
PART 1
—अभी कर दो, नंदिता के होश में आने से पहले। अगर रिया को पता चल गया कि उसका बच्चा नहीं, हमारा बेटा बिल्कुल स्वस्थ पैदा हुआ है, तो वह हमेशा के लिए टूट जाएगी।
यही वाक्य नंदिता ने अपने बेटे को जन्म देने के कुछ ही मिनट बाद सुना था।
दिल्ली के एक महंगे निजी अस्पताल की रिकवरी यूनिट में उसका शरीर ऑपरेशन के दर्द से सुन्न पड़ा था, पेट पर टांकों की जलन थी, आंखें भारी थीं, लेकिन कान अभी भी जाग रहे थे। बाहर सावन की हल्की बारिश शीशों पर गिर रही थी और कमरे में दूध, दवा और ताजे फूलों की मिली-जुली गंध थी।
नंदिता शर्मा ने 7 साल तक मां बनने का इंतजार किया था। हर महीने उम्मीद, हर महीने टूटना। मंदिरों में मन्नतें, डॉक्टरों की फाइलें, हार्मोन इंजेक्शन, रिश्तेदारों के ताने, सास की ठंडी नजरें और पति अर्जुन मल्होत्रा का वही वाक्य—“एक वारिस चाहिए, नंदिता। पापा की फैक्टरी, घर, नाम… सबको आगे ले जाने वाला कोई तो होना चाहिए।”
मल्होत्रा परिवार में बेटा सिर्फ बच्चा नहीं था, वंश की मुहर था।
जब ऑपरेशन थिएटर में पहली बार बच्चे की रोने की आवाज गूंजी, नंदिता की पलकों से आंसू बह निकले। डॉक्टर ने मुस्कुराकर कहा था कि बच्चा स्वस्थ है। अर्जुन ने उसके माथे को चूमा, आंखें लाल थीं, आवाज कांप रही थी।
—नंदू, हमारा बेटा बिल्कुल ठीक है। बस आराम करो। तुम्हें नींद की दवा दी जा रही है।
नंदिता ने उसकी उंगलियां पकड़ ली थीं। उस क्षण उसे लगा था कि इतने सालों की जिल्लत, इलाज और चुप्पी का दर्द आज खत्म हो गया।
लेकिन जैसे ही दवा नसों में फैलने लगी, कमरे के पास से आवाजें साफ सुनाई देने लगीं। अर्जुन किसी से धीमी आवाज में बात कर रहा था। वह आवाज नंदिता के बड़े भाई करण की थी।
करण, जिसने बचपन से उसकी रक्षा करने की कसम खाई थी।
—अर्जुन, यह पागलपन है। वह बच्चा अभी पैदा हुआ है।
अर्जुन की आवाज बर्फ जैसी थी।
—सिर्फ एक निशान चाहिए, करण। रिया की बेटी की पीठ पर काला जन्मचिह्न है। वह रो-रोकर बेहाल है। अगर नंदिता एक बिल्कुल स्वस्थ बेटे के साथ जागी, तो रिया मर जाएगी अंदर से। वह बचपन से सब हारती आई है।
रिया नंदिता की गोद ली हुई छोटी बहन थी। घर में आई तो सबने उसे दया से अपनाया, लेकिन धीरे-धीरे दया ईर्ष्या में बदल गई। रिया को हमेशा लगता था कि नंदिता ने उससे घर, मां-बाप का स्नेह, पढ़ाई, गहने और आखिर में अर्जुन भी छीन लिया। शादी से पहले रिया अर्जुन को पसंद करती थी, यह बात पूरे परिवार को पता थी, पर किसी ने कभी खुलकर स्वीकार नहीं किया।
नंदिता की पलकों के पीछे अंधेरा घिरने लगा, लेकिन भीतर डर जाग उठा।
—नहीं कर सकता मैं —करण फुसफुसाया— यह बच्चा है, खिलौना नहीं।
—तो कम से कम बदल दो। रिया की बच्ची को यहां रख दो। नंदिता को बोल देंगे कि उसकी संतान में जन्म से दोष है। कागज तैयार हैं। डिस्चार्ज के बाद सब संभल जाएगा।
नंदिता ने चीखना चाहा। गला सूखा था। हाथों में लगी सुई पत्थर जैसी भारी लग रही थी।
तभी उसके नवजात बेटे की तेज रोने की आवाज आई। पहले वाली नन्ही पुकार नहीं, दर्द से फटी हुई चीख।
उसका दिल सीने में धंस गया।
कुछ पल बाद करण की टूटी आवाज आई।
—मैं उंगली नहीं काट पाया। बस हल्की चोट लगी है। अर्जुन, अब और मत कर।
—उसे लिफ्ट के पास छोड़ दे। मैं रिया को संभालता हूं।
फिर सब धुंधला हो गया।
जब नंदिता की आंख खुली, सफेद छत उसकी ओर झुकी हुई लग रही थी। पेट में आग थी। बगल में गेंदे और गुलाब की माला रखी थी। दरवाजे के पास अर्जुन खड़ा था, चेहरा दुखी बनाकर।
—मेरा बच्चा कहां है?
