
PART 1
“अगर तुमने फिर पूछा कि मैं हर सुबह 4 बजे स्नानघर में बंद होकर क्या करता हूँ, तो मैं यह घर छोड़कर चला जाऊँगा।”
35 साल की शादी के बाद देवेंद्र त्रिपाठी ने अपनी पत्नी सरोज से यह कहा था।
सरोज 76 साल की थी। लखनऊ के पुराने चौक इलाके की एक तंग मगर अपनेपन से भरी हवेली जैसे घर में उसने अपनी आधी से अधिक उम्र देवेंद्र के साथ गुजारी थी। घर बड़ा नहीं था, पर हर दीवार में मेहनत की गंध थी—बरसों की बचत, बच्चों की फीस, राशन की कतारें, त्योहारों पर अधूरी इच्छाएँ और वह चुपचाप किया गया त्याग, जिसे भारतीय घरों में अक्सर प्रेम कह दिया जाता है।
देवेंद्र कभी ज्यादा बोलने वाले आदमी नहीं थे। सरकारी छपाई प्रेस में काम किया, समय पर लौटे, शराब नहीं छुई, किसी से ऊँची आवाज में बात नहीं की। मोहल्ले की औरतें सरोज से कहतीं, “बहन, तुम्हें तो भाग्य से ऐसा पति मिला है।”
सरोज मुस्कुरा देती, पर उसके भीतर एक दरवाजा हमेशा बंद रहता।
हर भोर ठीक 4 बजे देवेंद्र उठते। इतनी सावधानी से कि चारपाई भी आवाज न करे। फिर धीरे-धीरे गलियारे से गुजरते, आँगन के पास बने छोटे स्नानघर में जाते, अंदर से कुंडी चढ़ाते और लगभग 1 घंटा वहीं रहते।
शुरू में सरोज ने सोचा, शायद पेट की बीमारी है। फिर लगा, शायद पूजा करते होंगे। कभी लगा, किसी छिपे रोग का दुख है। कभी मन में डर उठा कि क्या वह किसी और से बात करते हैं। पर देवेंद्र के जीवन में कुछ भी ऐसा नहीं था जो शक को आकार दे सके।
न कोई अजीब दोस्त, न देर रात लौटना, न जेब में अजनबी कागज। बस वह 4 बजे वाला बंद दरवाजा।
उस दरवाजे के पीछे कभी पानी धीमे-धीमे बहता। कभी कांच की शीशी टकराने की हल्की आवाज आती। कभी कपड़े या कागज फटने जैसा स्वर। और कभी ऐसा दबा हुआ कराहना, जैसे कोई आदमी अपने ही गले में अपनी चीख दबा रहा हो।
पहली बार जब सरोज ने पूछा था, देवेंद्र का चेहरा राख जैसा हो गया था।
“पुराना दर्द है,” उन्होंने कहा था। “मत पूछा करो।”
सरोज चुप हो गई थी। उसे बचपन से यही सिखाया गया था—पति की चुप्पी को कुरेदना ठीक नहीं, घर की इज्जत घर में रहनी चाहिए, औरत को कुछ बातें जानकर भी न जानने जैसी रहना चाहिए।
लेकिन समय के साथ बात अजीब होती गई।
देवेंद्र ने कभी आधी बाँह की कमीज नहीं पहनी, जून की लू में भी नहीं। वह कभी सरोज के सामने कपड़े नहीं बदलते। कमरे की बत्ती बुझाए बिना वह सो भी नहीं पाते थे। अगर सरोज पीछे से अचानक उन्हें छू लेती, तो उनका शरीर पत्थर की तरह अकड़ जाता।
एक रात, जब बेटा निखिल और बेटी पूजा अपनी-अपनी गृहस्थी में जा चुके थे, सरोज से रहा नहीं गया।
“क्या तुम्हारे जीवन में कोई और औरत है?”
देवेंद्र के हाथ से रोटी की थाली छूटते-छूटते बची। उन्होंने सरोज को ऐसे देखा, जैसे किसी ने उनके सीने में दबा जख्म नाखून से खींच दिया हो।
“ऐसी बात मत करो।”
“तो फिर बताओ, तुम छिपाते क्या हो?”
