बहू ने शादी के मंच पर कैंसर से लड़ती सास की विग खींची, मेहमान हँसे, मगर पिता ने लिफाफा खोलकर कहा “यह शादी उसी माँ की बचत से हुई है”, और दुल्हन की मुस्कान सबके सामने हमेशा के लिए मर गई

PART 1

“देखो, अब सबको दूल्हे की असली माँ का चेहरा दिखेगा!”

रिया ने यह चीखते हुए मंच पर खड़ी सरोजा देवी की विग दोनों हाथों से खींच ली, और दिल्ली के उस चमचमाते विवाह-हॉल में 300 मेहमानों के सामने एक बीमार माँ का सिर, उसके घाव और 7 महीनों की केमोथेरेपी के निशान उजागर हो गए।

शहनाई की धुन अचानक रुक गई। चाँदी की थालियों में रखे गुलाब जामुन जैसे वहीं ठिठक गए। कैमरों की रोशनी अब दूल्हा-दुल्हन पर नहीं, बल्कि उस स्त्री पर थी जिसने अपने बेटे के लिए पूरी उम्र चुपचाप अपना शरीर, अपनी नींद और अपनी इच्छाएँ जला दी थीं।

सरोजा देवी ने रोया नहीं। उन्होंने चीखा भी नहीं। बस अपनी साड़ी का पल्लू सिर पर रखने की कोशिश की, पर हाथ काँप रहे थे। उनकी त्वचा पर लाल-काले निशान थे, जहाँ दवाइयों ने बालों के साथ-साथ ताकत भी छीन ली थी।

सबसे बड़ा दर्द रिया की हरकत नहीं थी।

सबसे बड़ा दर्द यह था कि उनका बेटा आरव वहीं खड़ा रहा।

उसके पैरों में जैसे कील ठुक गई हो। उसने अपनी माँ को देखा, अपनी दुल्हन को देखा, फिर अपनी नजरें झुका लीं।

कुछ घंटे पहले तक सरोजा देवी अपने होटल के छोटे कमरे में आईने के सामने बैठी थीं। हल्की गुलाबी बनारसी साड़ी उनकी गोद में फैली थी। विग को उन्होंने बार-बार ठीक किया, जैसे वह बाल नहीं, बेटे की खुशी की आखिरी लाज हो।

“देवेंद्र जी, कहीं यह टेढ़ी तो नहीं लग रही?” उन्होंने धीमे से पूछा।

देवेंद्र प्रसाद ने अपनी पत्नी को देखा। वही चेहरा, जिसने बरसों तक लखनऊ की गलियों में घर-घर टिफिन पहुँचाए थे। वही आँखें, जिन्होंने अपने बेटे की पहली फीस भरने के लिए अपनी शादी के कंगन बेच दिए थे। वही मुस्कान, जो दर्द में भी दूसरों को असुविधा नहीं देना चाहती थी।

“तुम जैसी हो, वैसी ही सुंदर हो,” उन्होंने कहा।

सरोजा मुस्कुरा दीं, पर वह मुस्कान पूरी नहीं थी।

“आज आरव की शादी है। लोग मुझे देखकर दुखी न हो जाएँ। उसकी शादी का माहौल खराब नहीं होना चाहिए।”

देवेंद्र कुछ कहना चाहते थे। कहना चाहते थे कि एक माँ कोई सजावट नहीं होती, जिसे बीमार होने पर परदे के पीछे कर दिया जाए। पर सरोजा की आँखों में इतनी विनती थी कि वे चुप रह गए।

जब वे हॉल पहुँचे, तो सारा माहौल अमीरी की चमक से भरा था। रिया का परिवार दक्षिण दिल्ली का बड़ा कारोबारी परिवार था। मेहमानों की बातों में शेयर, फार्महाउस, विदेश यात्राएँ और बड़े अफसरों से संबंध घूम रहे थे। कोई भी सरोजा की तरफ सचमुच देखना नहीं चाहता था।

एक महिला ने सूची देखकर पूछा, “नाम?”

“देवेंद्र प्रसाद। दूल्हे के पिता।”

महिला ने ऊपर से नीचे तक देखा। फिर बनावटी मुस्कान के साथ उन्हें आगे की मेज पर बैठा दिया।

आरव ने दूर से हाथ हिलाया। वह हाथ किसी बेटे का नहीं, किसी परिचित का लगा। सरोजा ने उसे प्यार से देखा और पल्लू ठीक कर लिया।

पीछे बैठी 2 औरतें फुसफुसाईं।

“यही माँ है? अरे, ऐसी हालत में शादी में क्यों आना था?”

