सड़क पर बेहोश पड़ी माँ के पास 2 जुड़वाँ बच्चे रोते रहे, और करोड़पति पिता ने जब पुरानी तस्वीर देखी तो टूट गया—“अगर आप वही आदमी हैं, तो आज भागिएगा मत”, बच्चे की यह बात उसकी पूरी दौलत पर भारी पड़ गई

PART 1

“अंधे मत बनिए, साहब! मेरी माँ सड़क पर मर रही है!”

दिल्ली की रिंग रोड पर उस बच्चे की चीख ने गाड़ियों के शोर, हॉर्न और धूल को चीर दिया। लोग रुक तो रहे थे, मगर मदद के लिए नहीं, मोबाइल निकालकर वीडियो बनाने के लिए। फुटपाथ के किनारे एक औरत बेहोश पड़ी थी, उसकी साड़ी का पल्लू मिट्टी में घिस चुका था, माथे पर पसीना सूखकर सफेद निशान छोड़ गया था। उसके पास 2 छोटे बच्चे खड़े थे, जैसे पूरी दुनिया से अकेले लड़ रहे हों।

काली चमचमाती गाड़ी के अंदर बैठे आर्यन मल्होत्रा ने पहले तो खिड़की से बाहर देखना भी जरूरी नहीं समझा। वह मल्होत्रा डेवलपर्स का मालिक था, गुरुग्राम से लेकर नोएडा तक जिसके टावरों पर उसका नाम चमकता था। अखबार उसे “नया शहरी सम्राट” लिखते थे। वह आदमी मीटिंग छोड़ सकता था, रिश्ता तोड़ सकता था, मगर रास्ते में कभी नहीं रुकता था।

उसने फोन से नजर उठाई।

—क्या हुआ है?

ड्राइवर घबराया।

—साहब, कोई औरत बेहोश हो गई है। 2 बच्चे रो रहे हैं।

आर्यन ने चिढ़कर शीशे से बाहर देखा। अगले ही पल उसका चेहरा जैसे पत्थर बन गया।

वह चेहरा।

वह पीली पड़ी, कमजोर, टूटी हुई औरत कोई अजनबी नहीं थी।

वह मीरा थी।

मीरा शर्मा।

वही मीरा, जिससे उसने 7 साल पहले पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में प्यार किया था, जब उसके पास सिर्फ सपने थे और जेब में बस किराए भर के पैसे। वही मीरा, जिसके हाथ पकड़कर उसने कहा था कि बस एक बड़ा सौदा पूरा होने दो, फिर वह उसे अपने घर ले जाएगा। फिर सौदा बड़ा होता गया, सपने महंगे होते गए, और उसका वादा धीरे-धीरे चुप्पी में दब गया।

आर्यन ने बिना सोचे गाड़ी का दरवाजा खोल दिया।

—साहब, यहां उतरना ठीक नहीं है! —ड्राइवर ने कहा।

लेकिन आर्यन सड़क पर उतर चुका था।

मीरा के होंठ सूखे थे, चेहरा धंसा हुआ, शरीर इतना हल्का लग रहा था जैसे कई सालों की थकान उसकी हड्डियों में उतर गई हो। उसके पास खड़े 2 बच्चे उसे ऐसे देख रहे थे जैसे वह कोई खतरा हो।

एक लड़का।

एक लड़की।

दोनों लगभग एक ही उम्र के।

लड़का तुरंत मीरा के आगे खड़ा हो गया।

—हाथ मत लगाइए मेरी माँ को।

आर्यन के सीने में कुछ टूटकर गिरा। उस बच्चे की आंखें… वही कठोर, गहरी, सवाल करती आंखें, जो आर्यन रोज आईने में देखता था।

—तुम्हारी माँ का नाम क्या है? —उसकी आवाज कांप गई।

लड़के ने दांत भींचे।

—मीरा शर्मा।

लड़की ने फटी हुई स्कूल बैग को सीने से चिपका लिया।

—मम्मी ने कल से ठीक से कुछ नहीं खाया। बोली थीं किसी को नहीं बताना।

लोग अब भी तमाशा देख रहे थे। किसी ने कहा पुलिस बुलाओ, किसी ने कहा अस्पताल ले जाओ, मगर कोई आगे नहीं बढ़ा। आर्यन घुटनों के बल बैठ गया। उसने मीरा की नब्ज टटोली। बहुत धीमी।

—एम्बुलेंस बुलाओ! अभी! —उसने चिल्लाकर कहा।

उसकी आवाज में पहली बार आदेश से ज्यादा डर था।

एम्बुलेंस आई तो डॉक्टर ने पूछा:

—परिजन कौन है?

