
PARTE 1
“साहब, आपकी पत्नी ने 11 साल पहले जो मुहरबंद निर्देश छोड़े थे, अब उन्हें खोलने का समय आ गया है।”
राजीव मल्होत्रा ने मोबाइल की स्क्रीन 2 बार पढ़ी।
फिर तीसरी बार।
उसकी उंगलियाँ कांप रही थीं, लेकिन उसने खुद को समझाया कि यह थकान है, डर नहीं।
बिस्तर पर लेटी मीरा उसे देख रही थी, जैसे मरने से पहले भी वह किसी लंबी प्रतीक्षा का अंत देख रही हो।
दिल्ली के साउथ एक्सटेंशन के निजी अस्पताल के कमरे में मशीनें धीमे-धीमे बीप कर रही थीं। बाहर बारिश खिड़की पर थपकी दे रही थी, और अंदर राजीव की दुनिया पहली बार सचमुच शांत थी। बहुत सालों तक वह शोर में जीता रहा था—बोर्ड मीटिंग, पार्टियाँ, झूठे फोन कॉल, महंगी घड़ियाँ, होटल के बिल, और वह मुस्कान जो वह समाज के सामने पहनता था।
—कौन से निर्देश? —राजीव ने सूखे गले से पूछा।
मीरा ने होंठ हिलाए, पर आवाज नहीं निकली।
उसने बस अपनी बेटी अनन्या की तरफ देखा, फिर बेटे अर्जुन की तरफ। दोनों दरवाजे के पास खड़े थे। उनके चेहरों पर मां को खोने का दुख था, पर पिता को देखकर जो ठंडापन था, उसने राजीव की छाती में अजीब-सी सुई चुभा दी।
मीरा ने अंतिम बार आंखें खोलीं।
—घर को घर बनाकर रखना… शोपीस नहीं…
बस इतना कहा।
फिर मशीन की आवाज लंबी हुई।
राजीव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
—मीरा! मीरा, आंखें खोलो!
नर्स दौड़ी। डॉक्टर आया। अर्जुन ने मुट्ठियां भींच लीं। अनन्या ने मुंह पर दुपट्टा रख लिया। लेकिन कुछ ही क्षणों में कमरे में वह खामोशी भर गई जिसे कोई पैसा, कोई नाम, कोई रिश्ता वापस नहीं खरीद सकता।
मीरा चली गई।
बिना चिल्लाए।
बिना शिकायत किए।
बिना राजीव को यह सुख दिए कि वह उसे टूटते देख सके।
कुछ देर बाद कमरे के कोने में खड़े बुजुर्ग वकील, मोहन कपूर, ने अपना काला चमड़े का बैग उठाया। वह दिल्ली के पुराने परिवारों की वसीयतें संभालने वाले आदमी थे। ऐसे आदमी, जो जानते थे कि मौत के बाद रिश्तेदारों की आंखों में आंसू कम और हिसाब ज्यादा चमकता है।
राजीव ने गुस्से से कहा:
—अभी नहीं। मेरी पत्नी अभी मरी है।
मोहन कपूर ने शांत स्वर में कहा:
—इसीलिए अभी। यह उनका साफ निर्देश था। अस्पताल छोड़ने से पहले।
यह वाक्य कमरे में थप्पड़ की तरह पड़ा।
अनन्या ने धीरे से कहा:
—पापा, सुन लीजिए।
राजीव ने बेटी को देखा। वहां दुख था, मगर सहारा नहीं। वहीं उसे पहली बार लगा कि कुछ ऐसा है जो उससे छुपा नहीं, बल्कि उसके लिए बचाकर रखा गया था।
अस्पताल की एक छोटी निजी बैठक में मोहन कपूर ने बैग खोला।
अंदर 3 लिफाफे थे।
सफेद।
