
भाग 1
मालती के पति की लाश अभी घर के आंगन में ठंडी भी नहीं हुई थी कि उसके देवर ने सबके सामने कह दिया कि अब यह ठेला बेच देना चाहिए, क्योंकि विधवा औरत का चौराहे पर खाना बेचना पूरे खानदान की नाक कटवा देगा।
मालती ने सफेद साड़ी के पल्लू से अपना चेहरा ढक रखा था। उसकी आंखें सूज चुकी थीं, आवाज गले में अटक गई थी, लेकिन सामने पड़ी राघव की अर्थी देखकर भी उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वही आदमी चला गया, जो रोज सुबह 5:00 बजे उठकर कढ़ी में दही फेंटते समय कहता था कि भूखे आदमी को खाना खिलाना पूजा से कम नहीं होता।
शांति नगर की उस तंग गली में उनका घर छोटा था, पर राघव का दिल बहुत बड़ा था। बस अड्डे के पास उसका छोटा सा ठेला था, जहां वह सिर्फ ₹30 में भरपेट कढ़ी-चावल खिलाता था। मजदूर, रिक्शेवाले, छात्र, सफाई कर्मचारी, अस्पताल से लौटे थके लोग, सब उसके ठेले को अपना सहारा मानते थे। मालती कई बार कहती थी कि थोड़ा दाम बढ़ा लो, तेल-मसाले महंगे हो गए हैं, घर में बूढ़े बाबूजी की दवाई भी चलती है। मगर राघव हंसकर कहता था कि जिसे ₹50 की थाली खानी होगी, वह होटल चला जाएगा, उसके ठेले पर वही आएगा जिसके पास पेट है लेकिन जेब खाली है।
श्यामलाल, राघव के पिता, अपने बेटे पर गर्व करते थे। वह अक्सर कहते थे कि उनकी बहू भाग्य से आई है, वरना आजकल कौन औरत पति की कमाई कम देखकर भी उसका मन समझती है। मालती बाहर से चुप रहती, लेकिन अंदर से डरती थी। राघव की कमाई में घर चलता था, बचत नहीं होती थी। फिर भी जब शाम को ठेले से बचा चावल वह किसी भूखे बच्चे को दे आता, मालती उसे रोक नहीं पाती थी।
उस दिन भी सब सामान्य था। राघव सुबह जल्दी निकला था। मालती ने उसके टिफिन में 2 सूखी रोटियां रखी थीं, लेकिन वह हंसते हुए बोला था कि आज ठेले पर ही कुछ खा लेगा। दोपहर में अचानक खबर आई कि राघव चौराहे पर गिर पड़ा है। जब तक मालती अस्पताल पहुंची, डॉक्टरों ने कहा कि दिल का दौरा बहुत तेज था।
इलाज में जो थोड़ा-बहुत जमा था, सब चला गया। उधार अलग चढ़ गया। अब घर में रोने की आवाजें थीं, रसोई ठंडी थी और ठेले की चाबी मालती की मुट्ठी में पड़ी कांप रही थी।
तेरहवीं के बाद रिश्तेदार जमा हुए। देवर सुरेश ने साफ कहा कि ठेला बेचकर कर्ज चुका देना चाहिए। उसकी पत्नी कमला ने ताना मारा कि बाजार में खड़े होकर मर्दों को थाली परोसना इज्जतदार बहू का काम नहीं। मालती ने पहली बार चेहरा उठाया और धीमे से कहा कि राघव का ठेला बिकेगा नहीं, चलेगा।
सुरेश हंस पड़ा। उसने जेब से एक मुड़ा हुआ कागज निकाला और सबके सामने फेंक दिया।
उस कागज पर लिखा था कि राघव मरने से पहले ठेला और जगह सुरेश के नाम कर गया था।
मालती की उंगलियों से चाबी गिर गई।
भाग 2