—शांत रहो, नंदू। डॉक्टर देख रहे हैं।
—कहां है मेरा बेटा?
अर्जुन ने नजरें झुका लीं।
—उसकी एक उंगली में जन्म से कमी है। घबराने की बात नहीं। करण विशेषज्ञ से बात कर रहा है।
नंदिता ने उसे ऐसे देखा जैसे पहली बार पहचान रही हो।
उसी समय करण अंदर आया। उसकी बांहों में गुलाबी कंबल में लिपटी एक बच्ची थी। नंदिता ने दर्द भूलकर कंबल खींचा। बच्ची की दोनों हथेलियां खुलीं—10 उंगलियां, साफ, पूरी।
—यह मेरा बेटा नहीं है।
करण का चेहरा सफेद पड़ गया।
—धीरे बोल। यह रिया की बेटी है।
नंदिता की सांस अटक गई।
—मेरा बच्चा कहां है?
करण ने होंठ भींच लिए।
—लिफ्ट के पास… बस 2 मिनट के लिए छोड़ा था। रिया बेहोश होने लगी थी।
नंदिता बिस्तर से लगभग गिरते हुए उठी। टांकों से खून रिसा, पैर कांपे, लेकिन वह दरवाजे तक पहुंच गई। अर्जुन पीछे बढ़ा, तभी गलियारे के दूसरे छोर से रिया की मीठी, कमजोर आवाज आई—
—अर्जुन…
अर्जुन रुक गया।
नंदिता अकेली लिफ्ट की ओर लड़खड़ाई। वहां दो बुजुर्ग महिलाएं घबराई खड़ी थीं। उनके बीच एक सफेद कंबल में उसका बेटा रोते-रोते थक चुका था।
नंदिता ने उसे सीने से चिपका लिया। उसके नन्हे हाथ की मुट्ठी बंद थी। जब उसने उंगलियां खोलीं, भीतर खून लगी पट्टी, नीला धागा और अस्पताल की कटी हुई पहचान-पट्टी का छोटा टुकड़ा था।
उस टुकड़े पर सिर्फ 3 अक्षर दिख रहे थे—
“रिया।”
PART 2
नंदिता अपने बेटे को सीने से लगाए कमरे में लौटी और दरवाजा भीतर से बंद कर दिया।
अर्जुन ने पहले प्यार दिखाया।
—नंदू, बच्चा नर्सरी में जाएगा तो ठीक से जांच होगी।
फिर उसका चेहरा कठोर हो गया।
—हठ मत करो। अभी तुम दवा के असर में हो।
नंदिता की आवाज कांपी, मगर टूटी नहीं।
—जांच यहीं होगी।
जब नर्स तापमान देखने आई, नंदिता ने अर्जुन के सामने पूछा—
—क्या मेरा बेटा किसी जन्मजात कमी के साथ पैदा हुआ था?
नर्स ने बच्चे की हथेलियां देखीं।
—नहीं मैडम। बच्चा स्वस्थ है। बस एक उंगली पर ऊपर से खरोंच है, जैसे किसी चीज से छुआ हो।
अर्जुन एक पल के लिए पत्थर बन गया।
नंदिता ने वही पल पकड़ लिया।
नर्स के जाते ही उसने पट्टी खोली। उसमें कोई कटा हिस्सा नहीं था। सिर्फ सूखा खून, नीला धागा और पहचान-पट्टी का टुकड़ा था। उस पर लिखा था—“रिया मेहरा की शिशु।”
दोपहर में नंदिता ने रिया को देखने की जिद की। सब अजीब तरह से जल्दी मान गए।
रिया तकियों के बीच लेटी थी। उसकी बच्ची पारदर्शी पालने में सो रही थी। पीठ पर बड़ा काला जन्मचिह्न था, पर वह कोई दोष नहीं, बस जन्म की छाप थी।
रिया की कलाई पर नीली राखी जैसी बुनी हुई डोरी बंधी थी। उसका एक सिरा टूटा था।
—दीदी, सुना आपके बच्चे के साथ… बहुत दुख हुआ।
नंदिता ने उसकी आंखों में देखा।
—तुम मेरे कमरे में आई थीं?
