
PARTE 1
लोग कहते थे कि आर्यवीर मल्होत्रा की 9 साल की बेटी अनाया शैतान है।
कहते थे, उसने 14 नौकरानियों को घर से भगा दिया था।
कहते थे, वह रात में शीशे तोड़ती, खाने में नमक भर देती और सोते हुए लोगों के बाल काट देती थी।
कहते थे, उसके पास जाने वाला कोई भी इंसान रोते हुए लौटता था।
लेकिन उस रात मुंबई के एक महंगे रेस्टोरेंट में, जब सब लोग उससे डर रहे थे, एक गरीब वेट्रेस ने टेबल के नीचे से उसकी कांपती फुसफुसाहट सुनी—
“पुदीने की खुशबू वाले आदमी से पापा को बचा लो…”
निशा सावंत ने ट्रे हाथ में ही रोक ली। बाहर बारिश गिर रही थी, अंदर अमीर लोगों की हंसी और शराब की महक फैली थी। लेकिन गोल कोने वाली उस टेबल के नीचे बैठी बच्ची का चेहरा किसी डरी हुई चिड़िया जैसा था। अनाया ने दोनों हाथों में चांदी का बटर नाइफ पकड़ा हुआ था और उसके सामने 4 बॉडीगार्ड खड़े थे, जैसे वह कोई बच्ची नहीं, बम हो।
“मैडम, दूर रहिए,” एक गार्ड ने सख्ती से कहा। “मिस अनाया काट लेंगी।”
निशा ने धीरे से ट्रे नीचे रखी और घुटनों के बल बैठ गई।
“अरे वाह,” उसने नरम आवाज में कहा, “इतनी बड़ी तलवार? इससे तो तुम पूरी बिरयानी की सेना हरा सकती हो।”
अनाया ने चौंककर उसे देखा। बाकी लोग हक्के-बक्के रह गए।
“पास मत आना,” बच्ची फुफकार उठी।
“नहीं आऊंगी,” निशा बोली, “जब तक महारानी अनुमति न दें।”
अनाया की आंखें लाल थीं। चेहरे पर गुस्सा था, पर गुस्से के नीचे ऐसा डर छिपा था जो निशा पहचानती थी। वह डर, जो बच्चे तब पाल लेते हैं जब बड़े लोग उनकी बात को झूठ समझते हैं।
तभी रेस्टोरेंट के दूसरे छोर से आर्यवीर मल्होत्रा आया। काला सूट, भारी चाल, और ऐसी खामोशी कि पूरा हॉल अपने आप शांत हो गया। मुंबई में लोग उसे बिजनेसमैन कहते थे, पुलिस उसे छूती नहीं थी, और अखबार उसे “रियल एस्टेट किंग” लिखते थे। लेकिन गलियों में फुसफुसाहट थी कि मल्होत्रा परिवार का असली कारोबार दीवारों के पीछे चलता है।
“अनाया,” उसकी आवाज ठंडी थी, “बाहर आओ।”
बच्ची और सिमट गई।
निशा ने बिना ऊपर देखे कहा, “आप धीरे बोल सकते हैं? वह पहले से डरी हुई है।”
गार्ड ने दांत भींचे। “जानती हो किससे बात कर रही हो?”
निशा ने पहली बार आर्यवीर की ओर देखा। “एक पिता से। कम से कम उम्मीद तो यही है।”
कुछ सेकंड के लिए हवा जम गई।
आर्यवीर की आंखें सिकुड़ीं। “तुम्हारा नाम?”
“निशा। यहां वेट्रेस हूं। और अभी आपकी बेटी को इंसान की तरह बात करने की जरूरत है, आदेश की नहीं।”
अनाया ने कांपती आवाज में फिर फुसफुसाया, “उसे मत आने दो… वह पुदीने जैसा महकता है…”
“कौन?” निशा ने पूछा।
बच्ची ने होंठ काट लिए। उसकी नजर दरवाजे की ओर गई, जहां एक सफेद कुर्ता-पायजामा पहने, चांदी बालों वाला आदमी खड़ा था। उसके चेहरे पर सभ्य मुस्कान थी, हाथ में चंदन की माला और बदन से हल्की पुदीने वाली खुशबू आ रही थी।
“विक्रम चाचा,” आर्यवीर ने कहा, “तुम यहां?”
