मेरे 11 साल के बेटे ने दादी के सामने रोकर सच बोल दिया—“पापा हमें छोड़कर दूसरी औरत के पास चले गए,” फिर स्पीकर पर पति ने ऐसी बात कही कि उसी घर में मेरी सास मेरे साथ खड़ी हो गई

भाग 1

“तुम्हारे पापा नौकरी के लिए मुंबई नहीं गए, मीरा… वो दूसरी औरत के साथ भाग गए हैं।”

11 साल के आरव की चीख जैसे पूरे घर की दीवारों से टकराकर वापस लौटी। कविता ने झट से उसका मुँह ढकना चाहा, लेकिन शब्द निकल चुके थे। दरवाजे पर खड़ी सावित्री देवी के हाथों से मिठाइयों और खिलौनों के 2 बड़े थैले लगभग छूट गए। उनके चेहरे की मुस्कान उसी पल मर गई।

6 महीने से सावित्री देवी अपने बेटे अर्जुन को फोन कर रही थीं। कभी वह कहता, “माँ, मीटिंग में हूँ।” कभी, “बाद में कॉल करता हूँ।” कभी बस 1 लाइन का मैसेज आता, “सब ठीक है।” लेकिन माँ का दिल झूठ की आवाज पहचान लेता है। इसलिए वह बिना बताए गाजियाबाद के उस फ्लैट में आ पहुँची थीं, जहाँ अर्जुन 12 साल से कविता और अपने 2 बच्चों, आरव और 5 साल की मीरा, के साथ रहता था।

कविता ने दरवाजा खोला तो उसके हाथ काँप रहे थे। माथे की बिंदी फीकी थी, आँखों के नीचे काले घेरे थे, और चेहरे पर वह थकान थी जिसे कोई मेकअप नहीं छिपा सकता।

—अरे बहू, कैसी हो? अर्जुन कहाँ है?

कविता ने जबरन मुस्कुराने की कोशिश की।

—अंदर आइए, माँजी।

सावित्री देवी ने जैसे ही घर में कदम रखा, उनकी नजर जूते के रैक पर गई। अर्जुन के ऑफिस वाले काले जूते नहीं थे। सोफे के पीछे उसकी जैकेट नहीं थी। दीवार पर लगी परिवार की तस्वीर अब भी वहीं थी, जिसमें जयपुर की यात्रा पर चारों हँस रहे थे, मगर घर में उस हँसी का कोई निशान नहीं बचा था।

मीरा दौड़कर आई।

—दादी!

सावित्री देवी ने उसे सीने से लगा लिया। आरव कमरे के दरवाजे पर खड़ा था, चुप, कठोर, जैसे अचानक बच्चा नहीं, घर का आदमी बन गया हो।

जब बच्चे उपहार खोलने लगे, कविता और सावित्री देवी रसोई के पास बैठ गईं। चाय ठंडी होती रही।

—सच बोलो, कविता। अर्जुन कहाँ है?

कविता की आँखों में पानी भर आया।

—वो 3 महीने पहले घर छोड़कर चले गए।

—कहाँ?

—अपने ऑफिस की एक लड़की के साथ। नाम रिया है। उम्र 28 साल।

सावित्री देवी की उंगलियाँ कप पर जम गईं।

—नहीं… अर्जुन ऐसा नहीं कर सकता।

कविता हल्का सा हँसी, पर वह हँसी टूटे काँच जैसी थी।

—मैं भी यही सोचती थी।

उसने बताया कि अर्जुन देर से आने लगा था, फोन छिपाने लगा था, त्योहारों पर भी चिड़चिड़ा रहता था। फिर 1 रात उसने सूटकेस निकाला और कहा कि उसे “खुद को समझने” के लिए कुछ समय चाहिए। जैसे पत्नी और बच्चे कोई परिवार नहीं, जेल हों।

—पैसे भेजते हैं? सावित्री देवी ने काँपती आवाज में पूछा।

—थोड़े। किराया, स्कूल फीस, राशन… सब मुश्किल से चलता है। मैं सुबह सरकारी स्कूल में पढ़ाती हूँ और शाम को बच्चों को ट्यूशन देती हूँ।

सावित्री देवी ने अपना माथा पकड़ लिया।

—और बच्चों को क्या बताया?

