“बस चलाते रहो,” बूढ़े ने कहा, और पीछे आती काली गाड़ियों ने गोलियां बरसानी शुरू कर दीं; जिस आदमी को ड्राइवर ने मजाक बनाया था, वही छिपा हुआ सच लेकर मौत से लड़ रहा था

भाग 1

बूढ़े आदमी को सड़क किनारे लंगड़ाते देख अर्जुन मल्होत्रा ने ट्रक रोका, मदद करने के लिए नहीं, बल्कि उसका मजाक उड़ाने के लिए।

राजस्थान की तपती दोपहर थी। जैसलमेर से जोधपुर जाने वाला हाईवे रेत, गर्म हवा और धुंधले आसमान के बीच सीधा खिंचा हुआ था। अर्जुन अपने 18 पहियों वाले कंटेनर ट्रक में बैठा चिड़चिड़ा होकर गाली दे रहा था। उसके ट्रक में 28 टन मशीनरी पार्ट्स थे, जिन्हें अगले दिन सुबह तक गुरुग्राम के एक डिफेंस सप्लायर के गोदाम तक पहुंचना था। मालिक ने पहले ही चेतावनी दे दी थी कि देर हुई तो आधा पेमेंट कटेगा।

अर्जुन 43 साल का था, तलाकशुदा, कर्ज में डूबा हुआ और दुनिया से नाराज। उसे लगता था कि जिंदगी ने उसके साथ हमेशा धोखा किया। पत्नी उसे छोड़कर चली गई थी, बेटा उससे बात नहीं करता था, और ट्रक की किस्तें हर महीने उसका गला घोंटती थीं। इसलिए जब उसने सड़क किनारे एक दुबले, सफेद बालों वाले बूढ़े आदमी को देखा, जिसकी पीठ पर पुराना फौजी कैनवास बैग था, तो उसके अंदर की करुणा नहीं, क्रूरता जागी।

उसने ट्रक रोककर दरवाजा खोला और तिरछी मुस्कान के साथ बोला—
—आ जाइए, दादाजी। आज किस आश्रम से भागकर निकले हैं?

बूढ़े ने जवाब नहीं दिया। वह धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ा। उसके घुटने जैसे हर कदम पर टूट रहे थे। चेहरे पर पसीना था, मगर आंखें अजीब थीं—हल्की भूरी, शांत, लेकिन भीतर कहीं बहुत गहरी।

—धन्यवाद, बेटा, उसने सीट पर बैठते हुए कहा। आवाज धीमी थी, पर कांपी नहीं।

—बेटा मत बोलिए, अर्जुन ने ट्रक फिर हाईवे पर चढ़ाते हुए कहा। मैं आपको दया में नहीं बैठा रहा। रास्ता लंबा है, बोर हो रहा था। सोचा, कोई दुखभरी कहानी सुनकर थोड़ी हंसी आ जाएगी।

बूढ़े ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा—
—मेरा नाम वेदांत राठौड़ है। बस पूर्व दिशा में जाना है।

अर्जुन हंसा।
—पूर्व दिशा? वाह! क्या बात है। कोई गुप्त मिशन है क्या? प्रधानमंत्री ने बुलाया है?

वेदांत चुप रहा।

अर्जुन की चिढ़ बढ़ गई। उसने जानबूझकर बातें और जहरीली कर दीं।
—आप जैसे लोग हमेशा यही करते हैं। कभी फौज की जैकेट पहन लो, कभी पुराना बैग लटका लो, फिर दुनिया से सम्मान मांगो। घरवालों ने निकाल दिया क्या? पेंशन खत्म? या बच्चे बोझ समझने लगे?