रिया की मुस्कान कांप गई।
—बस देखने। तुम्हें जगाना नहीं चाहती थी।
रात को नंदिता ने सोने का नाटक किया। आधी रात अर्जुन और करण कमरे में आए।
—अगर वह पहले न जागती तो सब हो जाता —अर्जुन फुसफुसाया।
करण बोला—
—मैं बच्चे को अपंग नहीं कर सकता था।
—बस डिस्चार्ज तक उसे रिया की बच्ची अपनी माननी थी। सहमति-पत्र तैयार है।
सुबह नंदिता ने काउंटर पर अपनी फाइल देखी।
एक कागज बाहर निकला था—
“पारिवारिक गोद लेने की सहमति, जैविक मां द्वारा हस्ताक्षरित।”
नीचे नंदिता के नकली हस्ताक्षर थे।
PART 3
उस पल नंदिता के भीतर कोई कमजोर स्त्री नहीं बची। दर्द था, टांके थे, चक्कर थे, दूध उतरने की बेचैनी थी, लेकिन उससे बड़ा था वह डर, जिसमें उसका बच्चा किसी और की गोद में गायब हो सकता था।
उसने तुरंत दरवाजे की घंटी दबाई। वही नर्स आई जिसने बच्चे की जांच की थी। नंदिता ने बिस्तर पर खून लगी पट्टी, नीला धागा, कटी हुई पहचान-पट्टी और मोबाइल में ली गई सहमति-पत्र की तस्वीर रख दी।
—मेरे बच्चे को कोई इस कमरे से बाहर नहीं ले जाएगा। अगर किसी ने कोशिश की, तो पूरा अस्पताल सुनेगा कि यहां नवजात बच्चों की अदला-बदली हो रही है।
नर्स का चेहरा उड़ गया। वह दोषी नहीं लग रही थी, डरी हुई लग रही थी। शायद उसे अंदाजा था कि बड़े घरों के लोग अस्पतालों में भी नियमों को पैसे की तरह मोड़ने की कोशिश करते हैं।
कुछ ही मिनटों में मुख्य नर्स, बाल रोग विशेषज्ञ और सुरक्षा अधिकारी कमरे में आ गए। बच्चे के पैरों के निशान, जन्म के समय लिए गए रिकॉर्ड, मां के नाम की पट्टियां और दोनों प्रसव कक्षों का समय मिलाया गया। डॉक्टरों के चेहरों पर पेशेवर शांति थी, मगर आंखों में बेचैनी साफ थी।
मुख्य नर्स ने धीमे लेकिन साफ स्वर में कहा—
—श्रीमती नंदिता, रिकॉर्ड में गंभीर गड़बड़ी है। जब तक कैमरे और दस्तावेज जांचे नहीं जाते, इस मंजिल से कोई बच्चा बाहर नहीं जाएगा।
अर्जुन लगभग दौड़ता हुआ आया।
—यह सब क्या तमाशा है? नंदू, तुम्हें प्रसव के बाद भ्रम हो रहा है। कोई तुम्हारे कान भर रहा है।
नंदिता ने बेटे को और कसकर सीने से लगाया।
—तो फिर डीएनए जांच से डर क्यों लग रहा है?
अर्जुन की आंखों में पहली बार डर तैर गया। वही आदमी, जिसने शादी के 7 सालों में कभी नंदिता की रुलाई को गंभीरता से नहीं लिया था, अब उसके एक वाक्य से चुप हो गया।
करण बाद में आया। उसके हाथ कांप रहे थे। वह आंखें नहीं मिला पा रहा था। उसके पीछे रिया व्हीलचेयर पर आई, गोद में अपनी बच्ची लिए। उसके चेहरे पर चोट खाई देवी जैसा भाव था, जैसे दुनिया ने सिर्फ उसी के साथ अन्याय किया हो।
लेकिन जैसे ही उसने अपनी टूटी नीली डोरी नंदिता के बिस्तर पर देखी, उसका चेहरा उतर गया।
—तुम्हारे पास हमेशा सब कुछ था —रिया अचानक बोल पड़ी— मम्मी-पापा का गर्व, अच्छी पढ़ाई, अच्छा घर, अर्जुन… और अब स्वस्थ बेटा भी। मेरी बेटी पैदा होते ही सबने उसकी पीठ देखी और दया की नजर से देखा। कोई उसे सुंदर नहीं कह रहा था, सब फुसफुसा रहे थे। तुम्हें फिर क्यों सब मिलना था?