देवेंद्र उठे। उनके होंठ कांप रहे थे। फिर पहली बार सरोज ने अपने पति को रोते देखा।
“मैं यह सब तुम्हें बचाने के लिए करता हूँ,” उन्होंने फुसफुसाकर कहा।
उस रात के बाद घर वैसा नहीं रहा।
सरोज ने बच्चों से कहा तो निखिल ने कड़वाहट से कहा, “पापा हमेशा से ऐसे ही हैं, माँ। दीवार जैसे। उन्हें किसी से लगाव नहीं।”
पूजा बोली, “आप ज्यादा सोचती हैं। पापा बस चुप स्वभाव के हैं।”
लेकिन सरोज जानती थी, चुप स्वभाव और डर में फर्क होता है।
मार्च की एक ठंडी सुबह सब बदल गया।
4 बजे देवेंद्र उठे। इस बार सरोज ने आँखें बंद रखीं, पर सांस रोककर सब देखा। देवेंद्र ने पुराने संदूक से दवाइयों की एक थैली निकाली, उसे शॉल में छिपाया और आँगन की ओर चले गए।
सरोज उनके पीछे गई।
स्नानघर के नीचे से पतली रोशनी बाहर गिर रही थी।
सरोज कांपते हाथों से झुकी और दरवाजे के छोटे छेद से भीतर देखा।
अगले ही पल उसका खून जम गया।
देवेंद्र बिना कमीज के खड़े थे।
उनकी पीठ किसी इंसान की पीठ नहीं लग रही थी। मोटे उभरे हुए निशान, पुराने जलने के दाग, कंधों से कमर तक फैली गहरी रेखाएँ, जैसे किसी ने चमड़ी पर टूटती बिजली खींच दी हो। कुछ निशान पुराने थे, पर कुछ जगहें खुली हुई थीं, लाल, सूजी हुई, दर्द से भरी।
देवेंद्र दाँतों में तौलिया दबाए अपनी ही पीठ पर दवा लगा रहे थे, ताकि आवाज बाहर न जाए।
सरोज ने अपना मुँह दबा लिया।
35 साल तक उसके बगल में सोने वाला आदमी अकेले नर्क झेलता रहा था।
और वह कुछ नहीं जानती थी।
उसे लगा, उसने अपने पति को पहली बार देखा है। पर असली सच अभी भी उस बंद दरवाजे के पीछे बाकी था।
PART 2
सरोज कमरे में लौट आई, मगर उसकी देह जैसे वहीं आँगन में छूट गई थी। वह रजाई में पड़ी रही और तकिया भीगता रहा। देवेंद्र लौटे तो धीरे से लेट गए। दोनों जाग रहे थे, दोनों चुप थे।
सुबह उसने चाय बनाई, जैसे हमेशा बनाती थी। अदरक, तुलसी, पीतल की केतली, दो स्टील के गिलास। लेकिन जब देवेंद्र लंबी बाँह का कुर्ता पहने भीतर आए, सरोज की आँखें उनके चेहरे पर टिक न सकीं।
उनके बाजार जाते ही उसने संदूक खोला। दवाइयों की थैली वहीं थी। उसमें जलन की मरहम, पट्टियाँ, दर्द की गोलियाँ, पुरानी खून लगी रूई और एक छोटी डायरी थी। डायरी में तारीखें लिखी थीं—हर उस दिन की, जब जख्म फिर खुले थे।
उस शाम सरोज ने धीमे से पूछा, “देवेंद्र, शादी से पहले तुम्हारे साथ कुछ हुआ था?”
