
भाग 2:
रेंज पर विक्रम अभी भी अर्जुन सिंह के सामने खड़ा था। बाकी जवानों की नजरें झुकी थीं। कोई अपने प्रशिक्षक का विरोध नहीं करना चाहता था, पर सबको लग रहा था कि कुछ गलत हो रहा है।
“बाबा,” विक्रम ने फिर कहा, “आपकी उम्र का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन सेना नियम से चलती है। यहां भावनाओं से गोली नहीं लगती।”
अर्जुन ने शांत स्वर में कहा, “गोली भावनाओं से नहीं लगती, सही। लेकिन घमंड से भी नहीं लगती।”
यह सुनते ही विक्रम का चेहरा और लाल हो गया। उसने अर्जुन की बांह पकड़ ली। रोहित ने दूर से देखा तो उसका दिल बैठ गया। वह दौड़कर आने ही वाला था कि अचानक रेंज के बाहर से सायरन की आवाज उठी।
पहले धूल दिखी, फिर 2 सैन्य जिप्सी और 1 मिलिट्री पुलिस वाहन तेज रफ्तार से अंदर आए। गाड़ियां रुकते ही कर्नल राजवीर शेखावत उतरे। उनके पीछे बेस सूबेदार मेजर भानु प्रताप थे, जिनका चेहरा पत्थर जैसा सख्त था।
पूरी रेंज सावधान हो गई।
विक्रम ने अर्जुन की बांह छोड़ दी, लेकिन देर हो चुकी थी।
कर्नल शेखावत सीधे अर्जुन सिंह के सामने आए। उन्होंने सूबेदार विक्रम की तरफ एक बार भी नहीं देखा। फिर उन्होंने अपनी पीठ सीधी की और इतने सम्मान से सलाम किया कि सारे जवानों की आंखें फैल गईं।
“ऑनरेरी कैप्टन अर्जुन सिंह राठौड़ साहब,” कर्नल की आवाज गूंज उठी, “मेरे जवानों के व्यवहार के लिए मैं शर्मिंदा हूं।”
विक्रम जैसे पत्थर बन गया।
कर्नल ने पूरी टीम की तरफ मुड़कर कहा, “जिस आदमी को तुमने माली समझा, उसने कारगिल से पहले की पहाड़ी कार्रवाई में 17 जवानों की जान बचाई थी। दुश्मन उसे ‘थार का साया’ कहता था। भारतीय सेना के पुराने स्नाइपर मैनुअल में हवा पढ़ने वाला जो अध्याय तुम आज भी पढ़ते हो, उसका आधार इन्हीं का अनुभव है।”
सूबेदार मेजर भानु प्रताप ने धीमी लेकिन खतरनाक आवाज में विक्रम से कहा, “तुमने अपने ही घर के बुजुर्ग को दरवाजे से धक्का देना चाहा।”
कर्नल ने अर्जुन से विनम्रता से पूछा, “साहब, क्या आप इन जवानों को दिखाएंगे कि हवा को मशीन से नहीं, आंख और धैर्य से कैसे पढ़ा जाता है?”
अर्जुन ने अपनी पुरानी राइफल उठाई। वह धीरे-धीरे फायरिंग मैट पर लेट गया। उसने कोई दिखावा नहीं किया। बस रेत उठाई, उसे उंगलियों से गिरने दिया, फिर दूर चमकती गर्मी को देखा।
“लक्ष्य वाला झंडा झूठ बोल रहा है,” उसने कहा। “बीच में हवा उलटी घूम रही है।”
उसने सांस रोकी। ट्रिगर दबा।
2 सेकंड बाद दूर लोहे की प्लेट से साफ आवाज आई।
टन!