विक्रम मल्होत्रा मुस्कुराया। “भतीजी फिर नाटक कर रही है? बेचारे लोग डर गए होंगे।”
अनाया ने अचानक चीख मार दी और नाइफ गिराकर टेबल के और अंदर घुस गई।
निशा ने तुरंत उसके आगे अपना हाथ फैला दिया। “कोई उसे छुएगा नहीं।”
विक्रम की मुस्कान एक पल को बुझी, फिर लौट आई। “गरीब लड़की को पता नहीं, यह बच्ची कितनी खतरनाक है।”
निशा ने उसकी आंखों में देखा। “शायद बच्ची खतरनाक नहीं, कुछ याद कर रही है।”
उस रात आर्यवीर ने निशा को अपने जुहू वाले बंगले में बुलाया। घर संगमरमर, पीतल के दीयों, महंगी पेंटिंग्स और सन्नाटे से भरा था। वहां खिलौने नहीं थे, सिर्फ कैमरे, गार्ड और बंद दरवाजे थे। उसने बताया कि अनाया की मां मीरा 2 साल पहले कार में लगी आग में मर गई थी। अनाया बच गई थी, क्योंकि मीरा ने उसे टूटे कांच से बाहर धकेल दिया था।
“मेरी बेटी ने सबको भगा दिया,” आर्यवीर बोला। “डॉक्टर, ट्यूटर, थेरेपिस्ट, नानी… कोई नहीं संभाल पाया।”
निशा ने कहा, “क्योंकि सब उसे संभालना चाहते थे। किसी ने सुना नहीं।”
“मैं तुम्हें रखता हूं,” उसने कहा। “महीने के 5 लाख। तुम्हारा कर्ज खत्म। मां के इलाज का खर्च मेरा।”
निशा की सांस अटक गई। उसकी मां किडनी की बीमारी से जूझ रही थी। कमरे का किराया 3 महीने से बाकी था। लेकिन उसने धीरे से कहा, “मेरी शर्तें होंगी।”
आर्यवीर ने भौंह उठाई।
“कोई उसे पागल, चुड़ैल, मुसीबत नहीं कहेगा। कोई गार्ड उसे घसीटेगा नहीं। उसका कमरा जेल नहीं रहेगा। और आप हफ्ते में 3 रात उसके साथ खाना खाएंगे।”
“मेरा समय—”
“तो मेरी नौकरी नहीं।”
आर्यवीर ने उसे घूरा। फिर पहली बार उसका चेहरा पिता जैसा लगा, मालिक जैसा नहीं।
“ठीक है,” उसने कहा।
अगली सुबह अनाया ने नाश्ते में चीनी की जगह नमक डाल दिया, दूध में मिर्च मिलाई और आर्यवीर की कुर्सी पर नकली छिपकली रख दी। घर की नौकरानी शकुंतला रो पड़ी।
निशा ने छिपकली उठाकर देखा। “अच्छी है। दिल्ली के बाजार से ली?”
अनाया ने आंखें तरेरीं। “तुम डांटोगी नहीं?”
