदेह है। मरीज नेहा अरोड़ा को तुरंत सुरक्षित निगरानी में रखा जाए।
मेरे कानों में भनभनाहट भर गई।
—क्या? —मैं चीख पड़ा—। आप क्या कह रहे हैं? मेरी पत्नी बाथरूम में फिसली है। मैं उसे लेकर आया हूँ!
दूसरे पुलिसवाले ने मेरा रास्ता रोक लिया।
—शांत रहिए।
—मैं शांत कैसे रहूँ? मेरी पत्नी गर्भवती है!
नेहा रोने लगी।
—रोहन ने कुछ नहीं किया, इंस्पेक्टर साहब। भगवान की कसम, उसने मुझे हाथ तक नहीं लगाया। वह तो सो रहा था।
डॉक्टर ने टैबलेट पर खींची तस्वीरें इंस्पेक्टर को दिखाईं।
—यह सामान्य गिरने की चोट नहीं है। मुख्य सूजन लंबी है, पर नीचे तीन गोल दबाव के निशान हैं। बिल्कुल बराबर दूरी पर। ऐसे निशान किसी सख्त पकड़ या जबरदस्ती दबाव से बनते हैं। और यहाँ… पुरानी हड्डी जुड़ने का संकेत है। दसवीं पसली में 3 या 4 महीने पुरानी फ्रैक्चर रही है, जिसका इलाज कभी अस्पताल में नहीं हुआ।
मैंने नेहा की तरफ देखा।
वह हैरान नहीं थी।
वह पकड़ी गई थी।
उसकी आँखें जमीन पर थीं। दोनों हाथ पेट पर कस गए थे।
—नेहा… यह कब हुआ? —मेरी आवाज टूट गई—। तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?
नेहा ने कुछ नहीं कहा।
उसका मौन मेरे लिए किसी चाकू से कम नहीं था।
इंस्पेक्टर सिंह ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
—आपको बयान के लिए थाने चलना होगा।
—नहीं! मैं उसे छोड़कर नहीं जाऊँगा। नेहा, कुछ बोलो! इन्हें सच बताओ!
नेहा ने मेरी तरफ देखा। उसके आँसू गालों से बह रहे थे।
—रोहन… मुझे माफ कर देना।
बस इतना।
मुझे कमरे से बाहर ले जाया गया। अस्पताल की प्रतीक्षा कक्ष में बैठे लोग मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे मैं कोई राक्षस हूँ जिसने अपनी गर्भवती पत्नी को पीटा हो।
बारिश में मुझे पुलिस जीप में बैठाया गया। लोहे की जाली के पीछे से मैंने अस्पताल की रोशनी देखी।
अंदर नेहा अकेली रह गई थी।
मेरे बच्चे को बचाते हुए।
और एक ऐसा सच छिपाते हुए, जो हमारे घर की दीवारों में महीनों से साँस ले रहा था।

PART 3

सुबह होने से पहले मुझे थाने से छोड़ा गया।

शर्त यह थी कि जांच पूरी होने तक मैं नेहा से सीधे संपर्क नहीं करूँगा। डॉक्टर की रिपोर्ट दर्ज हो चुकी थी। नेहा को महिला सुरक्षा कक्ष में रखा गया था। इंस्पेक्टर सिंह ने जाते-जाते मुझसे बस इतना कहा—

—अगर आप सच में निर्दोष हैं, तो घर जाइए और सोचिए कि आपकी पत्नी किससे डर रही थी।

मैं ऑटो लेकर घर लौटा। बारिश थम चुकी थी, लेकिन आसमान अब भी भारी था।

हमारे फ्लैट का दरवाज़ा आधा खुला था।

मेरी रीढ़ में ठंड उतर गई।

मैंने धीरे से दरवाज़ा धक्का दिया।

ड्रॉइंग रूम अस्त-व्यस्त था। बच्चे के कपड़ों का डिब्बा उलटा पड़ा था। अलमारी के पास कागज़ बिखरे थे। पूजा की छोटी घंटी फर्श पर गिरी थी।

—शेरू? —मैंने धीमे से पुकारा।

रसोई की तरफ से हल्की कराह सुनाई दी।

मैं भागा।

शेरू फर्श पर पड़ा था। उसके सफेद-भूरे बालों पर मिट्टी और गहरी चोट के निशान थे। वह मुझे देखकर पूँछ हिलाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन दर्द से सिहर गया।

मेरी आँखों में आँसू आ गए।

—शेरू… बेटा…

मैं उसके पास बैठ गया। हाथ काँप रहे थे। तभी पीछे से किसी के जूतों की आवाज आई।

मैं जम गया।

—तुम्हें घर नहीं लौटना चाहिए था, रोहन।

वह आवाज अजनबी नहीं थी।

मैं धीरे-धीरे मुड़ा।

दरवाज़े के पास खन्ना साहब खड़े थे।

नेहा के मायके के पुराने वकील। हमेशा साफ सूट पहनने वाला, धीमे बोलने वाला, बहुत सभ्य दिखने वाला आदमी।

उसके हाथ में काले चमड़े की फाइल थी।

—आप? —मेरे मुँह से निकला—। मेरे घर में क्या कर रहे हैं? नेहा के साथ क्या चल रहा है?