कविता ने कमरे की ओर देखा।

—मीरा को लगता है पापा मुंबई में बड़ा प्रोजेक्ट कर रहे हैं। आरव सब समझता है, पर चुप रहता है। रात को बाथरूम में रोता है।

उसी समय मीरा गुड़िया लेकर आई।

—दादी, पापा को बोलना जल्दी आएँ। मैंने उनके लिए ड्राइंग बनाई है। वो बहुत काम करते हैं ना?

सावित्री देवी की आँखें भर आईं। वह जवाब नहीं दे पाईं।

आरव दरवाजे पर खड़ा था। उसकी मुट्ठियाँ बंद थीं।

—वो काम नहीं कर रहे, मीरा। माँ झूठ बोलती हैं ताकि तू रोए नहीं। पापा हमें छोड़कर चले गए।

कविता उठी।

—आरव!

—क्यों छिपाएँ? सब क्यों दिखावा करें कि वो अच्छे पिता हैं? उन्होंने हमें चुना ही नहीं!

मीरा रोने लगी। सावित्री देवी ने कविता की ओर देखा, फिर अपने पोते की ओर। उस पल उन्हें समझ आ गया कि यह सिर्फ पति-पत्नी का झगड़ा नहीं था। यह 2 बच्चों का टूटता हुआ बचपन था।

उस रात बच्चों के सो जाने के बाद सावित्री देवी ने अपना फोन उठाया। अर्जुन को 1 बार कॉल किया। 2 बार। 3 बार। जवाब नहीं।

फिर उन्होंने मैसेज भेजा, “मैं तुम्हारे घर पर हूँ। सब जान गई हूँ। सुबह बात करोगे, भागोगे नहीं।”

कविता डर गई।

—माँजी, प्लीज बात मत बढ़ाइए। मैं और तमाशा नहीं झेल सकती।

सावित्री देवी की आँखों में अब आँसू नहीं, आग थी।

—तमाशा मेरे बेटे ने किया है, जब उसने अपने बच्चों को बोझ समझ लिया।

सुबह 7 बजे अर्जुन का फोन आया। सावित्री देवी ने स्पीकर ऑन कर दिया।

—माँ, अभी बात नहीं कर सकता, ऑफिस में हूँ।

—आज तू बात करेगा, अर्जुन।

दूसरी तरफ सन्नाटा छा गया।

—आप कविता के पास हैं?

—मैं तेरे असली घर में हूँ। उसी घर में जिसे तू कूड़े की तरह छोड़ गया।

अर्जुन ने थकी आवाज में कहा।

—माँ, आप नहीं समझेंगी। मुझे भी खुश रहने का हक है।

सावित्री देवी का चेहरा सफेद पड़ गया।

—खुशी? तेरी बेटी हर रात तेरी फोटो पकड़कर सोती है और तेरा बेटा बाथरूम में रोता है। इसे खुशी बोलता है तू?

तभी आरव दरवाजे के पीछे से बाहर आया। उसकी आँखें लाल थीं।

—उनसे बोल दो वापस मत आएँ। हमें ऐसे पापा नहीं चाहिए।

फोन खुला था। अर्जुन ने सब सुन लिया। और सबसे डरावनी बात यह थी कि उसने दर्द से नहीं, कायरता से कॉल काट दिया।