देवेंद्र का चेहरा सख्त हो गया।
“कुछ बातें दफन रहना ही ठीक है।”
पर शनिवार को बात छिप न सकी। निखिल अपनी पत्नी के साथ आया था, पूजा भी बच्चों को लेकर आई थी। सरोज के मुँह से निकल गया, “तुम्हारे पापा ठीक नहीं हैं।”
निखिल हंसा, मगर वह हंसी चुभती हुई थी।
“ठीक? माँ, पापा ने कभी हमें गले तक नहीं लगाया। बचपन में लगा, हम बोझ हैं।”
देवेंद्र ने दरवाजे की ओर कदम बढ़ाए।
“जिस बात को नहीं जानते, उस पर मत बोलो।”
निखिल की आँखें भर आईं। “तो बताया क्यों नहीं? मेरे मैच में नहीं आए, मेरी शादी में भी बस पत्थर की तरह बैठे रहे। मैंने हमेशा सोचा, आपको मुझसे प्यार नहीं था।”
देवेंद्र का चेहरा टूट गया।
“तुम सबने मेरी कायरता की कीमत चुकाई,” उन्होंने कहा।
2 सप्ताह बाद देवेंद्र आँगन में पाइप ठीक कर रहे थे। अचानक धड़ाम की आवाज आई। सरोज दौड़ी। देवेंद्र जमीन पर पड़े थे, पीठ पकड़कर कराह रहे थे। कुर्ता ऊपर खिसक गया था। कमर के पास का जख्म खुल गया था।
उसी पल निखिल भीतर आया।
पहली बार उसने अपने पिता की पीठ देखी।
उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
“पापा… यह किसने किया?”
देवेंद्र ने आँखें बंद कर लीं।
सरोज रो पड़ी। “मैंने भी देखा था… उस सुबह… दरवाजे से।”
पूजा भी घबराकर आ गई। चारों उनके पलंग के पास खड़े थे।
सरोज ने उनका हाथ पकड़ा। “अब अकेले मत सहो।”
देवेंद्र ने बच्चों को देखा।
“अगर सच बताऊँ,” उनकी आवाज टूट गई, “तो शायद तुम उस आदमी से नफरत करोगे जो मैं था।”
निखिल घुटनों के बल बैठ गया। “मैं खुद से नफरत कर रहा हूँ कि मैंने आपको बिना जाने जज किया। पापा, बताइए।”
देवेंद्र ने मुश्किल से सांस ली।
“सब 1976 में शुरू हुआ… जब मुझे किसी और देवेंद्र त्रिपाठी समझ लिया गया।”
PART 3
कमरे में ऐसा सन्नाटा फैल गया, जैसे पूरे घर ने सांस रोक ली हो। बाहर मोहल्ले में सब्जी वाले की आवाज आ रही थी, किसी मंदिर की घंटी दूर से सुनाई दे रही थी, गली में बच्चे पतंग के पीछे भाग रहे थे। मगर उस कमरे में 35 साल का झूठ, दर्द और गलतफहमी एक साथ खड़े थे।
देवेंद्र ने छत की ओर देखते हुए बोलना शुरू किया।
“मैं उस समय 27 साल का था। सरकारी प्रेस में नया-नया स्थायी हुआ था। दिन में नौकरी करता था, शाम को हनुमान सेतु के पास एक सेवा मंडली में जाता था। हम लोग बस्ती के बच्चों को किताबें देते, बीमार बूढ़ों के लिए दवा ले जाते, मजदूर परिवारों तक राशन पहुँचाते। कुछ बड़ा नहीं था। बस लगता था, इंसान अगर दो रोटी खाता है तो किसी भूखे को आधी रोटी दे सकता है।”
सरोज ने उनका हाथ कसकर पकड़ा।
देवेंद्र कुछ पल रुके। उनके गले में पुरानी राख भर आई थी।
“उन दिनों शहर में डर बहुत था। पुलिस की गाड़ियाँ रात को भी घूमती थीं। लोग धीमे बोलते थे। मोहल्ले में कौन किससे मिल रहा है, कौन किस सभा में गया, किसने क्या पर्चा पढ़ा—सब पर नजर रहती थी। मैं राजनीति नहीं समझता था। मुझे बस गरीबों की मदद करनी आती थी।”