नीला।
लाल।
तीनों पर मीरा की साफ, सुंदर लिखावट थी।
मोहन कपूर ने सफेद लिफाफा खोला।
—मीरा जी ने 11 साल पहले अपनी वसीयत दर्ज करवाई थी। फिर उसमें 2 बार बदलाव किए गए। आखिरी बदलाव 6 महीने पहले हुआ।
राजीव की सांस अटक गई।
11 साल।
मतलब मीरा ने सब कुछ बहुत पहले जान लिया था।
वह 11 साल से उसके साथ चुपचाप रह रही थी।
पत्नी बनकर नहीं।
गवाह बनकर।
मोहन कपूर ने दस्तावेज सामने रखे।
—ग्रेटर कैलाश वाली कोठी राजीव जी की संपत्ति नहीं है। वह मीरा जी को उनके मायके की विरासत से मिली थी। शादी भी अलग संपत्ति व्यवस्था में हुई थी।
राजीव हंसा, पर आवाज खाली थी।
—वह घर मैंने बनाया। मेरी कमाई लगी है उसमें।
अनन्या ने पहली बार सीधे उसकी आंखों में देखा।
—नहीं पापा। आपने बस उसके अंदर अपनी तस्वीरें टांगी थीं।
मोहन कपूर ने आगे कहा:
—कोठी अनन्या और अर्जुन को बराबर हिस्से में मिलेगी। शर्त यह है कि 5 साल तक उसे बेचा नहीं जाएगा। मीरा जी चाहती थीं कि उस घर में डर नहीं, सांस लौटे।
राजीव ने मेज पर हाथ मारा।
—और मैं?
कमरे में कोई जवाब नहीं आया।
फिर नीला लिफाफा खुला।
—मल्होत्रा इंफ्रा के नियंत्रण पर भी आपके अधिकार पूर्ण नहीं हैं।
राजीव का चेहरा सफेद पड़ गया।
मल्होत्रा इंफ्रा उसका गर्व था। वही कंपनी, जिसके नाम पर उसने समाचार पत्रों में इंटरव्यू दिए थे। वही कंपनी, जिसके नाम पर उसने लोगों को झुकते देखा था।
मोहन कपूर ने कहा:
—11 साल पहले जब कंपनी डूबने वाली थी, मीरा जी ने अपने गहने और मायके की जमीन का हिस्सा बेचकर कर्ज चुकाया था। लेकिन उन्होंने वह पैसा दान नहीं किया। वह परिवर्तनीय ऋण और अधिकार हस्तांतरण के अनुबंध के तहत था। आपने हस्ताक्षर किए थे।
—झूठ! —राजीव गरजा।
मोहन कपूर ने कागज आगे कर दिए।
हर पन्ने पर राजीव के हस्ताक्षर थे।
उसे याद आया—रात देर से व्हिस्की, मीरा का चाय लाना, फाइलें, और उसका बिना पढ़े साइन करना।
“मीरा, तुम देख लो, मुझे तुम पर भरोसा है।”
और मीरा ने देखा था।
सब कुछ देखा था।
मोहन कपूर की आवाज और कठोर हो गई:
—अब बहुमत हिस्सेदारी पारिवारिक ट्रस्ट में है। अनन्या अध्यक्ष बनेगी। अर्जुन वित्तीय अधिकार संभालेगा। आपको केवल अल्पांश हिस्सा मिलेगा, वह भी बिना प्रशासनिक शक्ति के।
राजीव उठना चाहता था, पर उसके पैर भारी हो गए।
तभी उसका फोन चमका।
स्क्रीन पर नाम आया—रिया मेहरा।
“मुझे खबर मिली। मीरा मर गई? घर और कंपनी का क्या हुआ? मुझे तुरंत फोन करो।”
अनन्या ने नाम पढ़ लिया।
उसने कुछ नहीं कहा।
वही उसकी सबसे बड़ी चीख थी।
मोहन कपूर ने लाल लिफाफा उठाया।
