बीमार बेटी 4 दिन भूखी रही, मोहल्ले ने पिता को राक्षस कहा, पर जब अस्पताल से आवाज आई “मेरी गुड़िया अकेली है”, तो सबको पता चला कि वह उसे छोड़कर नहीं, तूफान में गिरकर भी उसके पास लौट रहा था

PART 1

बीमार 7 साल की बच्ची 4 दिन तक भूखी, प्यास से सूखे होंठों वाली, अपने पिता की फटी हुई शॉल ओढ़े कमरे में बंद मिली, और पूरी बस्ती ने उसी रात उसके पिता को राक्षस कह दिया।

—पापा बोले थे, दवा लेकर अभी आते हैं… फिर वापस ही नहीं आए।

112 की लाइन पर बच्ची की आवाज इतनी कमजोर थी कि कंट्रोल रूम में बैठे ऑपरेटर आरव माथुर का हाथ कीबोर्ड पर रुक गया। बाहर दिल्ली की सर्द बारिश पुरानी छतों पर हथौड़े की तरह बज रही थी। करावल नगर की संकरी गलियों में पानी घुटनों तक भर चुका था।

—बेटा, तुम्हारा नाम क्या है? —आरव ने आवाज नरम की।

—अनन्या शर्मा। मेरी उम्र 7 है।

फोन के पीछे कहीं पानी टपकने की आवाज आ रही थी। बीच-बीच में बच्ची की सांस अटकती थी।

—घर में कोई और है?

कुछ पल चुप्पी रही।

—नहीं। पापा दवा और खिचड़ी लेने गए थे। बोले थे जल्दी आएंगे। मैंने दरवाज़ा अंदर से लगा लिया था, जैसे उन्होंने कहा था।

आरव की उंगलियां तेजी से चलने लगीं।

—तुमने आखिरी बार खाना कब खाया?

—पहले कुकर में दाल थी… फिर उसमें अजीब गंध आने लगी। मैंने नल का पानी पिया। मोती को भी दिया।

—मोती कौन है?

—मेरा कपड़े वाला हाथी। पापा कहते हैं, वह मेरी रखवाली करता है।

आरव ने तुरंत पास की पीसीआर वैन को संदेश भेजा।

—अनन्या, फोन मत काटना। पुलिस दीदी आ रही हैं। तुम्हें कोई डांटेगा नहीं।

करीब 18 मिनट बाद सब-इंस्पेक्टर मीरा चौहान एक पुरानी दोमंजिला बिल्डिंग के नीचे पहुंची। गली में कीचड़, बिजली की लटकती तारें और बंद खिड़कियां थीं। पहली मंजिल के कोने वाले कमरे से हल्की पीली रोशनी छन रही थी।

—अनन्या, दरवाज़ा खोलो बेटा। मीरा दीदी आई हैं।

अंदर से कुंडी धीरे से खिसकी।

दरवाज़ा खुलते ही मीरा की सांस रुक गई।

अनन्या नंगे पांव खड़ी थी। उसने नीली स्कूल स्वेटर के ऊपर अपने पिता की बड़ी भूरे रंग की शॉल लपेट रखी थी। बाल उलझे थे, होंठ फटे हुए, आंखें भीतर धंसी हुईं। उसका पेट दर्द से तना था, मगर हाथ लकड़ी जैसे पतले।

कमरे में जैसे जिंदगी अचानक बीच में रुक गई थी। गैस पर रखा काला पड़ा भगोना, मेज पर आधा भरा स्टील का गिलास, स्कूल की कॉपी, दवा की पर्ची, बिजली का बिल और एक छोटी सी पूजा की थाली जिसमें अगरबत्ती आधी जली रह गई थी।

दीवार पर कैलेंडर के नीचे लाल पेन से लिखा था—

“अनन्या की जांच। देर नहीं करनी।”

मीरा ने फ्रिज खोला। अंदर सिर्फ आधी कटोरी दही, सूखी रोटियां और पानी की बोतल थी।

अनन्या धीरे से बोली—

—पापा बुरे नहीं हैं। वह मुझे छोड़कर नहीं जाते।

मीरा ने उसे कंबल में लपेटा। उसी समय नीचे से शोर उठने लगा। पड़ोसियों ने मोबाइल निकाल लिए थे।