सुरेश ने कहा कि अब मालती चाहे तो घर में बैठकर रोटी खाए, लेकिन ठेले पर उसका कोई हक नहीं। श्यामलाल ने कांपते हाथों से कागज उठाया, मगर उनकी बूढ़ी आंखें साफ पढ़ नहीं पा रही थीं। मालती ने कागज देखा तो उसकी सांस अटक गई। नीचे राघव जैसा ही हस्ताक्षर बना था, पर वह जानती थी कि राघव अपना नाम कभी ऐसे नहीं लिखता था। उसने सबके सामने कहा कि यह झूठ है, मगर कमला ने ताना मारा कि विधवा औरतें अक्सर सहानुभूति के लिए रोना सीख जाती हैं। अगले दिन मालती चुपचाप ठेले पर पहुंची। आधे ग्राहक उसे देखकर रो पड़े। किसी ने ₹900 का पुराना उधार लौटाया, किसी ने बोला कि राघव भैया का स्वाद अब भी यहीं जिंदा रहेगा। उसी शाम एक दुबला-पतला लड़का दूर पेड़ के नीचे बैठा उसे देखता रहा। रात ढलने से पहले वह आया और बोला कि उसके पास सिर्फ ₹10 हैं, क्या चावल मिल जाएंगे। मालती ने ठेले की बची कढ़ी में अपने घर की दाल मिलाकर उसे पूरी थाली दे दी। लड़के का नाम अरुण था। वह शहर में कमरा लेकर परीक्षा की तैयारी कर रहा था और कई बार भूखे सो चुका था। धीरे-धीरे वह रोज आने लगा। मालती उसे डांटकर खिलाती, जैसे छोटा भाई हो। तभी एक रात नगर निगम की गाड़ी आई और ठेले पर लाल नोटिस चिपका गई। नोटिस में लिखा था कि यह ठेला अवैध कब्जा है और 24 घंटे में हटाया जाएगा। नीचे शिकायतकर्ता का नाम पढ़कर मालती पत्थर बन गई। वह नाम सुरेश का था।
भाग 3
मालती ने उस रात रोकर नहीं, बैठकर कढ़ी फेंटी। उसकी आंखें लाल थीं, हाथ कांप रहे थे, लेकिन चूल्हा जल रहा था। श्यामलाल खाट पर बैठे बार-बार कह रहे थे कि बहू, अब लड़ने की ताकत नहीं बची। सुरेश अपने ही खून का निकला, अब किस-किस से लड़ोगी। मालती ने बिना सिर उठाए कहा कि राघव ने भूख से लड़ना सिखाया था, रिश्तेदारों से नहीं डरना भी वही सिखा गया।
अगली सुबह वह ठेला लेकर बस अड्डे पर पहुंची। नगर निगम की चेतावनी चिपकी थी, लोग डर रहे थे कि कहीं सामान जब्त न हो जाए। पर जैसे ही मालती ने कड़ाही चढ़ाई, सबसे पहले वही बूढ़ा रिक्शेवाला आया जो कभी राघव से उधार खाकर महीने के अंत में पैसे देता था। उसने जेब से ₹30 रखे और कहा कि बहू, आज थाली नहीं, हिम्मत खिलाना। उसके बाद लोग आते गए। किसी ने चावल धोए, किसी ने पानी भरा, किसी ने सड़क किनारे खड़े होकर ग्राहकों को बताया कि ठेला आज भी खुला है।
सुरेश दूर पान की दुकान के पास खड़ा सब देख रहा था। उसे लगा था कि डर के मारे मालती ठेला छोड़ देगी और वह जगह किसी बड़े दुकानदार को किराए पर देकर पैसा कमाएगा। लेकिन भीड़ देखकर उसका चेहरा उतर गया। उसी शाम वह 2 आदमियों के साथ आया और ठेले के सामने चिल्लाने लगा कि यह संपत्ति उसके नाम है। उसने वह नकली कागज फिर हवा में लहराया। मालती ने पहली बार ऊंची आवाज में कहा कि जिसने अपने मरे भाई के नाम से झूठा हस्ताक्षर बनाया हो, उसे कम से कम चौराहे पर धर्म की बात नहीं करनी चाहिए।
