
PART 1
जिस सुबह उसके बेटे की शादी थी, उसी सुबह सुनयना मेहरा ने आईने में देखा कि किसी ने रात में उसका पूरा सिर मूंड दिया था।
दिल्ली के वसंत विहार वाले पुराने बंगले में उस पल इतनी खामोशी थी कि दीवार घड़ी की टिक-टिक भी चाकू जैसी लग रही थी। 68 साल की सुनयना ने कांपते हाथों से अपने सिर को छुआ। जहाँ कल रात तक लंबे चांदी जैसे बाल थे, वहाँ अब ठंडी, नंगी त्वचा थी। वही बाल, जिन्हें उसके दिवंगत पति राजीव मेहरा अक्सर कहते थे, “इनमें तुम्हारी पूरी गरिमा बसती है।”
आईने के सामने रखी मेज पर एक कागज पड़ा था।
उस पर लिखा था, “अब बिल्कुल वैसी दिख रही हो जैसी एक बेकार बूढ़ी औरत को दिखना चाहिए।”
लिखावट पहचानने में उसे 1 पल भी नहीं लगा।
मीरा।
कुछ घंटों बाद वही लड़की उसके बेटे आरव की पत्नी बनने वाली थी।
सुनयना के घुटने जैसे जवाब दे गए। वह पलंग के किनारे बैठ गई। उसके भीतर अपमान, भय और विश्वासघात एक साथ फट रहे थे। पर सबसे दर्दनाक बात यह थी कि इस घर में कोई नहीं जानता था कि शादी के अगले दिन वह आरव और मीरा के नाम परिवार की 900 करोड़ रुपये की संपत्ति का बड़ा हिस्सा सौंपने वाली थी। यह फैसला उसने और राजीव ने कई साल पहले लिया था—जब बेटा अपना घर बसाएगा, तब उसे सुरक्षित भविष्य दिया जाएगा।
अब वही भविष्य उसके सामने ज़हर बनकर खड़ा था।
मीरा जयपुर की एक चमकदार, खूबसूरत, बेहद सलीकेदार लड़की थी। जब आरव उसे मुंबई की एक चैरिटी शाम में मिला था, तब सुनयना ने पहली बार अपने बेटे को सचमुच मुस्कुराते देखा था। राजीव की मौत के बाद आरव जैसे भीतर से बुझ गया था। वह व्यापार में डूबा रहता, कम बोलता, और माँ की आँखों से बचकर अकेले रो लेता। मीरा के आने के बाद वह फिर हँसने लगा। इसी वजह से सुनयना ने मीरा को अपनाने की बहुत कोशिश की।
पर धीरे-धीरे उसके मीठे चेहरे में दरारें दिखने लगीं।
कभी वह कहती, “आंटी, ये पुरानी बनारसी साड़ियाँ अब कौन पहनता है?” कभी आरव के सामने हँसकर बोलती, “आपकी माँ बहुत भावुक हैं, इन्हें हर चीज़ में पुरखों की याद आ जाती है।” कभी शादी के मेन्यू से राजीव की पसंद की खीर हटवा देती, क्योंकि उसके अनुसार “यह प्रीमियम लुक खराब कर देगी।”
सबसे बुरा संगीत की रात हुआ।
सुनयना पीछे के बरामदे से गुजर रही थी, जब उसने मीरा को अपनी सहेलियों से कहते सुना, “बस 1 दिन और। फिर 900 करोड़ वजहें होंगी इस बूढ़ी महारानी को सहने की।”
सुनयना वहीं जम गई थी।
उसे उसी रात सब रोक देना चाहिए था।
पर उसने आरव की खुशी के लिए चुप्पी चुन ली।
और आज उसी चुप्पी ने उसका सिर नंगा कर दिया था।
उसने आरव को फोन किया। घंटी गई, जवाब नहीं। फिर दोबारा किया। फिर भी नहीं। कुछ देर बाद मीरा का संदेश आया, “आरव को परेशान मत कीजिए। और अपनी हालत दिखाकर सहानुभूति लेने की कोशिश मत कीजिएगा।”
