PART 1
“इसे फर्श पर ही रहने दो, नैना। तुम्हारी बेटी बीमारी का नाटक कर रही है।”
समरजीत ने यह बात इतनी ठंडी आवाज़ में कही, जैसे सामने 2 साल की बच्ची नहीं, कोई बोझ पड़ा हो। अवनि ठंडे संगमरमर पर करवट लिए हाँफ रही थी। उसका छोटा-सा सीना तेजी से उठ-गिर रहा था, होंठ सूखे थे, माथा आग की तरह तप रहा था और आँखें आधी बंद थीं।
नैना कुलकर्णी उस दिन पुणे के पिंपरी वाले सरकारी स्कूल से जल्दी लौटी थी। सुबह समरजीत ने ही कहा था—
—आज मैं घर से काम करूँगा। तुम स्कूल जाओ, अवनि को मैं संभाल लूँगा।
नैना को हैरानी हुई थी, क्योंकि समरजीत कभी अवनि के साथ अकेला रहना पसंद नहीं करता था। वह हिंजवडी की एक फाइनेंस कंपनी में काम करता था और हमेशा लैपटॉप, कॉल, मीटिंग, क्लाइंट, रिपोर्ट के पीछे छिपा रहता था। पर नैना ने सोचा, शायद वह बदलना चाहता है।
पिछले 6 महीने से घर का माहौल अजीब था। अवनि रोती तो समरजीत दाँत भींच लेता। अवनि दूध गिरा देती तो वह कहता—
—तुमने इसे बहुत सिर पर चढ़ा रखा है।
पहले वह बेटी को गोद में उठाकर “मेरी छोटी मोदक” कहता था। अब वह उसकी तरफ ऐसे देखता था जैसे उसकी साँसें भी उसे परेशान कर रही हों।
पहला शक तब हुआ था जब अवनि की बाँह पर नीला निशान आया। समरजीत बोला, सोफे से टकरा गई। फिर गाल पर खरोंच दिखी। उसने कहा, खिलौने से लगी। फिर पसली के पास उँगलियों जैसे निशान दिखे। वह बोला—
—गिर रही थी, मैंने पकड़ा था।
नैना ने खुद को समझाया। बच्चे गिरते हैं। पति थका हुआ है। घर की EMI है। नौकरी का दबाव है। हर बात को शक की नजर से नहीं देखना चाहिए।
लेकिन एक शाम जब वह दवा लेने बाहर गई और अचानक लौट आई, तो उसने दरवाजे के बाहर से अवनि की चीख सुनी।
—चुप हो जा! तेरी माँ यहाँ नहीं है तुझे बचाने के लिए!
नैना के हाथ से दवा की थैली गिर गई।
वह भागकर अंदर गई। अवनि कोने में बैठी काँप रही थी। समरजीत उसके सामने खड़ा था, आँखों में गुस्सा।
—तुमने क्या किया? —नैना ने अवनि को सीने से चिपकाते हुए पूछा।
—कुछ नहीं। ड्रामा कर रही थी। मैं काम कर रहा हूँ, ये लगातार रो रही थी।
—ये डर गई है।
—डर नहीं, चालाकी है। 2 साल की उम्र में भी इसे पता है तुम्हें कैसे अपने इशारे पर नचाना है।
उस रात नैना सो नहीं पाई। उसने अवनि की साँसें सुनीं, उसके माथे को छुआ, उसकी छोटी उँगलियाँ अपनी हथेली में दबाकर बैठी रही। समरजीत बगल में चैन से सोता रहा।
अगली सुबह उसने नीचे वाली पड़ोसन शालिनी ताई को निशान दिखाया। शालिनी ताई 62 साल की विधवा थीं, शनिवार पेठ में पली-बढ़ी, साफ बोलने वाली औरत।
उन्होंने निशान देखकर कहा—
—बेटा, ये टेबल से टकराने का निशान नहीं है। ये किसी बड़े हाथ की पकड़ लगती है।
नैना का गला सूख गया।
—वो कहता है, उसने बचाने के लिए पकड़ा था।
शालिनी ताई ने उसका हाथ दबाया।
—शादी बचाने के चक्कर में बच्ची मत खो देना।
वह वाक्य नैना के कानों में गूँजता रहा, पर उसने फिर भी पुलिस नहीं बुलाई। उसने सोचा, बात करके ठीक कर लेगी। घर टूटने से डरती रही। समाज, ससुराल, स्कूल के लोग, माँ-बाप की इज्जत—सब याद आता रहा।
फिर वह शुक्रवार आया।
नैना स्कूल से लौटते समय अवनि के लिए नारियल बर्फी और छोटा-सा गुलाबी हेयरक्लिप लेकर आई थी। वह सोच रही थी, अवनि दौड़कर कहेगी, “मम्मा, क्लिप!”