आर्यन आगे बढ़ा।

—मैं जाऊंगा इनके साथ।

लड़के ने उसे घूरा।

—आप कौन हैं?

आर्यन के पास जवाब नहीं था।

अस्पताल में मीरा को तुरंत अंदर ले जाया गया। बच्चे बाहर लोहे की बेंच पर बैठ गए। लड़की का नाम रूहानी था, लड़के का नाम विवान। दोनों 6 साल के थे।

6 साल।

आर्यन की सांस रुक गई।

उसे याद आया, 6 साल पहले उसने अपना नंबर बदला था। 6 साल पहले उसकी माँ सावित्री मल्होत्रा ने उससे कहा था कि गरीब घर की लड़की उसके परिवार की इज्जत डुबो देगी। 6 साल पहले उसने खुद से कहा था कि कुछ रिश्ते वक्त के साथ खत्म हो जाते हैं।

विवान ने बैग में हाथ डाला और एक पुरानी, मुड़ी हुई तस्वीर बाहर निकाली। तस्वीर में मीरा गर्भवती थी, आंखों में उम्मीद और चेहरे पर थकान।

पीछे नीली स्याही से लिखा था:

“जब ये बड़े हों, तो इन्हें पता रहे कि इनके पिता कौन थे।”

आर्यन के हाथ कांपने लगे।

तभी आपात कक्ष का दरवाजा खुला, एक डॉक्टर तेजी से बाहर आई और बोली:

—मीरा शर्मा के साथ जो भी है, तुरंत अंदर आइए। हालत उम्मीद से ज्यादा गंभीर है।

और उसी पल विवान ने उसकी कलाई पकड़कर कहा:

—अगर आप वही आदमी हैं, तो आज भागिएगा मत।

PART 2

आर्यन कमरे के बाहर रुक गया, जैसे 6 साल का बच्चा उसकी सारी दौलत से बड़ा हो गया हो।

—विवान, मैं तुम्हारी माँ को जानता था।

—लोग जानने का नाटक करते हैं, फिर छोड़ देते हैं।

आर्यन ने सिर झुका लिया। रूहानी थककर उसकी कुहनी से लग गई थी। वह हिला भी नहीं। उस छोटे से स्पर्श में ऐसी मासूमियत थी, जिसने उसके महंगे सूट की सारी अकड़ उतार दी।

डॉक्टर बाहर आई।

—मरीज को गंभीर कुपोषण है, तेज संक्रमण है, खून बहुत कम है। कई दिनों से शरीर पर जरूरत से ज्यादा दबाव पड़ा है। इलाज लंबा चलेगा।

—जो भी खर्च हो, मैं दूंगा।

विवान ने ठंडी हंसी हंसी।

—मम्मी कहती हैं अमीर लोग पैसे से अपनी नींद खरीदते हैं।

आर्यन ने आंखें बंद कर लीं।

जब उसे अंदर बुलाया गया, मीरा बिस्तर पर पड़ी थी। उसके हाथ में सुई लगी थी, आंखों के नीचे गहरे घेरे थे। उसने आर्यन को देखा, पर चौंकी नहीं।

—बहुत देर कर दी, आर्यन।

—मुझे पता नहीं था…

—तुम्हें पता करने की जरूरत भी कभी महसूस नहीं हुई।

आर्यन की आवाज टूट गई।

—ये बच्चे… मेरे हैं?

मीरा की आंखों में आंसू भर आए।

—हां।

कमरा चुप हो गया।

—तुमने बताया क्यों नहीं?