भाग 3:
उस एक आवाज ने पूरी रेंज का चेहरा बदल दिया। वह सिर्फ लोहे पर लगी गोली की आवाज नहीं थी। वह विक्रम चौहान के घमंड पर पड़ी चोट थी। वह जवानों के भीतर टूटते भ्रम की आवाज थी। सुबह से जिन मशीनों ने उन्हें उलझा दिया था, एक बूढ़े आदमी ने उन्हें 1 गोली में चुप करा दिया था।
कुछ क्षण तक कोई ताली भी नहीं बजा पाया। सबके चेहरे पर अविश्वास था। फिर रोहित यादव ने सबसे पहले हाथ जोड़े और धीरे से सिर झुका दिया। उसके बाद बाकी जवानों ने भी अर्जुन सिंह की तरफ वैसा सम्मान दिखाया, जो आदेश से नहीं, भीतर से पैदा होता है।
कर्नल शेखावत ने विक्रम की तरफ मुड़कर कहा, “सूबेदार विक्रम चौहान, तुम अच्छे शूटर हो सकते हो, लेकिन आज तुम अच्छे गुरु नहीं रहे। गुरु का पहला धर्म है सीखने की भूख जिंदा रखना। तुमने सोचा तुम्हारी मशीन तुम्हें पूरा बना चुकी है। इसी वजह से तुम आधे रह गए।”
विक्रम की आंखें झुक गईं। उसके होंठ सूख चुके थे। उसने सिर्फ इतना कहा, “सर, मेरी गलती है। कोई बहाना नहीं।”
“बहाना होता भी नहीं,” कर्नल ने कहा। “अगले 7 दिन तुम्हारी पूरी टीम अर्जुन सिंह साहब से हवा पढ़ना सीखेगी। बिना डिजिटल मीटर, बिना कंप्यूटर। सिर्फ आंख, कान, त्वचा और धैर्य।”
अर्जुन ने विक्रम की तरफ देखा। उनमें जीत का अहंकार नहीं था। वह आदमी युद्ध में जीतकर लौटा था, बहस में नहीं।
वह उठने लगा तो रोहित ने दौड़कर उनका हाथ पकड़ लिया। अर्जुन ने मुस्कुराकर कहा, “अभी इतना बूढ़ा नहीं हुआ हूं बेटा।”
फिर वह विक्रम के पास गया। जिस कंधे को कुछ देर पहले विक्रम ने कठोरता से पकड़ा था, अर्जुन ने उसी कंधे पर हाथ रखा।
“गुस्सा जवान खून में होता है,” अर्जुन ने कहा, “लेकिन घमंड अगर दिमाग में जम जाए तो निशाना धुंधला कर देता है। हथियार नया हो सकता है, पर हवा हमेशा पुरानी भाषा में बोलती है।”
विक्रम की आंखें भर आईं। वह सैनिक था, आसानी से रोने वालों में नहीं। लेकिन उस क्षण उसे अपने पिता याद आ गए, जो हरियाणा के गांव में किसान थे और हमेशा कहते थे कि मौसम को ऐप से नहीं, मिट्टी की गंध से पहचानो। उसने वर्षों से उन्हें फोन तक ठीक से नहीं किया था।
उस दिन की ट्रेनिंग वहीं खत्म नहीं हुई। अर्जुन सिंह ने अपनी पुरानी राइफल रोहित को पकड़ाई। रोहित ने उसे दोनों हाथों से ऐसे थामा जैसे कोई प्रसाद मिल गया हो।
“भारी है,” रोहित ने कहा।
“जिम्मेदारी हमेशा भारी होती है,” अर्जुन ने जवाब दिया।
फिर उन्होंने जवानों को लक्ष्य की तरफ नहीं, रेंज की तरफ देखने को कहा। उन्होंने बताया कि रेत की सतह पर रेंगती हल्की लहरें क्या कहती हैं। दूर पत्थरों के ऊपर उठती गर्म हवा कैसे गोली को हल्का धक्का देती है। बबूल की ऊपरी टहनी और नीचे की सूखी घास अगर अलग-अलग दिशा में झुके तो समझो हवा एक नहीं, परतों में चल रही है। उन्होंने कहा कि झंडा सिर्फ वह बताता है जो उसके पास हो रहा है, पर गोली को पूरी यात्रा करनी पड़ती है।
जवान मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे।
विक्रम भी उन्हीं के बीच बैठ गया। पहले वह आगे खड़ा होकर आदेश देता था, अब पीछे बैठकर नोट्स लिख रहा था। यह दृश्य रोहित को जीवन भर याद रहने वाला था। एक कठोर प्रशिक्षक, एक 82 साल का शांत बूढ़ा, और उनके बीच रेत पर खिंची वह अदृश्य रेखा, जहां अहंकार खत्म होकर सीख शुरू होती है।