“दुल्हन की माँ ने ठीक कहा था, तस्वीरों में अजीब लगेगी।”

देवेंद्र की मुट्ठियाँ भींच गईं। पर सरोजा ने उनके हाथ पर हाथ रख दिया।

“आज कुछ मत बोलिए,” उन्होंने कहा। “आरव का दिन है।”

फेरे हुए। मंत्र गूँजे। आरव ने रिया की माँग में सिंदूर भरा। सरोजा ने ताली बजाई, जबकि उनके हाथों की नसों में दर्द दौड़ रहा था। उनके चेहरे पर गर्व था, थकान थी और एक अदृश्य डर भी।

भोज शुरू होते ही रिया ने अचानक माइक उठाया।

“मैं अपनी सासू माँ को मंच पर बुलाना चाहूँगी। आखिर परिवार में उनका भी योगदान है।”

लोगों ने तालियाँ बजाईं। सरोजा का चेहरा सफेद पड़ गया। उन्होंने कोई भाषण तैयार नहीं किया था। देवेंद्र ने उनका हाथ पकड़ लिया।

“मत जाओ। जरूरत नहीं है।”

“जाना पड़ेगा,” सरोजा ने काँपती आवाज में कहा। “वह मेरा बेटा है।”

वह धीरे-धीरे मंच पर चढ़ीं। उन्होंने बस 4 वाक्य कहे। आरव और रिया को आशीर्वाद दिया। धैर्य, सम्मान और साथ निभाने की बात कही। उनकी आवाज कमजोर थी, मगर गरिमा से भरी थी।

तभी रिया हँसते हुए उनके पास आई।

“मम्मी जी, एक फोटो तो बनती है। बस पहले आपके बाल थोड़ा ठीक कर दूँ।”

सरोजा पीछे हटना चाहती थीं। लेकिन इससे पहले कि कोई समझ पाता, रिया ने उँगलियाँ विग में फँसाईं और जोर से खींच दिया।

विग उसके हाथ में थी।

कुछ लोगों ने हँसी दबाई। फिर 3-4 टेबलों से खुलकर हँसी उठी। रिया ने विग को हवा में उठाया, जैसे कोई मजाक जीत लिया हो।

“अरे, माफ कीजिए,” वह खिलखिलाई। “मुझे लगा अच्छे से चिपकी होगी।”

देवेंद्र ने आरव की तरफ देखा।

आरव ने अपनी माँ का खुला सिर देखा। उसकी शर्म देखी। उसकी टूटती साँस देखी।

और वह चुप रहा।

तभी देवेंद्र की आँखें धीरे-धीरे ठंडी पड़ गईं, जैसे भीतर कोई पुराना सैनिक जाग उठा हो।

PART 2

देवेंद्र इतनी धीमी गति से उठे कि उनकी कुर्सी की आवाज पूरे हॉल में चीरती हुई चली गई।

हँसी धीरे-धीरे मरने लगी। वह मंच की ओर बढ़े। उनके चेहरे पर गुस्सा था, पर आवाज में नहीं। ऐसे आदमी की खामोशी थी, जो अपमान का हिसाब शब्दों से नहीं, सच से चुकाता है।

उन्होंने पहले रिया को नहीं देखा। सीधे सरोजा के पास गए, अपना कोट उतारा और उनके सिर व कंधों पर डाल दिया। सरोजा ने बस इतना कहा, “चलते हैं, देवेंद्र जी।”

“अभी नहीं,” उन्होंने शांत स्वर में कहा।

उन्होंने रिया के हाथ से विग ले ली।

“यह तुम्हारी चीज नहीं है।”

रिया ने हँसने की कोशिश की। “अरे पापा जी, बस मजाक था। शादी में थोड़ा हँसी-मजाक चलता है।”

देवेंद्र ने माइक उठाया।

“आजकल बीमार औरत को 300 लोगों के सामने अपमानित करना मजाक कहलाता है?”