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भाग 2

अर्जुन उसी शाम 2 महंगे गिफ्ट बैग लेकर दरवाजे पर खड़ा था, जैसे ब्रांडेड जूते और एक बोलने वाली गुड़िया 3 महीने की गैरहाजिरी को मिटा सकते हों। कविता ने दरवाजा खोला, मगर उसके चेहरे पर न गुस्सा था, न स्वागत, सिर्फ खालीपन था। सावित्री देवी पीछे खड़ी थीं, माथे पर पल्लू, आँखों में शर्म और क्रोध दोनों। मीरा ने जैसे ही पिता को देखा, वह दौड़कर उनसे लिपट गई। अर्जुन ने उसे इतना कसकर पकड़ा कि बच्ची दर्द से सिसक गई। —सॉरी, मेरी गुड़िया… सॉरी। आरव वहीं खड़ा रहा। —अब याद आ गया कि आपका घर भी है? अर्जुन ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया। —बेटा, मुझसे गलती हो गई। —बेटा मत बोलिए। पापा ऐसे नहीं जाते। मीरा ने रोते हुए पूछा। —कौन गया था? पापा तो ऑफिस गए थे ना? कविता नीचे बैठी और मीरा के बाल सहलाने लगी। —तू अंदर चल, बेटा। —नहीं। अगर मैं अंदर गई तो पापा फिर चले जाएँगे। यह सुनकर कमरे की हवा भारी हो गई। अर्जुन ने चेहरा छिपा लिया। सावित्री देवी फट पड़ीं। —देख लिया? यह डर तूने अपनी बेटी को दिया है। सब बैठक में बैठ गए। अर्जुन ने समझाने की कोशिश की कि वह काम, जिम्मेदारियों और रोज की लड़ाइयों से घुट रहा था। रिया उसे फिर से जवान महसूस कराती थी। हर वाक्य कविता के लिए नया अपमान बनता जा रहा था। —तो मैं तुम्हारी जेल थी? —नहीं, मेरा मतलब वो नहीं था। —तुम्हारे जाने का मतलब वही था। मैं, बच्चे, यह घर… सब तुम्हारे लिए सजा बन गए थे। अर्जुन ने सिर झुका लिया। —मैंने बहुत गलत किया। आरव हँसा, मगर उस हँसी में बचपन नहीं था। —कितना आसान है बोलना। सावित्री देवी ने पूछा। —और वह लड़की? रिया? अर्जुन सख्त हो गया। —अब उसके साथ नहीं हूँ। कविता ने पहली बार उसे गौर से देखा। —कब से? —2 हफ्ते से। सावित्री देवी की आवाज धारदार हो गई। —मतलब उसने छोड़ा तो तुझे परिवार याद आया? अर्जुन चुप रहा। वही चुप्पी जवाब थी। कविता उठ खड़ी हुई। —कमाल है। —नहीं, मैंने उसे छोड़ा। सच में। उस रात मीरा ने मुझे वॉइस मैसेज भेजा था, “पापा, मेरा 1 दाँत गिर गया, आप नहीं थे।” मैं रिया के साथ डिनर कर रहा था। उसने मैसेज सुना और बोली, “फोन बंद करो, मेरा मूड खराब मत करो।” उस पल मुझे लगा मैं पिता नहीं, भगोड़ा हूँ। कविता चाहती थी कि उसकी आवाज झूठ लगे, ताकि वह उसे बिना दर्द के नफरत कर सके। मगर आवाज में पछतावा था, और यह पछतावा भी देर से आया था। तभी अर्जुन ने जेब से एक बैंक नोटिस निकाला। —मैं एक और बात बताने आया हूँ। कविता ने कागज पढ़ा। फ्लैट की ईएमआई 4 महीने से रुकी थी। बैंक ने चेतावनी भेजी थी। —यह क्या है? अर्जुन काँप गया। —पैसों की दिक्कत हो गई थी। सावित्री देवी ने कागज छीन लिया। —किस चीज में पैसा गया? अर्जुन ने कबूल किया कि वह रिया के लिए गुरुग्राम में सर्विस अपार्टमेंट का किराया दे रहा था, महंगे रेस्तरां, गहने, गोवा ट्रिप, कपड़े… सब कुछ। उसे लगा था बाद में संभाल लेगा, इसलिए घर की ईएमआई रोक दी। कविता का चेहरा पत्थर हो गया। —तुमने अपने बच्चों की छत दाँव पर लगा दी? —मैं ठीक कर दूँगा। —जैसे शादी ठीक की? जैसे पिता होना ठीक किया? आरव ने धीरे से कहा। —आपने हमसे घर भी छीन लिया। अर्जुन उसके पास बढ़ा। —नहीं, आरव, मैं बेच दूँगा कार, लोन लूँगा, सब ठीक करूँगा। आरव पीछे हट गया। —मुझे आपके गिफ्ट नहीं चाहिए। मीरा रोती रही। सावित्री देवी ने नोटिस अर्जुन के सीने पर दे मारा। —बेवफाई एक जख्म थी, लेकिन यह अपने ही बच्चों से चोरी है। कविता ने चीखकर नहीं कहा। उसका शांत स्वर अर्जुन को और ज्यादा तोड़ गया। —चले जाओ। —कविता, प्लीज। —जाने से पहले इतना समझ लो, जिस दिन मेरा बेटा मुझे पूरी तरह टूटते देख लेगा, उस दिन तुम उसके अंदर से हमेशा के लिए मर जाओगे। अर्जुन चला गया। दरवाजा बंद होते ही कविता फर्श पर बैठ गई। आरव ने पीछे से माँ को पकड़ लिया। मीरा भी रोते हुए उनसे लिपट गई। सावित्री देवी बीच कमरे में खड़ी थीं, जैसे पहली बार उन्हें अपने पालन-पोषण पर शर्म आई हो। अगले दिन सुबह 8 बजे घंटी बजी। कविता ने सोचा अर्जुन होगा। पर दरवाजे पर एक जवान औरत खड़ी थी, काले चश्मे, महंगा हैंडबैग और जहरीली मुस्कान के साथ। —मैं रिया हूँ। तुम्हें मुझसे बात करनी होगी, क्योंकि अर्जुन अब भी तुमसे झूठ बोल रहा है। ❤️नमस्ते, प्यारे रीडर्स! अगर आप अगले पार्ट के लिए तैयार हैं, तो प्लीज़ नीचे “Yes” लिखें, और मैं इसे तुरंत भेज दूँगा। मैं उन सभी के अच्छे स्वास्थ्य और खुशी की कामना करता हूँ जिन्होंने यह कहानी पढ़ी और पसंद की है! 💚