उन्होंने निखिल की ओर देखा।
“एक और देवेंद्र त्रिपाठी था। वही नाम। उम्र लगभग मेरी। वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जुड़ा था, सरकार के खिलाफ गुप्त बैठकों में जाता था। बाद में पता चला कि लोग उसे भी ‘देव’ कहते थे। शायद किसी ने नाम दिया, शायद गलती हुई, शायद किसी ने जानबूझकर मुझे फँसाया। आज तक नहीं जानता।”
पूजा की आँखों से आँसू बहने लगे।
“एक रात मैं प्रेस से लौट रहा था। अमीनाबाद की तरफ सड़क लगभग खाली थी। दो आदमी आए। बोले, साहब बुला रहे हैं। इससे पहले कि समझता, मेरे मुँह पर कपड़ा रख दिया गया। जब होश आया, हाथ बंधे थे, आँख पर पट्टी थी, और चारों तरफ सीलन की बदबू।”
सरोज का शरीर सिहर गया।
देवेंद्र ने सब विस्तार से नहीं बताया। कुछ सच शब्दों से ज्यादा शरीर पर लिखे जाते हैं। उनकी पीठ पर फैले निशान ही उस कमरे में गवाही दे रहे थे।
“वे नाम पूछते रहे। किससे मिलते हो? पर्चे कहाँ छापते हो? किसके लिए दवाइयाँ ले जाते हो? कौन-कौन लोग सेवा मंडली में आते हैं? मैंने कहा, मैं प्रेस में अक्षर छापता हूँ, साजिश नहीं। उन्होंने नहीं माना।”
निखिल ने मुट्ठियाँ भींच लीं।
“कितने दिन?” उसने धीमे से पूछा।
देवेंद्र ने आँखें बंद कर लीं।
“5 दिन। शायद 5। वहाँ दिन-रात का पता नहीं चलता था। बस दर्द से पता चलता था कि अभी जिंदा हूँ।”
सरोज के भीतर से कराह निकली।
देवेंद्र की आवाज सूखी नदी की तरह बहती रही।
“जब उन्हें समझ आया कि मैं वह आदमी नहीं हूँ, तब भी वे डर गए कि अगर मैं बाहर जाकर बोल दूँगा तो बात फैल जाएगी। छोड़ने से पहले उन्होंने मेरी आँखों की पट्टी खोली। एक आदमी ने मेरी जेब से तुम्हारी फोटो निकाली, सरोज। वही फोटो जो तुमने सगाई के बाद दी थी।”
सरोज का चेहरा पीला पड़ गया।
“उसने कहा—शादी होने वाली है न? अगर मुँह खोला तो अगली बार लड़की को उठा लेंगे। घरवालों को लगेगा भाग गई। फिर खोजते रहना।”
देवेंद्र की आँखों से आँसू बह निकले।
“मैंने उन्हें सच मान लिया। मुझे लगा, अगर मैंने किसी को बताया, तो वे तुम्हारे साथ कुछ कर देंगे। तुम्हारे बाबूजी की इज्जत मिट्टी हो जाएगी। हमारी शादी टूट जाएगी। और अगर शादी हो भी गई, तो मैं तुम्हें डर के साथ कैसे जीने देता?”
सरोज अब रो नहीं रही थी। वह जैसे भीतर से जल रही थी—अपने लिए नहीं, उस जवान आदमी के लिए जिसने प्रेम को बचाने के लिए अपनी आत्मा को अंधेरे में बंद कर दिया था।
“तुमने किसी डॉक्टर को क्यों नहीं दिखाया?” पूजा ने काँपते हुए पूछा।
देवेंद्र ने हल्की, टूटी हुई हंसी हंसी।
“सरकारी अस्पताल जाता तो सवाल होते। पुलिस रिपोर्ट मांगते। निशान देखते। नाम पूछते। मुझे हर वर्दी से डर लगने लगा था। शादी के बाद एक वैद्य से दवा ली। फिर खुद पट्टी करना सीख गया। कई जख्म भर गए, कई अंदर रह गए।”
निखिल ने धीरे से पूछा, “हमसे दूर क्यों रहे?”
