
भाग 1
“अगर तुम्हारी माँ को इतनी भूख लगती है, राजीव, तो इन्हें बालकनी में बिठाकर खिलाया करो, यह घर कोई बूढ़ों का लंगर नहीं है।”
सरला देवी ने यह वाक्य उसी संकरे गलियारे से सुना, जहाँ उनका पतला गद्दा जूतों की रैक और दीवार के बीच दबा पड़ा था। घुटनों पर पुरानी शॉल थी, सिरहाने छड़ी रखी थी और आंखें छत पर टिकाए वह ऐसे पड़ी थीं जैसे सांस लेने की भी इजाजत मांगनी पड़े। उन्होंने कुछ नहीं कहा। 1 साल में उन्होंने सीख लिया था कि इस घर में उनकी हर आवाज झगड़े की वजह बन सकती थी।
वह लखनऊ के एक साफ-सुथरे अपार्टमेंट में अपने बेटे राजीव, बहू प्रिया और 2 पोतों, आरव और विवान के साथ रहती थीं। कभी कानपुर की पुरानी बस्ती में उनका छोटा-सा घर था, दरवाजे पर तुलसी का चौरा, आंगन में अमरूद का पेड़ और रसोई में घी, दाल और गरम रोटियों की खुशबू। राजीव ने जब बड़ा फ्लैट लेने के लिए मदद मांगी थी, तब उन्होंने वही घर बेच दिया था।
—माँ, अब आप रानी की तरह रहेंगी।
राजीव ने उनके हाथ पकड़कर कहा था।
लेकिन रानी जूतों के पास सोने लगी।
सुबह सबसे पहले आरव और विवान की आवाजें आतीं। दोनों स्कूल जाने से पहले बाथरूम के लिए झगड़ते। सरला देवी को सिरदर्द होता, फिर भी उन आवाजों में उन्हें जीने की वजह मिलती थी। घर में वही 2 चेहरे थे जो उन्हें बोझ नहीं समझते थे।
—दादी, उठ गईं? आज मेरे टिफिन में आलू पराठा है, आधा आपका।
विवान फुसफुसाता।
—मम्मी सुन लेंगी।
सरला देवी डरकर कहतीं।
आरव मुंह बनाता।
—दादी को भी खाना चाहिए ना। वह कोई मेहमान थोड़ी हैं।
तभी प्रिया रसोई से निकलती, माथे पर बड़ी बिंदी, हाथ में कलछी और चेहरे पर चिढ़।
—बहुत बड़े वकील बन गए हो दोनों? स्कूल जाओ चुपचाप। और दादी का ड्रामा बंद करो।
—मम्मी, दादी गलियारे में ठंड से कांपती हैं।
आरव बोल पड़ा।
प्रिया की आंखें पत्थर जैसी हो गईं।
—तुम बच्चों को कुछ नहीं पता। बुजुर्गों को अलग जगह चाहिए होती है। इनके तेल, दवा और खांसी की बदबू कमरे में रहेगी तो तुम लोग बीमार पड़ोगे।
सरला देवी ने सिर झुका लिया। वह जानती थीं, यह अलग जगह उन्होंने नहीं चुनी थी। पहले उन्हें पूजा वाले छोटे कमरे में रखा गया, फिर कहा गया कि मेहमान आएंगे। फिर स्टोर में भेजा गया, फिर कहा गया कि सामान खराब हो जाएगा। आखिर में उनका संसार गलियारे के उस गद्दे में सिमट गया।
सबसे कठिन समय दोपहर का खाना था। प्रिया पहले राजीव और बच्चों की थालियां लगाती, फिर अपने लिए चावल, दाल और सब्जी सजाती। सरला देवी के लिए कभी फीकी खिचड़ी, कभी पतली दलिया, कभी सिर्फ चाय।
—आपकी उम्र में मसाला नहीं चलता।
प्रिया कहती।
—थोड़ी सब्जी दे दे बेटी, सुबह से कुछ नहीं खाया।
—बेटी मत बोलिए मुझे। और खाना कम कीजिए। डॉक्टर ने कहा है ना?
डॉक्टर ने ऐसा कभी नहीं कहा था। 3 साल पहले सरला देवी को हल्का लकवा पड़ा था। दाहिना हाथ कांपता था, कभी कटोरी गिर जाती थी। प्रिया तब मुंह फेर लेती।
—देखो बच्चों, ऐसे खाना नहीं खाते। कितनी गंदी आदत है।
—हाथ कांपता है मेरा।
सरला देवी धीरे से कहतीं।
—हाथ नहीं, नाटक कांपता है।
राजीव दिन भर निजी बैंक में काम करता था। वह सुबह जल्दी निकलता, रात को थका हुआ लौटता। प्रिया हमेशा कहती कि वह माँ की पूरी सेवा करती है। सरला देवी ने कभी बेटे से शिकायत नहीं की। वह सोचतीं, बेटे का घर टूट गया तो दोष उन्हीं पर आएगा।
लेकिन बच्चों की आंखें सब देखती थीं।
एक शाम विवान ने अपने स्कूल बैग से छोटा-सा डिब्बा निकाला। उसमें 2 पूरियां और थोड़ा अचार था।
—दादी, जल्दी खा लो। मम्मी मंदिर गई हैं।
सरला देवी की आंखें भर आईं।
—तुम्हें भूख लगेगी बेटा।
—मैंने कैंटीन से समोसा खा लिया था।
वह झूठ बोल रहा था। सरला देवी समझ गईं।
उसी रात प्रिया ने उन्हें परदे के पीछे सूखी रोटी का टुकड़ा खाते देख लिया।
—फिर चोरी-छिपे निगल रही हैं? शर्म नहीं आती?