भाग 3

रिया बिना पूछे घर में चली आई, जैसे उस टूटे हुए घर पर उसका भी कोई हक हो। कविता दरवाजे के पास खड़ी रह गई। सावित्री देवी रसोई से बाहर आईं और उसे देखते ही समझ गईं। आरव के कमरे का दरवाजा आधा खुला था। —तुम्हें यहाँ आने की हिम्मत कैसे हुई? सावित्री देवी गरजीं। रिया ने चश्मा उतारा। उसकी आँखों में घमंड कम, थकान ज्यादा थी। —मैं तमाशा करने नहीं आई। मैं चाहती हूँ कि कविता सच जाने। अर्जुन यहाँ पश्चाताप करने नहीं लौटा। वह इसलिए लौटा क्योंकि मैंने उसे निकाल दिया। कविता की उंगलियाँ ठंडी पड़ गईं। —क्यों? —क्योंकि उसने मुझसे भी झूठ बोला। उसने कहा था कि उसका तलाक लगभग हो चुका है। कहा तुम लालची हो, बच्चों को हथियार बनाती हो, उसे उनसे मिलने नहीं देती। उसने खुद को बेचारा पति और जिम्मेदार पिता बनाकर दिखाया। सावित्री देवी का चेहरा शर्म से झुक गया। —और तुमने यकीन कर लिया? रिया ने धीमे से कहा। —करना चाहती थी। जब मीरा का दाँत वाला मैसेज आया और उसने फोन बंद किया, तब समझ गई कि वह आदमी फँसा हुआ नहीं, भागा हुआ है। फिर मैंने उसके कागज देखे। रिया ने बैग से कुछ फाइलें निकालीं। —यह सिर्फ घर की ईएमआई की बात नहीं है। उसने एक पर्सनल लोन लिया है। पति-पत्नी के नाम पर। कविता ने कागज छीनकर देखा। नीचे उसका हस्ताक्षर था। मगर उसने कभी हस्ताक्षर किए ही नहीं थे। —नहीं… यह मेरा साइन नहीं है। सावित्री देवी ने कागज देखा और उनका चेहरा कठोर हो गया। —अर्जुन ने तुम्हारा फर्जी हस्ताक्षर किया है। उसी पल आरव बाहर आ गया। —पापा ने माँ का साइन चुराया? कविता ने उसे रोकना चाहा। —आरव, अंदर जाओ। —नहीं। अब कोई मुझे बच्चा समझकर झूठ नहीं बोलेगा। रिया ने नजरें झुका लीं। शायद पहली बार उसे एहसास हुआ कि वह किसी ऑफिस रोमांस की कहानी में नहीं, 2 बच्चों की बर्बादी के बीच खड़ी है। सावित्री देवी ने अर्जुन को फोन किया। 20 मिनट बाद वह भागता हुआ आया। रिया को देखकर उसका चेहरा उड़ गया। —तुम यहाँ क्या कर रही हो? —जो तुमने कभी नहीं किया, सच बोल रही हूँ। कविता ने कागज उसके सामने रख दिए। —क्या तुमने मेरा फर्जी हस्ताक्षर किया? अर्जुन की साँस अटक गई। —मैं सब ठीक करने वाला था। —जवाब दो। उसने आँखें बंद कर लीं। —हाँ। कमरे में ऐसा सन्नाटा छाया कि मीरा की धीमी सिसकियाँ भी चाकू जैसी लगने लगीं। आरव रो पड़ा, मगर वह रोना छोटे बच्चे का नहीं था। वह टूटे भरोसे का रोना था। —मैं चाहता था आप लौट आएँ। बहुत गुस्सा था, पर चाहता था। लेकिन अब समझ नहीं आता आप