सुनयना ने अलमारी खोली। उसकी शादी वाली नीली कांजीवरम साड़ी धारदार कैंची से काटी जा चुकी थी। जेवरों का डिब्बा गायब था। उसके हाथ सुन्न पड़ गए। वह सुरक्षा कक्ष में गई और रात की प्रविष्टियाँ देखीं। सुबह 3:18 पर अतिथि कोड से उसके कमरे का दरवाजा खुला था।
मीरा।
सुनयना कुछ मिनट तक वहीं बैठी रही। पहली बार उसे अपने 68 साल सचमुच भारी लगे।
फिर उसने आँसू पोंछ दिए।
उसने अपनी बहन कविता को फोन किया। फिर वकील को। फिर बैंक सलाहकार को। 2 घंटे बाद वह शादी के भव्य मंडप में पहुँची—गहरे नीले रंग की साड़ी में, सिर पर चांदी जैसी विग लगाए, चेहरे पर ऐसी शांति लिए जो अब डर नहीं, फैसला थी।
फेरों से पहले उसने आरव को अकेले बुलाया और सब बताया।
वह चाहती थी बेटा टूट पड़ेगा, गुस्से से काँप उठेगा, माँ को गले लगा लेगा।
पर आरव का चेहरा सख्त हो गया।
मीरा सफेद और लाल लहंगे में देवियों जैसी मासूमियत ओढ़े आ गई। आरव ने माँ को घूरकर कहा, “आप मेरी शादी खराब करना चाहती हैं।”
वही वार सबसे गहरा था।
और जब उसका अपना बेटा शादी के दिन उससे मुँह मोड़ रहा था, सुनयना को अभी अंदाज़ा भी नहीं था कि मंडप के बीच अगला सच किस तरह सबको हिला देने वाला था।
PART 2
फेरे सुनयना की आँखों के सामने धुंध की तरह गुजरते रहे।
ढोलक की थाप, मंत्रों की आवाज़, मेहमानों की नम आँखें, आरव का काँपता हुआ चेहरा—सब कुछ दूर से आता हुआ लग रहा था। विग के नीचे उसका नंगा सिर जल रहा था, और दिल में वही कागज चुभ रहा था।
फिर उसकी नजर मीरा के कानों पर गई।
हरे पन्नों वाले झुमके।
वे सुनयना के थे।
राजीव ने उन्हें शादी की 35वीं वर्षगांठ पर अपने हाथों से पहनाया था। सुनयना उन्हें हजारों गहनों में भी पहचान लेती। वे अब उस लड़की के कानों में लटक रहे थे जिसने उसे रात में अपमानित किया था।
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
सिर्फ 1 पल।
फिर मुस्कुरा दी।
रिसेप्शन में सुनयना ने एक और बात सुनी। मीरा अपनी सहेली से कह रही थी, “माँ जी राजीव अंकल के जाने के बाद संतुलित नहीं रहीं। हनीमून के बाद आरव से कहूँगी इन्हें किसी अच्छे देखभाल केंद्र में रखवा दे। घर और बिज़नेस संभालने के लिए मुझे खुली जगह चाहिए।”
सुनयना के भीतर दुख नहीं, साफ़ रोशनी फूटी।
यह सिर्फ अपमान नहीं था।
यह उसे पागल साबित करने की साजिश थी।
वह बाहर आई और बैंक सलाहकार को फोन किया।
“कल की पूरी संपत्ति-हस्तांतरण प्रक्रिया रोक दीजिए,” उसने कहा।
कुछ देर बाद कविता ने उसके हाथ में एक फाइल रखी। उसमें सुरक्षा प्रविष्टियाँ, गलियारे की तस्वीरें और वकील की प्रारंभिक रिपोर्ट थी। रात 3:18 पर मीरा और उसकी सहेली नंदिनी अंदर आई थीं। 3:55 पर वे एक कपड़े का थैला और छोटा जेवर-बक्सा लेकर निकली थीं।
जब आशीर्वाद भाषण का समय आया, संचालक ने सुनयना का नाम पुकारा।