कमरे में सन्नाटा जम गया।
नंदिता ने रिया की बच्ची की ओर देखा। वह शांत सो रही थी, दुनिया के अपराधों से अनजान। उसकी पीठ का निशान किसी पाप का प्रमाण नहीं था। वह बच्ची भी उतनी ही निर्दोष थी जितना नंदिता का बेटा।
—तुमने अपनी बेटी से शर्म खाई —नंदिता ने कहा— और मेरे बेटे को चोट पहुंचाने चली आई।
रिया की आंखों में आंसू थे, पर पछतावा नहीं था। वह अपनी पीड़ा को अधिकार समझ रही थी।
सीसीटीवी फुटेज ने सच्चाई को निर्वस्त्र कर दिया।
रात के धुंधले वीडियो में रिया नंदिता के कमरे में जाती दिखी, जब नंदिता दवा के असर में अचेत थी। उसके पीछे करण था। अर्जुन दरवाजे पर खड़ा पहरा दे रहा था। कुछ मिनट बाद करण नवजात लड़के को लेकर बाहर निकला। वह गलियारे में रुका, बच्चे की पहचान-पट्टी काटी, फिर लिफ्ट के पास उसे रखकर पीछे मुड़ गया। कैमरे में उसका चेहरा ऐसा था जैसे वह अपने ही हाथों से अपने बचपन की कसम दफना रहा हो।
दूसरे वीडियो में रिया की बच्ची को नंदिता के कमरे में लाया गया। एक नर्सिंग असिस्टेंट ने झिझकते हुए पालना बदला, फिर तुरंत बाहर चली गई। बाद में पता चला कि उसे अर्जुन ने पैसे देकर कहा था कि यह “परिवार की निजी व्यवस्था” है और सभी दस्तावेज तैयार हैं।
दस्तावेज भी मिले। अर्जुन ने डॉक्टर से अतिरिक्त नींद की दवा लिखवाई थी। उसने अस्पताल प्रशासन को यह बताया था कि दोनों परिवारों की सहमति से “भावनात्मक कारणों” से बच्ची को अस्थायी रूप से नंदिता के पास रखा जाएगा। सहमति-पत्र में नंदिता के नकली हस्ताक्षर थे, और गवाह के रूप में करण का नाम।
फिर अर्जुन के फोन से संदेश निकले।
“नंदिता जागने से पहले पालना बदलना होगा।”
“मल्होत्रा घर को बेटा चाहिए।”
“उसे बोल देना बच्चा दोष के साथ पैदा हुआ है, मां सदमे में सच नहीं पहचान पाएगी।”
“डिस्चार्ज के बाद कागज कानूनी कर देंगे।”
नंदिता ने हर संदेश पढ़ा। हर पंक्ति उसके भीतर एक चाकू की तरह उतरती गई।
यह कोई अचानक की गई गलती नहीं थी। यह योजना थी।
उसका पति, उसका भाई, उसकी बहन—तीनों ने मिलकर तय किया था कि कौन-सा बच्चा किस मां की गोद में जाएगा। उन्होंने मां के दूध, जन्म की पहचान, बच्चे की त्वचा की गंध, पहली रोने की आवाज—सबको कागज और झूठ से बदल देने की कोशिश की थी।
पुलिस आई तो करण सबसे पहले टूट गया। उसने हाथ जोड़कर कहा कि उसने बच्चे को जानबूझकर नुकसान नहीं पहुंचाया, सिर्फ अर्जुन के दबाव में आया। वह कहता रहा कि रिया टूट रही थी, घर बिखर रहा था, अर्जुन ने भरोसा दिलाया था कि बाद में सब संभल जाएगा।
नंदिता ने उसे देखा। यही भाई कभी स्कूल के बाहर लड़कों से लड़ जाता था अगर कोई नंदिता को छेड़ दे। वही भाई आज उसके नवजात बेटे को लिफ्ट के पास छोड़ आया था।
—तूने मुझे नहीं, अपने ही खून को छोड़ा है —नंदिता ने कहा— क्योंकि जो रिश्ता मां और बच्चे के बीच होता है, उसे काटने वाला कोई भाई नहीं हो सकता।
करण रो पड़ा, लेकिन उसके आंसू देर से आए थे।
अर्जुन ने आखिरी कोशिश की।
