
PART 1
“अगर ये दोनों बच्चियाँ फिर से आँख खोल दें, तो आज रात उस हवेली से कोई न कोई हथकड़ी पहनकर ही निकलेगा।”
डॉ. नीरज अवस्थी की भारी आवाज़ दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल के पोस्टमार्टम कक्ष में गूँज उठी। बाहर बरसात की हल्की बूँदें शीशे पर पड़ रही थीं, और अंदर स्टील की 2 ठंडी मेज़ों पर 10 साल की जुड़वाँ बहनें लेटी थीं—सान्वी और मीरा राजवंशी।
कागज़ों में लिखा था कि दोनों की मौत वसंत विहार की एक बड़ी कोठी में रात को सोते समय साँस रुकने से हुई। परिवार ने बताया था कि बच्चियाँ कई दिनों से बीमार थीं। निजी डॉक्टर ने मृत्यु प्रमाण पत्र भी बना दिया था। पुलिस सिर्फ औपचारिक जाँच के लिए शव लाई थी।
लेकिन डॉ. नीरज को कुछ भी औपचारिक नहीं लग रहा था।
इतनी कम उम्र की 2 बच्चियाँ। एक जैसी चोटी। एक जैसे गुलाबी कुर्ते। हथेलियाँ पेट पर रखी हुईं। चेहरे ऐसे शांत जैसे अभी स्कूल की बस छूटने से पहले माँ की आवाज़ सुनकर उठ जाएँगी।
उनके साथ खड़ी जूनियर डॉक्टर रिया माथुर पहली बार ऐसे केस में मौजूद थी। उसने फाइल पकड़ी हुई थी, पर उसकी नज़र बार-बार बच्चियों के चेहरों पर जा रही थी।
तभी रिया अचानक पीछे हट गई।
“सर… आपने सुना?”
डॉ. नीरज ने चश्मे के ऊपर से देखा।
“क्या?”
रिया का गला सूख गया।
“हँसी… जैसे किसी छोटी बच्ची की हँसी।”
कमरे में सन्नाटा था। सिर्फ एग्जॉस्ट फैन की घरघराहट और धातु की ट्रे की हल्की खनक।
नीरज ने गहरी साँस ली। वह 28 साल से सरकारी अस्पताल में पोस्टमार्टम कर रहे थे। उन्होंने अमीर घरों की झूठी कहानियाँ देखी थीं, गरीबों की मजबूरियाँ देखी थीं, दहेज, ज़मीन, बीमा, विरासत—हर रिश्ते के पीछे छिपी क्रूरता देखी थी।
“रिया, डर में दिमाग आवाज़ें बना लेता है। खुद को संभालो।”
रिया ने सिर हिलाया, पर उसका हाथ काँप रहा था।
फाइल में लिखा था—संभावित खाद्य विषाक्तता। पुलिस ने बच्चियों के कमरे से चाँदी के ढक्कन वाली 2 प्यालियाँ और एक छोटा काँच का शीशी जैसा डिब्बा बरामद किया था, जिसमें गुलाबी रंग का थोड़ा तरल बचा था।
“बाहर से कुछ नहीं आया,” नीरज ने धीरे कहा, “जो हुआ है, उसी घर के अंदर हुआ है।”
रिया ने होंठ भींच लिए।
“तो किसी ने इन्हें मारने की कोशिश की?”
नीरज ने जवाब नहीं दिया। उन्होंने दस्ताने पहने, स्टेथोस्कोप उठाया, फिर सान्वी की ओर झुके। कमरे की ठंड जैसे अचानक और बढ़ गई।
जैसे ही उन्होंने उसके सीने के पास हाथ बढ़ाया, रिया चीख उठी।
“सर, हाथ हिला!”