मीरा ने धीमे से मुंह फेर लिया।

—बताया था। तुम्हारे दफ्तर गई थी। तुम्हारे घर गई थी। चिट्ठियां भेजीं। तुम्हारी माँ ने मुझे करोल बाग के एक रेस्टोरेंट में बुलाया था। बोलीं, “आर्यन का भविष्य बर्बाद मत करो।” उन्होंने पैसे दिए। धमकी दी। कहा कि अगर मैं सामने आई, तो बच्चों को अनाथालय तक पहुंचा देंगी।

आर्यन की रीढ़ में बर्फ उतर गई।

तभी विवान ने बैग से एक पुराना लिफाफा निकाला।

—नानी ने मरने से पहले कहा था, अगर वह आदमी कभी लौटे तो यह देना।

लिफाफे में मीरा की चिट्ठियां थीं, गर्भ की रिपोर्ट थी, और एक बैंक रसीद थी। नीचे सावित्री मल्होत्रा के हस्ताक्षर थे:

“आर्यन को सच पता नहीं चलना चाहिए।”

उसी समय आर्यन का फोन बजा।

स्क्रीन पर लिखा था: माँ।

विवान ने आंसू रोकते हुए कहा:

—उठाइए। मैं सुनना चाहता हूं झूठ कैसे बोला जाता है।

PART 3

आर्यन ने फोन स्पीकर पर कर दिया।

—माँ।

दूसरी तरफ सावित्री मल्होत्रा की आवाज हमेशा की तरह ठंडी और सधी हुई थी।

—तुम कहां हो, आर्यन? जयपुर वाले निवेशक डिनर पर आ चुके हैं। तुम्हारी गैरहाजिरी अच्छी नहीं लग रही।

आर्यन ने मीरा को देखा, जो तकिए पर निढाल पड़ी थी। रूहानी बेंच पर सोते-सोते भी अपनी माँ की उंगलियां पकड़े थी। विवान उसके सामने खड़ा था, आंखों में 6 साल की भूख, अपमान और इंतजार जमा था।

—मैं अस्पताल में हूं।

—अस्पताल? क्या हुआ?

—मैंने मीरा को ढूंढ लिया।

फोन पर कुछ सेकंड ऐसी चुप्पी रही, जिसने सब कुछ कह दिया।

फिर सावित्री की आवाज आई।

—उस लड़की ने तुम्हें फिर पकड़ लिया? मैंने कहा था न, ऐसी औरतें भावनाओं से जाल बुनती हैं।

विवान का चेहरा लाल हो गया।

—मेरी माँ जाल नहीं बुनती! वह हमारे लिए रात को सिलाई करती थीं, सुबह दूसरों के घरों में खाना बनाती थीं। वह खुद भूखी रहती थीं ताकि हम स्कूल जा सकें!

मीरा ने कमजोर आवाज में कहा:

—विवान, चुप…

—नहीं, मम्मी! अब नहीं!

आर्यन ने फोन कसकर पकड़ा।

—माँ, मेरे बच्चे हैं।

सावित्री की सांस अटक गई।

—आर्यन, तुम इस समय भावुक हो रहे हो। खून का रिश्ता साबित होना आसान नहीं होता। और वैसे भी, उस लड़की का परिवार कभी हमारे बराबर नहीं था।

—बराबर? —आर्यन की आवाज भारी हो गई—जिस औरत ने मेरे बच्चों को जिंदा रखा, वह हमारे पूरे खानदान से ऊंची निकली।

—मैंने तुम्हारे लिए किया। तुम्हारे पिता के बाद इस परिवार की इज्जत मैंने संभाली है। तुम एक गलती के कारण सब कुछ गंवा देते।

—गलती मीरा नहीं थी। गलती मैं था। और अपराध तुमने किया।

सावित्री की आवाज तेज हो गई।

—जुबान संभालो!

—मेरे पास रसीद है। तुम्हारे हस्ताक्षर हैं। मीरा की चिट्ठियां हैं। तुम्हारे भेजे लोग थे, जिन्होंने उसे धमकाया। क्या अब भी झूठ बोलोगी?

फोन पर फिर चुप्पी छा गई।

विवान धीरे से बोला:

—पूछिए उनसे, उन्होंने मेरी माँ को क्यों रुलाया था जब मैं पेट में था।

आर्यन के भीतर जैसे कोई दीवार गिर गई। वह बड़ा आदमी था, मगर उस पल अपने ही बच्चे के सामने बहुत छोटा हो गया।

—माँ, तुमने मुझे मेरे बच्चों से दूर किया। लेकिन सच यह है कि मैंने भी तुम्हारे झूठ को आराम से मान लिया, क्योंकि मेरी महत्वाकांक्षा को वही सच पसंद था।

—आर्यन…

—आज से तुम मेरे किसी फैसले में शामिल नहीं होगी। मल्होत्रा परिवार की सेवा संस्था से तुम्हारा नाम हटेगा। कंपनी की परिषद में तुम्हारी जगह खत्म होगी। और अगर तुमने मीरा या बच्चों को फिर डराने की कोशिश की, तो मामला कानून तक जाएगा।

—तुम अपनी माँ को धमका रहे हो?