लेकिन घर खोला तो अंदर अजीब सन्नाटा था।
टीवी बंद। खिलौने बिखरे हुए। तुलसी के गमले के पास पानी फैला हुआ। दीवार पर लगी गणपति बप्पा की छोटी तस्वीर तिरछी।
—अवनि?
कोई जवाब नहीं।
फिर उसने फर्श पर अपनी बच्ची को देखा।
अवनि की साँस अटक रही थी। शरीर तप रहा था। एक हाथ मुड़ा हुआ था, जैसे दर्द से बचाने की कोशिश कर रही हो।
नैना चीख पड़ी।
—समरजीत!
वह बेडरूम से निकला, हाथ में तौलिया था।
—इतना क्यों चिल्ला रही हो?
—इसे क्या हुआ?
—रोते-रोते नीचे बैठ गई। फिर सो गई होगी।
—ये सो नहीं रही, ये साँस नहीं ले पा रही!
समरजीत ने आँखें घुमाईं।
—तुम हर बात को अस्पताल क्यों बना देती हो? तुम्हारी बेटी सिर्फ ध्यान खींचती है।
नैना ने उसका जवाब नहीं दिया। उसने अवनि को उठाया। बच्ची का शरीर ढीला था।
कार में वह अवनि से बार-बार कहती रही—
—बस मेरी जान, मम्मा आ गई। मम्मा अब कभी नहीं छोड़ेगी।
वह ससून अस्पताल पहुँची तो नर्सों ने तुरंत ऑक्सीजन लगाया। बाल रोग विशेषज्ञ को बुलाया गया। नैना के हाथ काँप रहे थे। तभी समरजीत भी अस्पताल पहुँचा।
उसी क्षण एक युवा नर्स दवा की ट्रे लेकर बाहर आई। उसने समरजीत को देखा और उसका चेहरा सफेद पड़ गया। ट्रे उसके हाथ से गिरकर जोर से बज उठी।
—तुम? —उसने काँपती आवाज़ में कहा।
नैना ने उसकी तरफ देखा।
—आप इन्हें जानती हैं?
नर्स ने नैना को नहीं, सीधे समरजीत को देखा।
—तुमने कहा था तुम्हारी शादी नहीं हुई… फिर ये पत्नी कौन है? और अंदर जो बच्ची है… वो तुम्हारी बेटी है?
समरजीत का चेहरा राख जैसा पड़ गया।
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PART 2
अस्पताल के गलियारे में कुछ सेकंड के लिए सब रुक गया। नैना को लगा जैसे ऑक्सीजन मशीन की आवाज़ भी दूर चली गई हो।
समरजीत नर्स के पास बढ़ा।
—रिद्धिमा, प्लीज, यहाँ तमाशा मत करो। मैं समझा सकता हूँ।
नैना का दिल धक से रह गया।
—समझाना किसे है? मुझे या इन्हें?
रिद्धिमा की आँखों में आँसू थे, पर आवाज़ में गुस्सा।
—इसने कहा था कि ये अकेला रहता है। कहा था पत्नी से अलग हो चुका है। कहा था इसके बच्चे नहीं हैं।
नैना ने दीवार पकड़ ली।
—कब से?
समरजीत ने सिर झुका लिया।
—नैना, अभी अवनि को देखो।
—कब से?