यह सवाल कमरे की सबसे बड़ी गाँठ था।
देवेंद्र ने बेटे की ओर देखा। 50 साल का निखिल उस पल फिर 8 साल का बच्चा लग रहा था, जो मैदान में पिता को खोजता रह गया था।
“क्योंकि तुम्हें गले लगाते ही शरीर जलने लगता था,” देवेंद्र बोले। “कंधे उठाता तो नसों में आग दौड़ती। तुम्हें कंधे पर बैठाना चाहता था, पर डरता था कि गिरा दूँगा। तुम्हारे क्रिकेट मैच में जाना चाहता था, पर भीड़ देखते ही सांस अटक जाती। लाउडस्पीकर की आवाज से मुझे वही कमरा याद आता। जब तुम पास आते, मैं खुश होता था… और उसी खुशी से डर जाता था।”
निखिल की आँखों में वर्षों का गुस्सा पिघलने लगा।
“मुझे लगा, आपको शर्म आती है कि मैं आपका बेटा हूँ।”
देवेंद्र सिसक पड़े।
“मुझे खुद पर शर्म आती थी। लगता था, मैं मर्द नहीं रहा। जो आदमी अपनी चीख भी नहीं बचा सका, वह परिवार का सहारा क्या बनेगा? मुझे लगता था, अगर तुम लोग मेरी पीठ देखोगे तो मुझसे डरोगे, घिन करोगे, या मुझे कमजोर समझोगे।”
सरोज झुककर उनके माथे से लग गई।
“कमजोर?” वह फूट पड़ी। “तुमने 35 साल अकेले जिया। यह कमजोरी नहीं, जिंदा रहने की जिद थी। लेकिन देवेंद्र, तुमने अकेले रहकर हमें भी अकेला कर दिया।”
देवेंद्र ने पहली बार सिर हिलाया।
“जानता हूँ। यही मेरी सबसे बड़ी गलती थी।”
निखिल ने अपने पिता का हाथ उठाया और माथे से लगा लिया।
“पापा, मुझे माफ कर दीजिए। मैंने आपको पत्थर कहा, जबकि आप भीतर से टूटे हुए थे।”
देवेंद्र ने काँपते हाथ से बेटे के बाल छुए। शायद इतने वर्षों में पहली बार।
“तुम्हारी कोई गलती नहीं थी,” उन्होंने कहा। “बच्चे पिता के मौन को प्यार की कमी समझते हैं। यह मैंने तुम्हें दिया।”
पूजा पलंग के पास बैठ गई। उसने अपने पिता की बाँहों को बहुत सावधानी से पकड़ा, जैसे किसी पुराने मंदिर की टूटी मूर्ति को सहला रही हो।
“अब हम हैं न,” उसने कहा। “अब दरवाजा बंद नहीं होगा।”
उस दिन घर में खाना नहीं बना। चूल्हा ठंडा रहा। आँगन की तुलसी के पास दीपक भी देर से जला। पर उस घर में पहली बार सच की रोशनी आई थी।
अगले ही दिन सरोज ने निखिल से कहा कि अच्छे डॉक्टर को दिखाना होगा। देवेंद्र ने पहले मना किया। उनका चेहरा फिर डर से भर गया। अस्पताल, सफेद दीवारें, सवाल—सब उनके लिए पुराने अंधेरे के दरवाजे थे।
लेकिन इस बार वह अकेले नहीं थे।
निखिल उन्हें किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज ले गया। सरोज साथ बैठी रही। पूजा ने पुरानी डायरी, दवाइयाँ और पट्टियाँ संभालीं। डॉक्टर ने जांच के बाद कहा कि कई जख्म पुराने तंत्रिका-दर्द से जुड़े हैं, कुछ जगहों पर त्वचा बार-बार फटती है, और इतने वर्षों की गलत देखभाल ने दर्द को स्थायी बना दिया है।
देवेंद्र ने सिर झुका लिया।
डॉक्टर ने धीमे स्वर में कहा, “देर हुई है, पर मदद अब भी हो सकती है।”
यह वाक्य सरोज के लिए किसी प्रसाद जैसा था।
घर में नई दिनचर्या शुरू हुई। 4 बजे का स्नानघर अब डर का कमरा नहीं रहा। सरोज देवेंद्र के साथ जाती। पहले वह शर्म से दीवार की ओर देखते रहते। फिर धीरे-धीरे उन्होंने तौलिया दाँतों में दबाना छोड़ दिया। दर्द होता तो हाथ कसकर सरोज की हथेली पकड़ लेते।
सरोज पट्टी बदलते हुए कभी-कभी रो पड़ती।
देवेंद्र कहते, “अब मत रो। देर से सही, मैं लौट आया हूँ।”
“नहीं,” सरोज कहती, “तुम कहीं गए ही नहीं थे। तुम दरवाजे के पीछे फँसे रह गए थे।”
निखिल हर रविवार आने लगा। पहले पिता-पुत्र के बीच बातें छोटी होतीं—दवा ली? दर्द कैसा है? बिजली का बिल भर दिया? फिर धीरे-धीरे बातों में बचपन लौटने लगा।
एक दिन निखिल पुरानी क्रिकेट की गेंद लेकर आया। बोला, “याद है, मैंने मोहल्ले के टूर्नामेंट में 32 रन बनाए थे?”