कौन हैं। अर्जुन घुटनों पर बैठ गया। —मुझे माफ कर दे, बेटा। —मुझसे मत माँगिए। माँ से माँगिए। कविता ने गहरी साँस ली। उसके भीतर अब भी पुराने दिनों की राख थी, मगर आग बुझ चुकी थी। —आज ही बैंक चलोगे। लिखकर दोगे कि वह हस्ताक्षर मेरे नहीं हैं। कर्ज तुम भरोगे। कार बेचोगे। बच्चों की फीस और खर्च का कानूनी समझौता होगा। अगर एक भी झूठ बोला, तो मैं पुलिस में शिकायत करूँगी। अर्जुन ने सिर हिला दिया। —और एक बात, तुम बच्चों से मिल सकते हो, मगर मेरी शर्तों पर। भरोसा आदेश से नहीं लौटता। और मेरे साथ तुम्हारा कोई भविष्य नहीं है। सावित्री देवी की आँखें भर आईं, पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। उन्हें पता था कविता पहली बार अपने लिए खड़ी हुई है। रिया चुपचाप चली गई। वह भी घायल थी, मगर उसकी चोटों में मासूम बच्चे नहीं थे। उसी दिन बैंक में अर्जुन ने धोखाधड़ी स्वीकार की। अगले 7 दिनों में उसने कार बेच दी, रिया वाले अपार्टमेंट की जमा राशि वापस ली, और कानूनी कागजों पर बच्चों की जिम्मेदारी लिखी। वह नोएडा के एक छोटे कमरे में रहने लगा। शनिवार को बच्चों से मिलने आता, कभी जबरदस्ती नहीं करता। आरव ने महीनों तक उससे ठीक से बात नहीं की। मीरा अब भी पूछती थी कि पापा घर में क्यों नहीं सोते। कविता उसे सच का नरम हिस्सा बताती, झूठ नहीं। सावित्री देवी हर रविवार खाना लेकर आतीं, बच्चों का होमवर्क करवातीं और कभी अपने बेटे की गलती को छोटा नहीं बतातीं। एक दिन उन्होंने कविता का हाथ पकड़ा। —मेरा बेटा गलत निकला, पर तू उसकी गलती की सजा पूरी जिंदगी क्यों भुगते? कविता ने फिर पढ़ाई शुरू की, स्कूल में ज्यादा घंटे लिए, और धीरे-धीरे उसे अपनी आवाज वापस मिली। 6 महीने बाद स्कूल के वार्षिक समारोह में आरव गणित की ट्रॉफी लेकर माँ की ओर दौड़ा। मीरा के चेहरे पर तितली बनी थी और हाथ में टॉफी थी। अर्जुन दूर खड़ा ताली बजा रहा था, बिना अधिकार जताए, बिना पास आने की जिद किए। कविता ने उसे देखा। अब सीने में खालीपन नहीं उठा। बस शांति थी। सावित्री देवी ने उसके कंधे पर हाथ रखा। —मुझे तुझ पर गर्व है, बेटी। कविता मुस्कुराई। —मुझे भी। क्योंकि कभी-कभी परिवार पहले जैसा होकर नहीं बचता। कभी-कभी वह तब बचता है, जब एक औरत किसी और के झूठ ढोना बंद कर देती है, बच्चे सीखते हैं कि प्यार दर्द का दूसरा नाम नहीं होता, और गलती करने वाला आदमी समझता है कि सब कुछ खोना सजा नहीं… अंजाम होता है।

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