—देखा? अकेला आदमी बच्चा नहीं पाल सकता, —नीचे वाली अरोड़ा आंटी बोलीं।

—4 दिन तक बच्ची बंद रही! ऐसे बाप को जेल में सड़ा देना चाहिए।

—कहता था बेटी मेरी जान है। सब नाटक था।

मीरा की आंखें कठोर हो गईं। कमरे में बिखरी चीजें किसी भागे हुए आदमी की नहीं लग रही थीं। चाबी मेज पर थी। बटुआ अलमारी के ऊपर पड़ा था। धुले कपड़े बाल्टी में भीगे हुए थे। एक थैले में बच्ची की मेडिकल रिपोर्ट रखी थी।

कोई पिता जो भागता है, वह घर ऐसे नहीं छोड़ता।

पर यह बात कहने से पहले ही अनन्या का सिर मीरा की बांह पर लुढ़क गया।

—एम्बुलेंस! जल्दी!

रात होते-होते वीडियो फैल गया। “दिल्ली में हैवान पिता ने बीमार बेटी को 4 दिन अकेला छोड़ा।” धुंधले वीडियो में अनन्या स्ट्रेचर पर थी, उसके सीने से कपड़े का हाथी चिपका था।

लोगों ने नाम भी पता कर लिया—राघव शर्मा। पेशा—ई-रिक्शा चालक। पत्नी—3 साल पहले बीमारी से गुजर चुकी।

और उसी रात, हजारों अजनबी लोग उस पिता को कोस रहे थे, जो कहीं मिल ही नहीं रहा था।

किसी ने यह नहीं पूछा कि वह गया कहां था।

किसी ने यह नहीं सोचा कि अगर वह सच में भागा था, तो अपनी बेटी की पर्ची पर कांपते हाथों से आखिरी बार क्यों लिख गया था—

“डॉ. सेन को फोन करना। दर्द बढ़ रहा है।”

सुबह होने से पहले अनन्या अस्पताल के बेड पर बेहोश पड़ी थी।

और उसी वक्त शहर के दूसरे छोर पर, एक सरकारी अस्पताल के अज्ञात वार्ड में, पट्टियों में लिपटा एक आदमी बार-बार बेहोशी में एक ही नाम बुदबुदा रहा था—

—अनन्या… मेरी गुड़िया अकेली है…

PART 2

सुबह तक सोशल मीडिया ने फैसला सुना दिया था।

“गरीब बाप ने बीमार बच्ची को मरने के लिए छोड़ दिया।”

लोक नायक अस्पताल के बाल वार्ड में अनन्या होश में आई तो उसके हाथ में मोती था। नर्स पूजा ने उसके माथे पर हाथ रखा।

—अब डरने की जरूरत नहीं है, बेटा।

अनन्या ने दरवाज़े की तरफ देखा।

—पापा आ गए?

नर्स चुप रह गई।

थोड़ी देर बाद बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अदिति सेन, सब-इंस्पेक्टर मीरा और बाल कल्याण अधिकारी नीलिमा वर्मा कमरे के बाहर खड़े थे।

—राघव ने मुझे 3 दिन पहले फोन किया था, —डॉ. सेन ने धीमे कहा। —वह बहुत घबराया हुआ था। बच्ची को पेट में तेज दर्द था। मैंने तुरंत जांच लिखी थी।

—वह भागने वाला आदमी नहीं लग रहा? —मीरा ने पूछा।

—भागने वाला नहीं। टूटने वाला आदमी लग रहा था। वह कह रहा था, ई-रिक्शा बेच देगा, पर इलाज रुकना नहीं चाहिए।

नीलिमा ने अनन्या की शॉल उठाई। जेब से एक मुड़ा हुआ मेडिकल स्टोर का बिल निकला। पीछे नीली स्याही में लिखा था—

“दवा महंगी है। उधार मांगना पड़े तो भी लेना।”

मीरा उसी शाम राघव के कमरे में लौटी। बटुआ वहीं था। पुरानी घड़ी वहीं थी। मंदिर के पास बेटी की तस्वीर रखी थी। कैलेंडर पर लिखा था—

“दूसरी शिफ्ट।”
“अनन्या की सोनोग्राफी।”
“किराया देना।”
“स्कूल फीस आधी जमा।”

नीचे गली में 70 साल के हाशिम चाचा ने भीगी टोपी ठीक की।

—मैंने उसे उस रात देखा था। वह दवा की दुकान की तरफ भाग रहा था। बोला, बच्ची का दर्द बढ़ गया है।

—पहले क्यों नहीं बताया?