वेदांत ने बस इतना कहा—
—कुछ रिश्ते खत्म हो जाते हैं, लेकिन कुछ जिम्मेदारियां बूढ़ी नहीं होतीं।

उस जवाब ने अर्जुन को और भड़का दिया।

शाम तक वह बूढ़े को ताने मारता रहा। उसने रास्ते के ढाबे पर खाना खाया, लेकिन वेदांत को ट्रक में ही बैठा छोड़ दिया। लौटकर देखा तो बूढ़ा उसी तरह शांत बैठा था, जैसे कोई भीतर ही भीतर प्रार्थना कर रहा हो।

रात गहराने लगी। हाईवे पर ट्रक की हेडलाइटें रेत पर लंबी लकीरें बना रही थीं। अर्जुन की आंखें थकान से भारी थीं। उसने पानी की बोतल उठाई, तभी ट्रक अचानक एक गहरे गड्ढे में धंसकर उछला। वेदांत जोर से दरवाजे से टकराया। उसकी पुरानी जैकेट खुल गई।

अर्जुन ने बस 5 सेकंड के लिए देखा, लेकिन उसके शरीर का खून जैसे जम गया।

वेदांत की गर्दन से एक भारी काले धातु का पहचान-पत्र झूल रहा था। उस पर भारत सरकार का चिह्न था, लेकिन उसके ऊपर लाल रंग का गुप्त निशान बना था—टूटी हुई ढाल के बीच खड़ा अशोक चक्र। नीचे सफेद अक्षरों में लिखा था—

रणनीतिक छाया प्रकोष्ठ
स्थिति: सक्रिय अनिश्चितकालीन
अनुमति स्तर: अग्नि 7
सभी केंद्रीय, राज्य और सैन्य संसाधन धारक की बिना शर्त सहायता करेंगे

अर्जुन का गला सूख गया।

वेदांत ने धीरे से पहचान-पत्र वापस जैकेट में छिपाया, फिर पहली बार सीधे अर्जुन की आंखों में देखा। अब वह कमजोर बूढ़ा नहीं लग रहा था। उसकी आंखों में आदेश था, खतरा था, और ऐसा अतीत था जिसे अर्जुन समझ भी नहीं सकता था।

—चलाते रहो, अर्जुन, वेदांत ने ठंडी आवाज में कहा। अब देर नहीं होनी चाहिए।

अर्जुन ने कांपते हाथों से स्टीयरिंग पकड़ा। उसे तभी पीछे शीशे में 2 काली एसयूवी की हेडलाइटें दिखाई दीं, जो काफी देर से उसी दूरी पर उनका पीछा कर रही थीं।

और तभी वेदांत ने धीमे से कहा—
—अब अगर तुमने गलती की, तो हम दोनों सूरज उगने से पहले मर जाएंगे।

भाग 2

अर्जुन की सांस अटक गई। उसने एक्सेलरेटर दबाया, पर 28 टन का ट्रक अचानक हवा नहीं बन सकता था। पीछे की 2 काली एसयूवी अब पास आ रही थीं। वेदांत ने अपने कैनवास बैग की चेन खोली। उसमें कपड़े नहीं थे, बल्कि एक सुरक्षित सैटेलाइट यंत्र, छोटी पिस्तौल, एन्क्रिप्टेड रेडियो और धातु का सिलेंडरनुमा डिवाइस था। अर्जुन चीख पड़ा—
—आप कौन हैं?
—वही आदमी, जिसकी वजह से कुछ लोग अभी तक देश बेच नहीं पाए, वेदांत ने कहा।
उसने बताया कि वह एक गुप्त जांच अधिकारी था। उसके पास वह डेटा था, जिसमें सेना की खरीद, ड्रोन तकनीक और मिसाइल सिस्टम बेचने वाले बड़े अधिकारियों, उद्योगपतियों और नेताओं के नाम थे। वह डेटा दिल्ली पहुंचना जरूरी था।
रात 11:20 पर वे टोल जांच चौकी पर पहुंचे। एक सख्त पुलिस अधिकारी ने ट्रक रोक लिया। अर्जुन पसीने से तर था। अधिकारी ने वेदांत से पहचान मांगी। वेदांत ने छोटा हरा कार्ड दिया। स्कैनर लाल चमका। अधिकारी का चेहरा सफेद पड़ गया। वह पीछे हटकर सीधा खड़ा हो गया।
—सर, रास्ता साफ है।
ट्रक आगे बढ़ा, लेकिन एसयूवी अब खुलकर पीछा करने लगीं। एक गाड़ी बाईं तरफ आई। खिड़की से बंदूक निकली। वेदांत चिल्लाया—
—जब कहूं, ट्रक बाईं तरफ काटना।
अर्जुन ने वैसा ही किया। भारी ट्रेलर ने एसयूवी को डिवाइडर से रगड़ दिया। चिंगारियां अंधेरे में फूट पड़ीं। दूसरी गाड़ी पीछे रह गई। आगे सड़क पर 3 और काली गाड़ियां रास्ता रोककर खड़ी थीं।
—ब्रेक लगाऊं? अर्जुन चिल्लाया।
—नहीं। अगले कच्चे रास्ते पर उतर जाओ।
—वह पुरानी खदान की तरफ जाता है। आगे मौत है।
वेदांत ने उसकी तरफ देखा।
—आज मौत पीछे है। आगे शायद मौका हो।
अर्जुन ने ट्रक मोड़ दिया। तभी पीछे से गोलियों की आवाज आई, और ट्रक का दायां शीशा टूटकर बिखर गया।