मीरा ने विजयी मुस्कान फेंकी।
सुनयना ने फाइल पकड़ी, विग को छुआ, मंच पर गई और कहा, “मेरा नाम सुनयना मेहरा है… और आज सुबह मैं पूरी तरह गंजे सिर के साथ उठी थी।”
PART 3
पूरा हॉल पत्थर बन गया।
शहनाई की धुन बीच में ही रुक गई। प्लेटों की खनक थम गई। जो मेहमान अभी तक मिठाई की तारीफ कर रहे थे, उनके हाथ हवा में ठहर गए। आरव का चेहरा सफेद पड़ गया, जैसे किसी ने उसके पैरों के नीचे से सारी जमीन खींच ली हो।
सुनयना ने धीरे से अपनी चांदी जैसी विग उतारी।
कुछ औरतों के मुँह से चीख निकल गई। एक बुजुर्ग रिश्तेदार ने माथे पर हाथ रख लिया। किसी की चाय छलक गई। नंगी खोपड़ी पर मंडप की सफेद रोशनी पड़ रही थी, पर उस क्षण सुनयना को शर्म नहीं आई। पहली बार उसे लगा कि जो छिपाया जा रहा था, वही उसकी ताकत बन सकता है।
उसने काँपते बिना कागज खोला।
“अब बिल्कुल वैसी दिख रही हो जैसी एक बेकार बूढ़ी औरत को दिखना चाहिए।”
हॉल में ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे किसी ने सबकी साँसें चुरा ली हों।
मीरा तुरंत उठी।
“ये झूठ है!” उसकी आवाज़ जरूरत से ज्यादा तेज थी। “इन्होंने खुद किया होगा। ये हमेशा मुझे पसंद नहीं करती थीं। इन्हें सहन नहीं हो रहा कि आरव ने मुझे चुना है।”
सुनयना ने उसकी तरफ देखा, पर जवाब देने की जल्दी नहीं की।
वह सिर्फ फाइल खोलती रही।
“यह मेरे घर की सुरक्षा प्रविष्टि है,” उसने कहा। “यह रात 3:18 की तस्वीर है। यहाँ तुम हो, मीरा। तुम्हारे साथ नंदिनी है। यह वही अतिथि कोड है जो शादी की तैयारियों के लिए तुम्हें दिया गया था। यह गलियारा है। यह मेरा कमरा है। और यह तस्वीर 3:55 की है, जब तुम दोनों मेरे कमरे से यह थैला और यह छोटा जेवर-बक्सा लेकर निकल रही हो।”
आरव ने आगे बढ़कर तस्वीरें देखीं।
उसके हाथ काँप रहे थे।
मीरा ने हँसने की कोशिश की, मगर हँसी गले में अटक गई। “ये फोटो बदली गई हैं। आजकल कुछ भी बनाया जा सकता है। माँ जी ड्रामा कर रही हैं।”
हॉल में कुछ लोग फुसफुसाने लगे। कुछ मेहमानों ने नजरें झुका लीं। कुछ ने मोबाइल निकालने की कोशिश की, पर सुरक्षा कर्मियों ने इशारे से रोक दिया। सुनयना नहीं चाहती थी कि यह तमाशा सोशल मीडिया पर बिखरे। वह बदला नहीं, सच चाहती थी।
तभी मुख्य मेज के पास से एक कुर्सी खिसकने की आवाज आई।
नंदिनी खड़ी थी।
उसका चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था। हाथों की मेहंदी अभी गहरी थी, पर उंगलियाँ बुरी तरह काँप रही थीं।
“मैं… मैं और झूठ नहीं बोल सकती,” उसने टूटी आवाज़ में कहा। “मीरा ने कहा था कि यह बस मज़ाक है। उसने कहा था कि आंटी ने उसे बहुत नीचा दिखाया है, अब उन्हें भी सबक मिलेगा। उसने कहा था शादी के बाद पैसे आ जाएँगे, फिर कोई कुछ साबित नहीं कर पाएगा।”
मीरा बिजली की तरह उसकी तरफ मुड़ी।
“चुप रहो, नंदिनी!”