—नहीं। पहली बार अपने बच्चों को बचा रहा हूं।

उसने फोन काट दिया।

कमरे में कोई आवाज नहीं थी। बाहर अस्पताल के गलियारे में चप्पलों की आवाजें, स्ट्रेचर के पहिए और दूर से आती किसी परिजन की रोती हुई प्रार्थना सुनाई दे रही थी। आर्यन बिस्तर के पास खड़ा रहा। वह मीरा का हाथ पकड़ना चाहता था, मगर उसने खुद को रोक लिया। उसे समझ आ गया था कि कुछ हाथ पैसे से नहीं, पश्चाताप से भी तुरंत नहीं मिलते।

—मीरा, मैं सब ठीक कर दूंगा।

मीरा ने आंखें खोलीं।

—सब ठीक नहीं होता, आर्यन। कुछ चीजें सिर्फ संभाली जाती हैं।

—मैं संभालूंगा।

—किस अधिकार से?

उस सवाल ने उसे वहीं रोक दिया।

विवान और रूहानी उसकी तरफ देखने लगे। उन्हें पिता नहीं चाहिए था जो अचानक आसमान से उतरे और अपना नाम थमा दे। उन्हें कोई चाहिए था जो रात में बुखार नापे, फीस भरने से पहले स्कूल की कॉपी पर नाम लिखे, अस्पताल के गलियारे में जागे, और गलती मानकर भी भागे नहीं।

आर्यन ने धीमे से कहा:

—अधिकार से नहीं। जिम्मेदारी से। अगर तुम अनुमति दो तो।

मीरा ने उत्तर नहीं दिया। उसने बस आंखें बंद कर लीं। पर पहली बार उसके चेहरे पर डर से ज्यादा थकान थी।

उस रात आर्यन अस्पताल से नहीं गया। उसने अपने सहायक को सारे कार्यक्रम रद्द करने को कहा। जयपुर वाले निवेशक इंतजार करते रहे, फिर नाराज होकर चले गए। अगले दिन व्यापारिक अखबारों में खबर चली कि मल्होत्रा डेवलपर्स की सबसे बड़ी बैठक अचानक स्थगित हो गई। किसी ने नहीं जाना कि उसका मालिक एक सरकारी अस्पताल की कुर्सी पर बैठा 2 बच्चों के दूध के गिलास पकड़ रहा था।

सुबह विवान की नींद खुली तो उसने आर्यन को वहीं देखा।

—आप गए नहीं?

—नहीं।

—आपको काम नहीं था?

—था।

—फिर?

—तुम्हारी माँ उससे ज्यादा जरूरी है।

विवान ने शक से देखा।

—आज कह रहे हो। कल?

—कल भी यहीं रहूंगा। और परसों भी, जब तक डॉक्टर कहें।

—बड़ों की बातों पर भरोसा नहीं करना चाहिए।

—सही कहते हो। इसलिए मेरी बात पर नहीं, मेरे रुकने पर नजर रखना।

रूहानी धीरे से उठी। उसकी आंखें सूजी हुई थीं। उसने डरते-डरते पूछा:

—आप हमारे पापा हैं?

कमरा जैसे ठहर गया।

आर्यन का गला भर आया। वह घुटनों के बल बैठ गया ताकि वह बच्ची उसे ऊपर से नहीं, सामने से देखे।

—अगर तुम्हारी माँ अनुमति दें, और अगर तुम दोनों एक दिन चाहो, तो मैं तुम्हारा पापा बनना सीखना चाहता हूं। मुझे आता नहीं है। लेकिन मैं सीखूंगा।

रूहानी ने कुछ नहीं कहा। उसने अपनी छोटी उंगली उसकी ओर बढ़ाई। आर्यन ने उसे पकड़ लिया। वह उंगली इतनी हल्की थी कि डर लगा, कहीं उसके अपराधों का वजन उस पर न टूट पड़े।