भाग 3

कच्चे रास्ते पर ट्रक ऐसे उछल रहा था जैसे लोहे का कोई घायल जानवर अंधेरे में भाग रहा हो। रेत, पत्थर और सूखी झाड़ियां हेडलाइटों के सामने अचानक आतीं और गायब हो जातीं। अर्जुन ने अपने जीवन में हजारों किलोमीटर चलाया था, पहाड़, बारिश, धुंध, दिल्ली का ट्रैफिक, मुंबई की बंदरगाह वाली रातें, लेकिन आज उसका स्टीयरिंग उसके हाथ में नहीं, किस्मत के हाथ में लग रहा था।

—लाइट बंद करो, वेदांत ने आदेश दिया।

—क्या? पागल हो गए हैं? सामने कुछ नहीं दिखेगा।

—लाइट बंद करो, अर्जुन। अभी।

अर्जुन ने दांत भींचकर स्विच दबाया। दुनिया तुरंत काली हो गई। सिर्फ डैशबोर्ड की हल्की हरी रोशनी और चांद की फीकी चमक बची। पीछे वाली एसयूवी की हेडलाइटें धूल के बादल को चीरती हुई पास आ रही थीं।

वेदांत ने अपने बैग से धातु का सिलेंडर निकाला, खिड़की आधी खोली और उसे पीछे की तरफ तान दिया। कोई धमाका नहीं हुआ, कोई आग नहीं निकली। बस एक नीली रोशनी 2 बार चमकी। अगले ही पल पीछे वाली एसयूवी की हेडलाइटें बुझ गईं। अंधेरे में तेज भागती गाड़ी मोड़ नहीं देख पाई। पत्थरों से टकराने की भारी आवाज आई, फिर सब शांत हो गया।

अर्जुन ने ट्रक धीमा किया। उसके हाथ कांप रहे थे।
—ये सब… ये सब फिल्म जैसा क्यों लग रहा है?

—क्योंकि असली जिंदगी में कैमरा नहीं होता, वेदांत ने थके स्वर में कहा। बस खून असली होता है और फैसले भी।

कुछ दूर आगे एक पुराना, वीरान हवाई पट्टी जैसा मैदान दिखाई दिया। कभी शायद सेना ने इस्तेमाल किया होगा, अब टूटी डामर, जंग खाए लोहे और बबूल की झाड़ियों के अलावा वहां कुछ नहीं था। वेदांत ने घड़ी देखी।

—यहीं रुकना है। गरुड़ 4 मिनट में पहुंचेगा।

—गरुड़ कौन?