—इसमें निजी निर्देश हैं। पहले एक वीडियो चलाना है।
टैबलेट की स्क्रीन पर मीरा का चेहरा उभरा। वह अस्पताल वाली मीरा नहीं थी। वह 6 महीने पहले की मीरा थी। हल्की रेशमी साड़ी, माथे पर छोटी बिंदी, आंखों में थकान, पर आवाज में अजीब-सी दृढ़ता।
—अगर तुम यह देख रहे हो राजीव, तो मैं जा चुकी हूं। और अब तुम्हारे पास भागने की कोई जगह नहीं बची…
PARTE 2
मीरा की आवाज कमरे में फैल गई—धीमी, मगर धारदार। —मैं तुम्हें नफरत देकर नहीं जा रही। नफरत भी थका देती है। तुमने मुझे पहले ही बहुत थका दिया था। मुझे रिया से कम दर्द हुआ, उससे ज्यादा दर्द इस बात से हुआ कि तुम उसके पास से लौटकर मेरे हाथ की रोटी खाते थे, जैसे मेरे विश्वास की कोई कीमत ही न हो। अनन्या ने सिर झुका लिया। अर्जुन की आंखें लाल हो गईं। मीरा आगे बोली—तुमने सोचा मेरा चुप रहना मेरी कमजोरी है। नहीं राजीव, वह मेरी तैयारी थी। हर होटल बिल, हर नकली यात्रा, हर खर्च जिसे तुमने कंपनी के खाते में छुपाया, हर संदेश, हर झूठ, सब मेरे पास है। मैंने यह बदला लेने के लिए नहीं किया। मैंने यह अपने बच्चों की जिंदगी बचाने के लिए किया। राजीव ने टेबल पर मुट्ठी मारी। —बंद करो यह सब! मगर किसी ने हाथ नहीं बढ़ाया। मीरा की आंखें स्क्रीन से जैसे सीधे उसके भीतर देख रही थीं। —तुम्हें गरीब नहीं छोड़ रही हूं। तुम्हें बस उतना छोड़ रही हूं जितना सचमुच तुम्हारा था—तुम्हारा नाम, तुम्हारे सूट, तुम्हारी घड़ियां, और वह औरत जिसने तुमसे प्रेम नहीं, तुम्हारी सुविधा से प्रेम किया। अब देखना, बिना पैसे के कौन तुम्हारे साथ बैठता है। वीडियो बंद हुआ। उसी क्षण राजीव के फोन पर कंपनी की कानूनी निदेशक का संदेश आया—“आज 17:00 बजे आपात बोर्ड बैठक। विषय: अधिकार समाप्ति और संदिग्ध लेनदेन की जांच।” राजीव ने सिर उठाया, और देखा कि उसके अपने बच्चे उसे पिता की तरह नहीं, आरोपी की तरह देख रहे थे।
PARTE 3
मीरा का शरीर दोपहर तक ग्रेटर कैलाश वाले घर लाया गया। वह घर, जिसे वर्षों तक राजीव ने अपने रुतबे की प्रदर्शनी बना रखा था, उस दिन पहली बार घर जैसा लग रहा था। अनन्या ने ड्राइंग रूम से राजीव की बड़ी फ्रेम वाली तस्वीरें उतरवा दीं। उनकी जगह मीरा की पुरानी तस्वीर रखी गई—जब वह 26 की थी, इंडिया गेट के पास हंस रही थी, जैसे दुनिया अभी तक उसके खिलाफ तय नहीं हुई थी।
फूलों के बड़े-बड़े दिखावटी हार नहीं लगाए गए। मीरा ने पहले ही लिख छोड़ा था—सिर्फ सफेद रजनीगंधा और तुलसी का दीया। रसोई में पुरानी नौकरानी शकुंतला चुपचाप चाय बना रही थी। वह वही औरत थी, जिसने मीरा को कई रातों में बिना आवाज रोते देखा था।