—नंदू, पुलिस केस मत करो। मल्होत्रा नाम मिट्टी में मिल जाएगा। गलती हो गई। रिया की हालत देखकर दिमाग खराब हो गया था। हमारा बच्चा हमारे पास है न? अब सब ठीक कर सकते हैं।
नंदिता हंसी नहीं, रोई भी नहीं। बस उसकी आंखें खाली हो गईं।
—तुम्हारे लिए बच्चा “हमारा” तब था जब वह वारिस था। जब उसे बचाना था, तुमने उसे लिफ्ट के पास छोड़ दिया।
अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ना चाहा। उसने तुरंत हाथ पीछे कर लिया।
—परिवार बचाना है तो सच बोलो। मुझे बचाना है तो दूर रहो। और अपने बेटे को बचाना है तो उसे फिर कभी अपना मत कहना।
रिया ने तब भी माफी नहीं मांगी। वह अपनी बच्ची को पकड़े बैठी रही, जैसे वह बच्ची उसकी हार का सबूत हो। नंदिता को सबसे ज्यादा दर्द उसी पर आया। वह बच्ची जन्म लेते ही अपनी मां की ईर्ष्या की छाया में कैद हो गई थी।
मुख्य डॉक्टर ने रिया की बच्ची की जांच करवाई। जन्मचिह्न पूरी तरह सामान्य था। किसी इलाज की जरूरत नहीं थी। लेकिन रिया के मन का अंधेरा उससे कहीं गहरा था।
नंदिता ने उसी दिन लिखित शिकायत की। अस्पताल ने सुरक्षा उल्लंघन, गलत दस्तावेज और नवजात पहचान प्रक्रिया की जांच शुरू की। संबंधित स्टाफ को निलंबित किया गया। अर्जुन, करण और रिया के बयान दर्ज हुए। नकली हस्ताक्षर, बच्चे को अकेला छोड़ना, पहचान-पट्टी काटना और गोद लेने के फर्जी कागज—सब अपराध बन गए।
नंदिता के माता-पिता अस्पताल पहुंचे तो मां बेहोश होते-होते बची। पिता की आंखें लाल थीं। उन्होंने करण को थप्पड़ नहीं मारा। बस कहा—
—आज से तू इस घर का बेटा नहीं, अदालत का आरोपी है।
करण जमीन पर बैठ गया। वह रोता रहा, लेकिन नंदिता ने उस ओर नहीं देखा।
अगले 48 घंटे नंदिता ने अस्पताल के कमरे में पुलिस सुरक्षा के बीच बिताए। उसका बेटा उसके पास था। नर्स जब भी उसे लेने आती, नंदिता साथ जाती। जांच, टीका, वजन, सब उसकी आंखों के सामने हुआ। नींद टूटती तो वह बच्चे की उंगलियां गिनती—1, 2, 3… 10। फिर उसकी घायल उंगली पर होंठ रख देती।
बच्चे का नाम उसने आरव रखा।
अर्जुन ने नामकरण में भाग लेने की अनुमति मांगी। नंदिता ने इंकार कर दिया। नाम उस बच्चे को दिया गया था जिसने जन्म के पहले ही दिन अपनी मुट्ठी में सबूत दबाकर अपनी मां को सच बता दिया था।
डिस्चार्ज के दिन अस्पताल के बाहर बारिश बंद हो चुकी थी। आसमान धुला हुआ था। मल्होत्रा परिवार की गाड़ियां बाहर खड़ी थीं, मगर नंदिता उनकी ओर नहीं गई। उसके पिता ने कार का दरवाजा खोला। मां ने आरव के माथे पर काला टीका लगाया। नंदिता ने एक बार अस्पताल की इमारत को देखा।
वह वहां मां बनकर गई थी।
वह वहां से योद्धा बनकर निकली।
कुछ ही हफ्तों में उसने अर्जुन से अलग रहने की अर्जी डाली। फिर तलाक का केस। अदालत में अर्जुन के वकील ने कहा कि यह “भावनात्मक भ्रम” था, परिवार के भीतर गलतफहमी थी। नंदिता के वकील ने कैमरा फुटेज, फोन संदेश, नकली दस्तावेज और नर्स के बयान रख दिए। अदालत में सन्नाटा छा गया।