नीरज ने तीखी नज़र से देखा।
“शरीर में मृत्यु के बाद हल्की प्रतिक्रिया हो सकती है।”
“नहीं सर,” रिया लगभग रो पड़ी, “उसने मेरी उँगली पकड़ी।”
नीरज झुँझलाए, पर अगले ही पल उनका चेहरा बदल गया। उन्होंने सान्वी की गर्दन पर 2 उँगलियाँ रखीं। फिर झुककर उसके सीने पर कान लगाया।
एक धड़कन।
बहुत धीमी।
बहुत कमजोर।
लेकिन धड़कन थी।
सान्वी के होंठों से एक हल्की, टूटी हुई हँसी निकली, जैसे कोई बच्ची अधूरे सपने में अपनी बहन को पुकार रही हो।
रिया दीवार पकड़कर खड़ी रह गई।
“सर… ये जिंदा है।”
नीरज तुरंत मीरा की ओर भागे। उसकी पलकों में हल्का कंपन था। नाड़ी वहाँ भी थी। साँस इतनी धीमी कि मशीन के बिना पता ही न चले।
“अभी इमरजेंसी टीम बुलाओ!” नीरज गरजे। “पुलिस को रोको। कोई शव रिलीज नहीं होगा। मजिस्ट्रेट को फोन करो। तुरंत!”
रिया भागी, पर तभी नीरज की नज़र दोनों बच्चियों की कलाई पर गई। दोनों ने धागे से बनी छोटी-छोटी कंगन जैसी गाँठें बाँध रखी थीं। जैसे किसी ने डर में खुद को याद दिलाने के लिए उन्हें बाँधा हो।
सान्वी की कलाई पर नीली स्याही से एक शब्द लिखा था—
“माँ।”
नीरज का दिल एक पल को थम गया।
क्योंकि मृत घोषित की गई 2 बच्चियाँ सिर्फ जिंदा नहीं थीं।
वे किसी को सच बताने के लिए मौत से वापस लौट रही थीं।
PART 2
3 हफ्ते पहले वही हँसी वसंत विहार की राजवंशी कोठी के लॉन में गूँज रही थी। मानसून की दोपहर थी। आम के पेड़ के नीचे सफेद कुर्सियाँ लगी थीं, नौकर चाय और समोसे परोस रहे थे, और बिल्डर अरविंद राजवंशी अपनी बेटियों सान्वी और मीरा को बारिश में भीगते हुए देखकर मुस्कुरा रहा था।
उनकी माँ नंदिता की मौत 2 साल पहले जयपुर हाईवे पर हुई थी। अरविंद उस दिन से अपराधबोध में जी रहा था। फिर काव्या उसके जीवन में आई—मीठी बोली, सलीकेदार साड़ी, और सबके सामने बच्चियों पर झूठा ममता भरा हाथ।
लेकिन उसी दिन मीरा की फेंकी पानी की बाल्टी गलती से काव्या पर गिर गई। उसकी महँगी साड़ी भीग गई, मेहमान चुप हो गए।
काव्या मुस्कुराई।
“बच्चियाँ हैं, अरविंद। जाने दो।”
पर कमरे में जाते ही उसने दरवाज़ा पटक दिया।
“मैं इन दोनों से तंग आ गई हूँ, माँ।”
उसकी माँ शकुंतला पलंग पर बैठी पान चबा रही थी।
“धीरे बोल। दीवारों के भी कान होते हैं।”
काव्या की आँखें जल रही थीं।
“सब कुछ इन्हीं के नाम जाएगा। कोठी, कंपनी, नंदिता का ट्रस्ट। मैं इस घर में रहकर भी पराई रहूँगी।”
शकुंतला ने ठंडी आवाज़ में कहा।
“तो इंतज़ार मत कर।”
कुछ दिनों बाद सान्वी बीमार पड़ने लगी। कभी बुखार, कभी उल्टी, कभी कमजोरी। डॉक्टर कारण नहीं पकड़ पा रहे थे। काव्या सबके सामने रोती, अकेले में मुस्कुराती।
मीरा बहन का हाथ नहीं छोड़ती थी।
एक शाम शकुंतला ने सान्वी के लिए खीर भेजी। सान्वी ने कटोरी दूर कर दी।
“मुझे इन लोगों का दिया कुछ नहीं खाना।”
मीरा बोली।
“मैं पहले खाती हूँ। फिर तू खाना।”
10 मिनट बाद मीरा जमीन पर गिर पड़ी।