साउथ दिल्ली की सोसाइटी में खबर तेजी से फैलती है, बस दया देर से पहुंचती है। पड़ोसनें आईं। बिजनेस पार्टनर आए। कुछ महिलाएं, जो कभी मीरा की साड़ियों और घर से जलती थीं, उस दिन उसके चेहरे को देखकर समझ गईं कि सुंदर जीवन हमेशा सुखी जीवन नहीं होता।
राजीव अर्थी के पास खड़ा था। वह विधुर का चेहरा पहनने की कोशिश कर रहा था, पर अब लोगों की आंखें पहले जैसी नहीं थीं। कुछ निगाहें छोटी थीं, कुछ भारी, कुछ जानकार।
किसी ने धीरे से कहा:
—सुना है कंपनी का मामला बड़ा है।
राजीव ने सुना, पर अनसुना किया।
तभी दरवाजे पर रिया मेहरा आ गई।
काली साड़ी, हीरे की पतली चेन, हाथ में महंगा बैग और वही परफ्यूम, जिसे मीरा ने शायद 11 साल से पहचान लिया था। कमरे में बैठे लोग एक साथ चुप हो गए। अनन्या उठ खड़ी हुई।
—यहां से चली जाइए।
रिया ने चश्मा उतारा।
—मैं मीरा को आखिरी बार देखने आई हूं।
अर्जुन आगे आया।
—आपने उन्हें जिंदगी भर देखने लायक नहीं समझा। अब नाटक मत कीजिए।
रिया की आंखों में अपमान तैर गया।
—मुझे इस परिवार के बारे में बहुत कुछ पता है।
अनन्या ने अपने पिता की तरफ देखा।
—पापा, अगर आपने आज इसका साथ दिया, तो आप इसी के साथ बाहर जाएंगे। इस घर में वापस नहीं आएंगे।
राजीव ने रिया और बच्चों के बीच देखा। वह 1 पल तक चुप रहा।
वही 1 पल रिया को जवाब दे गया।
उसने कड़वाहट से कहा:
—तुम हमेशा कायर थे, राजीव।
राजीव ने धीमे कहा:
—अभी मत करो, रिया।
—अभी नहीं? —रिया की हंसी कमरे में चुभ गई—12 साल तक सब ठीक था, अब “अभी नहीं”?
सबने सुन लिया।
रिया समझ गई कि उसने खुद को उजागर कर दिया है। वह तेजी से मुड़ी, पर बाहर निकलते ही एक कूरियर लड़के ने उसे रोका।
—रिया मेहरा जी? आपके नाम नोटिस है।
रिया ने कागज छीना। कुछ पंक्तियां पढ़ते ही उसके चेहरे का रंग उतर गया। राजीव ने दूर से देखा, पर समझ गया कि मीरा ने उसे भी नहीं छोड़ा था।
उस रात जब राजीव ने रिया को फोन किया, उसने बहुत देर बाद उठाया।
—मीरा ने क्या भेजा तुम्हें? —राजीव ने पूछा।
रिया ने ठंडी आवाज में कहा:
—हम दोनों की तस्वीरें। ईमेल। होटल रिकॉर्ड। तुम्हारे ट्रांसफर। सब कुछ।
—हम संभाल लेंगे।
—नहीं राजीव। तुम संभालोगे। मैं नहीं।
—रिया, हमने साथ रहने की बात की थी।
रिया हंसी।
—मैंने तुम्हारे साथ रहने की नहीं, तुम्हारे साथ सुरक्षित रहने की बात की थी। अब तुम सुरक्षित नहीं हो।
—तुम ऐसा नहीं कर सकती।
—तुमने मीरा के साथ किया। मैं तुमसे बेहतर क्यों बनूं?