देवेंद्र की आँखें भर आईं।
“मैं उस दिन गया था,” उन्होंने धीमे से कहा।
निखिल चौंक गया।
“क्या?”
“मैदान के बाहर पेड़ के पीछे खड़ा था। भीड़ में नहीं जा पाया। तुम्हें खेलते देखा। जब तुम आउट हुए, तुमने चारों तरफ मुझे खोजा। मैं वहीं था, पर सामने नहीं आया। उस दिन घर आकर बहुत रोया।”
निखिल ने चेहरे पर हाथ रख लिया। इतने वर्षों तक जिस अनुपस्थिति से वह नफरत करता रहा, उसके भीतर भी एक छिपी उपस्थिति थी।
उसने पिता को गले लगाने की कोशिश की, फिर दर्द याद कर रुक गया। देवेंद्र ने खुद हाथ फैलाए।
“धीरे से,” उन्होंने कहा।
निखिल ने पिता को बहुत सावधानी से गले लगाया। दोनों आदमी बिना आवाज रोते रहे। सरोज दरवाजे पर खड़ी थी। उसे लगा, एक घर की दीवारें इतने वर्षों बाद साँस ले रही हैं।
पूजा ने अपने बच्चों को भी सच का हल्का रूप बताया। “नाना जी बहुत दर्द से गुजरे हैं,” उसने कहा, “इसलिए वे कम बोलते थे। लेकिन कम बोलना प्यार न होना नहीं होता।”
देवेंद्र नाती-पोतों के साथ बैठने लगे। वह कहानियाँ नहीं सुना पाते थे, पर पतंग बनाना सिखाते थे। पुराने अखबार से लिफाफे बनाते थे। दीपावली पर पहली बार उन्होंने खुद आँगन में दीया रखा। होली पर रंग नहीं खेला, पर दूर बैठकर बच्चों की हंसी देखते रहे और मुस्कुराए।
सरोज ने एक दिन उनसे पूछा, “तुम्हें कभी उस दूसरे देवेंद्र के बारे में पता चला?”
देवेंद्र ने कहा, “सालों बाद सुना था कि वह जेल गया, फिर छूटा और बनारस चला गया। शायद उसे पता भी नहीं होगा कि उसके नाम ने किसी और की जिंदगी बदल दी।”
सरोज के भीतर गुस्सा था, मगर देवेंद्र के भीतर अब बदला नहीं बचा था।
“क्या तुम्हें न्याय नहीं चाहिए?” उसने पूछा।
“चाहिए था,” उन्होंने कहा। “बहुत चाहिए था। लेकिन जिन चेहरों ने किया, वे शायद अब बूढ़े होंगे, कुछ मर गए होंगे। कागज नहीं, गवाह नहीं। अदालत से पहले मुझे अपने घर में सच कहना था। वही सबसे कठिन था।”
फिर भी निखिल ने हार नहीं मानी। उसने पुराने अधिकार समूहों से संपर्क किया, उस दौर की गलत गिरफ्तारियों पर काम करने वाले लोगों से मिला। कोई मुकदमा बड़ा नहीं बन सका, पर देवेंद्र की गवाही दर्ज हुई। उनका नाम एक सूची में आया—उन लोगों की सूची में, जिन्हें गलत शक, सत्ता के भय और चुप्पी ने कुचल दिया था।
देवेंद्र ने कागज पर अपना नाम देखा तो बहुत देर तक उसे छूते रहे।
“अब मैं सिर्फ अफवाह नहीं हूँ,” उन्होंने कहा। “अब कहीं लिखा है कि यह हुआ था।”
सरोज ने महसूस किया, कभी-कभी न्याय अदालत की सजा नहीं, बल्कि सच का दर्ज हो जाना भी होता है।
देवेंद्र 14 साल और जिए। वे पूरी तरह ठीक कभी नहीं हुए। रातों में कभी-कभी चिल्लाकर उठ बैठते। तेज आवाज से अब भी चौंक जाते। ठंड में जख्म दुखते, गर्मी में त्वचा जलती। पर अब 4 बजे का दरवाजा बंद नहीं होता था।