न्यायाधीश ने आरव की सुरक्षा को प्राथमिकता दी। अर्जुन को बच्चे से मिलने पर अस्थायी रोक लगी। नंदिता को संरक्षण आदेश मिला। करण पर आपराधिक जांच चली। रिया को भी बच्ची के साथ मनोवैज्ञानिक परामर्श और निगरानी में रखा गया, क्योंकि अदालत ने माना कि उसकी बेटी भी खतरे में हो सकती है—उस मां से नहीं जो गरीब थी, बल्कि उस मां से जो अपने ही बच्चे के निशान से घृणा कर बैठी थी।
महीने बीतते गए। नंदिता ने नौकरी फिर शुरू की। वह पहले चार्टर्ड अकाउंटेंट थी, मगर शादी के बाद ससुराल के दबाव में घर बैठा दी गई थी। अब उसने दक्षिण दिल्ली में एक छोटे ऑफिस से काम शुरू किया। गोद में आरव, टेबल पर फाइलें, और मन में वह आग, जिसने उसे वापस खड़ा कर दिया था।
रातें आसान नहीं थीं। कई बार वह अचानक जाग जाती। उसे लगता कोई पालना बदल रहा है। वह उठकर आरव की सांस सुनती। उसकी उंगलियां छूती। वह छोटा सा निशान अब भर चुका था, पर नंदिता की स्मृति में हमेशा ताजा रहा।
कभी-कभी मां कहती—
—बेटी, अब डर छोड़ दे। बच्चा सुरक्षित है।
नंदिता सिर हिला देती, लेकिन मन में जानती थी कि मां की सुरक्षा सिर्फ दरवाजे बंद करने से नहीं आती। मां की सुरक्षा सच पहचानने से आती है। उस दिन अगर उसने आधी नींद में सुनी बात को भ्रम मान लिया होता, अगर उसने दर्द की वजह से उठना छोड़ दिया होता, अगर उसने परिवार की इज्जत के लिए चुप्पी चुन ली होती, तो उसका बेटा किसी और की गोद में बड़ा होता और वह किसी और की बेटी को अपना समझकर उम्र भर अपने ही मातृत्व पर भरोसा खोती रहती।
रिया की बेटी का नाम बाद में अनाया रखा गया। नंदिता ने अदालत के बाहर एक बार उसे देखा। वह बच्ची अपनी आया की गोद में थी, हंस रही थी। उसकी पीठ का निशान कपड़ों के भीतर छिपा था, पर नंदिता को लगा कि असली निशान उस बच्ची पर नहीं, उन बड़ों पर था जिन्होंने जन्म को भी तुलना बना दिया।
साल भर बाद आरव के पहले जन्मदिन पर कोई बड़ा समारोह नहीं हुआ। नंदिता ने घर की छत पर छोटा सा पूजन रखा। मां ने हलवा बनाया, पिता ने चांदी की पायल दी, और आरव ने केक की जगह केले को मसलकर अपने चेहरे पर लगा लिया। सब हंस पड़े।
नंदिता ने उसी शाम उसकी घायल उंगली पर हल्का सा चुंबन रखा। निशान अब मुश्किल से दिखता था। फिर भी वह उसे देख लेती थी। शायद मां की आंखें उन घावों को भी पहचानती हैं जिन्हें दुनिया भर चुका मान लेती है।
उस रात आरव उसकी गोद में सो गया। बाहर दिल्ली की हवा में हल्की ठंड थी। दूर किसी मंदिर की घंटी बज रही थी। नंदिता ने खिड़की से आसमान देखा और पहली बार बिना डर के सांस ली।
उसे समझ आ गया था कि परिवार खून, उपनाम और हवेली से नहीं बनता।
परिवार वह होता है जो बच्चे को पालने से उठाकर सीने से लगाता है, लिफ्ट के पास छोड़कर नहीं जाता।
प्यार वह नहीं जो मां से उसका बच्चा छीनकर किसी और की कमी भरना चाहे।
और मातृत्व वह आवाज है जो बेहोशी, दर्द, धोखे और झूठ के पार भी अपने बच्चे की चीख पहचान लेती है।