उसी रात दोनों बहनों ने रसोई के बाहर काव्या और शकुंतला की आवाज़ सुनी।
“कल सान्वी खत्म,” शकुंतला बोली। “मीरा तो बहन के दुख में खुद चली जाएगी। किसी को शक नहीं होगा।”
सान्वी ने मीरा का मुँह दबा दिया।
अगले दिन उन्होंने शकुंतला की नींद वाली बूंदों की शीशी बदल दी और असली ज़हर मंदिर की फूलदानी के पीछे छिपा दिया।
रात को काव्या 2 प्यालियाँ लेकर आई।
“मेरी बेटियाँ, ये पी लो। आराम से नींद आएगी।”
दोनों ने पीने का नाटक किया।
थोड़ी देर बाद उनकी साँसें इतनी धीमी हो गईं कि अरविंद की चीख पूरी कोठी में फैल गई।
लेकिन काव्या ने खाली शीशी देख ली।
और पहली बार उसे समझ आया कि बच्चियाँ मरने से पहले सच जान चुकी थीं।
PART 3
सफदरजंग अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में उस रात कोई भी सामान्य तरीके से साँस नहीं ले पा रहा था। मृत घोषित की गई 2 बच्चियाँ अब मशीनों से जुड़ी थीं, डॉक्टरों की टीम उनके शरीर को गरम कर रही थी, पुलिस बाहर पहरा दे रही थी, और डॉ. नीरज अवस्थी बार-बार वही बात दोहरा रहे थे—
“इन दोनों को पोस्टमार्टम टेबल तक जिंदा लाया गया था। इसका मतलब है या तो किसी ने जल्दबाजी में मौत मान ली, या किसी ने चाहता था कि ये सच बोलने से पहले काट दी जाएँ।”
रिया खामोश खड़ी थी। उसकी आँखें सान्वी की कलाई पर लिखे शब्द से हट नहीं रही थीं।
“माँ।”
जब बच्चियों की हालत थोड़ी स्थिर हुई, नीरज उनके पास गए। सान्वी की पलकें भारी थीं। मीरा का हाथ अपनी बहन की उँगलियों में फँसा हुआ था।
“बेटा,” नीरज ने बहुत नरम आवाज़ में पूछा, “तुम दोनों ने कलाई पर माँ क्यों लिखा?”
सान्वी की आँखों से आँसू निकलकर तकिए पर गिर गए।
“मम्मी कहती थीं… डर लगे तो एक-दूसरे का हाथ पकड़ना… और याद रखना कि माँ कहीं नहीं गई।”
मीरा ने टूटी आवाज़ में कहा।
“हम मरना नहीं चाहती थीं, अंकल। हमें पापा को बचाना था।”
नीरज के गले में जैसे काँटा अटक गया।
“पापा को?”
सान्वी ने मुश्किल से सिर हिलाया।
“काव्या आंटी कह रही थीं कि पापा को भी धीरे-धीरे दवाई देंगी। फिर सब उनके नाम हो जाएगा।”
रिया ने तुरंत यह बात नोट की। बाहर खड़े इंस्पेक्टर देशमुख ने वायरलेस पर संदेश भेजा। केस अब हादसा नहीं रहा था। यह हत्या की कोशिश, साजिश और संपत्ति के लिए अपराध का मामला था।
उसी समय वसंत विहार की कोठी में अरविंद राजवंशी टूट चुका था। ड्राइंग रूम में सफेद चादरें पड़ी थीं। रिश्तेदार आकर रो चुके थे। पड़ोसी धीमी आवाज़ में बातें कर रहे थे। किसी ने कहा, “बेचारा अरविंद, दूसरी शादी के बाद भी सुख नहीं मिला।” किसी ने कहा, “सौतेली माँ तो बहुत सेवा करती दिखती थी।”
काव्या सीढ़ियों के पास बैठी थी, पर उसकी आँखों में आँसू नहीं थे। सिर्फ डर था। उसकी माँ शकुंतला बार-बार अलमारी खोलकर गहने, नकद पैसे और पासपोर्ट बैग में रख रही थी।
“माँ, पुलिस वापस आएगी,” काव्या फुसफुसाई। “डॉक्टर ने शव रोक लिया तो?”