फोन कट गया।
उस रात राजीव ने पहली बार महसूस किया कि धोखा लौटकर आने पर आवाज नहीं करता। वह बस कमरे की हवा बदल देता है।
अगले दिन अंतिम संस्कार निगमबोध घाट पर हुआ। सुबह की धुंध में यमुना के किनारे लकड़ियां सजाई गईं। पंडित मंत्र पढ़ रहा था। रिश्तेदार सफेद कपड़ों में खड़े थे। राजीव आगे आया, पर अर्जुन ने हाथ रोक दिया।
—अग्नि मैं दूंगा।
राजीव हिल गया।
—मैं उसका पति हूं।
अर्जुन की आवाज कांपी, पर टूटी नहीं।
—और मैं उसका बेटा हूं। जिसने उसे आखिरी 11 साल हर सुबह टूटते और फिर मुस्कुराते देखा है।
अनन्या ने मां की चिट्ठी खोली और पढ़ी:
“मेरे बच्चों, मुझे माफ करना कि मैंने बहुत देर तक घर बचाने को सच बचाने से बड़ा समझा। मैंने सोचा चुप रहकर तुम्हें टूटने से बचा लूंगी। पर सच यह है कि झूठ की छत के नीचे बच्चे भी बिना आवाज डरना सीख जाते हैं। कभी किसी रिश्ते के नाम पर अपनी इज्जत गिरवी मत रखना। प्रेम वहां नहीं रहता जहां सम्मान रोज मरता हो।”
अर्जुन ने मां को अग्नि दी।
उस पल राजीव रोया, मगर कोई उसे सांत्वना देने नहीं आया। शायद इसलिए नहीं कि लोग निर्दयी थे, बल्कि इसलिए कि कुछ आंसू बहुत देर से आते हैं।
अगले हफ्तों में मीरा की छोड़ी हुई योजना धीरे-धीरे खुली।
पहले कंपनी की बोर्ड बैठक हुई। अनन्या ने हल्की क्रीम साड़ी पहनी, बाल पीछे बांधे, और मीरा की तरह बिना आवाज ऊंची लगे, कमरे में दाखिल हुई। पुराने निदेशक, जो राजीव के सामने झुकते थे, आज कागज देखकर सीधे बैठे थे।
कानूनी निदेशक ने दस्तावेज रखे।
नकली कंसल्टेंसी बिल।
दुबई यात्रा जिसे परियोजना बैठक बताया गया था।
जयपुर का रिसॉर्ट, जहां कंपनी फाइल में “सीमेंट सप्लायर मीटिंग” लिखा था।
रिया के भाई की फर्म को दिए गए भुगतान।
हर झूठ के साथ तारीख थी। हर तारीख के साथ दस्तावेज। हर दस्तावेज के पीछे मीरा की 11 साल की चुप मेहनत।
बोर्ड ने राजीव के प्रशासनिक अधिकार तत्काल समाप्त कर दिए। उसके दफ्तर का केबिन सील हो गया। दीवार से उसका नाम उतरा। बाहर जाते हुए उसने देखा, कुछ कर्मचारी उसे देखकर झुके नहीं। कुछ ने राहत की सांस ली।
उसे पहली बार समझ आया कि डर को लोग सम्मान समझ लेते हैं, जब तक डर खत्म न हो जाए।
फिर बैंक ने सवाल किए। आयकर सलाहकार आए। पुराने साथी गायब हो गए। क्लब ने सदस्यता समीक्षा में डाल दी। जिन लोगों को वह “भाई” कहता था, उन्होंने उसके फोन उठाने बंद कर दिए।
एक शाम वह ग्रेटर कैलाश के घर पहुंचा।
अनन्या ने दरवाजा खोला।
वही दरवाजा, जहां कभी ड्राइवर उसका इंतजार करता था। जहां दिवाली पर 200 मेहमान आते थे। जहां मीरा हर साल लक्ष्मी पूजा में चांदी के दीये सजाती थी, और राजीव पूजा खत्म होने से पहले ही किसी “जरूरी कॉल” पर बाहर चला जाता था।
—मुझे अंदर आना है —राजीव ने कहा।
अनन्या ने दरवाजे की चौखट पकड़े रखी।
—आपकी चीजें पैक हैं।
—यह मेरा घर है।
अनन्या की आंखें भर आईं, पर आवाज शांत रही।
—नहीं पापा। यह मां का घर था। आपने इसमें सिर्फ शोर भरा था।
अर्जुन 2 बड़े डिब्बे लेकर आया। उनमें राजीव के कपड़े, घड़ियां, कुछ फाइलें और उसकी ट्रॉफियां थीं।
राजीव ने टूटी आवाज में पूछा:
—मैं कहां जाऊंगा?