लोग रुक गए। हवा जैसे थम गई। सुरेश गरजा कि सबूत है तो दिखाओ। मालती के पास उस वक्त कोई सबूत नहीं था। बस राघव की पुरानी डायरी थी, जिसमें वह रोज का खर्च लिखता था और अंत में अपना नाम लिखता था। हस्ताक्षर अलग थे, लेकिन अदालत और दफ्तर की भाषा मालती नहीं जानती थी। तभी अरुण भीड़ से आगे आया। उसने वह कागज हाथ में लिया, कुछ देर देखा और बोला कि दीदी, इसे संभालकर रखिए। झूठ का भी एक दिन पेट फटता है।
अरुण तब बहुत दुबला था। आंखों के नीचे काले घेरे, कंधे पर पुराना बैग, जेब में हमेशा मुड़े हुए नोट। वह दिन में पुस्तकालय में पढ़ता, रात को एक कोचिंग सेंटर में बच्चों की कॉपियां जांचता और शाम को मालती के ठेले पर आता। मालती उसे कभी ग्राहक नहीं मानती थी। कभी बची कढ़ी देती, कभी घर का अचार, कभी चुपचाप ₹10 वापस उसकी जेब में डाल देती। अरुण हर बार शर्मिंदा होता, पर मालती डांट देती कि भूखे पेट बड़ा अफसर नहीं बना जाता।
समय धीरे-धीरे चलता रहा, पर मालती की जिंदगी में हर दिन एक लड़ाई था। सुबह बाजार से दही और बेसन उधार लाना, दोपहर में ग्राहकों को मुस्कान के साथ खिलाना, शाम को घर आकर श्यामलाल की दवाई देना, रात में अगले दिन की चिंता करना। कई बार बर्तन धोते-धोते उसकी पीठ टूट जाती। कई बार थाली लगाते समय राघव की आवाज सुनाई देती। वह पलटकर देखती, लेकिन वहां सिर्फ धुआं होता।
सुरेश ने हार नहीं मानी। उसने नगर निगम में शिकायत की, पुलिस चौकी में कहा कि मालती सड़क घेरती है, पड़ोस में अफवाह फैलाई कि वह जवान लड़कों को मुफ्त खाना खिलाकर नाम कमा रही है। कमला ने मोहल्ले की औरतों से कहा कि ऐसी विधवा से अपनी बेटियों को दूर रखना चाहिए। कुछ लोग धीरे-धीरे पीछे हटने लगे। मालती को चोट लगी, मगर उसने ठेला बंद नहीं किया।
एक दिन दोपहर में तेज बारिश आई। सड़क खाली हो गई। मालती ने सोचा आज घाटा होगा। तभी अरुण भीगा हुआ आया। उसके हाथ में परीक्षा का फॉर्म था और चेहरे पर डर। फॉर्म भरने की अंतिम तारीख थी, फीस कम पड़ रही थी। उसने कहने की कोशिश की, लेकिन शब्द नहीं निकले। मालती ने उसकी आंखें पढ़ लीं। उसने दिन भर की कमाई में से ₹500 निकाले और उसके हाथ में रख दिए। अरुण घबरा गया। उसने कहा कि दीदी, यह पैसे वापस कर दूंगा। मालती ने बस इतना कहा कि जब पास हो जाना, तब किसी और भूखे को खिला देना।
उस रात श्यामलाल ने मालती से पूछा कि घर का राशन कैसे आएगा। मालती ने झूठ बोला कि एक ग्राहक ने कल का ऑर्डर दिया है। असल में उस रात उसने खुद चावल में पानी मिलाकर खाया और श्यामलाल के लिए आखिरी दाल बचा दी।
अरुण ने परीक्षा दी। फिर वह शहर से चला गया। जाते समय उसने मालती के पैर छुए और कहा कि अगर लौटकर आया तो खाली हाथ नहीं आऊंगा। मालती ने उसके सिर पर हाथ रखा और हंसकर कहा कि पहले पास हो जा, फिर बड़ी-बड़ी बातें करना। उसकी आंखें भीग गई थीं, लेकिन उसने आंसू पोंछ लिए। उस दिन के बाद अरुण लंबे समय तक नहीं आया।