—वे लोग जो अभी भी बिके नहीं हैं।

अर्जुन ने इंजन बंद किया। अचानक सन्नाटा ऐसा गिरा कि अपनी धड़कन भी हथौड़े जैसी सुनाई देने लगी। वह सीट पर ढह गया। अभी सुबह तक वह बस एक गुस्सैल ट्रक ड्राइवर था। उसे पेमेंट, किस्त, डीजल और अपनी टूटी शादी की चिंता थी। अब वह किसी ऐसे खेल में था, जहां लोग देश बेच रहे थे और बूढ़े आदमी मौत को जेब में रखकर घूम रहे थे।

वेदांत ने पहली बार नरमी से उसकी तरफ देखा।
—तुमने अच्छा चलाया।

अर्जुन कड़वाहट से हंसा।
—मैंने आपको दिन भर जलील किया। आप मुझे धन्यवाद दे रहे हैं?

—तुम मुझे नहीं देख रहे थे, अर्जुन। तुम अपना गुस्सा देख रहे थे। दुनिया अक्सर बूढ़े लोगों को बोझ समझती है। मेरे काम में यह कमजोरी नहीं, ढाल है।

अर्जुन कुछ बोलता, उससे पहले ऊपर से सफेद तेज रोशनी उनके ट्रक पर गिर पड़ी। पूरा मैदान दिन जैसा चमक उठा। वेदांत का चेहरा कठोर हो गया।

—ड्रोन, उसने कहा। नीचे उतर जाओ। अभी।

दोनों दरवाजे खोलकर कूदे। अर्जुन घुटनों के बल गिरा, हथेलियां छिल गईं। वेदांत अपनी उम्र के बावजूद तेजी से ट्रेलर के नीचे घुस गया। अर्जुन भी रेंगकर उसके पीछे चला गया। तभी दूर से इंजन की भारी आवाजें आने लगीं। 3 काली बख्तरबंद गाड़ियां धूल उड़ाती हुई मैदान में दाखिल हुईं। उनके ऊपर हथियार लगे थे। लगभग 12 लोग काली वर्दी में उतरे।

एक आदमी ने लाउडस्पीकर उठाया। उसकी आवाज ठंडी और आत्मविश्वासी थी।

—वेदांत राठौड़। खेल खत्म। डेटा बाहर फेंक दो। मैं वादा करता हूं, तुम्हारी मौत जल्दी होगी।

वेदांत ने धीमे से कहा—
—समर प्रताप।

—आप उसे जानते हैं? अर्जुन ने फुसफुसाया।

—मैंने उसे 18 साल पहले ट्रेन किया था। वह देश की रक्षा करने आया था, फिर पैसे का गुलाम बन गया।

समर की आवाज फिर गूंजी।
—बूढ़े शेर, इस बार दांत टूट जाएंगे।

वेदांत ने जवाब दिया—
—शेर बूढ़ा हो जाए तो भी गीदड़ों से समझौता नहीं करता।

तभी गोलियों की बौछार शुरू हो गई। ट्रक का केबिन छलनी होने लगा। शीशे टूटे, धातु चीखी, चिंगारियां बरसीं। अर्जुन ने कान दबा लिए। उसे लगा कि धरती फट रही है। वेदांत ने ट्रेलर के पहिए की आड़ से पिस्तौल निकाली और 3 गोलियां चलाईं। दूर की 2 टैक्टिकल लाइटें टूट गईं। अंधेरा फिर आधा लौट आया।

—गरुड़ कितनी दूर है? अर्जुन चिल्लाया।

—2 मिनट, वेदांत ने कहा, लेकिन उसकी सांस भारी हो रही थी।

अर्जुन ने देखा, बूढ़े का हाथ छाती पर जा रहा था। उसके चेहरे पर दर्द था, लेकिन आवाज अब भी स्थिर थी।

—मेरे घुटने ने जवाब दे दिया है। शायद दिल भी।

—नहीं, आप उठेंगे। आपने मुझे इस मुसीबत में डाला है, अब बाहर भी आप ही निकालेंगे।

वेदांत ने अपने सीने की अंदरूनी जेब से एक छोटा धातु ड्राइव निकाला और अर्जुन के हाथ में ठूंस दिया।

—इसे लेकर भागना। विमान उतरेगा तो सीधे उसमें चढ़ जाना।

—मैं आपको छोड़कर नहीं भागूंगा।

—यह आदेश है।

—मैं आपकी फौज में नहीं हूं!