अनन्या ने उसे चाबी दी।
—मां ने लाजपत नगर में 6 महीने के लिए छोटा फ्लैट किराए पर लिया था। किराया पहले से दिया है। उसके बाद आपको खुद देखना होगा।
राजीव की आंखों में अपमान भर गया।
—मरकर भी मुझे नीचा दिखा रही है।
अर्जुन ने पहली बार नरमी से कहा:
—नहीं। मरकर भी आपको सड़क पर नहीं छोड़ रही। आपने जीते-जी उन्हें अकेला छोड़ दिया था।
दरवाजा बंद हो गया।
राजीव सड़क पर खड़ा रहा। उसके पीछे 2 डिब्बे थे। सामने वही शहर था, जो कभी उसके लिए रास्ते खाली करता था। अब ऑटो वाले तक उसे पहचान नहीं रहे थे।
लाजपत नगर का फ्लैट छोटा था। बाहर सब्जी वाले की आवाज आती थी। ऊपर वाले घर से प्रेशर कुकर की सीटी सुनाई देती थी। बाथरूम में पुरानी टाइलें थीं। खिड़की से किसी और के कपड़े सूखते दिखते थे। राजीव को लगा वह सजा काट रहा है। फिर धीरे-धीरे उसे समझ आया—भारत के करोड़ों लोग इसे सामान्य जीवन कहते हैं। सजा तो शायद वह थी, जिसमें मीरा वर्षों तक उसके बड़े घर में अकेली रहती रही।
1 महीने बाद मोहन कपूर का फोन आया।
—मीरा जी का अंतिम लिफाफा है। उन्होंने कहा था, जब राजीव जी सब कुछ खोने का अर्थ समझने लगें, तब देना।
राजीव उनके पुराने दफ्तर पहुंचा। चांदनी चौक के पास वह इमारत पुरानी थी, सीढ़ियां संकरी, दीवारों पर फाइलों की गंध। मोहन कपूर ने उसे एक छोटा लिफाफा और पीतल की चाबी दी।
पत्र में लिखा था:
“राजीव,
मैंने तुमसे कुछ छीना नहीं। मैंने बस तुम्हें उठाना बंद कर दिया।
तुमने मेरे प्रेम को ऐसी चौकी समझा, जिस पर गंदे जूते रखकर भी बैठा जा सकता है। तुमने मेरी चुप्पी को अनुमति समझा। तुमने मेरी सेवा को मेरा धर्म समझ लिया।
गलती तुम्हारी थी।
इस चाबी से स्टोर रूम खुलता है। वहां मेरी डायरी रखी है। मैंने उन्हें तुम्हें सार्वजनिक रूप से जलाने के लिए नहीं छोड़ा। मैंने उन्हें इसलिए छोड़ा है कि कभी साहस बचे, तो पढ़ना—तुम्हारे बगल में एक औरत जी रही थी, जिसे तुमने देखा ही नहीं।
बच्चों से माफी मांगने मत जाना। पहले शर्म कमाना।
मीरा।”
राजीव उसी शाम पुराने गोदाम गया। वहां 6 लोहे के बक्से रखे थे। उसने पहला खोला। नीली स्याही वाली डायरी की कतारें थीं।
उसने एक पन्ना खोला।
“15 अगस्त। राजीव आज फिर किसी मीठे परफ्यूम की गंध लेकर आया। कहा कार फ्रेशनर था। मैंने दाल गरम की। उसने नमक कम बताया। मैं मुस्कुराई। बाद में बाथरूम का नल खोलकर रोई ताकि अनन्या न सुन ले।”
दूसरी डायरी:
“3 नवंबर। सासू मां ने आज कहा, बहू, राजीव का ध्यान रखना, वह दिल का बुरा नहीं है। मैं चुप रही। क्या कहती? जो आदमी दिल का बुरा नहीं होता, वह किसी और का दिल रोज क्यों तोड़ता है?”