हाशिम चाचा की आंखें झुक गईं।

—यहां लोग सच से पहले तमाशा देखते हैं, बेटी।

रात 11 बजे अस्पताल के फोन पर कॉल आया।

—मेरी… अनन्या… जिंदा है?

नर्स पूजा जम गई।

—आप कौन?

—उससे कहना… पापा आएंगे…

लाइन कट गई।

तभी दूसरे अस्पताल से खबर आई—एक अज्ञात घायल आदमी 4 दिन से भर्ती था। हर बार होश में आकर कहता था—

“मेरी बेटी घर में अकेली है।”

और पहचान की पुष्टि से पहले ही बाल वार्ड का दरवाज़ा अचानक खुला।

PART 3

दरवाज़े पर खड़ी औरत की साड़ी बारिश से भीगी हुई थी, माथे की बिंदी फैल चुकी थी और हाथ में मोबाइल कांप रहा था।

अनन्या ने गर्दन उठाई।

—बुआ?

संध्या शर्मा, राघव की बड़ी बहन, दौड़कर बेड के पास आ गई। उसके चेहरे पर शर्म, डर और पछतावे का ऐसा मिश्रण था कि वह बच्ची के सामने घुटनों पर बैठ गई।

—मुझे माफ कर दे, अनन्या। मैंने भी वही मान लिया जो सब बोल रहे थे।

अनन्या की आंखें भर आईं।

—पापा कहां हैं? सब कहते हैं वह बुरे हैं। वह बुरे नहीं हैं ना?

संध्या रो पड़ी।

—नहीं बेटा। तेरा पापा जिंदा है। और वह 4 दिन से तुझे ही पुकार रहा है।

कमरे में खड़े सब लोग चुप हो गए। डॉ. सेन ने धीरे से नीलिमा की तरफ देखा। मीरा ने फोन कसकर पकड़ लिया।

कहानी अब खुलने लगी थी।

उस रात राघव ने अनन्या को दर्द से तड़पते देखा था। उसने पहले गर्म पानी की बोतल रखी, फिर पुरानी पर्ची निकाली, फिर डॉ. सेन को फोन किया। डॉक्टर ने कहा था कि दवा तुरंत शुरू करनी होगी और सुबह तक अस्पताल लाना होगा। राघव के पास पैसे कम थे, पर इंतजार करने की हिम्मत उससे खत्म हो चुकी थी।

उसने अनन्या को शॉल ओढ़ाई।

—गुड़िया, दरवाज़ा अंदर से बंद रखना। किसी अजनबी को मत खोलना। पापा दवा लेकर आते हैं। बस 20 मिनट।

अनन्या ने दर्द के बीच पूछा था—

—खिचड़ी भी लाओगे?

राघव ने उसके माथे को चूमा।

—सबसे नरम वाली। और मोती को भी खिलाएंगे।

वह बिना बटुआ लिए निकला था, क्योंकि पैसे उसने पहले ही मोबाइल कवर के अंदर रखे थे। बारिश इतनी तेज थी कि ई-रिक्शा निकालना मुश्किल था, इसलिए वह पुरानी मोटरसाइकिल लेकर निकला। करावल नगर की मुख्य सड़क पर पानी भरा था। सामने से आती एक दूध की वैन फिसली। ड्राइवर ने ब्रेक मारा, मगर गाड़ी बेकाबू होकर राघव की बाइक से टकरा गई।

राघव सड़क किनारे जा गिरा। सिर फुटपाथ से टकराया। मोबाइल नाले में बह गया। दवा की पर्ची कीचड़ में खो गई। जिस छोटे निजी क्लिनिक की एम्बुलेंस आई, उसने उसे बिना पहचान वाले घायल के रूप में शहर के दूसरे सरकारी अस्पताल भेज दिया।

वह कई घंटों तक बेहोश रहा।

जब पहली बार आंख खुली, उसे अपना नाम याद था, बेटी का नाम याद था, पर पता पूरा नहीं बोल पा रहा था। वह बार-बार उठने की कोशिश करता।