—5 महीने।
5 महीने। वही 5 महीने जब वह देर रात घर आता था। वही 5 महीने जब वह फोन लेकर बाथरूम में बंद होता था। वही 5 महीने जब नैना अपनी बच्ची के निशानों को दुर्घटना समझती रही।
रिद्धिमा ने अपनी बाँह ऊपर की। उस पर उँगलियों का नीला निशान था।
—पिछले हफ्ते मैंने इससे सच पूछा तो इसने मेरा हाथ ऐसे पकड़ा कि निशान पड़ गया। बोला, मैं पागल हूँ।
नैना ने वह निशान देखा। वही गोल नीले दाग। वही पकड़। वही डर।
तभी डॉक्टर बाहर आए। उनका चेहरा गंभीर था।
—मिसेज कुलकर्णी, बच्ची अभी स्थिर है, पर हमें बात करनी होगी।
कमरे में डॉक्टर ने एक्स-रे शीट रोशनी के सामने लगाई।
—अवनि की एक पसली में बाल जैसी दरार है। पेट में सूजन है। शरीर पर मजबूत पकड़ के निशान हैं। यह साधारण गिरने से नहीं हुआ।
समरजीत बोला—
—डॉक्टर, वो बहुत जिद्दी है। मैं बस संभाल रहा था।
—2 साल की बच्ची को संभालते हैं, दबाते नहीं —डॉक्टर ने शांत पर कठोर आवाज़ में कहा।
नैना की आँखों में आँसू नहीं थे। इस बार कुछ और था। जैसे डर की जगह आग भर गई हो।
महिला सामाजिक कार्यकर्ता ने रिपोर्ट दर्ज की। पुलिस को सूचना दी गई। रिद्धिमा ने बयान दिया। डॉक्टर ने मेडिकल रिपोर्ट बनाई। समरजीत बार-बार कहता रहा—
—ये पारिवारिक मामला है।
नैना ने पहली बार उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा—
—नहीं। यह अपराध है।
जब पुलिस उसे ले जाने लगी, उसने फुसफुसाकर कहा—
—तू मुझे बर्बाद कर देगी?
नैना ने अवनि की तरफ देखा, जो ऑक्सीजन मास्क के पीछे धीमे-धीमे साँस ले रही थी।
—मैं अपनी बेटी को बचाऊँगी।
2 दिन बाद नैना अपनी बहन मालविका और पुलिसकर्मी के साथ फ्लैट लौटी। कमरे में वही बिखरे खिलौने थे। मेज पर आधा भरा कॉफी मग था। सोफे के नीचे अवनि का छोटा नीला इनहेलर पड़ा था, जिसे डॉक्टर ने साँस फूलने पर तुरंत देने को कहा था।
नैना को याद आया—समरजीत कहता था, “दवा की जरूरत नहीं, आदत खराब होगी।”
फिर उसे बेबी कैमरा याद आया, जो अवनि की सुरक्षा के लिए लगाया गया था। मेमोरी कार्ड लैपटॉप में लगाया गया। कई वीडियो खुले। एक में समरजीत अवनि को बाँह से खींच रहा था। दूसरे में वह उसका इनहेलर उठाकर अलमारी के ऊपर रख रहा था।
तीसरे वीडियो में उसकी आवाज़ साफ थी।
—थोड़ा रोएगी तो सीखेगी। हर बार माँ बचाने नहीं आएगी। और अगर आज कुछ बड़ा हो गया, तो सब कहेंगे नैना लापरवाह माँ है।
नैना की साँस रुक गई।
वीडियो के आखिरी 8 सेकंड में समरजीत फोन पर किसी से कह रहा था—
—डीएनए रिपोर्ट आ चुकी है, माँ। अवनि मेरी ही बेटी है… लेकिन अब बहुत देर हो गई। मुझे वो बच्ची नहीं चाहिए।