पर अब शब्द बाहर आ चुके थे।
नंदिनी रोते हुए बोलती गई, “मैंने बाल नहीं काटे। मैं दरवाजे पर खड़ी थी। मीरा अंदर गई थी। उसने खुद कैंची उठाई। फिर मशीन निकाली। आंटी सो रही थीं… शायद थकान की दवा के कारण गहरी नींद में थीं। मीरा हँस रही थी। वह कह रही थी, ‘कल तक ये घर की रानी थीं, अब देखना कैसी लगेंगी।’ फिर उसने जेवर उठाए। मैंने मना किया था, मगर उसने कहा, ‘चुप रहना, वरना तुझे भी सबके सामने चोर बना दूँगी।’”
कई मेहमानों ने एक साथ साँस खींची।
आरव पीछे हट गया।
उसकी आँखें मीरा पर टिक गईं, जैसे वह पहली बार उसे बिना श्रृंगार, बिना मुस्कान, बिना अभिनय देख रहा हो।
मीरा का चेहरा लाल पड़ चुका था। उसकी सुंदरता अब तेजाब जैसी लग रही थी। उसने अपने भारी लहंगे का पल्लू झटका और सुनयना की ओर उंगली उठाई।
“हाँ, किया मैंने!” वह अचानक चीख पड़ी। “तो क्या? हर समय आपकी परंपराएँ, आपका परिवार, आपके मरे हुए पति की यादें, आपका नाम, आपका बंगला, आपका नियंत्रण! आरव आपके बिना साँस भी नहीं लेता। मैं उसकी पत्नी बनने वाली थी या आपकी मेहमान?”
हॉल में हलचल मच गई।
मीरा बोलती चली गई, “आप मुझे कभी स्वीकार नहीं करतीं। आपने मुझे हमेशा बाहर वाली महसूस कराया। हर बात में राजीव जी, हर रस्म में आपका इतिहास, हर कमरे में आपकी तस्वीरें। मैं इस घर में आपकी छाया बनकर नहीं रह सकती थी। मुझे बस आपको आपकी जगह दिखानी थी।”
सुनयना ने बहुत धीमे स्वर में पूछा, “मेरी जगह?”
मीरा की आँखों में लालच चमका। “हाँ। अब आरव की जिंदगी में पहली जगह मेरी है। और शादी के बाद जो कुछ भी आपका है, वह उसका है। और जो उसका है, वह मेरा भी है।”
यह वाक्य पूरे हॉल में हथौड़े की तरह गिरा।
सुनयना ने गहरी साँस ली।
फिर उसने वह कहा जिसके बाद मीरा की आँखों से सारा आत्मविश्वास उतर गया।
“कल सुबह मैं आरव और तुम्हारे नाम परिवार की 900 करोड़ रुपये की संपत्ति का बड़ा हिस्सा हस्तांतरित करने वाली थी,” उसने कहा। “राजीव और मैंने यह अपने बेटे की नई जिंदगी के लिए सोचा था। लेकिन यह संपत्ति किसी ऐसे हाथ में नहीं जाएगी जो रिश्ते को दरवाजा और शादी को तिजोरी समझता हो।”
हॉल में सनसनी दौड़ गई।
कुछ रिश्तेदारों ने एक-दूसरे को देखा। किसी ने धीरे से “हे भगवान” कहा। आरव ने जैसे सुनना ही बंद कर दिया। उसका चेहरा बिखर गया था।
मीरा ने 2 कदम आगे बढ़ाए।
“आप ऐसा नहीं कर सकतीं,” वह दाँत भींचकर बोली। “शादी हो चुकी है।”
“शादी हुई है,” सुनयना ने शांत स्वर में कहा, “खरीद-फरोख्त नहीं।”
उसने वकील की तरफ देखा, जो हॉल के कोने में पहले से खड़ा था।