“नहीं। तुम नाश्ता खराब करोगी, तो नया नाश्ता बनाने में मदद करोगी।”
“मैं नहीं करूंगी।”
“ठीक है। हम सब भूखे बैठेंगे।”
20 मिनट बाद आर्यवीर आया। उसने आदेश देने के लिए मुंह खोला, पर निशा ने उसे रोक दिया। “यह मीटिंग नहीं है। पिता बनकर बैठिए।”
उस दिन मुंबई का सबसे डरावना आदमी रसोई में बेसन का चीला बिगाड़ रहा था, और उसकी बेटी पहली बार हंसी थी। लेकिन उसी हंसी के बीच दरवाजे पर विक्रम खड़ा था। अनाया का चेहरा सफेद पड़ गया।
उसने निशा की कलाई इतनी जोर से पकड़ी कि नाखून धंस गए।
“दीदी,” वह फुसफुसाई, “मम्मी ने सच छिपाया था… और वही आदमी आज रात उसे लेने आएगा…”
PARTE 2
उस रात बारिश तेज थी और बंगले की छतों पर पानी ऐसे बज रहा था जैसे कोई दरवाजा पीट रहा हो। अनाया अपने कमरे में नहीं सोई; वह निशा के बिस्तर के नीचे टॉर्च लेकर छिपी मिली। निशा भी नीचे लेट गई। “गुप्त सभा?” अनाया ने धीरे से लकड़ी का छोटा डिब्बा निकाला। अंदर मीरा की चूड़ी, एक पुरानी फोटो, सूखा गुलाब और मखमल के नीचे चिपकी एक पेन ड्राइव थी। “मम्मी ने आग से पहले दी थी,” अनाया रोते हुए बोली। “कहा था, पापा को देना, विक्रम चाचा को नहीं। लेकिन अस्पताल में चाचा आए। उनके कपड़ों से पुदीने की खुशबू आ रही थी। उन्होंने कहा, अगर मैंने कुछ बोला तो पापा भी चले जाएंगे।” निशा का खून ठंडा हो गया। दोनों आर्यवीर के स्टडी रूम में पहुंचे। वह फोन पर चिल्ला रहा था, पर अनाया को देखते ही रुक गया। पेन ड्राइव चलते ही स्क्रीन पर मीरा दिखी, कार की पिछली सीट में बैठी, चेहरा डरा हुआ। “आर्य,” उसकी आवाज टूटी, “विक्रम परिवार बचा नहीं रहा, बेच रहा है। वह तुम्हारे नाम पर सौदे कर रहा है। मैंने कागज रखे हैं। अगर मुझे कुछ हो जाए तो अनाया को बचाना। उस पर यकीन करना।” आर्यवीर की आंखों से रंग उतर गया। तभी पूरे बंगले की बिजली चली गई। गलियारे में लाल इमरजेंसी लाइट जल उठी। नीचे से विक्रम की आवाज आई—“पहले बच्ची को पकड़ो। पिता खुद घुटनों पर आ जाएगा।”
PARTE 3
निशा ने अनाया को अपनी छाती से लगा लिया। बच्ची के दांत कटकटा रहे थे। बाहर कहीं कांच टूटने की आवाज आई, फिर भारी जूतों की धमक। यह कोई साधारण चोरी नहीं थी। जो लोग अंदर घुसे थे, उन्हें घर का नक्शा पता था, कैमरों के ब्लाइंड स्पॉट पता थे, और यह भी पता था कि सुरक्षित कमरा कहां है।
आर्यवीर ने दराज से पिस्तौल निकाली, मगर निशा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“सुरक्षित कमरे में मत जाइए,” उसने फुसफुसाया। “विक्रम वहीं इंतजार करेगा।”
“तुम्हें कैसे पता?”
“क्योंकि वह उसे बच्ची कहता है, बेटी नहीं। वह अनाया को पकड़ने आएगा, बचाने नहीं।”
आर्यवीर एक पल के लिए जम गया। यह बात उसके भीतर कहीं गहराई से लगी।
“मीरा का पुराना आर्ट रूम,” अनाया अचानक बोली। “वहां बालकनी है। मम्मी मुझे तारों को देखने ले जाती थीं।”
आर्यवीर की आंखें दर्द से भर गईं। उस कमरे का दरवाजा 2 साल से बंद था। जिस दिन मीरा की चिता जली थी, उसी दिन उसने वह कमरा सील करवा दिया था। उसे लगता था, बंद दरवाजे दुख को कैद कर लेते हैं। मगर दुख कैद नहीं हुआ था; वह उसकी बेटी के भीतर चीखता रहा था।
“चलो,” उसने कहा।
वे पश्चिमी गलियारे की ओर दौड़े। रास्ते में शकुंतला फर्श पर बेहोश पड़ी थी। निशा ने झुककर नाड़ी देखी। “जिंदा हैं। शायद बेहोश किया है।”
अनाया रो पड़ी। “सब मेरी वजह से हो रहा है।”