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PART 3
नैना ने वीडियो वहीं रोक दिया। कमरे में इतनी खामोशी थी कि बाहर सड़क पर गुजरती ऑटो की आवाज़ भी तेज लग रही थी। मालविका रो रही थी, पर नैना की आँखें सूखी थीं। जैसे आँसू किसी गहरे कुएँ में गिर चुके हों।
—डीएनए रिपोर्ट? —मालविका ने काँपते हुए पूछा।
नैना को अचानक पिछले महीनों की कई बातें याद आने लगीं। समरजीत का बार-बार पूछना, “अवनि मेरी तरह क्यों नहीं दिखती?” उसकी माँ वसुधा बाई का ताना, “कुलकर्णी घराने में ऐसी आँखें किसी की नहीं।” उसका वह पुराना झगड़ा, जब नैना ने कहा था कि अवनि का रंग, चेहरा, आदत सब उसकी नानी पर गया है, तो समरजीत ने 3 दिन तक उससे बात नहीं की थी।
फिर उसे वह लिफाफा याद आया जो 1 महीने पहले अलमारी में छिपा मिला था। उस पर एक प्राइवेट लैब का नाम था। नैना ने तब उसे ऑफिस का मेडिकल बिल समझकर छोड़ दिया था।
अब सब साफ था।
समरजीत ने शक में अपनी ही बेटी से नफरत शुरू की। फिर जब रिपोर्ट ने साबित कर दिया कि अवनि उसी की बेटी है, तब भी उसने अपने अहंकार को सच से बड़ा मान लिया। क्योंकि अगर वह मान लेता कि अवनि उसकी है, तो उसे मानना पड़ता कि वह 2 साल की निर्दोष बच्ची पर अत्याचार कर रहा था।
अगले दिन वकील आद्या प्रधान ने नैना से कहा—
—ये वीडियो सिर्फ सबूत नहीं, पूरा पैटर्न दिखाते हैं। चोट, दवा छिपाना, मानसिक क्रूरता, पत्नी को फँसाने की योजना—सब।
नैना ने धीरे से पूछा—
—क्या वसुधा बाई को भी पता था?
आद्या ने मोबाइल रिकॉर्डिंग सुनी। उसी वीडियो के कॉल ऑडियो में वसुधा बाई की आवाज़ थी—
—ज्यादा मत मार, निशान रह जाते हैं। बस इसे इतना कमजोर कर कि नैना खुद टूट जाए।
नैना का पूरा शरीर काँप गया।
यह सिर्फ पति की क्रूरता नहीं थी। यह एक परिवार की मिली हुई नफरत थी, जो एक बच्ची पर उतारी जा रही थी।
अवनि अस्पताल से घर नहीं लौटी। नैना उसे लेकर मालविका के छोटे से किराए के फ्लैट में चली गई। घर छोटा था, बालकनी से सिर्फ सामने वाली इमारत दिखती थी, लेकिन वहाँ डर नहीं था। रात को कोई दरवाजा पटककर नहीं आता था। कोई बच्ची के रोने पर उसे “ड्रामा” नहीं कहता था।
फिर भी अवनि टूट चुकी थी। वह किसी पुरुष की भारी आवाज़ सुनते ही माँ की साड़ी पकड़ लेती। दूध पीते समय अचानक कप हाथ से गिर जाता तो वह खुद ही कहती—
—मम्मा, अवनि चुप… पापा को मत बोलना।
यह सुनकर नैना का दिल हर बार चाकू से कटता।
एक दिन अस्पताल की काउंसलर ने अवनि को रंग भरने के लिए कागज दिया। अवनि ने एक छोटा घर बनाया। घर के बाहर माँ थी। अंदर एक बच्ची थी। और दरवाजे पर एक बड़ा काला आदमी था। काउंसलर ने पूछा—
—ये कौन है?