शकुंतला ने उसे घूरा।
“चुप रह। बच्चों की मौत पर डॉक्टर ज्यादा देर सवाल नहीं करता। अमीर घर है, कागज़ बन चुके हैं।”
“लेकिन खाली शीशी…”
“वो नींद की बूंदों वाली थी। असली चीज़ मैंने संभाल रखी है।”
काव्या ने माथा पकड़ लिया।
“उन दोनों ने हमें सुन लिया था। मीरा ने मुझे ऐसे देखा था जैसे सब जानती हो।”
शकुंतला की आवाज़ कड़वी हो गई।
“देखने से क्या होता है? मरी हुई बच्चियाँ गवाही नहीं देतीं।”
इतने में मुख्य दरवाज़े पर ज़ोर से दस्तक हुई।
अरविंद, जो पूजा के कमरे में नंदिता की तस्वीर के सामने बैठा था, लड़खड़ाते हुए उठा। उसकी आँखें सूजी थीं, चेहरे पर 1 रात में जैसे 10 साल उतर आए थे। काव्या दौड़कर उसके पास आई।
“मत खोलिए, अरविंद। आप टूट जाएँगे। पुलिस फिर परेशान करेगी।”
अरविंद ने पहली बार उसे दूर किया।
“मेरी बेटियाँ गई हैं। अब मुझसे बचाने को कुछ बचा नहीं।”
दरवाज़ा खुला।
बाहर खड़े दृश्य ने पूरे घर की साँस रोक दी।
सफेद एम्बुलेंस की रोशनी बरसात में चमक रही थी। 2 महिला पैरामेडिक्स के बीच सान्वी और मीरा खड़ी थीं—कमजोर, पीली, कंबल में लिपटी, मगर जिंदा।
अरविंद का शरीर जैसे बेजान हो गया। वह दरवाज़े की चौखट पकड़कर नीचे बैठ गया।
“नहीं… ये सपना है…”
मीरा ने काँपते हुए कहा।
“पापा…”
बस इतना सुनते ही अरविंद घुटनों के बल रेंगता हुआ उनके पास पहुँचा। उसने दोनों बेटियों को बाँहों में भर लिया और ऐसा रोया जैसे उसके भीतर का सारा पिता देर से जागा हो।
“मुझे माफ कर दो। मेरी बच्चियों, मुझे माफ कर दो। मैं तुम्हारी आँखों का डर क्यों नहीं पढ़ पाया? मैं काव्या की बातों में क्यों अंधा हो गया?”
सान्वी ने उसका कुर्ता पकड़ लिया।
“हमने बहुत बार कहा था कि हमें उनसे डर लगता है।”
अरविंद की आँखों में शर्म चुभ गई। उसे याद आया—सान्वी का रात को उसके कमरे में आकर कहना कि खीर अजीब लगती है। मीरा का काव्या के सामने चुप हो जाना। दोनों का अचानक खाना छोड़ देना। हर बार उसने कहा था—“नई माँ से घुलने में समय लगता है।”
उसने अपनी ही बेटियों के डर को जिद समझ लिया था।
काव्या पीछे हट गई। उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था।
“ये झूठ है। ये बच्चियाँ सदमे में हैं। इन्हें कुछ पता नहीं।”
इंस्पेक्टर देशमुख अंदर आए। उनके साथ डॉ. नीरज, रिया और 2 महिला कॉन्स्टेबल थीं।
नीरज ने फाइल खोली।
“इन बच्चियों के शरीर में ऐसी दवा के अंश मिले हैं जिससे नाड़ी और साँस बेहद धीमी हो सकती है। इसी कारण इन्हें मृत समझ लिया गया। लेकिन घर से मिली चीज़ों की प्राथमिक जाँच में दूसरी जहरीली चीज़ के अंश भी मिले हैं—खीर की कटोरी, अधधुली प्यालियाँ और मंदिर के पीछे छिपी शीशी में।”
काव्या ने चीखकर कहा।
“मुझे फँसाया जा रहा है!”
रिया आगे बढ़ी। उसके हाथ में सीलबंद छोटा पैकेट था।
“सान्वी और मीरा ने अपनी कलाई पर जो धागे बाँधे थे, उनमें से एक गाँठ में ये छोटा कागज़ मिला। शायद इन्होंने डर में छिपाया था।”
कागज़ पर बच्चियों की लिखावट थी—
“काव्या आंटी और नानी हमें दवाई देकर मारना चाहती हैं। पापा, अगर हम न उठें तो माँ की फोटो के पीछे देखना।”
अरविंद ने काँपते हाथों से कागज़ लिया। वह पढ़ नहीं पा रहा था। अक्षर धुंधले हो गए थे।
इंस्पेक्टर ने पूछा।
“माँ की फोटो कहाँ है?”