वेदांत की आंखों में पहली बार दर्द चमका।
—आज हो। क्योंकि आज तुम सिर्फ अपनी जान नहीं बचा रहे। उन जवानों की जान बचा रहे हो जो कल सीमा पर खड़े होंगे और जिन्हें पता भी नहीं होगा कि दिल्ली में बैठे कौन लोग उनकी ढाल बेच चुके थे।

अर्जुन के हाथ में ड्राइव भारी लगने लगा। उसे अपने बेटे आरव की याद आई, जो 13 साल का था और स्कूल की परेड में तिरंगा उठाकर चला था। उसे पहली बार समझ आया कि देश कोई टीवी बहस नहीं, कोई नारा नहीं, बल्कि उन लोगों की सांस है जिन्हें वह प्यार करता है।

उसी समय आसमान फटने जैसा शोर हुआ। एक काला, बिना निशान वाला टिल्ट-रोटर विमान नीचे उतरा। उसके पंखों से उठी हवा ने धूल का तूफान बना दिया। पीछे का रैंप खुला। अंदर से हथियारबंद कमांडो हाथ हिलाकर अर्जुन को बुला रहे थे।

—भागो! वेदांत चिल्लाया।

अर्जुन ड्राइव सीने से लगाकर दौड़ा। गोलियां धूल में चमकती रेखाओं जैसी उसके पास से निकल रही थीं। विमान तक बस 30 कदम बाकी थे। तभी पीछे से वेदांत की दर्दभरी आवाज आई।

अर्जुन मुड़ा। वेदांत ट्रक के नीचे से बाहर आ गया था, ताकि दुश्मनों का ध्यान अपनी तरफ खींच सके। उसके पैर में गोली लगी थी। वह गिर चुका था। समर प्रताप धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ रहा था, बंदूक सीधी वेदांत के सिर पर।

विमान के रैंप पर खड़े कमांडो चिल्लाए—
—ड्राइव लेकर अंदर आओ!

अर्जुन रुका। सामने सुरक्षित रास्ता था। पीछे मौत थी। उसके दिमाग में 2 तस्वीरें चमकीं—सुबह का वह पल जब उसने बूढ़े को “बोझ” कहा था, और अभी का वह पल जब वही बूढ़ा उसके बेटे के भविष्य के लिए जान दे रहा था।

अर्जुन ने गाली दी और वापस दौड़ पड़ा।

वह सीधे ट्रक के केबिन में घुसा। गोलियों ने दरवाजे को छेदा, पर वह झुक गया। ट्रक का इंजन बंद था, मगर एयर ब्रेक सिस्टम में दबाव बचा था। उसे अचानक अपने 20 साल के ड्राइविंग अनुभव की सबसे मामूली चीज याद आई—ब्रेक रिलीज का तेज प्रेशर।

समर ने उसे देखा और बंदूक घुमाई।

अर्जुन ने लाल-पीले एयर ब्रेक नॉब दोनों हाथों से धक्का देकर अंदर कर दिए। ट्रक के नीचे से जोरदार हवा फटी। धूल, रेत और कंकड़ का बादल सीधे समर के चेहरे पर उठा। वह अंधा होकर लड़खड़ाया और गोलियां हवा में चला बैठा।