अवनि ने पेंसिल छिपा ली और बहुत धीमे कहा—
—आवाज।
उस रात नैना बाथरूम में जाकर पहली बार खुलकर रोई। उसने अपने गले से मंगलसूत्र उतारा, हथेली में रखा और देर तक देखती रही। शादी के समय उसकी माँ ने कहा था, “इसे इज्जत से पहनना।” पर अब उसे समझ आया कि इज्जत धागे में नहीं, जीवन में होती है।
कुछ दिनों बाद उसने वही मंगलसूत्र बेच दिया। उस पैसे से अवनि की थेरेपी, वकील की फीस और नए किराए की जमा रकम भरी। सुनार ने पूछा—
—मैडम, बेच रही हैं? भावनात्मक चीज़ लगती है।
नैना ने कहा—
—भावना बचानी है, चीज़ नहीं।
सुनार ने कुछ नहीं कहा। बस रसीद आगे बढ़ा दी।
मुकदमा शुरू हुआ तो समरजीत ने अपना पुराना मुखौटा पहन लिया। साफ कमीज, तेल लगे बाल, धीमी आवाज़। उसके वकील ने कहा कि नैना को पति की बेवफाई से चोट लगी, इसलिए वह बदला ले रही है। उसने कहा कि बच्ची की चोटें घर में गिरने से हो सकती हैं। उसने यह भी कहा कि माँ स्कूल जाती थी, इसलिए बच्ची की सही देखभाल नहीं होती थी।
नैना ने मेज के नीचे अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं।
आद्या ने धीरे से कहा—
—उन्हें बोलने दीजिए। सच अभी आएगा।
फिर वीडियो चलाए गए।
पहले वीडियो में समरजीत अवनि का इनहेलर छिपा रहा था। दूसरे में वह बच्ची को बाँह से झटका दे रहा था। तीसरे में वह फोन पर कह रहा था कि अगर कुछ बड़ा हो गया तो दोष नैना पर जाएगा। चौथे में वसुधा बाई की आवाज़ थी—“निशान रह जाते हैं।”
अदालत में बैठे लोगों की साँसें भारी हो गईं।
डॉक्टर ने बयान दिया—
—यदि समय पर इनहेलर और इलाज मिलता तो बच्ची की साँस इतनी गंभीर न बिगड़ती। चोटें बार-बार के बल प्रयोग की ओर इशारा करती हैं।
रिद्धिमा ने भी गवाही दी। वह सफेद सलवार-कुर्ता पहने आई थी। उसका चेहरा थका हुआ था, पर आँखें स्थिर थीं।
—मुझे नहीं पता था कि वह शादीशुदा है। उसने मुझे भी झूठ बोला। जब मैंने सवाल किए तो उसने मुझे भी डराया। लेकिन आज मैं यह साफ कहना चाहती हूँ कि वह कमजोर लोगों को चुप कराना जानता है। उस बच्ची के साथ जो हुआ, वह गलती नहीं थी।
समरजीत ने पहली बार सिर झुका लिया। शर्म से नहीं, हार से।
फिर नैना की बारी आई।
वह खड़ी हुई। उसके हाथ काँप रहे थे, लेकिन आवाज़ नहीं।
—मैंने देर की। मैं मानती हूँ। मैंने निशानों को गिरना समझा, चीखों को चिड़चिड़ापन समझा, पति के गुस्से को तनाव समझा। मैंने शादी बचाने के लिए सच को कई बार छोटा किया। पर मेरी बेटी को मेरी समझदारी नहीं, मेरी हिम्मत चाहिए थी। अब मैं उसे कभी किसी के सामने अकेला नहीं छोड़ूँगी।
वह रुकी। फिर उसने वह छोटा कागज निकाला जो अवनि ने थेरेपी में बनाते समय पीछे खरोंच दिया था। उस पर टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं के बीच काउंसलर ने अवनि के शब्द लिखे थे—
“मम्मा जल्दी आना। आवाज़ मुझे नहीं चाहिए।”
अदालत में कुछ लोग आँखें पोंछने लगे।
फैसला 3 सप्ताह बाद आया। समरजीत को बाल क्रूरता, घरेलू हिंसा, जानबूझकर चिकित्सा से वंचित रखने और पत्नी को फँसाने की साजिश के लिए दोषी ठहराया गया। उसकी कस्टडी और मुलाकात के अधिकार निलंबित कर दिए गए। वसुधा बाई पर भी आपराधिक साजिश और बाल सुरक्षा में बाधा डालने का मामला दर्ज हुआ। अदालत ने आदेश दिया कि अवनि की सुरक्षा, थेरेपी और पुनर्वास की पूरी व्यवस्था राज्य सहायता और आरोपी से वसूली गई राशि से की जाए।