हॉल पत्थर जैसा शांत हो गया।

रिया की माँ नंदिता खड़ी हुईं। “आप हमारी बेटी की शादी खराब कर रहे हैं।”

देवेंद्र ने उनकी ओर देखा। “शादी आपकी बेटी ने खराब की है। उसने क्रूरता को शान समझ लिया।”

आरव दौड़कर आया। “पापा, कृपया यहाँ तमाशा मत कीजिए।”

देवेंद्र की आँखों में पहली बार दर्द चमका। “यहाँ नहीं? तो अपनी माँ की इज्जत कहाँ बचाऊँ? पार्किंग में?”

फिर उन्होंने अपनी जेब से लाल मखमली लिफाफा निकाला।

“यह उपहार तुम्हारी माँ ने तुम दोनों के लिए रखा था।”

रिया की आँखों में अचानक चमक लौट आई।

देवेंद्र ने दस्तावेज़ बाहर निकाले। “नोएडा में 4 कमरों का मकान, पूरा भुगतान। और 75 लाख रुपये की सावधि जमा, जो आज रात तुम्हारे नाम होनी थी।”

मेहमानों में फुसफुसाहट फैल गई।

“और यह शादी,” उन्होंने चारों ओर देखकर कहा, “रिया के परिवार ने नहीं, सरोजा ने चुकाई है। 27 साल की बचत से। टिफिन बेचकर। सिलाई करके। अपने इलाज के पैसों में कटौती करके।”

रिया का चेहरा उतर गया।

देवेंद्र ने दस्तावेज़ मोड़ दिए। “अब यह उपहार नहीं मिलेगा।”

तभी पीछे से एक लड़की की आवाज आई।

“साहब, मैंने सब रिकॉर्ड किया है। दुल्हन ने यह पहले से सोच रखा था।”

पूरे हॉल ने पलटकर देखा।

एक युवा वेट्रेस मोबाइल हाथ में लिए खड़ी थी।

PART 3

उस लड़की का नाम पूजा था। उम्र मुश्किल से 21 रही होगी। होटल की वर्दी में खड़ी वह घबराई हुई थी, पर उसकी आँखों में डर से ज्यादा गुस्सा था।

“साहब,” उसने कहा, “मैं मिठाई की ट्रे लेकर पर्दे के पीछे खड़ी थी। मैंने दुल्हन को सुना था। पहले लगा घर की बात है, पर जब उन्होंने आंटी जी के साथ ऐसा किया, तो चुप नहीं रह सकी।”

रिया तेजी से उसकी तरफ बढ़ी। “फोन बंद करो! तुम्हारी नौकरी चली जाएगी।”

पूजा पीछे नहीं हटी। “नौकरी चली जाए तो चले जाए। पर आज मेरी माँ भी बीमार होती, तो मैं चाहती कोई सच बोलता।”

देवेंद्र ने हॉल के प्रबंधक की ओर देखा। प्रबंधक ने चुपचाप स्क्रीन चालू करवा दी। कुछ ही सेकंड में बड़े पर्दे पर एक धुँधला लेकिन साफ वीडियो चलने लगा।

वीडियो में रिया अपनी 2 सहेलियों के साथ मंच के पीछे खड़ी थी। वह हँस रही थी। उसके हाथ में माइक था।

“देखना, अभी सासू माँ को बुलाती हूँ,” रिया कह रही थी। “मम्मी ने कहा है, उनकी विग बहुत नकली लग रही है। फोटो खराब हो जाएँगी। अगर थोड़ा खींच दूँगी तो पूरा हॉल देखेगा। मजा आ जाएगा।”

एक सहेली ने पूछा, “आरव कुछ बोलेगा?”

रिया ने मुँह बनाकर कहा, “आरव? उसे तो अपनी माँ से ही शर्म आती है। तभी तो मैंने शादी के कार्ड में उनके नाम छोटे रखवाए। वह मेरे परिवार के सामने कुछ नहीं बोलेगा।”

वीडियो खत्म हुआ, मगर हॉल की साँसें जैसे खत्म न हुईं।

आरव का चेहरा राख जैसा हो गया। वह रिया को देखता रहा, जैसे पहली बार उसे पहचान रहा हो। सरोजा देवी ने आँखें बंद कर लीं। विग खींचने का अपमान उन्हें चुभा था, पर बेटे की चुप्पी और रिया के उस वाक्य ने जैसे उनके सीने के भीतर कुछ तोड़ दिया।

नंदिता ने तुरंत कहा, “यह अधूरा वीडियो है। लड़कियाँ मजाक में ऐसी बातें कर देती हैं।”

देवेंद्र ने शांत होकर पूछा, “तो क्या आपकी बेटी ने मजाक में विग खींची? मजाक में कैंसर के निशान दिखाए? मजाक में 300 लोगों के सामने एक माँ की इज्जत उतारी?”