“दस्तावेज़ बदल दिए गए हैं,” वकील ने स्पष्ट आवाज़ में कहा। “संपत्ति अब सीधे किसी दंपती को हस्तांतरित नहीं होगी। आरव के नाम एक सुरक्षित न्यास बनेगा। उसकी व्यक्तिगत देखभाल, व्यापार और भविष्य के लिए धन रहेगा, पर कोई जीवनसाथी, ससुराल पक्ष या बाहरी व्यक्ति उस पर नियंत्रण नहीं कर पाएगा। और आज की घटना के आधार पर आपराधिक शिकायत दर्ज की जाएगी।”
मीरा का चेहरा राख जैसा हो गया।
“आपराधिक शिकायत?” वह हँसी, पर आवाज़ टूट रही थी। “मेरी शादी है आज। आप लोग पागल हो गए हैं।”
“मेरे कमरे में घुसना, मुझे शारीरिक और मानसिक रूप से अपमानित करना, मेरे जेवर चुराना, मुझे अस्थिर साबित करने की योजना बनाना—ये शादी की रस्में नहीं हैं,” सुनयना ने कहा।
सुरक्षा कर्मी आगे बढ़े।
मीरा ने अचानक हाथ उठाकर अपने कानों से पन्नों वाले झुमके उतारने की कोशिश की। शायद वह उन्हें फेंकना चाहती थी, शायद छिपाना। पर उसके हाथ काँप रहे थे। एक झुमका फर्श पर गिरा और सफेद फूलों के बीच लुढ़कता हुआ सुनयना के पैरों के पास आकर रुक गया।
सुनयना ने उसे उठाया नहीं।
वह उसे देखती रही।
उसी पल उसे राजीव की याद आई—सालों पहले, उनके विवाह की 35वीं वर्षगांठ की शाम, जब उसने हँसकर कहा था, “ये पन्ने तुम्हारी आँखों जैसे हैं, सुनयना। गहरे, पर टूटते नहीं।”
आज वही झुमका फूलों और अपमान के बीच पड़ा था।
मगर सुनयना टूटी नहीं थी।
मीरा ने आरव की तरफ मुड़कर कहा, “कुछ बोलो! मैं तुम्हारी पत्नी हूँ।”
आरव ने उसे देखा। उसकी आँखों में प्रेम का बचा हुआ भ्रम धीरे-धीरे मर रहा था।
“तुमने मेरी माँ के साथ यह किया?” उसने फुसफुसाकर पूछा।
“मैंने तुम्हारे लिए किया!” मीरा चिल्लाई। “ताकि हम आज़ाद हो सकें।”
आरव का चेहरा जैसे बुझ गया।
“मेरी माँ मेरी कैद नहीं थीं,” उसने कहा। “तुमने मुझे मेरी ही माँ के सामने अंधा बना दिया।”
मीरा ने रोना शुरू कर दिया। पर वे आँसू उस तरह के नहीं थे जो दर्द से गिरते हैं। वे हार से निकले थे। उसने आसपास देखा—उन मेहमानों को, जो कुछ देर पहले उसे दुल्हन की तरह निहार रहे थे, अब उसके चेहरे पर लालच और क्रूरता पढ़ रहे थे।
कविता आगे आई और सुनयना के कंधे पर हाथ रखा।
“चलो दीदी,” उसने धीमे से कहा।
पर सुनयना अभी गई नहीं।
वह आरव की तरफ मुड़ी।
“बेटा,” उसकी आवाज़ पहली बार भर्रा गई, “मैंने तुम्हें खोने के डर में बहुत देर तक चुप्पी रखी। मैंने सोचा, माँ अगर सह ले तो घर बच जाता है। लेकिन जिस घर में सच बोलना गुनाह बन जाए, वह घर पहले ही टूट चुका होता है।”
आरव के होंठ काँपे।