निशा ने उसका चेहरा पकड़ लिया। “नहीं। सच बोलना कभी गलती नहीं होता। गलती उन लोगों की होती है जिन्हें सच से डर लगता है।”
सीढ़ियों से 2 आदमी ऊपर चढ़ रहे थे। आर्यवीर ने निशा और अनाया को परदे के पीछे धकेला और खुद अंधेरे में खड़ा हो गया। जैसे ही पहला आदमी मुड़ा, आर्यवीर ने उसे कंधे से दीवार पर दे मारा। दूसरा आदमी हथियार उठाने ही वाला था कि निशा ने पीतल का दीया उसके हाथ पर दे मारा। पिस्तौल फर्श पर गिर गई। अनाया ने डरते-डरते उसे दूर लात मार दी।
आर्यवीर ने बेटी की ओर देखा। “शाबाश।”
यह छोटा शब्द अनाया के भीतर ऐसे उतरा जैसे किसी ने अंधेरे कमरे में दिया जला दिया हो।
वे आर्ट रूम तक पहुंचे। आर्यवीर ने गले में पहनी चेन से छोटी चाबी निकाली। दरवाजा खुलते ही धूल, रंग और चमेली की हल्की महक बाहर आई। दीवारों पर बच्चों की पेंटिंग्स थीं। एक मेज पर छोटे हाथों से बनाया गया सूरज, नदी और 3 लोग खड़े थे—मम्मी, पापा, अनाया।
अनाया रुक गई। “मम्मी…”
आर्यवीर की सांस टूट गई, लेकिन उसने खुद को संभाला। “बाद में, बेटा। अभी बाहर निकलना है।”
बालकनी का पुराना दरवाजा जाम था। निशा ने मेज से धातु का पेंटिंग टूल उठाया और ताले में फंसाया। हाथ कट गया, खून बह निकला, पर उसने दबाव नहीं छोड़ा।
तभी पीछे से विक्रम की आवाज आई।
“दरवाजा खोल दो, आर्य। परिवार की बात परिवार में ही खत्म होनी चाहिए।”
आर्यवीर ने दांत भींचे। “तूने मेरी पत्नी को मारा।”
दरवाजे के उस पार कुछ पल चुप्पी रही। फिर विक्रम हंसा। “मीरा समझदार औरत थी, पर बहुत सवाल पूछती थी। तुम्हें कमजोर बना रही थी। कारोबार भावना से नहीं चलता।”
“वह मेरा कारोबार नहीं, मेरी पत्नी थी।”
“और यह लड़की?” विक्रम की आवाज में जहर था। “यह तुम्हारी कमजोरी है। पहले मां, अब बेटी, फिर यह वेट्रेस। तुमने हमेशा गलत लोगों को दिल दिया।”
निशा ने पूरी ताकत से ताला घुमाया। दरवाजा खुल गया। ठंडी हवा और बारिश भीतर घुस आई। बालकनी से नीचे पुराने ग्रीनहाउस की छत दिख रही थी। फिसलन थी, ऊंचाई थी, अंधेरा था।
अनाया पीछे हट गई। “मैं नहीं कूद सकती।”
निशा ने अपना खून पोंछा और बोली, “डर के बिना बहादुरी नहीं होती। बहादुरी मतलब डरते हुए भी सही जगह कूदना।”
अंदर का दरवाजा धड़ाम से खुला। विक्रम 2 हथियारबंद लोगों के साथ भीतर आ गया। उसके चेहरे पर वही सभ्य मुस्कान थी, जिससे उसने सालों तक सबको धोखा दिया था।
आर्यवीर ने गोली नहीं चलाई। उसने ऊपर झूमर की पुरानी जंजीर पर निशाना लगाया। गोली चली, जंजीर टूटी, भारी झूमर नीचे गिरा और विक्रम के आदमी पीछे हट गए। उसी पल निशा बालकनी से नीचे उतरी, ग्रीनहाउस की छत पर गिरी और फिसलते हुए खुद को संभाला।
“अनाया, मेरी तरफ कूदो!”
“पापा!” बच्ची चिल्लाई।
आर्यवीर ने उसकी ओर देखा। उस आदमी की आंखों में, जिसे दुनिया खून से डरती थी, इस समय सिर्फ पिता का डर था।
“जा, गुड़िया,” उसने कहा। “मैं यहीं हूं। मैं कहीं नहीं जा रहा।”
अनाया कूदी। निशा ने उसे पकड़ लिया, दोनों फिसले, कांच दरक गया, मगर वे छत की ढलान पकड़कर रेंगते हुए किनारे तक पहुंचीं। नीचे आर्यवीर का वफादार ड्राइवर कबीर और 3 गार्ड खड़े थे। कबीर ने अनाया को पकड़ लिया।
निशा उतर रही थी कि ऊपर से गोली चली। गोली लोहे की रेलिंग से टकराई। निशा का पैर फिसला और वह नीचे आ गिरी। उसके फेफड़ों से हवा निकल गई। अनाया चीखती हुई उसके पास दौड़ी।
“निशा दीदी!”