अगले 7 दिन रेंज पर कोई चिल्लाहट नहीं हुई। सुबह 5 बजे जवान लाइन में खड़े हो जाते। अर्जुन सिंह कभी मुट्ठी भर रेत लेकर आते, कभी सूखी पत्ती, कभी कपड़े का छोटा टुकड़ा। वह उन्हें हवा का पाठ पढ़ाते जैसे कोई पुराना कथावाचक महाभारत सुनाता हो।
“भीष्म के पास शस्त्र था,” वह एक दिन बोले, “लेकिन अर्जुन को जीत इसलिए मिली क्योंकि उसने लक्ष्य से पहले अपने मन को साधा। स्नाइपर भी वही करता है। वह सिर्फ दुश्मन को नहीं, खुद को निशाना बनाता है।”
एक दिन उन्होंने अपनी राइफल की लकड़ी पर पड़े गहरे निशान की कहानी सुनाई। यह 1971 के बाद की सीमा झड़प का समय था। युवा अर्जुन सिंह कश्मीर की पत्थरीली चौकी पर तैनात थे। रात में दुश्मन ने मोर्टार दागे। एक छर्रा उनकी राइफल के बट में धंस गया। उसी रात नीचे फंसी भारतीय टुकड़ी वायरलेस पर मदद मांग रही थी। दुश्मन का मशीन गनर ऊपर से रास्ता बंद किए बैठा था।
अर्जुन ने कहा, “उस रात मुझे डर लगा था। जो कहे कि युद्ध में डर नहीं लगता, वह झूठ बोलता है। फर्क बस इतना है कि कौन डर को हाथ पकड़कर बैठा रहता है और कौन उसे साथ लेकर रेंगता हुआ आगे बढ़ता है।”
उन्होंने आधी रात, बर्फ, गीले दस्ताने, कांपती उंगलियां और उस एक गोली का जिक्र किया। गोली लगी तो नीचे फंसे जवान निकल पाए। सुबह उनमें से 1 जवान ने उन्हें गले लगाकर कहा था, “आपने मेरी मां का बेटा बचा लिया।”
उस वाक्य पर अर्जुन की आवाज भर्रा गई। “मेडल धातु का होता है। असली पुरस्कार किसी मां की बची हुई नींद है।”
विक्रम ने उस दिन पहली बार अर्जुन के पैर छूना चाहा। अर्जुन ने तुरंत रोक दिया।
“फौजी के पैर मत छू,” उन्होंने कहा, “उसकी बात पकड़।”
धीरे-धीरे टीम बदलने लगी। जवान हर शॉट से पहले 30 सेकंड आंखें बंद करते, हवा को महसूस करते, फिर स्कोप में देखते। डिजिटल मीटर बंद नहीं किए गए, लेकिन अब वे मालिक नहीं, सहायक बन गए। 5वें दिन रोहित ने वही 1,650 मीटर का लक्ष्य पहली गोली में मारा। वह खुशी से उछलना चाहता था, पर अर्जुन ने दूर से ही हाथ उठाकर उसे शांत रहने का इशारा किया।
“जो लक्ष्य पर पहुंच गया,” उन्होंने कहा, “उसे शोर की जरूरत नहीं।”
7वें दिन कर्नल शेखावत फिर रेंज पर आए। इस बार कोई सायरन नहीं था। कोई गुस्सा नहीं था। उन्होंने देखा कि सूबेदार विक्रम खुद जमीन पर बैठा है और अपने जवानों से कह रहा है, “पहले हवा सुनो, फिर मशीन देखो।”
कर्नल ने अर्जुन की तरफ देखा। उनकी आंखों में संतोष था।
कुछ हफ्तों बाद प्रशिक्षण केंद्र के पाठ्यक्रम में एक नया हिस्सा जोड़ा गया। उसका नाम रखा गया, “राठौड़ विंड रीडिंग मॉड्यूल।” अर्जुन ने नाम सुनकर नाक सिकोड़ ली।
“नाम से क्या होगा?” उन्होंने कहा। “जवान बचने चाहिए, बस।”
लेकिन जवानों के लिए वह नाम सिर्फ पाठ्यक्रम नहीं था। वह एक याद था कि सेना में असली विरासत हमेशा चमकदार मेडल बोर्ड पर नहीं टंगी होती। कभी-कभी वह धूल भरी चप्पलों में चुपचाप रेंज के किनारे खड़ी रहती है।
करीब 1 महीने बाद, शनिवार की शाम विक्रम जैसलमेर बाजार में अपनी मां के लिए दवाइयां और घर के लिए टमाटर के बीज खरीद रहा था। उसने सब्जी मंडी के पास एक परिचित पगड़ी देखी। अर्जुन सिंह एक छोटे दुकानदार से मोलभाव कर रहे थे।
“इतने महंगे मेथी के बीज? बेटा, यह बीज है या सोना?” अर्जुन हंसते हुए बोले।
विक्रम धीरे से उनके पास गया। “साहब…”
अर्जुन ने मुड़कर देखा। “अरे सूबेदार, तुम्हारे टमाटर बचे कि नहीं?”