वह कुछ कहना चाहता था, पर शब्द नहीं निकले।
सुरक्षा कर्मियों ने मीरा को घेरे में लिया। नंदिनी को अलग ले जाया गया ताकि उसका बयान दर्ज हो सके। मीरा अब भी कह रही थी कि सबने उसे फँसाया है, कि सुनयना ने उसके सपने जला दिए, कि आरव पछताएगा। पर उसकी हर बात अब उसी के खिलाफ गवाही बन रही थी।
मेहमान धीरे-धीरे निकलने लगे।
कुछ औरतें सुनयना के पास आईं, पर सहानुभूति के शब्दों से ज्यादा उनकी झुकी हुई आँखें बोल रही थीं। कुछ रिश्तेदार, जिन्होंने सुबह से मीरा की तरफदारी की थी, अब चुपचाप रास्ता बदलकर बाहर जा रहे थे। फूलों से सजा मंडप अब किसी अधूरे नाटक का मंच लग रहा था।
रात गहरी हो गई।
जब आखिरी रोशनी भी धीमी कर दी गई और हॉल में सिर्फ मुरझाई मालाएँ, आधे भरे गिलास और टूटी हुई खुशियों की गंध बची, सुनयना एक कुर्सी पर अकेली बैठी थी। विग उसकी गोद में रखी थी। सिर पर ठंडी हवा लग रही थी, पर अब वह उसे छिपाना नहीं चाहती थी।
आरव धीरे-धीरे उसके पास आया।
उसके शेरवानी के बटन खुले थे, सेहरा कहीं छूट चुका था, और आँखें लाल थीं। वह कुछ पल उसके सामने खड़ा रहा, जैसे उसे समझ नहीं आ रहा कि माँ के सामने बेटा बने या अपराधी।
फिर वह घुटनों के बल बैठ गया।
उसने अपना सिर सुनयना की गोद में रख दिया।
“माँ,” उसकी आवाज़ बच्चे जैसी हो गई, “मैंने आपको नहीं माना। आपने मुझे बचाने की कोशिश की और मैंने आपको ही दोषी बना दिया। मुझे माफ कर दो।”
सुनयना ने उसकी पीठ पर हाथ रखा।
वह तुरंत नहीं बोली।
क्योंकि क्षमा कोई बटन नहीं होती, जिसे दबाते ही सब ठीक हो जाए। उस दिन उसके बाल गए थे, उसका अपमान हुआ था, उसका बेटा उसके खिलाफ खड़ा हुआ था। हर चोट को नाम चाहिए था। हर आँसू को समय।
पर जब उसने आरव के कंधे को काँपते देखा, तो उसके भीतर की माँ ने धीरे से साँस ली।
“माफ़ी की शुरुआत सच से होती है,” उसने कहा। “और आज तुमने सच देख लिया है।”
आरव ने सिर उठाया। “मैं सब ठीक करूँगा।”
“नहीं,” सुनयना ने नरम पर दृढ़ आवाज़ में कहा। “तुम सब ठीक नहीं कर सकते। जो हुआ, वह हुआ। पर आगे झूठ को जगह मत देना। यही काफी होगा।”
आरव रो पड़ा।
सुनयना ने उसे पहली बार वैसे छुआ जैसे बचपन में बुखार आने पर छूती थी—धीमे, स्थिर, बिना शर्त। पर इस बार उसके हाथों में एक नई दूरी भी थी। प्रेम था, पर आत्मसम्मान भी था। माँ थी, पर वह स्त्री भी थी जिसने आज खुद को चुना था।
अगले दिनों में बहुत कुछ बदला।
मीरा के खिलाफ चोरी, अनधिकृत प्रवेश और मानसिक उत्पीड़न की शिकायत दर्ज हुई। नंदिनी ने औपचारिक बयान दिया। शादी की वैधानिक स्थिति पर सलाह ली गई। आरव ने सार्वजनिक तमाशे से बचते हुए भी स्पष्ट किया कि वह उस रिश्ते को आगे नहीं बढ़ाएगा जिसकी शुरुआत अपमान और लालच से हुई थी।