—बेटी… घर… अकेली…

नर्सें उसे पकड़तीं। डॉक्टर कहते, सिर पर चोट है, भ्रम हो रहा है। वह फिर बेहोश हो जाता।

अगले 4 दिन तक राघव आधी दुनिया भूलता रहा, आधी दुनिया पकड़कर बैठा रहा। उसे अपना फोन नंबर याद नहीं आ रहा था, बहन का नंबर अधूरा याद था, घर का पता टूटे शब्दों में निकलता। पर हर बार एक बात साफ निकलती—

—अनन्या को दवा चाहिए।

उधर अनन्या अपने कमरे में इंतजार करती रही। पहले उसने दरवाज़े की तरफ देखा। फिर खिड़की से गली में झांका। फिर पापा की शॉल कसकर लपेट ली। पहले दिन उसने दाल गर्म करने की कोशिश की, मगर गैस जलाने से डर गई। दूसरे दिन उसने नल का पानी पिया। तीसरे दिन पेट का दर्द बढ़ा तो वह फर्श पर सिकुड़कर लेट गई। चौथे दिन उसे पापा का दिया वाक्य याद आया—

“जरूरत पड़े तो 112 मिलाना। पुलिस डराने नहीं, बचाने आती है।”

उसने कांपते हाथ से फोन उठाया।

और पूरी दुनिया ने सिर्फ अंतिम दृश्य देखा—भूखी बच्ची, बंद कमरा, गायब पिता।

किसी ने बीच की बारिश नहीं देखी।

किसी ने वह सड़क नहीं देखी जहां राघव खून और पानी के बीच पड़ा था।

किसी ने अस्पताल के उस वार्ड को नहीं देखा जहां वह पट्टियों में लिपटा, अपनी बेटी के नाम से लड़ रहा था।

मीरा ने तुरंत दूसरे अस्पताल से संपर्क किया। फोटो भेजी गई। संध्या ने पहचान की। राघव शर्मा मिल गया था।

2 घंटे बाद उसे एम्बुलेंस से उसी अस्पताल में लाया गया जहां अनन्या भर्ती थी।

वार्ड के बाहर भीड़ जमा थी—पड़ोसी, पुलिस, अस्पताल का स्टाफ और वे लोग भी जिन्होंने रात भर उसे गालियां दी थीं। अरोड़ा आंटी भी थीं, जिन्होंने सबसे पहले वीडियो शेयर किया था। उनके हाथ में फोन था, पर इस बार स्क्रीन नीचे थी।

दरवाज़ा खुला।

स्ट्रेचर अंदर आया।

राघव का चेहरा सूजा हुआ था। माथे पर पट्टी, बांह पर प्लास्टर, होंठ फटे हुए। आंखें थकी थीं, मगर जैसे ही उसने बेड पर बैठी अनन्या को देखा, उसके भीतर बची हुई सारी ताकत टूटकर बाहर आ गई।

—गुड़िया…

अनन्या ने हाथ फैलाए।

—पापा!

नर्स ने सलाइन संभाली। डॉ. सेन पीछे हट गईं। राघव को सहारा देकर बेटी के पास बैठाया गया। उसने कांपते हाथ से अनन्या के बाल छुए, फिर उसके माथे से अपना माथा लगा दिया।

—पापा आ नहीं पाए, बेटा। पापा ने कोशिश की थी। बहुत कोशिश की थी।

अनन्या रोते हुए बोली—

—मैंने कहा था सबको। आप मुझे छोड़कर नहीं जाएंगे।

—कभी नहीं, —राघव की आवाज फट गई। —तू मेरी सांस है। सांस कोई छोड़ता है क्या?

कमरे में खड़े कई लोग आंखें पोंछने लगे। नीलिमा ने फाइल बंद कर दी। उसके चेहरे पर राहत थी। यह मामला अब परित्याग का नहीं था। यह गरीबी, दुर्घटना, लापरवाही और समाज की जल्दबाजी का मामला था।

मीरा बाहर आई और सीधे पड़ोसियों के सामने खड़ी हो गई।

—वीडियो बनाना आसान था। दरवाज़ा खटखटाना मुश्किल था?