तीसरी डायरी:
“7 मई। रिया ने पार्टी में उसके कंधे पर हाथ रखा। वह ऐसे मुस्कुराया जैसे जवान हो गया हो। मैं उसके पास खड़ी थी। उस रात मैंने तय किया—मैं मरूंगी नहीं। मैं याद रखूंगी।”
राजीव फर्श पर बैठ गया।
वह पढ़ता रहा। रात बीत गई। फिर कई रातें बीतीं।
उसने पढ़ा कि मीरा ने कैसे अर्जुन की फीस समय पर भरने के लिए अपने कंगन बेचे और उसे बताया भी नहीं। कैसे अनन्या के पहले ब्रेकअप पर उसने पूरी रात बेटी के बाल सहलाए, जबकि राजीव उसी रात “लखनऊ मीटिंग” में था। कैसे उसने राजीव की बीमार मां को 2 साल तक दवा दी, जबकि राजीव रिया को महंगे फूल भेजता रहा।
फिर एक पंक्ति आई, जिसने उसे पूरी तरह तोड़ दिया:
“आज राजीव सोफे पर सो गया था। चेहरे पर थकान थी। मुझे उस पर दया आई। कैसी अजीब सजा है—जिस आदमी ने तुम्हें मिटाया, कभी-कभी वही आदमी अब भी अपना लगता है।”
राजीव ने डायरी बंद कर दी।
कंपनी खोना दर्द था।
घर खोना अपमान था।
रिया का छोड़ जाना चोट थी।
लेकिन यह पढ़ना कि मीरा ने उसे पूरी तरह नफरत भी नहीं किया था—यह असहनीय था।
क्योंकि इसका मतलब था कि उसके पास प्रेम था।
साफ, धैर्यवान, सच्चा प्रेम।
और उसने उसे खर्च कर दिया था, जैसे किसी और के पैसे से खरीदी चीज।
धीरे-धीरे राजीव बदलने लगा। यह कोई फिल्मी बदलाव नहीं था। वह अगले ही दिन संत नहीं बना। वह गुस्सा भी हुआ, रोया भी, खुद को सही भी ठहराना चाहता था। मगर हर बार मीरा की डायरी की कोई पंक्ति उसके भीतर से झूठ खींचकर बाहर कर देती।
उसने कंपनी पर कानूनी लड़ाई करने से इनकार कर दिया। उसने रिया को अंतिम बार संदेश लिखा—“मुझे अब किसी झूठ की जरूरत नहीं।” फिर नंबर मिटा दिया। उसने अर्जुन को लंबे संदेश नहीं भेजे। अनन्या को सफाई नहीं दी। बस हर महीने एक छोटी चिट्ठी लिखता—“मैं आज यह समझा…” और फिर रोक देता। कभी जवाब नहीं आता था।
1 साल बाद मीरा की बरसी पर राजीव निगमबोध घाट नहीं, पहले ग्रेटर कैलाश के घर के बाहर गया। दरवाजे पर तुलसी का पौधा बड़ा हो गया था। अंदर से हंसी आ रही थी—अनन्या, अर्जुन, शायद रिश्तेदार। वह दरवाजे तक गया, पर घंटी नहीं बजाई। फिर चुपचाप टैक्सी लेकर श्मशान घाट के पास उस जगह गया, जहां मीरा की अस्थियों का एक हिस्सा प्रवाहित हुआ था।
उसने रजनीगंधा रखी।
बहुत देर तक कुछ नहीं बोला।
फिर धीमे से कहा:
—मीरा, मैंने तुम्हें खोया नहीं। मैंने तुम्हें बहुत पहले ही छोड़ दिया था। बस तुमने मरकर मुझे यह दिखा दिया।
उसने जेब से कागज निकाला। वह कानूनी घोषणा थी—वह वसीयत, घर, कंपनी या बच्चों के अधिकारों को कभी चुनौती नहीं देगा। उसने उस पर पहले ही हस्ताक्षर कर दिए थे।
—जो मेरा नहीं था, उस पर अब दावा नहीं करूंगा।
कोई उत्तर नहीं आया।
न नदी से।
न हवा से।
न मीरा से।
लेकिन पहली बार राजीव को लगा कि वह अभिनय नहीं कर रहा। शायद यही उसका पहला सच्चा शोक था।
वापसी में उसका फोन बजा।
अनन्या का संदेश था:
“रविवार को घर पर खाना है। अर्जुन भी होगा। अगर आना चाहें तो आ सकते हैं। शर्त वही है—झूठ नहीं। पैसे की बात नहीं। रिया का नाम नहीं। और मां की जगह लेने की कोशिश नहीं।”
राजीव स्क्रीन देखता रहा।
उसने मुस्कुराया नहीं।
रोया भी नहीं।
बस सांस ली।
उसे पता था यह माफी नहीं थी। यह परिवार में वापसी भी नहीं थी। यह बस एक दरवाजा था, जो पूरी तरह नहीं, बस 1 इंच खुला था।
और शायद मीरा का आखिरी न्याय यही था।
उसने राजीव को सजा दी—सच्चाई में जीने की।
और रास्ता भी दिया—अगर वह सच में आदमी बनना चाहे, तो बच्चों के सामने सिर झुकाकर बैठ सके।
रविवार को जब वह घर पहुंचा, अनन्या ने दरवाजा खोला। अर्जुन डाइनिंग टेबल पर प्लेटें लगा रहा था। रसोई से राजमा की खुशबू आ रही थी। वही राजमा, जो मीरा हर खास दिन बनाती थी।
राजीव दरवाजे पर रुक गया।
—अंदर आ जाऊं?
अनन्या ने हल्के से सिर हिलाया।
—जूते बाहर उतार दीजिए।
राजीव झुका।
पहली बार उस घर में वह मालिक की तरह नहीं, मेहमान की तरह दाखिल हुआ।
और शायद पहली बार, उस घर ने उसे सहन नहीं किया—उसे मौका दिया।
उस दिन खाने की मेज पर मीरा की कुर्सी खाली रही। किसी ने उसे छुआ नहीं। किसी ने उस पर बैठने की कोशिश नहीं की। राजीव ने उस खाली कुर्सी को देखा और समझ गया कि कुछ लोग मरकर भी घर में रहते हैं, क्योंकि उन्होंने ईंटों से ज्यादा आत्मा छोड़ी होती है।
उसने धीरे से कहा:
—तुम दोनों को जो समय चाहिए, मैं इंतजार करूंगा।
अर्जुन ने पहली बार उसकी तरफ देखा।
—इंतजार मत कीजिए। बदलकर दिखाइए।
राजीव ने सिर झुका दिया।
मीरा ने उसे संपत्ति नहीं छोड़ी थी।
मगर शायद उससे बड़ी चीज छोड़ गई थी—सच का सामना करने का अवसर।
और यही उसकी सबसे कठिन सजा थी।
यही उसकी पहली उम्मीद भी।