पूजा कक्ष में नंदिता की बड़ी तस्वीर टँगी थी, जिसके नीचे फूल मुरझा चुके थे। पुलिस ने तस्वीर हटाई। पीछे दीवार में बने छोटे गुप्त खाने में एक पुराना मोबाइल मिला। वह नंदिता का था, जिसे अरविंद ने याद के तौर पर रखा था। बच्चियों ने शायद उसका वॉइस रिकॉर्डर चलाना सीख लिया था।
रिया ने मोबाइल चालू किया। बैटरी कम थी, पर एक रिकॉर्डिंग चल गई।
शकुंतला की आवाज़ साफ सुनाई दी—
“धीरे-धीरे देना। पहले कमजोरी आएगी, फिर सब कहेंगे बीमारी है। जब दोनों हट जाएँगी तो ट्रस्ट पर कोई दावा नहीं रहेगा।”
फिर काव्या की आवाज़—
“अरविंद को कुछ पता नहीं चलेगा। वह मेरे आँसू देखकर सब मान लेता है।”
कमरे में खड़े हर इंसान ने अरविंद की ओर देखा। वह पत्थर की तरह खड़ा था। एक पिता का भरोसा उसी घर की दीवारों पर टूट रहा था, जिसे उसने बेटियों के लिए सुरक्षित समझा था।
काव्या ने भागने की कोशिश की, पर महिला कॉन्स्टेबल ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“छोड़ो मुझे! सब मेरी माँ ने किया है। मैंने किसी को नहीं मारा!”
शकुंतला अचानक अपने कमरे से बाहर निकली। उसका चेहरा पसीने से भीगा था। हाथ में वही छोटी शीशी थी जिसे वह घबराहट में अपनी नींद की दवा समझकर पी चुकी थी।
“काव्या…” उसकी आवाज़ फट गई, “ये… ये कौन सी शीशी थी?”
काव्या की आँखें फैल गईं।
“माँ, आपने क्या पी लिया?”
शकुंतला के होंठ नीले पड़ने लगे। वह अपना गला पकड़कर मार्बल के फर्श पर गिर पड़ी। उसके मुँह से झाग निकलने लगा। घर में अफरा-तफरी मच गई।
डॉ. नीरज तुरंत झुके, पैरामेडिक्स ने बैग खोला, पर नीरज का चेहरा बता रहा था कि सच किसी अदालत से पहले ही अपना फैसला लिख चुका था।
जिस ज़हर से 2 बच्चियों की साँस छीनने की योजना बनी थी, वही घबराहट में शकुंतला के भीतर उतर चुका था।
काव्या चीखती रही।
“माँ! माँ! उठो! मैंने ऐसा नहीं चाहा था!”
सान्वी ने मीरा की आँखें ढक दीं। मीरा ने बहन का हाथ और कसकर पकड़ लिया।
इंस्पेक्टर देशमुख ने काव्या को हथकड़ी पहनाई। इस बार उसकी चीखों में न आँसू थे, न पछतावा—सिर्फ अपना बचा हुआ जीवन छिनने का डर।
“मैंने सब अरविंद के लिए किया! मैं इस घर में जगह चाहती थी!”
अरविंद ने पहली बार उसकी ओर देखा। उसकी आवाज़ बेहद धीमी थी, मगर उसमें ऐसा टूटना था जो किसी अदालत की सजा से भारी था।
“जगह माँगती तो शायद मिल जाती। मेरी बेटियों की साँसें छीनकर तूने इस घर में अपनी परछाई तक की जगह खो दी।”
पुलिस काव्या को ले गई। शकुंतला को अस्पताल ले जाया गया, पर वह रास्ते में ही मर गई। उसके खिलाफ मुकदमा बंद नहीं हुआ; वह केस फाइल में अपराध की जड़ बनकर दर्ज रही। काव्या पर हत्या की कोशिश, आपराधिक साजिश, नाबालिगों को ज़हर देने और धोखाधड़ी के आरोप लगे। निजी डॉक्टर, जिसने बिना पूरी जाँच मौत का प्रमाण पत्र बनाया था, निलंबित हुआ। घर के 2 कर्मचारियों ने बयान दिया कि काव्या अक्सर बच्चियों का खाना खुद कमरे में ले जाती थी।
अरविंद ने उसी रात काव्या का कमरा बंद कर दिया। अगले दिन उसने अदालत में बच्चियों की सुरक्षा के लिए आवेदन दिया और नंदिता के नाम बने ट्रस्ट को फिर से सक्रिय कराया। सारी संपत्ति सान्वी और मीरा की शिक्षा, देखभाल और भविष्य के लिए कानूनी निगरानी में रखी गई।
लेकिन असली इलाज कागज़ों से नहीं हुआ।
कई महीनों तक सान्वी रात में चीखकर उठती। मीरा खाना खाने से पहले हर निवाला सूँघती। अरविंद उनके कमरे के बाहर फर्श पर सोता, क्योंकि दोनों चाहती थीं कि दरवाज़ा खुला रहे। वह हर सुबह खुद उनके लिए दूध गरम करता, हर शाम स्कूल से लेने जाता, हर रविवार उन्हें इंडिया गेट नहीं, बल्कि नंदिता की यादों वाली छोटी-सी झील के पास ले जाता जहाँ उनकी माँ उन्हें बतखें दिखाने ले जाती थी।
एक दिन सान्वी ने उससे पूछा।
“पापा, आपने हमारी बात पहले क्यों नहीं मानी?”