खन्ना ने चश्मा ठीक किया। उसकी नजर एक पल के लिए शेरू पर गई।

—कुत्ता बीच में आ गया था। हमें मजबूरी में संभालना पड़ा।

मेरे भीतर आग भड़क उठी।

—किस बात की मजबूरी?

—तुम्हें सच बताने का समय अब आ ही गया है —वह बोला—। नेहा के पिता ने मरने से पहले बहुत बड़ा खेल खेला था। नोएडा और गुरुग्राम की जमीनों में पैसा लगाया, फिर कुछ बिल्डरों और नेताओं के पैसे डुबो दिए। दस्तावेज नेहा के नाम पर थे। कर्ज उनका था, लेकिन चाबी तुम्हारी पत्नी के हाथ में थी।

मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था।

—कौन से दस्तावेज?

—वही जिन पर नेहा महीनों से साइन करने से मना कर रही थी। उसके पिता की पुरानी संपत्तियाँ, फार्महाउस, कुछ बेनामी हिस्से, और वह घर जिसमें तुम दोनों रहते हो। सबकी फाइलें उसके पास थीं। लोगों ने पहले समझाया। फिर दबाव डाला। फिर उसे याद दिलाया गया कि इस दुनिया में नरमी कमजोरी समझी जाती है।

मुझे डॉक्टर की बात याद आई।

पुरानी फ्रैक्चर।

तीन-चार महीने पुरानी।

—वह जयपुर नहीं गई थी… —मैंने फुसफुसाया—। उसने कहा था माँ की तबीयत खराब है।

खन्ना ने ठंडी मुस्कान दी।

—उसे एक ऑफिस में बुलाया गया था। बस बातचीत होनी थी। पर वह जिद्दी निकली। कुछ लोगों ने उसे पकड़कर दीवार से लगा दिया। चोट लग गई। हादसा था।

—हादसा? —मैं चीखा—। मेरी गर्भवती पत्नी की पसली तोड़ दी आपने!

—वह तब गर्भवती थी, पर शुरुआती महीने थे। और उसने तुम्हें बचाने के लिए चुप्पी रखी।

मेरे पाँव जैसे जमीन में धँस गए।

नेहा की रात की चुप्पी, अचानक डरकर फोन छिपा लेना, पैसों की बात पर रो पड़ना, डॉक्टर के पास जाने से इंकार करना—सब याद आने लगा।

मैं कितना अंधा था।

—कल रात क्या हुआ? —मैंने पूछा।

खन्ना ने फाइल खोली।

—कल अंतिम तारीख थी। दस्तावेज लेने लोग आए थे। तुम स्टडी में हेडफोन लगाकर काम कर रहे थे। नेहा ने उन्हें अंदर आने नहीं देना चाहा। शेरू भौंकने लगा। धक्का-मुक्की में वह ऊपर की तरफ भागी, सीढ़ियों के पास फिसली और रेलिंग से टकराई। वही चोट फिर खुल गई। उसने बाथरूम की कहानी इसलिए बनाई ताकि पुलिस, अस्पताल और तुम—तीनों उस असली जाल से दूर रहो।

मेरे गले में काँटा अटक गया।

—अब क्या चाहते हैं आप?

खन्ना ने फाइल बंद की।

—सब हो चुका है। नेहा ने अस्पताल में साइन कर दिए। बदले में तुम्हारे खिलाफ घरेलू हिंसा की शिकायत आगे नहीं बढ़ेगी। बच्चा सुरक्षित रहेगा। यह फ्लैट तुम्हारे नाम रहेगा। बाकी संपत्तियाँ चली गईं। पुराने कर्ज का हिसाब खत्म।

—आप लोग उसे मजबूर करके…

—कानून कागज़ देखता है, भावना नहीं, रोहन —वह बीच में बोला—। और मेरी सलाह मानो, तो सवाल मत पूछो। जिन लोगों का पैसा डूबा था, वे अदालत से ज्यादा तेज तरीके जानते हैं। तुम्हारी पत्नी ने तुम्हें जिंदा रखने के लिए सब गंवा दिया।

मैंने उसे घूरा।

—और अगर मैं शिकायत करूँ?