पर सबसे बड़ा बदलाव बंगले के भीतर हुआ।
सुनयना ने राजीव की तस्वीरें हटाईं नहीं, पर उनके पीछे छिपकर जीना बंद कर दिया। उसने घर की बैठकों में फिर से अपनी कुर्सी संभाली। उसने पुराने कर्मचारियों से कहा कि अब कोई भी अतिथि कोड बिना उसकी लिखित अनुमति के जारी नहीं होगा। उसने आरव को परिवार के व्यापार में जिम्मेदारी दी, पर हर फैसले पर आँख मूँदकर भरोसा नहीं किया।
आरव ने भी समय लिया।
वह रोज सुबह माँ के कमरे के बाहर खड़ा होता, धीरे से पूछता, “चाय साथ पीएँगे?” कई दिन सुनयना ने सिर्फ सिर हिला दिया। कई दिन वह चुपचाप बैठी रही। फिर एक सुबह उसने कहा, “अदरक थोड़ी ज्यादा डालना।”
आरव मुस्कुराया नहीं। बस चाय बनाकर लाया।
कभी-कभी टूटे हुए रिश्ते बड़े शब्दों से नहीं, छोटी आदतों से जुड़ते हैं।
1 साल बाद सुनयना के बाल फिर उग आए।
पहले छोटे, फिर खुरदरे, फिर मजबूत। वह उन्हें रंगती नहीं थी। वे जैसे थे, वैसे ही रहने देती। सफेद, चांदी जैसे, कुछ जगहों पर छोटे-छोटे काले धागे। जब किसी ने पूछा कि वह विग क्यों नहीं पहनती, उसने मुस्कुराकर कहा, “क्योंकि अब मुझे छिपाने की जरूरत नहीं।”
उसी साल आरव ने अपनी माँ के नाम पर एक न्यास शुरू किया—उन वृद्ध महिलाओं के लिए जिन्हें परिवार में बोझ, पागल, जिद्दी या बेकार कहकर चुप कराया जाता था। उद्घाटन के दिन सुनयना मंच पर खड़ी थी। उसके सिर पर छोटे चांदी जैसे बाल चमक रहे थे। भीड़ में आरव खड़ा था, आँखों में गर्व और पश्चाताप का मिला-जुला पानी लिए।
सुनयना ने उस दिन कोई लंबा भाषण नहीं दिया।
उसने सिर्फ इतना कहा, “जिस दिन मेरा सिर मूंडा गया था, मुझे लगा था मेरी गरिमा छीन ली गई। फिर समझ आया, गरिमा बालों में नहीं रहती। वह उस पल जन्म लेती है जब आप अपमान को सच में बदल देते हैं।”
लोग देर तक तालियाँ बजाते रहे।
आरव ने सिर झुका लिया।
सुनयना ने आसमान की ओर देखा, जैसे राजीव कहीं ऊपर से सुन रहे हों।
उस शादी ने उनका घर तोड़ भी सकता था। पर उसी दिन झूठ का दरवाजा खुला, लालच का चेहरा दिखा, और एक माँ ने पहली बार अपने बेटे को बचाते हुए खुद को भी बचा लिया।
कभी-कभी जीवन जिस दिन आपको सबसे ज्यादा अपमानित करता है, वही दिन आपकी रीढ़ सीधी कर देता है। उस दिन सुनयना मेहरा ने सिर्फ विग नहीं उतारी थी। उसने डर उतारा था, चुप्पी उतारी थी, और वह बोझ उतारा था जो सालों से उसे सिखाता आया था कि माँ होने का मतलब खुद को मिटा देना है।