किसी ने जवाब नहीं दिया।

—4 दिन तक एक बच्ची अकेली थी। किसी ने रोने की आवाज नहीं सुनी? किसी ने पूछा नहीं कि राघव कहां है? आप सबने फैसला सुना दिया, पर मदद किसने की?

हाशिम चाचा की आंखें भर आईं।

—गलती हमारी भी है। वह लड़का रोज मेहनत करता था। पत्नी के बाद बेटी को अकेले पाल रहा था। हमने कभी ठीक से पूछा भी नहीं कि कैसे निभा रहा है।

अरोड़ा आंटी ने धीरे से कहा—

—मैंने पोस्ट हटा दी।

मीरा की आवाज सख्त हो गई।

—बदनामी हटाने से जख्म नहीं हटते।

अगले दिन सच सामने आया। पुलिस ने दुर्घटना की रिपोर्ट निकाली। सड़क के पास की दुकान के कैमरे में टक्कर साफ दिख रही थी। दूध वैन के ड्राइवर ने भी बयान दिया कि वह बारिश में फिसल गया था और घायल आदमी बेहोश था। अस्पताल के रजिस्टर में “अज्ञात पुरुष” के नाम से भर्ती की एंट्री थी। रात 11 बजे की कॉल भी उसी वार्ड के फोन से हुई थी।

राघव अपराधी नहीं था।

राघव वह पिता था जो दवा लेने निकला था और मौत से टकराकर भी बेटी का नाम नहीं भूल पाया।

लेकिन सच आ जाने से दर्द कम नहीं हुआ। अनन्या कई दिनों तक पापा को अपनी आंखों से दूर नहीं होने देती। नर्स जब दवा देती तो वह पूछती—

—पापा बाहर तो नहीं गए?

राघव उसके बेड के पास बैठता, टूटी बांह से भी उसके हाथ पर उंगलियां फेरता।

—यहीं हूं। इस बार कहीं नहीं जाऊंगा।

डॉ. सेन ने जांच पूरी की। अनन्या को पेट की गंभीर सूजन थी, जो इलाज से संभल सकती थी, मगर देर होती तो जान का खतरा था। राघव ने सिर झुका लिया।

—मेरे पास पैसे नहीं थे, डॉक्टर। इसी चक्कर में देर हो गई।

डॉ. सेन ने कठोर मगर दयालु आवाज में कहा—

—गरीबी शर्म की बात नहीं है, राघव। मदद मांगने में देर करना खतरनाक है।

नीलिमा ने सरकारी योजना, चाइल्ड हेल्थ फंड और स्थानीय सहायता समूह से बात की। अस्पताल ने इलाज जारी रखा। संध्या, जो पहले अपने मायके की जिम्मेदारियों से बचती रही थी, हर दिन खाने का डिब्बा लेकर आने लगी।

एक शाम उसने राघव से कहा—

—तूने फोन क्यों नहीं किया था पहले?

राघव ने अनन्या को सोते देखा।

—हर किसी की अपनी लड़ाई होती है दीदी। लगा, अपनी बेटी को अपने दम पर पालना मेरा फर्ज है।

संध्या की आंखें भर आईं।

—फर्ज अकेले उठाने की चीज नहीं होती। परिवार अगर सिर्फ त्योहारों पर दिखे, तो वह परिवार नहीं, फोटो होता है।

राघव ने कुछ नहीं कहा। उसकी चुप्पी में 3 साल की विधुर जिंदगी, किराए का कमरा, दोहरी शिफ्ट, स्कूल की फीस, दवा की पर्चियां और बेटी की चोटी बनाते हुए सीखी गई अनगिनत सुबहें छिपी थीं।

जब अनन्या को 9वें दिन छुट्टी मिली, अस्पताल के गेट पर वही बस्ती के लोग खड़े थे। कोई फूल लाया था, कोई राशन, कोई दूध, कोई स्कूल बैग। अरोड़ा आंटी आगे बढ़ीं, हाथ जोड़कर बोलीं—

—बेटा, माफ कर दो। मैंने बिना जाने बहुत गलत बोला।

राघव ने उनकी तरफ देखा। उसके चेहरे पर थकान थी, गुस्सा भी था, लेकिन बदले की आग नहीं थी।

—माफी मुझसे नहीं। उस बच्ची से मांगिए जिसे 4 दिन कोई देखने नहीं आया।

अरोड़ा आंटी अनन्या के सामने झुक गईं।

—मुझे माफ करोगी?