नंदिता के होंठ काँपे। जवाब नहीं निकला।

कुछ मेहमान, जो थोड़ी देर पहले हँसे थे, अब सिर झुकाए खड़े थे। एक बुजुर्ग चाचा ने धीरे से अपनी पत्नी से कहा, “हमने बहुत गलत किया।”

आरव धीरे-धीरे अपनी माँ के पास आया।

“माँ…”

सरोजा ने हाथ उठा दिया। “अभी मत बोल, बेटा।”

उसकी आवाज कमजोर थी, मगर उसमें पहली बार एक दीवार थी।

आरव की आँखों से आँसू बहने लगे। “माँ, मुझे माफ कर दो। मैं डर गया था। मुझे लगा अगर मैं कुछ बोलूँगा तो बात बढ़ जाएगी। रिया का परिवार…”

सरोजा ने उसकी बात काट दी।

“बात तब बढ़ी थी, जब तू चुप रहा।”

वह वाक्य हल्का था, पर आरव को घुटनों तक गिरा गया। वह वहीं मंच पर बैठ गया, दूल्हे की शेरवानी में, सिर झुकाए, जैसे बचपन का वह बच्चा लौट आया हो जो गलती करने पर माँ की गोद ढूँढ़ता था।

“तू जानता है,” सरोजा ने धीमे-धीमे कहा, “जब तेरी 10वीं की फीस भरने के लिए पैसे नहीं थे, तब तेरे पापा ने अपनी पुरानी घड़ी बेची थी। जब तू इंजीनियरिंग पढ़ने गया, तब मैंने 14 घरों में टिफिन भेजे। जब मुझे बीमारी पता चली, तब डॉक्टर ने कहा था आराम जरूरी है। लेकिन मैंने तेरी शादी के कार्ड बाँटते समय भी सोचा कि मेरा बेटा खुश रहेगा, तो दर्द कम लगेगा।”

आरव सिसक उठा।

“मैंने तुझसे कभी कुछ नहीं माँगा। न कार, न बड़ा घर, न महंगे तोहफे। सिर्फ इतना चाहा कि जब दुनिया मुझे कम समझे, तब मेरा बेटा मुझे अपनी माँ समझे।”

रिया झल्लाकर बोली, “बस कीजिए यह भावुकता! एक विग ही तो थी। इतनी बड़ी बात बना दी सबने!”

आरव ने पहली बार सिर उठाकर रिया को देखा।

उसकी आँखों में शर्म थी, गुस्सा था और देर से जागी हुई समझ थी।

“वह विग नहीं थी,” उसने कहा। “वह मेरी माँ की हिम्मत थी।”

हॉल में जैसे किसी ने सबके भीतर घंटा बजा दिया हो।

रिया का चेहरा कस गया। “तो अब क्या? शादी के बीच में अपनी माँ का नाटक करोगे? याद रखना, मेरे पापा के बिना तुम्हारा कारोबार भी नहीं चलेगा।”

देवेंद्र हल्का-सा हँसे, पर वह हँसी दुख से भरी थी।

“आरव का कारोबार तुम्हारे पिता ने नहीं बनाया। उसकी पहली दुकान का किराया सरोजा ने दिया था। खाते में जमा पहले 12 लाख रुपये भी उसी ने दिए थे। मगर आज से किसी पर कोई एहसान नहीं रहेगा।”

उन्होंने कागज़ दोबारा खोले, मगर इस बार पढ़ने के लिए नहीं, सबको दिखाने के लिए।

“नोएडा का मकान अब बिकेगा। 75 लाख रुपये की जमा भी रद्द होगी। उसका आधा हिस्सा सरोजा के इलाज में जाएगा और आधा उन महिलाओं के लिए, जो कैंसर से लड़ते हुए अपने परिवार में ही अपमान झेलती हैं।”

रिया चीख उठी, “आप ऐसा नहीं कर सकते! वह हमारे भविष्य के लिए था!”