1 साल बीता, फिर 2 साल, फिर 3 साल। मालती ने समझ लिया कि शायद अरुण गांव लौट गया होगा या किसी नौकरी में कहीं दूर चला गया होगा। मगर वह उसे भूल नहीं पाई। जब भी कोई कमजोर छात्र ₹10 लेकर आता, वह थाली भर देती। लोग कहते कि इससे क्या मिलेगा। वह कहती कि राघव होता तो यही करता।
इधर सुरेश और कमला की हालत बदलने लगी। जिस दुकानदार को जगह दिलाने का सपना उन्होंने देखा था, उसने कोई और दुकान ले ली। नकली कागज का खेल अधर में रह गया। मगर सुरेश अब भी मालती को चैन से नहीं रहने देता था। एक सुबह वह 2 कर्मचारियों और एक जेसीबी जैसी मशीन लेकर आया। उसने कहा कि आज ठेला हटेगा। नगर निगम की अंतिम कार्रवाई है। मालती ठेले के सामने खड़ी हो गई। श्यामलाल लाठी टेकते हुए उसके साथ आ गए। भीड़ जमा हो गई, मगर कोई अधिकारी से भिड़ना नहीं चाहता था।
मालती ने कड़ाही के पास खड़े होकर कहा कि यह ठेला सिर्फ लोहे और लकड़ी का नहीं है। इसमें उस आदमी की मेहनत है जिसने मरते दम तक गरीबों को सस्ता खाना खिलाया। सुरेश हंसा और बोला कि कहानी सुनाकर कानून नहीं बदलता। कर्मचारी आगे बढ़े ही थे कि सड़क पर एक सफेद सरकारी गाड़ी रुकी। उसके पीछे 2 और गाड़ियां थीं। पुलिस का सिपाही उतरा और पिछला दरवाजा खोला।
गाड़ी से अरुण उतरा।
अब वह वही दुबला लड़का नहीं था। सादी लेकिन साफ इस्त्री की हुई खादी की कमीज, सीधी चाल, आंखों में वही नम्रता लेकिन चेहरे पर अधिकार। लोग फुसफुसाने लगे कि यह नए जिलाधिकारी अरुण वर्मा हैं। मालती कुछ पल उसे पहचान ही नहीं पाई। अरुण सीधे उसके पास आया, झुका और सबके सामने उसके पैर छू लिए। मालती के हाथ अपने आप उसके सिर पर चले गए। वह कुछ बोलती, उससे पहले भीड़ में सन्नाटा फैल गया।
सुरेश का चेहरा पीला पड़ गया। अरुण ने खड़े होकर पूछा कि किस आदेश से यह ठेला हटाया जा रहा है। कर्मचारी कागज दिखाने लगे। अरुण ने एक-एक पन्ना देखा। फिर उसने सुरेश की तरफ देखा और कहा कि शिकायत निजी दुश्मनी से की गई है, कागज अधूरे हैं और जिस संपत्ति के दावे की बात हो रही है, उसके हस्ताक्षर संदिग्ध हैं। उसने अपने साथ आए अधिकारी को राघव की डायरी और नकली कागज जांच के लिए लेने को कहा।
सुरेश हकलाने लगा कि यह घर का मामला है। अरुण की आवाज सख्त हो गई। उसने कहा कि जब भूखे लोगों का ठेला हटाने के लिए सरकारी दफ्तर का इस्तेमाल किया जाए, तब घर का मामला जनता का मामला बन जाता है। कमला भीड़ में सिर झुकाकर खड़ी थी। पहली बार मोहल्ले ने देखा कि झूठा गर्व कैसे पिघलता है।
कुछ दिनों में जांच हुई। पता चला कि कागज पर राघव के हस्ताक्षर की नकल की गई थी। गवाह के नाम पर जिस आदमी की मुहर लगी थी, वह 2 साल पहले ही मर चुका था। सुरेश पर मामला दर्ज हुआ। मालती ने जेल भेजने की जिद नहीं की। उसने बस इतना कहा कि वह श्यामलाल के सामने माफी मांगे और आगे कभी ठेले पर दावा न करे। सुरेश रो पड़ा। उसे शायद पहली बार समझ आया कि जिस बहू को वह कमजोर समझता था, उसी ने उसकी इज्जत पूरी तरह मिटाने के बजाय बचा ली।
