—रोओ मत, ठीक है? आज मेरे साथ ऐसा मत करो… —इवान बुदबुदाया, अपने पिल्ले को सीने से ऐसे लगाए हुए जैसे उसे किसी अंतिम विदाई के लिए ले जाया जा रहा हो, न कि सिर्फ एक साधारण टीका लगवाने के लिए।

एल कैचोरो ने चीख भी नहीं मारी। उसने बस अपना सिर घुमाया, जैसे यह समझने की कोशिश कर रहा हो कि अभी हुआ क्या था। लेकिन इवान ने एक टूटी हुई साँस छोड़ी, और डॉक्टर समझ गई कि घाव कुत्ते की पीठ पर नहीं था।

—उसका नाम ब्रूनो था —उसने कहा, जबकि किसी ने उससे पूछा भी नहीं था—। वह भी इतना ही भरोसा करने वाला था। इतना ही शांत। और पूँछ हिलाने में उतना ही भोला, जब नहीं हिलानी चाहिए थी।

पशु चिकित्सक ने सावधानी से सिरिंज नीचे रख दी।

टोमी का टीकाकरण हो चुका था। वह अब भी मेज़ पर बैठा था, जैसे यह सारा नाटक उससे जुड़ा ही न हो। लेकिन इवान ने उसे फिर से अपने सीने से लगा लिया, लगभग बेताबी के साथ, जैसे वह अब भी किसी अनहोनी को रोक सकता हो।

—यहीं हुआ था —वह आगे बोला, नज़रें फर्श पर गड़ाए हुए—। मतलब… इसी क्लिनिक में। लगभग तीन साल पहले।

डॉक्टर ने रुई एक तरफ रख दी।

उसके चेहरे का भाव थोड़ा बदल गया।

बहुत नहीं।

बस इतना कि इवान ने नोटिस कर लिया और उसकी रीढ़ में ठंडी लहर दौड़ गई।

—यहीं? —उसने पूछा।

इवान ने सिर हिलाया।

—मैं उसे टीका लगवाने लाया था। उन्होंने कहा था कि यह सामान्य है। कि शायद वह थोड़ा सुस्त रहेगा। चिंता न करूँ।

उसकी आवाज़ अटक गई।

—उस रात वह काँपने लगा। फिर वह खड़ा भी नहीं हो पा रहा था। मैंने फोन किया। तीन बार फोन किया। उन्होंने कहा यह सामान्य है, बस निगरानी रखो। रात के दो बजे तक उसे ठीक से साँस नहीं आ रही थी… और जब मैं उसे वापस लेकर आया…

वह वाक्य पूरा नहीं कर पाया।

ज़रूरत भी नहीं थी।

डॉक्टर भी कुछ नहीं बोली।

वह बस उसे एक अलग नज़र से देखती रही—और अधिक गंभीर, और अधिक केंद्रित।

जैसे वह कोई दुखद कहानी नहीं, बल्कि कुछ ऐसा सुन रही हो जिसे वह पहचानती हो।

इवान ने मुश्किल से थूक निगला।

—मैंने उसे आख़िरी साँस तक अपनी बाँहों में पकड़े रखा। और तब से मैं किसी भी क्लिनिक में बिना यह महसूस किए नहीं जा सका कि कोई फिर से मुझसे मेरी सबसे प्रिय चीज़ छीन लेगा।

टोमी ने उसकी उँगली चाट ली।

इवान ने नीचे देखा और पिल्ले के पंजे को अपनी हथेली में बंद कर लिया।

वह पहले से ज़्यादा काँप रहा था।

लेकिन अब सिर्फ डर नहीं था।

शर्म भी थी।

वर्षों से भीतर दबे हुए दर्द को किसी के सामने स्वीकार करने की शर्म।

डॉक्टर धीरे-धीरे उसके करीब आई।

—क्या आपको तारीख़ याद है?

इवान ने भौंहें सिकोड़ लीं।

उसे इस सवाल की उम्मीद नहीं थी।

उसे सांत्वना की उम्मीद थी।

या किसी घिसे-पिटे वाक्य की।

या चुप्पी की।

लेकिन इसकी नहीं।

उसने यादों में हाथ डाला, जैसे कोई काँच के टुकड़ों से भरे डिब्बे में हाथ डालता है।