निशा बोल नहीं पा रही थी। उसकी आंखें बालकनी पर थीं।
ऊपर आर्यवीर और विक्रम भिड़ चुके थे। विक्रम ने पिस्तौल पकड़ रखी थी, आर्यवीर उसके हाथ को मोड़ रहा था। बारिश दोनों पर गिर रही थी। विक्रम गरजा, “मारो मुझे! यही हो तुम। यही तुम्हारी औकात है। तुम्हारी बेटी भी जान जाएगी कि उसका बाप हत्यारा है।”
नीचे अनाया रो रही थी। “पापा, नहीं!”
उस आवाज ने आर्यवीर को रोक दिया।
विक्रम को मारना आसान था। बहुत आसान। शायद पुराने आर्यवीर ने एक सेकंड भी न लगाया होता। लेकिन नीचे उसकी बेटी थी, जिसने 2 साल तक सच को अपने भीतर बंद रखा था। अगर वह आज खून से जवाब देता, तो अनाया फिर वही सीखती—कि दर्द का अंत मौत से होता है, न्याय से नहीं।
आर्यवीर ने विक्रम के हाथ से पिस्तौल छीनी और उसे दूर फेंक दिया। फिर उसे जमीन पर दबाकर प्लास्टिक टाई से बांध दिया, जो कभी सुरक्षा किट में रखी गई थी।
विक्रम हांफते हुए बोला, “तू पछताएगा।”
आर्यवीर उसके कान के पास झुका। “यह दया नहीं है। यह मेरी बेटी का भविष्य है। उसे तेरे खून की गंध लेकर नहीं जीना पड़ेगा।”
सुबह तक बंगले के बाहर पुलिस, मीडिया और सरकारी गाड़ियां खड़ी थीं। इस बार वे खरीदे हुए लोग नहीं थे। मीरा की पेन ड्राइव में बैंक रिकॉर्ड, कॉल रिकॉर्डिंग, नकली कंपनियों के दस्तावेज और विक्रम के सौदों की पूरी सूची थी। जिन दुश्मनों का नाम लेकर आर्यवीर ने बदला लिया था, उनमें से कुछ बेगुनाह निकले। असली सांप घर के भीतर बैठा था।
आर्यवीर ने पहली बार अपने खिलाफ भी बयान दिया।
वह जानता था, उसके हाथ साफ नहीं थे। वह यह भी जानता था कि मीरा अगर जिंदा होती, तो उससे सवाल करती। इसलिए उसने भागने की जगह सच चुना। उसने अपने गैरकानूनी धंधों को खत्म करने, पुलिस को दस्तावेज देने और उन परिवारों की भरपाई करने का फैसला किया जिन्हें उसके कारोबार ने कभी नुकसान पहुंचाया था।
निशा अस्पताल के बिस्तर पर थी। हाथ में पट्टी, पैर में प्लास्टर, चेहरे पर थकान। अनाया उसके पास बैठी थी और उसका दुपट्टा पकड़कर ऐसे बैठी थी जैसे छोड़ देगी तो निशा गायब हो जाएगी।
आर्यवीर कमरे में आया। पहली बार उसके साथ कोई गार्ड नहीं था।
“विक्रम ने बोलना शुरू कर दिया है,” उसने कहा। “कायर लोग तभी तक बहादुर होते हैं जब तक सच सामने नहीं आता।”
निशा ने पूछा, “और आप?”
आर्यवीर ने उसकी आंखों में देखा। “मैं साफ आदमी बनने का नाटक नहीं करूंगा। लेकिन मैं गंदगी बचाऊंगा भी नहीं। मीरा ने चाहा था कि अनाया डर में न जीए। अब वही होगा।”
अनाया ने धीरे से पूछा, “हमारा घर चला जाएगा?”