नैना को खुशी नहीं हुई। उसे बदला नहीं चाहिए था। उसे बस यह चाहिए था कि कोई दरवाजा अब उसकी बच्ची पर बंद न हो।
अदालत से बाहर निकलते समय वसुधा बाई ने पहली बार नैना से कहा—
—हमसे गलती हो गई।
नैना ने शांत आवाज़ में जवाब दिया—
—गलती दूध गिराना होती है। बच्ची की साँस छीनना पाप होता है।
वसुधा बाई ने नजर झुका ली।
महीनों बाद नैना ने कोथरुड छोड़ दिया। वह पुणे के एक शांत इलाके में छोटे से फ्लैट में रहने लगी। घर में महंगे फर्नीचर नहीं थे, लेकिन खिड़की से धूप आती थी। दरवाजे के पास तुलसी थी। रसोई में अवनि का छोटा स्टील का गिलास रखा रहता था। दीवार पर गणपति बप्पा की वही तस्वीर थी, इस बार सीधी।
अवनि धीरे-धीरे ठीक होने लगी। पहले उसने जोर से हँसना शुरू किया। फिर उसने पार्क में झूला माँगा। फिर एक दिन उसने दूध गिरा दिया और तुरंत डरकर पीछे हट गई।
नैना ने कुछ नहीं कहा। उसने कपड़ा उठाया, फर्श पोंछा और मुस्कुराकर बोली—
—कुछ नहीं हुआ, बेटा। घर गंदा हो सकता है, बच्चा नहीं।
अवनि ने पहली बार बिना डरे पूछा—
—पक्का?
—पक्का।
उस रात अवनि नैना की गोद में सोते-सोते बोली—
—मम्मा, आवाज़ चली गई?
नैना ने उसके बालों को चूमा।
—हाँ, मेरी जान। अब इस घर में सिर्फ हमारी आवाज़ रहेगी।
कुछ दिन बाद रिद्धिमा का पत्र आया। वह मुंबई के एक अस्पताल में नई नौकरी पर चली गई थी। उसने लिखा—
“नैना, मैं सोचती थी कि मैं अकेली धोखा खाई हूँ। पर उस दिन समझ आया कि झूठ सिर्फ दिल नहीं तोड़ता, कई बार जान भी ले सकता है। तुमने अपनी बेटी को बचाया, पर सच कहूँ तो तुमने मुझे भी बचाया।”
नैना ने पत्र पढ़कर आँखें बंद कर लीं। दर्द खत्म नहीं हुआ था, पर अब वह उसे निगल नहीं रहा था। वह दर्द अब चेतावनी बन चुका था, ताकत बन चुका था।
1 साल बाद गणेश चतुर्थी पर अवनि ने मिट्टी के छोटे गणपति को फूल चढ़ाए। उसके गाल फिर भर गए थे, आँखों में चमक लौट आई थी। आरती के बाद उसने नैना से पूछा—
—मम्मा, बप्पा बुरे लोगों को सजा देते हैं?
नैना ने कहा—
—बप्पा हमें हिम्मत देते हैं कि हम बुरे लोगों को रोक सकें।
अवनि ने सिर हिलाया, जैसे उसे बात समझ आ गई हो। फिर वह प्रसाद का मोदक लेकर बोली—
—मम्मा, आधा आपका। आपने मुझे बचाया।
नैना की आँखें भर आईं।
वह जानती थी कि हर माँ हमेशा सही समय पर सब नहीं समझ पाती। कई बार डर, शर्म, समाज, रिश्ते और उम्मीद सच को ढक देते हैं। पर जब सच सामने खड़ा हो जाए, तब चुप रहना भी अपराध बन जाता है।
उसने अवनि को सीने से लगा लिया।
घर छोटा था, पर सुरक्षित था। भविष्य कठिन था, पर साफ था। और नैना ने उस दिन मन ही मन कसम खाई—अब वह अपनी बेटी को सिर्फ पालेंगी नहीं, उसे यह भी सिखाएगी कि प्यार कभी डर की शक्ल में नहीं आता।
क्योंकि एक औरत टूट सकती है, रो सकती है, देर से जाग सकती है, लेकिन जब वह माँ बनकर उठती है, तो उसके सामने सबसे बड़ा झूठ भी टिक नहीं पाता।