—नवंबर था। सत्रह तारीख़… शायद। हाँ। सत्रह। क्योंकि दो दिन बाद मेरा जन्मदिन था।

डॉक्टर बिल्कुल स्थिर हो गई।

फिर वह कंप्यूटर की ओर मुड़ी और टाइप करने लगी।

कीबोर्ड की आवाज़ ने कमरे को नई बेचैनी से भर दिया।

अब यह सिर्फ अतीत नहीं था।

यह वह एहसास था कि शायद कोई अधूरा सच अब जाकर अपनी जगह मिलने वाला है।

इवान ने टोमी को और कसकर पकड़ लिया।

—खोजने का कोई मतलब नहीं —उसने बुदबुदाया—। बहुत समय बीत चुका है।

—कभी-कभी मतलब होता है —डॉक्टर ने बिना पीछे देखे जवाब दिया।

स्क्रीन की नीली रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी।

इवान देख नहीं पा रहा था कि स्क्रीन पर क्या है।

लेकिन उसने देखा कि डॉक्टर का जबड़ा कस गया।

वह एक सेकंड के लिए टाइप करना बंद कर देती है।

फिर और तेज़ी से टाइप करने लगती है।

एक और फ़ाइल।

फिर दूसरी।

—क्या ब्रूनो ग्यारह महीने का काला श्नाउज़र था? —उसने पूछा।

इवान ने झटके से सिर उठाया।

—हाँ।

डॉक्टर ने माउस छोड़ दिया।

वह हैरान नहीं लग रही थी।

वह नाराज़ लग रही थी।

उससे नहीं।

किसी और चीज़ से।

किसी पुराने मामले से जो अब भी उस सिस्टम में ठंडे शब्दों और अधूरी रिपोर्टों में जीवित था।

—आपका मामला दर्ज किया गया था —उसने आखिर कहा—। और इसे सामान्य प्रतिक्रिया नहीं माना गया था।

इवान का मुँह सूख गया।

—इसका क्या मतलब है?

डॉक्टर ने स्क्रीन थोड़ा घुमाई।

लेकिन उससे पहले कि वह पढ़ पाता, टोमी ने एक छोटी-सी कराह निकाली।

दोनों एक साथ उसकी ओर मुड़े।

पिल्ला अब पहले जैसा शांत नहीं था।

वह थोड़ा एक तरफ ढुलक गया था।

कुछ नाटकीय नहीं।

लेकिन उसकी साँसें बदल गई थीं।

छोटी।

तेज़।

इवान का चेहरा सफेद पड़ गया।

—नहीं —उसने फुसफुसाया।

डॉक्टर तुरंत हरकत में आ गई।

उसने टोमी को उसकी बाँहों से निकालकर मेज़ पर रखा और उसके मसूड़े, आँखें और सीना जाँचा।

फिर दरवाज़े की ओर ऊँची आवाज़ में बोली—

—मरियाना! तुरंत एंटीहिस्टामिन और कैन्युला लेकर आओ!

इवान के पैरों ने जवाब दे दिया।

—नहीं… नहीं… नहीं… फिर से नहीं…

दरवाज़ा खुला।

एक सहायक दौड़ती हुई अंदर आई।

सब कुछ बहुत तेज़ी से होने लगा।

दस्ताने।

ट्रे।

छोटा मॉनिटर।

डॉक्टर की छोटी-छोटी हिदायतें।

टोमी की बिगड़ती साँसें।

इवान दीवार से चिपक गया।

न वह रास्ते में आ रहा था।

न बोल रहा था।

न रो रहा था।

लेकिन उसके चेहरे पर उस आदमी का भाव था जो अपनी ज़िंदगी का सबसे भयानक पल फिर से होते देख रहा हो।

—मेरी तरफ देखो, इवान —डॉक्टर ने काम करते हुए कहा—। मेरी तरफ देखो।

वह नहीं देख पाया।

वह सिर्फ टोमी को देख रहा था।

इतना छोटा।

इतना असहाय।

इतना अजीब कि इतना नन्हा शरीर इतना बड़ा डर उठा सकता था।

—मेरी बात सुनो —डॉक्टर ने कहा—। उसे प्रतिक्रिया हुई है, हाँ। लेकिन यहीं। हमारे सामने। समय रहते।

“समय रहते।”

यह शब्द उसके भीतर कुछ तोड़ गया।

क्योंकि ब्रूनो के साथ सब कुछ देर से हुआ था।

फोन।

वापसी।

मदद।

सच।

यहाँ तक कि वह माफ़ी भी जो कभी नहीं मिली।

—मैं तुम्हें वादा नहीं कर सकता कि कभी दर्द नहीं होगा। और यह भी नहीं कि मुझे कभी डर नहीं लगेगा। लेकिन मैं यह वादा करता हूँ कि इस बार मैं भागूँगा नहीं।

टोमी ने आँखें बंद कर लीं।

शांत।

उसके सीने से लगा हुआ।

और बारिश उनके ऊपर गिरती रही, जबकि शहर अपनी रफ़्तार में भागता रहा, इस बात से अनजान कि उस दिन सिर्फ एक कुत्ते का टीकाकरण नहीं हुआ था।

उस दिन इवान के भीतर वर्षों से पल रहा अपराधबोध का ज़हर भी आखिरकार निकल गया था।

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