अगले कुछ दिनों में चीजें आसान नहीं हुईं। मीरा को दवाइयां लगीं, खून चढ़ा, जांचें हुईं। डॉक्टर ने साफ कहा कि उसका शरीर सिर्फ बीमारी से नहीं, लंबे संघर्ष से टूटा था। वह पुरानी दिल्ली में किराए के एक छोटे से कमरे में बच्चों के साथ रहती थी। दिन में 2 घरों में खाना बनाती, रात को सिलाई करती, फिर भी स्कूल की फीस, दवाई और राशन के बीच हर महीने हार जाती।

आर्यन ने अस्पताल का कमरा बदलवाया, अच्छे डॉक्टर बुलाए, बच्चों के लिए कपड़े और किताबें मंगवाईं। लेकिन उसने एक गलती नहीं की—उसने मीरा के सामने अहसान का चेहरा नहीं बनाया। हर कागज पर हस्ताक्षर करते समय उसे लगता, जैसे वह कोई बिल नहीं, अपने पुराने अपराध की गवाही भर रहा हो।

तीसरे दिन सावित्री अस्पताल आईं। सफेद रेशमी साड़ी, मोतियों की माला, माथे पर ठंडी मर्यादा। उनके साथ 2 रिश्तेदार भी थे, ताकि बात परिवार के दबाव में हो सके।

—मीरा, जो हुआ वह गलतफहमी थी। तुमने भी उस समय भावुक होकर बातें बढ़ाईं।

मीरा ने पहली बार सिर उठाया।

—गलतफहमी वह होती है, माताजी, जब कोई बात सुनी न जाए। आपने तो मेरी बात जानकर दबाई थी।

सावित्री का चेहरा कस गया।

—तुम्हें समझना चाहिए था कि बड़े घरों की मर्यादा होती है।

विवान आगे आया।

—मर्यादा भूखे बच्चों से बड़ी होती है क्या?

रिश्तेदार असहज होकर इधर-उधर देखने लगे।

आर्यन ने दरवाजे के पास खड़े होकर कहा:

—माँ, आपने मीरा से माफी मांगने आना था। अगर बचाव करने आई हैं, तो बाहर जा सकती हैं।

—तुम मुझे अपमानित कर रहे हो?

—आपने 6 साल एक माँ को अपमानित किया। आज सिर्फ सच खड़ा है।

सावित्री ने पहली बार अपने बेटे की आंखों में वह अजनबी कठोरता देखी, जो कभी व्यापारियों के लिए होती थी, परिवार के लिए नहीं। उनकी आवाज धीमी पड़ गई।

—मैंने सोचा था, तुम्हारा जीवन बचा रही हूं।

—किसी का जीवन बचाने के लिए 2 बच्चों से पिता नहीं छीना जाता।

कमरे में लंबे समय तक कोई कुछ नहीं बोला। आखिर सावित्री ने मीरा की तरफ देखा। शब्द उनके गले में अटक रहे थे, शायद पहली बार गर्व ने उन्हें कमजोर किया था।

—मुझसे बहुत गलत हुआ।

मीरा ने पलटकर कहा:

—गलत नहीं। अन्याय हुआ। और उसके निशान एक माफी से नहीं जाएंगे।

—मैं जानती हूं।

—नहीं। आप नहीं जानतीं। आपने कभी बच्चों को यह समझाते हुए नहीं सुलाया कि आज दाल पतली क्यों है। आपने कभी स्कूल की फीस के लिए मंगलसूत्र गिरवी नहीं रखा। आपने कभी अपने बच्चे से यह झूठ नहीं बोला कि माँ को भूख नहीं लगती।

सावित्री की आंखें झुक गईं। उस दिन पहली बार आर्यन ने अपनी माँ को छोटा देखा, और मीरा को बहुत बड़ा।

मामला घर की दीवारों में दबा नहीं रहा। आर्यन ने परिवार की बैठक बुलवाई। उसने सबके सामने कहा कि मीरा उसके बच्चों की माँ है, और उसने स्वयं अपनी कायरता स्वीकार की। सावित्री को सेवा संस्था और पारिवारिक न्यास से अलग किया गया। जिन कर्मचारियों ने मीरा को दफ्तर से लौटाया था, उनसे पूछताछ हुई। पुराने खाते खोले गए। जो पैसा मीरा को चुप कराने के लिए भेजा गया था, उसका रिकॉर्ड कानूनी सलाहकारों को दिया गया।