पहली बार उसके चेहरे पर हल्की कठोरता आई।

—फिर तुम्हें साबित करना होगा कि जिन लोगों के नाम फाइलों में हैं, वे सचमुच मौजूद हैं। तुम्हें साबित करना होगा कि नेहा ने डर में साइन किए। तुम्हें उन लोगों से लड़ना होगा जिनके साथ पुलिस, बिल्डर और नेता चाय पीते हैं। और तब शायद तुम अपने बच्चे का चेहरा देखने से पहले ही किसी हादसे का हिस्सा बन जाओगे।

वह दरवाज़े तक गया, फिर मुड़कर बोला—

—नेहा को दोपहर तक साउथ दिल्ली की निजी मातृत्व क्लिनिक में शिफ्ट कर दिया जाएगा। अगर तुम सच में उससे प्यार करते हो, तो उससे सवाल करने मत जाना। उसके पास पहले ही बहुत जवाब जल चुके हैं।

दरवाज़ा बंद हो गया।

घर में सिर्फ शेरू की कराह और मेरी टूटी साँसें बचीं।

मैं घुटनों के बल बैठ गया। मेरे सामने बच्चे की छोटी नीली टोपी पड़ी थी। नेहा ने उसे 2 हफ्ते पहले हाथ से धोकर सूखने डाली थी। वह कह रही थी—

—आरव को यह बहुत प्यारी लगेगी, न?

उस पल मुझे समझ आया कि नेहा कमजोर नहीं थी।

वह अकेली लड़ रही थी।

अपने पिता के पापों से।

धमकियों से।

मेरी सुरक्षा के लिए अपने दर्द को झूठ में बदलकर।

मैंने तुरंत पशु एम्बुलेंस को फोन किया। शेरू को गोद में उठाते समय वह दर्द से काँपा, लेकिन उसने अपना सिर मेरी छाती से लगा दिया। जैसे वह भी कह रहा हो—अब देर मत करना।

दोपहर तक शेरू की सर्जरी शुरू हो चुकी थी। डॉक्टर ने कहा, पसलियों में चोट है, पर जान बच जाएगी। वह कुछ हफ्तों में चलने लगेगा।

मैं सीधे नेहा की क्लिनिक पहुँचा।

कमरे के बाहर नर्स ने मुझे रोकना चाहा, लेकिन अंदर से धीमी आवाज आई—

—उन्हें आने दीजिए।

नेहा खिड़की के पास लेटी थी। चेहरा थका हुआ, आँखें सूजी हुई, पेट पर हाथ रखा हुआ। मुझे देखते ही उसकी पलकों पर आँसू भर आए।

मैं उसके पास गया। कुछ पल हम दोनों चुप रहे।

मुझसे हजार सवाल पूछे जा सकते थे।

तुमने क्यों छिपाया?

किससे डरती रहीं?

मुझ पर भरोसा क्यों नहीं किया?

पर मैंने कुछ नहीं पूछा।

मैंने सिर्फ उसका हाथ पकड़ा।

—अब अकेले मत लड़ना —मैंने धीरे से कहा—। चाहे जो हो, आरव तक पहुँचने से पहले उन्हें मुझसे गुजरना होगा।

नेहा टूटकर रो पड़ी।

—मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती थी, रोहन।

मैंने उसका माथा चूमा।

—और मैं तुम्हें दर्द में अकेला छोड़कर जीना नहीं चाहता।

खिड़की से बाहर दिल्ली की सुबह साफ दिख रही थी। बारिश के बाद हवा धुली हुई थी। दूर सड़क पर लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में लौट रहे थे, जैसे दुनिया ने हमारे घर की रात देखी ही न हो।

लेकिन हमारे लिए सब बदल चुका था।

हमने जमीनें खो दी थीं, पैसे खो दिए थे, भरोसे की पुरानी आसान दुनिया खो दी थी।

पर उस कमरे में, मशीन की धीमी बीप के बीच, नेहा की हथेली मेरी उंगलियों में थी और उसके पेट के भीतर हमारा बच्चा हल्का-सा हिला।

नेहा ने रोते-रोते मुस्कुराने की कोशिश की।

—देखो… आरव ने जवाब दिया।

मैंने अपनी हथेली उसके पेट पर रखी।

उस नन्ही-सी हरकत में मुझे एक वादा सुनाई दिया।

अब डर हमारे घर का मालिक नहीं रहेगा।

अब चुप्पी किसी की ढाल नहीं बनेगी।

और जब भी शेरू वापस घर आएगा, जब आरव पहली बार उस कमरे में रोएगा, जब नेहा फिर बिना डर के सो पाएगी—तब शायद हम पूरी तरह ठीक न हों, लेकिन हम टूटे हुए नहीं रहेंगे।

उस सुबह मैंने जाना कि प्यार हमेशा बड़े-बड़े वादों में नहीं होता।

कभी-कभी प्यार एक झूठी कहानी में छिपा होता है, जो कोई तुम्हें बचाने के लिए बोलता है।

कभी वह पसली के नीले निशान में छिपा होता है।

कभी पुलिस की गलत नजरों में सहा गया अपमान बन जाता है।

और कभी वह अस्पताल के सफेद कमरे में दो काँपते हाथों का मिलना होता है, जब दोनों समझ जाते हैं कि अब से दर्द अकेले नहीं बाँटा जाएगा।

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