विक्रम चौंक गया। “आपको कैसे पता?”
“पिछले हफ्ते तुमने बैरक के पीछे लगाए थे। बहुत पास-पास लगा दिए। पौधे भी जवानों जैसे हैं, जगह नहीं दोगे तो बढ़ेंगे कैसे?”
विक्रम मुस्कुरा नहीं पाया। उसकी आंखें भर आईं। उसने धीमे से कहा, “मैंने उस दिन आपका अपमान किया। आप चाहें तो मुझे कभी माफ न करें। लेकिन आपने मुझे सिर्फ निशाना लगाना नहीं सिखाया। आपने मुझे सुनना सिखाया।”
अर्जुन ने उसके हाथ से बीज का पैकेट लिया, देखा, और वापस पकड़ा दिया।
“माफी मांगने से आदमी छोटा नहीं होता,” उन्होंने कहा। “और सीखने वाला कभी हारता नहीं।”
विक्रम ने गहरी सांस ली। “मैंने अपने पिता को 3 महीने से फोन नहीं किया।”
अर्जुन कुछ पल चुप रहे। फिर बोले, “आज कर लेना। बूढ़े लोग ज्यादा कुछ नहीं मांगते। बस इतना कि उनके रहते उनकी आवाज सुनी जाए।”
उस रात विक्रम ने सचमुच अपने पिता को फोन किया। दूसरी तरफ से बूढ़ी आवाज आई, “कौन?”
विक्रम का गला भर गया। “मैं हूं, पापा।”
कुछ सेकंड चुप्पी रही। फिर पिता ने सिर्फ इतना कहा, “खाना खाया?”
विक्रम हंस भी पड़ा और रो भी पड़ा। उसे समझ आ गया कि अर्जुन सिंह ने उसे सिर्फ हवा नहीं पढ़ाई थी। उन्होंने उसे जीवन के वे छोटे संकेत पढ़ना सिखाया था, जिन्हें वह वर्षों से नजरअंदाज कर रहा था।
उधर अर्जुन सिंह अपने छोटे से क्वार्टर में लौटे। कमरे की दीवार पर कोई बड़ी तस्वीर नहीं थी, कोई दिखावटी सम्मान नहीं। एक संदूक में पुराने पदक रखे थे, जिन पर धूल जमी थी। मेज पर उनकी पत्नी की तस्वीर थी, जो 12 साल पहले गुजर गई थीं। उसके पास वही पुरानी राइफल रखी थी।
उन्होंने राइफल के लकड़ी वाले बट पर हाथ फेरा। गहरे निशान में उंगली अटक गई। उन्हें फिर कश्मीर की रात याद आई, फिर वह जवान जिसकी मां का बेटा बच गया था, फिर आज के जवान जिनकी आंखों में उन्होंने पहली बार अहंकार की जगह जिज्ञासा देखी थी।
उन्होंने धीमे से कहा, “अभी काम बाकी है।”
अगली सुबह जब सूरज रेत के ऊपर उठ रहा था, रेंज पर फिर जवान जमा थे। दूर 1,650 मीटर पर वही लोहे की प्लेट चमक रही थी। विक्रम ने अपना कंप्यूटर जेब में रखा, आंखें बंद कीं, और हवा को गाल पर महसूस किया।
अर्जुन सिंह पीछे खड़े थे। हाथ में कोई पदक नहीं, कोई भाषण नहीं, सिर्फ एक सूखी पत्ती थी।
पत्ती हल्के से कांपी।
विक्रम ने आंख खोली और फुसफुसाया, “3 हवाएं।”
अर्जुन मुस्कुराए।
दूर कहीं रेत पर सुबह की हवा चली। कोई शोर नहीं हुआ। लेकिन उस चुप्पी में 1 बूढ़े सैनिक की पूरी उम्र बोल रही थी।