मीरा ने कोई दिखावटी बदला नहीं मांगा। उसने सिर्फ 3 बातें कहीं—बच्चों की पढ़ाई सुरक्षित हो, उसकी रहने की जगह उसके नाम पर हो, और आर्यन बच्चों से मिलने से पहले उनकी भावनाओं का सम्मान करना सीखे। आर्यन ने बिना बहस माने।

हफ्तों बाद मीरा अस्पताल से निकली। वह अब भी कमजोर थी, लेकिन उसकी चाल में एक नया संतुलन था। आर्यन ने बड़े घर में आने का प्रस्ताव रखा, मगर मीरा ने मना कर दिया।

—मैं बच्चों को महल में नहीं, भरोसे में ले जाना चाहती हूं।

आर्यन ने सिर झुका लिया।

—मैं इंतजार करूंगा।

—इंतजार नहीं। साबित करो।

उसने साबित करना शुरू किया। वह हर सुबह बच्चों को स्कूल छोड़ने आता, मगर गाड़ी से उतरकर उनके बैग खुद उठाता। विवान पहले दूर-दूर चलता। रूहानी धीरे-धीरे उससे बातें करने लगी—उसे इमली वाली टॉफी पसंद थी, उसे गणित से डर लगता था, और जब मम्मी रात में खांसती थीं तो वह चुपके से जाग जाती थी।

एक शाम विवान ने उसे अपने स्कूल के बाहर रोका।

—आपने इतने साल क्यों नहीं ढूंढा?

आर्यन ने झूठ नहीं बोला।

—क्योंकि मैं डरपोक था। और क्योंकि जब इंसान बहुत ऊपर चढ़ना चाहता है, तो उसे नीचे छूटे लोग छोटे लगने लगते हैं। लेकिन वे छोटे नहीं होते। वह खुद छोटा हो जाता है।

विवान ने देर तक उसे देखा।

—मम्मी कहती हैं, गलती मानना काफी नहीं होता।

—तुम्हारी मम्मी हमेशा सही कहती हैं।

—तो फिर आगे क्या करेंगे?

—हर दिन वहां रहूंगा जहां पहले होना चाहिए था।

विवान ने कोई मुस्कान नहीं दी, पर पहली बार उसने आर्यन का हाथ झटका नहीं।

महीनों बाद, दीपावली की शाम मीरा के छोटे से नए घर में 4 दीये जले। एक दरवाजे पर, एक रसोई में, एक बच्चों की पढ़ाई की मेज पर, और एक खिड़की के पास, जहां से शहर की रोशनी दिखती थी। आर्यन मिठाई लेकर आया, मगर अंदर आने से पहले रुक गया।

—आ सकता हूं?

मीरा ने उसे देखा। उसके चेहरे पर पुराना प्रेम नहीं था, मगर नफरत भी नहीं थी। वहां एक कठिन, सावधान, घायल विश्वास का पहला बीज था।

—बच्चों से पूछ लो।

रूहानी दौड़कर आई और उसका हाथ पकड़ लिया।

—आइए। विवान ने आपके लिए दीया रखा है।

विवान ने तुरंत मुंह फेर लिया।

—मैंने बस खाली जगह भर दी थी।

आर्यन मुस्कुरा नहीं पाया, क्योंकि आंखें भर आई थीं।

दीयों की रोशनी में वह आदमी, जो कभी गगनचुंबी इमारतों को अपनी जीत समझता था, मिट्टी के छोटे से दीपक के सामने चुप खड़ा था। उसे उस दिन समझ आया कि घर ईंट, संगमरमर और नाम की पट्टियों से नहीं बनता। घर उन लोगों से बनता है, जिन्हें तुम छोड़कर भी लौट सकते हो—लेकिन लौटने के बाद तुम्हें दरवाजे पर खड़े रहकर इंतजार करना पड़ता है, जब तक वे खुद भीतर बुलाने की ताकत न पा लें।

कभी-कभी जीवन आदमी को उसकी सबसे बड़ी सजा अदालत में नहीं देता। वह उसे एक भूखे बच्चे की आंखों में खड़ा कर देता है, जहां हर सवाल फैसला बन जाता है। और अगर वह आदमी सच में बदलना चाहता है, तो उसे जवाब नहीं, उपस्थिति देनी पड़ती है—हर दिन, हर दरवाजे पर, हर उस घाव के पास जिसे उसकी गैरहाजिरी ने बनाया था।

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