अरविंद के पास कोई बचाव नहीं था। उसने सिर्फ सिर झुका दिया।
“क्योंकि मैं अकेलेपन से इतना डर गया था कि तुम्हारे डर को देख ही नहीं पाया।”
मीरा ने धीमे से पूछा।
“अब देखोगे?”
अरविंद रो पड़ा।
“अब तुम्हारी साँस भी बदल जाएगी तो मैं सुनूँगा।”
वक्त लगा, पर घर की हवा बदलने लगी। कोठी से झूठी चमक हट गई। बड़े-बड़े पार्टियों की जगह छोटी-छोटी शामें आईं। रसोई में अब बच्चियों की पसंद से पराठे बनते। पूजा कक्ष में नंदिता की तस्वीर के सामने हर दिन फूल रखे जाते। अरविंद ने तस्वीर के पीछे अब कोई रहस्य नहीं रखा, सिर्फ एक छोटा कागज़ चिपका दिया—
“बच्चों की बात को कभी कल्पना मत समझना।”
6 महीने बाद सान्वी और मीरा पहली बार स्कूल लौटीं। बच्चे उन्हें देखकर फुसफुसाए, कुछ डर गए, कुछ रो पड़े। उनकी क्लास टीचर ने उन्हें गले लगाया। सान्वी ने मीरा का हाथ पकड़े रखा, पर इस बार वह काँप नहीं रही थी।
स्कूल से लौटते हुए अरविंद उन्हें लोधी रोड के श्मशान के पास बने स्मृति स्थल पर ले गया, जहाँ नंदिता की अस्थियों के बाद एक छोटा-सा पत्थर लगाया गया था। दोनों बच्चियों ने वहाँ 2 नए धागे रखे। उन पर नीली स्याही से वही शब्द लिखा था—
“माँ।”
मीरा ने पत्थर को छूकर कहा।
“हमने हार नहीं मानी।”
सान्वी ने बहन की हथेली दबाई।
“क्योंकि माँ ने कहा था, हम अकेली नहीं हैं।”
अरविंद पीछे खड़ा था। उसे लगा जैसे उस दिन पहली बार नंदिता ने उसे माफ नहीं किया, बल्कि चेतावनी दी हो—पिता होना सिर्फ बच्चों को महँगे स्कूल भेजना नहीं, उनके डर की आवाज़ पहचानना भी है।
दिल्ली में यह मामला जब अखबारों और टीवी चैनलों पर आया, तो लोग कई दिनों तक बहस करते रहे। किसी ने सौतेली माँ की क्रूरता को दोष दिया, किसी ने विरासत के लालच को, किसी ने अमीर घरों की चुप्पी को। लेकिन सबसे ज्यादा सवाल अरविंद जैसे माता-पिता पर उठा।
क्योंकि कई बार बच्चे झूठ नहीं बोलते।
वे बस इतने छोटे होते हैं कि बड़े लोग उनकी सच्चाई को जिद समझ लेते हैं।
और उस रात पोस्टमार्टम कक्ष में सुनाई दी वह हल्की-सी हँसी सिर्फ 2 बच्चियों की वापसी नहीं थी।
वह हर उस बच्चे की आवाज़ थी, जो अंधे भरोसे, चुप घरों और नकली ममता के बीच कहीं दबा हुआ इंतज़ार कर रहा है कि कोई बड़ा एक बार सचमुच उसकी नब्ज़ टटोलकर कहे—
“ये अभी जिंदा है। इसे बचाया जा सकता है।”