सरोजा ने पहली बार सीधे उसकी ओर देखा।

“नहीं, बेटी। वह एक परिवार के भविष्य के लिए था। लेकिन परिवार वह नहीं होता, जहाँ किसी की बीमारी तमाशा बन जाए।”

रिया की आँखों में आँसू नहीं थे, केवल गुस्सा था। उसने नंदिता की ओर देखा, पर वहाँ भी डर था। क्योंकि वीडियो अब कई मोबाइलों में था। कुछ मेहमान पहले ही हॉल से बाहर जाकर किसी को फोन कर रहे थे। कोई होटल स्टाफ से बात कर रहा था। कोई रिया के परिवार की तरफ घूर रहा था।

नंदिता ने माहौल सँभालने की कोशिश की। “देखिए, शादी हो चुकी है। अब घर की बात घर में सुलझानी चाहिए।”

देवेंद्र ने कहा, “इज्जत जब घर में छीनी जाती है, तब भी आवाज बाहर तक जाती है।”

आरव ने काँपते हुए अपनी पगड़ी उतार दी। उसकी आँखें अपनी माँ पर टिकी थीं।

“माँ, मैं आपके साथ चलूँगा।”

सरोजा का चेहरा दर्द से भर गया। “आज नहीं।”

आरव चौंक गया। “माँ?”

“आज तू अपने किए के साथ रह। समझ कि चुप रहना भी पाप होता है। जब तक तू यह नहीं समझेगा, मेरी माफी तेरे किसी काम की नहीं।”

देवेंद्र ने अपनी पत्नी का हाथ थामा। वह मंच से उतरने लगीं। कोट अब भी उनके सिर पर था, पर कुछ कदम चलने के बाद वह रुकीं। उन्होंने धीरे से कोट हटाया।

हॉल ने उनका सिर देखा। वही निशान। वही झड़ चुके बालों की जगह। वही पीली त्वचा। मगर अब उस दृश्य में शर्म नहीं थी। अब वह किसी युद्ध से लौटी स्त्री जैसी लग रही थीं।

उन्होंने रिया के हाथ से गिरकर पड़ी विग उठाई। कुछ पल उसे देखा। फिर पास रखी मेज पर रख दिया।

“इसे संभालकर रखना,” उन्होंने कहा। “तुम्हें याद रहे कि जिस चीज पर तुम हँसी थीं, उसी ने तुम्हारी असलियत दिखा दी।”

फिर वे बिना पल्लू सिर पर डाले बाहर निकल गईं।

हॉल के बाहर दिल्ली की ठंडी रात थी। शादी की रोशनी पीछे चमक रही थी, पर देवेंद्र और सरोजा के आसपास एक अलग ही सन्नाटा था। पार्किंग तक जाते हुए सरोजा लड़खड़ाईं। देवेंद्र ने उन्हें बाँहों में थाम लिया।

“दर्द हो रहा है?” उन्होंने पूछा।

सरोजा ने धीमे से कहा, “दर्द तो बहुत पहले से था। आज बस सबने देख लिया।”

कार में बैठते ही उन्होंने आँखें बंद कर लीं। देवेंद्र ने उनके पैरों के पास पानी की बोतल रखी, दवा निकाली, पर वह कुछ देर तक चुप रहीं।

फिर उन्होंने पूछा, “क्या आरव सच में इतना बदल गया?”

देवेंद्र ने लंबी साँस ली। “शायद वह खो गया था। आज उसे आईना मिल गया।”

उस रात आरव ने 27 बार फोन किया। देवेंद्र ने नहीं उठाया। सरोजा ने भी नहीं। यह सजा नहीं थी। यह वह दूरी थी, जो किसी टूटे हुए दिल को फिर से साँस लेने के लिए चाहिए होती है।

सुबह तक वीडियो पूरे शहर में फैल चुका था। लोग रिया के परिवार को पहचानने लगे। सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई। कुछ ने कहा शादी में ऐसा नहीं करना चाहिए था। कुछ ने कहा देवेंद्र ने देर से सही, सही किया। मगर सबसे ज्यादा लोग उस माँ की तस्वीर पर ठहर गए, जो बिना विग के हॉल से बाहर निकली थी और फिर भी सबसे गरिमामयी दिख रही थी।

होटल ने पूजा को नौकरी से निकालने की हिम्मत नहीं की। उल्टा, उसके लिए लोगों ने आवाज उठाई। कुछ हफ्तों बाद देवेंद्र ने उसे अपने जानने वाले अस्पताल के कैंटीन में बेहतर काम दिलवा दिया। पूजा ने सरोजा के पैर छूते हुए कहा, “आंटी, उस दिन मुझे अपनी माँ दिख रही थीं।”