अनन्या ने मोती को सीने से लगाया और धीरे से पूछा—

—अगली बार अगर किसी के घर की लाइट 4 दिन जले, तो आप दरवाज़ा खटखटाओगी?

आंटी रो पड़ीं।

—हां, बेटा। कसम।

करावल नगर की वह गली सच में बदलने लगी। मकान मालिक ने राघव का 2 महीने का किराया माफ किया। पास के गुरुद्वारे से लंगर आने लगा। मोहल्ले की महिलाओं ने बारी-बारी अनन्या को स्कूल छोड़ने का जिम्मा लिया। हाशिम चाचा ने अपने पुराने रेडियो के बदले राघव की मोटरसाइकिल की मरम्मत में पैसे दिए। एक दुकानदार ने मेडिकल स्टोर वाले से बात करके दवा उधार की व्यवस्था कर दी।

लेकिन सबसे बड़ा बदलाव दरवाज़ों में आया।

पहले लोग खिड़की से झांकते थे। अब दस्तक देते थे।

पहले मुसीबत खबर बनती थी। अब आवाज बनती थी।

पहले किसी गरीब पिता की थकान को नाकामी कहा जाता था। अब कोई पूछता था—

“भाई, मदद चाहिए?”

राघव काम पर लौटने से पहले हर शाम अनन्या के साथ मंदिर के बाहर वाली चाय की दुकान तक चलता। वह अभी भी लंगड़ाता था। अनन्या उसका हाथ कसकर पकड़े रहती।

—पापा, उस रात आपको बहुत दर्द हुआ था?

राघव मुस्कुराने की कोशिश करता।

—तुझसे दूर रहने से ज्यादा नहीं।

—और मुझे बहुत डर लगा था।

—मुझे भी।

—फिर हम दोनों बहादुर हैं?

राघव ने उसकी नाक छुई।

—तू ज्यादा।

घर लौटकर अनन्या ने अपनी ड्राइंग कॉपी निकाली। उसने पीले क्रेयॉन से एक बड़ा सूरज बनाया, नीचे एक छोटा कमरा, एक शॉल, एक हाथी और एक आदमी जिसकी बांह पर पट्टी थी। आदमी ने बच्ची का हाथ पकड़ा हुआ था।

ऊपर उसने लिखा—

“पापा रास्ता भटक गए थे, प्यार नहीं।”

राघव ने वह पन्ना देखा तो उसके होंठ कांप गए। उसने मुंह फेर लिया, मगर आंसू छिप नहीं पाए।

अनन्या ने पूछा—

—रो क्यों रहे हो?

—क्योंकि मेरी बेटी लिखना सीख गई।

—और?

राघव ने उसे सीने से लगा लिया।

—और क्योंकि मेरी बेटी ने मुझे माफ कर दिया, जबकि मेरी गलती नहीं थी।

अनन्या ने उसके कान में फुसफुसाया—

—गलती बारिश की थी। और थोड़ी उन लोगों की, जिन्होंने पूछा नहीं।

उस रात बारिश फिर हुई। पानी फिर टपका। गली फिर भीगी। लेकिन इस बार जब राघव के कमरे की लाइट देर तक जलती रही, 3 लोगों ने दरवाज़ा खटखटाया।

—सब ठीक है?

राघव ने दरवाज़ा खोला। पीछे अनन्या हंस रही थी, हाथ में मोती था, चूल्हे पर ताज़ी खिचड़ी पक रही थी।

—सब ठीक है, —राघव ने कहा। —अब सच में ठीक है।

और उस गली ने उस दिन समझा कि हर गायब आदमी दोषी नहीं होता। हर बंद दरवाज़े के पीछे अपराध नहीं, कभी-कभी बेबसी होती है। हर गरीब पिता की चुप्पी लापरवाही नहीं, कभी-कभी टूटती हुई इज्जत होती है।

लोगों ने राघव को राक्षस कहा था।

पर 4 दिन बाद उन्होंने जाना—वह राक्षस नहीं था।

वह वह पिता था जो तूफान में गिर गया था, मगर बेहोशी में भी अपनी बेटी का रास्ता नहीं भूला।

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