उन वर्षों में सरोज ने अपने विवाह को नया सीखा। पहले वह समझती थी कि साथ रहना ही विवाह है। फिर जाना, साथ रहना काफी नहीं; किसी के दर्द के पास बैठना, बिना घिन, बिना आरोप, बिना जल्दी समाधान मांगे—वह विवाह है।
देवेंद्र ने भी बदलना सीखा। वह निखिल को फोन करते। पूजा से कहते, “आज आ जाना, तुम्हारी माँ ने कढ़ी बनाई है।” कभी-कभी सरोज का हाथ पकड़कर बाजार जाते। लोग कहते, “अरे त्रिपाठी जी, अब तो बड़े हँसमुख हो गए।”
सरोज मन ही मन सोचती—नहीं, वह हँसमुख नहीं हुए। बस उनके मुँह से वह पट्टी हट गई, जो उन्होंने 35 साल खुद बाँध रखी थी।
2018 की सर्दियों में देवेंद्र की तबीयत बिगड़ने लगी। उम्र, पुराना दर्द, फेफड़ों की कमजोरी—सब साथ आ गए। अस्पताल के कमरे में एक शाम उन्होंने सरोज को बुलाया। बाहर निखिल दवा लेने गया था, पूजा नर्स से बात कर रही थी।
देवेंद्र ने सरोज की उंगलियाँ पकड़ीं।
“तुमने उस दिन दरवाजे से क्यों देखा?” उन्होंने धीमे से पूछा।
सरोज की आँखें भर आईं। “क्योंकि मैं डर गई थी कि तुम मुझसे दूर जा रहे हो।”
देवेंद्र मुस्कुराए। “अच्छा किया। कभी-कभी बंद दरवाजा तोड़ना पाप नहीं होता।”
सरोज रो पड़ी।
उन्होंने बहुत धीरे कहा, “मुझे मेरी शर्म के साथ अकेला न छोड़ने के लिए धन्यवाद।”
सरोज ने उनके माथे को चूमा।
“वह शर्म नहीं थी, देवेंद्र। वह जख्म था। और जख्म तब तक सड़ता है, जब तक कोई उसे प्यार से साफ न करे।”
कुछ दिनों बाद देवेंद्र चले गए।
उनके अंतिम संस्कार में मोहल्ले के लोग आए। सबने कहा, “बहुत शांत आदमी थे।” निखिल ने चिता के सामने खड़े होकर पहली बार सबके सामने कहा, “मेरे पिता शांत नहीं थे। उन्हें चुप कराया गया था। और फिर उन्होंने हमें बचाने के लिए खुद को छिपा लिया। आज हम उन्हें उस चुप्पी से मुक्त करते हैं।”
सरोज ने देखा, हवा में उठता धुआँ किसी बंद स्नानघर की भाप जैसा नहीं था। वह खुला था, आकाश में जाता हुआ।
आज भी सुबह 4 बजे सरोज की नींद खुल जाती है। घर अब बहुत शांत है। आँगन में तुलसी है, दीवार पर देवेंद्र की फोटो है, और संदूक में वह छोटी डायरी रखी है जिसमें तारीखें लिखी थीं।
सरोज कभी-कभी उस डायरी को खोलती है और सोचती है—कितने घरों में कोई न कोई देवेंद्र होगा, जो अपनी पीठ नहीं दिखाता, अपना डर नहीं बताता, अपने बच्चों को गले लगाने से पहले दर्द नापता है।
कितनी सरोज होंगी, जो शक को सच समझ बैठती हैं, क्योंकि दर्द अक्सर बेवफाई से ज्यादा चुप रहता है।
कितने निखिल होंगे, जो पिता की दूरी को नफरत मान लेते हैं, बिना यह जाने कि कुछ लोग प्रेम करते हुए भी हाथ नहीं फैला पाते।
हर बंद दरवाजे के पीछे धोखा नहीं होता।
कभी-कभी वहाँ सिर्फ एक इंसान होता है, जो चीखना चाहता है, मगर किसी अपने को बचाने के लिए तौलिया दाँतों में दबाए चुपचाप जिंदा रहने की कोशिश करता है।