लेकिन अरुण सिर्फ कागज बचाने नहीं आया था। उसने मालती को जिला कार्यालय बुलाया। बड़ा कमरा, चमकती मेज, कुर्सियों पर बैठे अधिकारी, दीवार पर राष्ट्रचिह्न। मालती घबराकर दरवाजे पर ही ठिठक गई। श्यामलाल ने धीरे से कहा कि बहू, अंदर चल, आज राघव देख रहा होगा।
अरुण ने सबके सामने घोषणा की कि बस अड्डे के पास गरीब यात्रियों, मजदूरों और छात्रों के लिए एक जन-रसोई शुरू की जाएगी। उसका संचालन मालती करेगी। सरकार जगह देगी, साफ पानी, बैठने की व्यवस्था, गैस, बर्तन और 2 सहायकों का खर्च देगी। थाली ₹10 की होगी, और स्वाद वही रहेगा जो कभी एक छोटे ठेले पर मिलता था। नाम रखा जाएगा राघव अन्न सेवा केंद्र।
मालती सुनती रही। उसके होंठ कांपे, मगर आवाज नहीं निकली। उसे लगा जैसे राघव कड़ाही के उस पार खड़ा मुस्कुरा रहा हो। अरुण ने धीरे से कहा कि दीदी, आपने मुझे ₹10 में सिर्फ खाना नहीं दिया था। आपने मुझे यह यकीन दिया था कि गरीब आदमी भी सम्मान से खा सकता है। अगर उस शाम आपने सूखे चावल के साथ अपने घर की दाल न दी होती, तो शायद मैं अगले दिन परीक्षा देने ही नहीं जाता।
मालती रो पड़ी। उसने अरुण के सिर पर हाथ रखा, जैसे 3 साल पहले रखा था। फिर अचानक उसने आंचल से आंखें पोंछीं और बोली कि इतना बड़ा अफसर बन गया, पर हिसाब अभी बाकी है। सब लोग चौंक गए। अरुण भी घबरा गया। मालती ने कहा कि उस दिन की थाली ₹10 की थी, आज ब्याज लगाकर ₹30 दे। मेरे ठेले की थाली मुफ्त में कोई नहीं खाता।
कमरे में हंसी फूट पड़ी। अरुण ने जेब से ₹30 निकाले, दोनों हाथों से मालती को दिए और झुक गया। मालती ने पैसे लिए, माथे से लगाए और बोली कि अब ठीक है, अब राघव को भी चैन मिलेगा।
कुछ महीने बाद राघव अन्न सेवा केंद्र खुला। पहले दिन लंबी लाइन लगी। मजदूर, छात्र, रिक्शेवाले, अस्पताल के मरीजों के परिजन, सब आए। दीवार पर राघव की एक छोटी सी तस्वीर लगी थी। उसके नीचे लिखा था कि भूखे को खाना देना सबसे बड़ा धर्म है। मालती कड़ाही के पास खड़ी थी, अब सफेद साड़ी में भी उसका चेहरा बुझा हुआ नहीं था। श्यामलाल कुर्सी पर बैठे आने वालों को पानी पिला रहे थे। अरुण बिना किसी तामझाम के लाइन में खड़ा हुआ और ₹10 की थाली ली।
मालती ने उसकी थाली में कढ़ी थोड़ी ज्यादा डाली। अरुण मुस्कुराया। उसने पहला निवाला खाया तो उसकी आंखें भर आईं। मालती ने पूछा कि नमक ठीक है या नहीं। अरुण ने सिर झुकाकर कहा कि दीदी, इसमें नमक नहीं, किसी मां का आशीर्वाद है।
उस शाम जब केंद्र बंद हुआ, मालती ने आखिरी बची कढ़ी एक छोटे कटोरे में निकाली और राघव की तस्वीर के सामने रख दी। बाहर बस अड्डे की भीड़ धीरे-धीरे कम हो रही थी। भीतर चूल्हे की आखिरी आंच चमक रही थी। मालती ने तस्वीर को देखकर धीमे से कहा कि तुम कहते थे न, ठेला सेवा है। देखो, तुम्हारा ठेला अब रुकने वाला नहीं।
और उस रात शांति नगर में पहली बार लोगों ने मालती को विधवा नहीं, राघव की अधूरी करुणा को पूरा करने वाली औरत कहा।