सरोजा ने उसके सिर पर हाथ रखा। “बेटी, उस दिन तूने मेरी लाज बचाई।”

आरव कई दिनों बाद घर आया। वह अकेला था। बिना शोर, बिना बहाने, बिना रिया के। दरवाजे पर खड़े होकर उसने घंटी नहीं बजाई। वह पुरानी आदत से लोहे के दरवाजे को हल्के से खटखटाता रहा, जैसे बचपन में स्कूल से लौटकर करता था।

देवेंद्र ने दरवाजा खोला।

आरव ने पाँव छूने चाहे। देवेंद्र पीछे हट गए।

“पैर बाद में छूना। पहले अपनी माँ की आँखों में देखना।”

सरोजा अंदर पूजा की थाली लगा रही थीं। सिर पर कोई विग नहीं थी। छोटे-छोटे नए बाल उगने लगे थे। आरव ने उन्हें देखा और रो पड़ा।

“माँ, मैं उस दिन बेटा नहीं था। मैं कायर था।”

सरोजा चुप रहीं।

“मैंने रिया से अलग रहने का फैसला किया है। उसके खिलाफ शिकायत भी करूँगा, क्योंकि जो हुआ वह अपमान से ज्यादा था। मैं जानता हूँ इससे सब ठीक नहीं होगा। पर अब छिपूँगा नहीं।”

सरोजा ने उसकी ओर देखा। उनकी आँखें अभी भी घायल थीं, लेकिन उनमें नफरत नहीं थी।

“माफी शब्द से नहीं मिलती, आरव। रोज कमानी पड़ती है।”

आरव ने सिर झुका दिया। “मैं कमाऊँगा, माँ। जितना समय लगे।”

मकान बाद में बिक गया। पैसा सचमुच सरोजा के इलाज और एक छोटे से सहायता-निधि में लगा। देवेंद्र ने उसका नाम रखा—सरोजा सहारा कोष। पहला चेक उस महिला को दिया गया, जिसके पति ने बीमारी के कारण उसे मायके छोड़ दिया था। सरोजा ने उसे गले लगाया और कहा, “बाल चले जाएँ तो डरना मत। इज्जत बची रहे, तो इंसान पूरा रहता है।”

रिया के परिवार पर सामाजिक दबाव बढ़ा। व्यापारिक मंडली में नंदिता को अब लोग पहले जैसी इज्जत से नहीं देखते थे। रिया ने कई बार सफाई दी, पर वीडियो की आवाज हर सफाई से तेज थी। अदालत में आरव ने अपनी बात रखी। मामला लंबा चला, पर एक बात साफ हो गई—उस रात का अपमान किसी निजी मजाक में दबाया नहीं जा सकता था।

समय बीता। सरोजा का इलाज चलता रहा। कुछ दिन अच्छे होते, कुछ दिन इतने कठिन कि वह बिस्तर से उठ नहीं पातीं। पर अब वह विग कम पहनती थीं। कई बार शाम को छत पर बैठ जातीं। हवा उनके सिर को छूती और वह आँखें बंद कर मुस्कुरा देतीं।

एक शाम देवेंद्र ने पूछा, “अब विग क्यों नहीं लगाती?”

सरोजा ने आसमान की तरफ देखा। दूर किसी घर में आरती की घंटी बज रही थी। सड़क से चाय वाले की आवाज आ रही थी। जीवन फिर से छोटे-छोटे टुकड़ों में लौट रहा था।

उन्होंने कहा, “बाल चले गए, देवेंद्र जी। पर उस रात समझ आ गया कि मेरी शर्म मेरे सिर पर नहीं थी। वह उन लोगों के चेहरे पर थी।”

देवेंद्र ने उनका हाथ पकड़ लिया।

उसी समय दरवाजे पर आरव आया। हाथ में दवाइयों का डिब्बा था। वह कुछ बोले बिना माँ के पास बैठ गया। सरोजा ने उसे देखा, फिर थाली से एक बिस्कुट उठाकर उसकी तरफ बढ़ा दिया।

यह माफी नहीं थी।

लेकिन शायद रास्ते की पहली सीढ़ी थी।

और उस रात की सबसे बड़ी सच्चाई यही रह गई—मंच पर सरोजा देवी बेनकाब नहीं हुई थीं।

बेनकाब वे लोग हुए थे, जिन्हें माँ की कुर्बानी से बनी रोशनी में भी सिर्फ अपनी तस्वीरें सुंदर चाहिए थीं।

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