अर्जुन केबिन से कूदा, लुढ़कता हुआ वेदांत तक पहुंचा और उसकी जैकेट पकड़कर खींचा।

—मैंने कहा था भागो, बेवकूफ, वेदांत ने दर्द में कहा।

—और मैंने कहा था, मैं आपकी फौज में नहीं हूं। इसलिए आदेश नहीं मानूंगा।

वह बूढ़े को लगभग कंधे पर लादकर विमान की तरफ भागा। कमांडो अब कवर फायर दे रहे थे। उनकी गोलियां कम थीं, लेकिन सटीक थीं। समर के 3 आदमी तुरंत गिर पड़े। धूल, चीख, इंजन और गोलियों के बीच अर्जुन ने किसी तरह वेदांत को रैंप तक पहुंचाया। हाथों ने उन्हें अंदर खींच लिया। रैंप बंद हुआ। विमान उठ गया।

कुछ ही सेकंड में वे अंधेरे आसमान में थे।

अंदर लाल रोशनी थी। डॉक्टर वेदांत के पैर पर पट्टी बांध रहे थे। एक कठोर चेहरे वाला अधिकारी अर्जुन के पास आया।

—ड्राइव?

अर्जुन ने कांपते हाथों से धातु ड्राइव दिया। अधिकारी ने मुहर देखी, फिर उसे सुरक्षित केस में बंद किया।

—आज रात आपने भारत के लिए ऐसा काम किया है, जिसे कोई अखबार कभी नहीं लिखेगा।

अर्जुन थका हुआ हंसा।
—मुझे तो बस गुरुग्राम डिलीवरी करनी थी।

अधिकारी ने कहा—
—आपका ट्रक आधिकारिक रिकॉर्ड में इंजन आग से नष्ट माना जाएगा। कंपनी को पूरा बीमा मिलेगा। आपके खाते में कल सुबह एक राशि पहुंचेगी। कर्ज, किस्त, गुजारा भत्ता—सब खत्म हो जाएगा। लेकिन आज की रात कभी हुई ही नहीं।

अर्जुन ने वेदांत की तरफ देखा। बूढ़ा होश में था। उसने कमजोर हाथ उठाकर सलाम किया।

अर्जुन की आंखें भर आईं। उसने सिर झुकाया।
—मैंने आपको बहुत गलत समझा।

वेदांत ने धीमे से कहा—
—अच्छा है। देर से सही, तुमने खुद को सही समझ लिया।

कुछ महीनों बाद, जयपुर के बाहर एक ढाबे पर सुबह की चाय पीकर अर्जुन बाहर निकला। सामने उसका नया ट्रक खड़ा था—नीला, चमकदार, पूरी तरह उसका अपना। अब कोई मालिक उस पर चिल्लाता नहीं था। कोई ब्रेंडा फोन पर गाली नहीं देती थी। उसने अपने बेटे आरव से फिर बात शुरू कर दी थी। महीने में 2 बार वह उससे मिलने जाता था। पहली बार उसे लगता था कि सड़क सजा नहीं, रास्ता है।

वह केबिन में चढ़ा। सूरज की रोशनी आंखों पर पड़ी तो उसने सन-वाइजर नीचे किया। एक छोटा हरा कार्ड उसकी गोद में गिरा।

अर्जुन जम गया।

वही कार्ड। बिना नाम वाला। पीछे सिर्फ 1 नंबर लिखा था। नीचे काली स्याही से छोटा संदेश—

अगर फिर कभी रास्ता बहुत शांत लगे।
वेदांत

अर्जुन बहुत देर तक कार्ड देखता रहा। फिर उसने उसे अपने ड्राइविंग लाइसेंस के पीछे बटुए में रख दिया। इंजन स्टार्ट हुआ। भारी ट्रक की आवाज सुबह के आसमान में फैल गई।

वह हाईवे पर निकला। सड़क लंबी थी। दिशा पूर्व की थी। और इस बार, अर्जुन मल्होत्रा को सफर से डर नहीं लग रहा था।

क्योंकि उसने जान लिया था कि कभी-कभी सड़क किनारे दिखने वाला सबसे कमजोर आदमी ही वह दीवार होता है, जिसके पीछे पूरा देश सुरक्षित सांस लेता है।

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