आर्यवीर उसके पास बैठ गया। “शायद।”
बच्ची की आंखें भर आईं।
उसने पहली बार बिना झिझक उसका हाथ पकड़ा। “तो छोटा घर लेंगे। जिसमें रसोई सच में इस्तेमाल होगी। जहां पापा चीला जलाएंगे। जहां किसी कमरे पर ताला नहीं होगा। और जहां तू जितना चाहे हंस सकेगी।”
अनाया ने रोते-रोते हंस दिया। “आपको चीला बनाना नहीं आता।”
“मुझे पिता बनना भी नहीं आता था,” आर्यवीर बोला, “पर सीख रहा हूं।”
3 महीने बाद जुहू का मल्होत्रा बंगला बिक गया। अखबारों ने लिखा—“मुंबई के बड़े साम्राज्य का पतन।” टीवी वालों ने बहस की। कुछ ने आर्यवीर को गद्दार कहा, कुछ ने उसे चालाक। लेकिन अनाया ने पहली बार स्कूल के फॉर्म में पिता के नाम के आगे मुस्कुराकर लिखा—आर्यवीर मल्होत्रा।
वे कोंकण के समुद्र किनारे एक छोटे से घर में रहने लगे। घर में संगमरमर नहीं था, लेकिन आंगन में तुलसी थी। दीवारों पर महंगी पेंटिंग्स नहीं थीं, पर अनाया की रंग-बिरंगी ड्रॉइंग्स थीं। शकुंतला भी साथ आ गई थी, और कबीर अब ड्राइवर से ज्यादा परिवार जैसा था।
निशा ने सोचा था, वह मां के इलाज के बाद चली जाएगी। पर एक शाम अनाया ने उसके कमरे के दरवाजे पर हाथ से बनाई तख्ती टांग दी—“निशा दीदी का कमरा।” अक्षर टेढ़े थे, रंग फैला हुआ था, लेकिन आर्यवीर ने उसे इतनी सावधानी से सीधा लगाया कि निशा की आंखें भर आईं।
बरसात की एक रात, बादल जोर से गरजे। पुराने दिनों में अनाया चीखते हुए बिस्तर के नीचे छिप जाती। उस रात वह पॉपकॉर्न का कटोरा लेकर आर्यवीर और निशा के बीच सोफे पर बैठ गई।
“आज ड्रैगन बहुत शोर कर रहे हैं,” उसने कहा।
निशा मुस्कुराई। “करने दो। वे आसमान की रखवाली कर रहे हैं।”
आर्यवीर ने बेटी के कंधे पर हाथ रखा। अब उसमें झिझक नहीं थी। पिता होना उसे किसी ने किताब से नहीं सिखाया था। उसने सीखा था—गलती करके, माफी मांगकर, रुककर, सुनकर।
अनाया ने धीरे से पूछा, “मम्मी नाराज होंगी?”
आर्यवीर ने लंबी सांस ली। “कुछ बातों पर हां। कुछ बातों पर नहीं। लेकिन वह खुश होंगी कि तू अब डरकर चुप नहीं रहती।”
बच्ची ने सिर उसके सीने पर रख दिया।
निशा ने खिड़की के बाहर बारिश देखी। उसे याद आया, एक समय वह सिर्फ एक वेट्रेस थी, जिसके पास किराया नहीं था, मां का इलाज अधूरा था और जिंदगी से उम्मीद लगभग खत्म हो चुकी थी। फिर उसने एक टेबल के नीचे बैठी बच्ची की फुसफुसाहट सुनी, और सब बदल गया।
लोग कहते थे, अनाया मल्होत्रा बुरी है।
सच यह था कि वह टूटी नहीं थी, बस अनसुनी थी।
लोग कहते थे, आर्यवीर मल्होत्रा डर से घर चलाता है।
सच यह था कि डर से दीवारें बनती हैं, घर नहीं।
और निशा ने कोई चमत्कार नहीं किया था। उसने बस एक बच्ची की बात पर यकीन किया, जब पूरी दुनिया उसे झूठ समझ रही थी।
कभी-कभी बच्चों का गुस्सा बदतमीजी नहीं होता, मदद की आखिरी पुकार होता है। कभी-कभी सबसे खतरनाक सच वही होता है, जिसे परिवार की इज्जत के नाम पर दबा दिया जाता है। और कभी-कभी किसी घर को बचाने के लिए पैसे, ताकत या बंदूक नहीं, सिर्फ एक ऐसा इंसान चाहिए जो तूफान में भी कह सके—
“मैं सुन रही हूं। मैं कहीं नहीं जा रही।”