सरला देवी के हाथ से रोटी गिर गई।
—भूख लगी थी, बहू।
—भूख? इस घर में कोई आपकी नौकरी नहीं करता। जितना मिल रहा है, उतने में रहिए।
बहुत महीनों बाद सरला देवी की आवाज कांपी, लेकिन टूटी नहीं।
—यह घर मेरी बेची हुई जमीन और मेरे घर के पैसों से आया है।
प्रिया का चेहरा लाल पड़ गया। वह पास आकर झुकी।
—तो क्या रोज यही हिसाब सुनाओगी? एक दिन किसी वृद्धाश्रम में छोड़ आऊंगी, फिर वहीं अपने पैसों का हिसाब करना।
सरला देवी ने छड़ी कसकर पकड़ ली।
—वृद्धाश्रम नहीं भेजती, क्योंकि मेरी पेंशन चाहिए तुम्हें।
प्रिया की आंखों में जहर उतर आया। उसने कोई जवाब नहीं दिया, बस रसोई में जाकर बर्तन पटकने लगी।
उस रात सरला देवी ने नींद नहीं ली। उन्हें पहली बार लगा कि वह घर में नहीं, अपने ही प्यार की गिरवी रखी हुई कैदी हैं। और उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि अगली सुबह जो होने वाला था, वह पूरे परिवार की इज्जत को दरवाजे पर खड़ा कर देगा।
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भाग 2
अगली सुबह प्रिया ने ऐसे व्यवहार किया जैसे कुछ हुआ ही न हो। उसने राजीव और बच्चों के लिए गरम पराठे, दही, आम का अचार और इलायची वाली चाय रखी। सरला देवी के सामने उसने खाली स्टील का गिलास रख दिया और बोली कि आज पेट साफ रखने का दिन है, कल रात बहुत खा लिया था। सरला देवी ने गिलास को देखा, फिर बहू को, मगर बोल नहीं पाईं। आरव की मुट्ठियां कस गईं और विवान की आंखें भर आईं, पर राजीव तब तक ऑफिस निकल चुका था। बच्चों के स्कूल जाते ही सरला देवी ने पुराने मोबाइल से अपनी बचपन की सहेली मीना को फोन किया, जो अब उसी शहर के पुराने इलाके में अकेली रहती थी। रोते हुए उन्होंने कहा कि मीना सही थी, उन्हें अपना घर नहीं बेचना चाहिए था। मीना ने बिना एक पल गंवाए कहा कि उसके घर में बड़ा कमरा खाली है, बिस्तर है, रसोई है और सबसे जरूरी, इज्जत है। सरला देवी चुप रहीं, क्योंकि मां का मन बेटे का घर छोड़ते हुए भी बेटे की बदनामी सोचता है। उसी हफ्ते राजीव ने बताया कि रविवार को उसका जन्मदिन घर पर मनाया जाएगा। बैंक के 4 साथी, उनकी पत्नियां और मोहल्ले के शर्मा अंकल भी आएंगे। प्रिया तिलमिला उठी। उसने कहा कि क्या वह सबको गलियारे में पड़ी बूढ़ी माँ दिखाना चाहता है। पहली बार राजीव ने धीमे पर साफ स्वर में कहा कि शायद गलती यही है कि माँ गलियारे में है। प्रिया उस समय चुप हो गई, लेकिन पार्टी से 2 घंटे पहले उसने सरला देवी को अपने बेडरूम में बंद कर दिया और कहा कि मेहमानों के सामने दया का तमाशा नहीं चाहिए। सरला देवी पलंग के कोने पर बैठी रहीं। बाहर से हंसी, गाने, प्लेटों की आवाज और केक काटने की तैयारी सुनाई देती रही। यही वह बेटा था जिसके लिए उन्होंने बरसों स्कूल की फीस भरने को घरों में अचार बेचा, जिसके जूते फटते थे तो खुद साड़ी नहीं खरीदती थीं। अब उसी बेटे के जन्मदिन पर वह कमरे में छुपाई गई थीं। अचानक दरवाजा खुला। राजीव अंदर आया। उसकी आंखों में अजीब चमक और अपराधबोध था। उसने माँ का हाथ पकड़ा और बाहर ले आया। प्रिया ने उसे घूरा, पर वह नहीं रुका। सबके सामने उसने कहा कि आज वह जो कुछ है, इस औरत की वजह से है, और यह फ्लैट भी उसकी माँ के त्याग से खड़ा है। तालियां बजने लगीं। आरव और विवान दादी से लिपट गए। सरला देवी रो पड़ीं। तभी प्रिया ने तंज कसा कि भाषण देना आसान है, लेकिन एक बीमार और कांपती बूढ़ी औरत के साथ घर चलाना रोज की सजा है। कमरा अचानक चुप हो गया। शर्मा आंटी ने नजरें झुका लीं। राजीव ने बात संभालनी चाही, मगर प्रिया और तेज हो गई। उसने कहा कि कोई नहीं जानता वह क्या सहती है, कौन बदबू साफ करता है, कौन गिरा हुआ खाना उठाता है। सरला देवी का चेहरा सफेद पड़ गया, पर उसी क्षण उन्होंने कांपती आवाज में जन्मदिन का गीत शुरू कर दिया। बच्चों ने साथ दिया, फिर मेहमानों ने भी। प्रिया का अपमान उसी गीत में दब गया। रात को राजीव ने माँ को बर्तन धोते देखा। उनके गाल अंदर धंस गए थे, कलाई सूखी लकड़ी जैसी लग रही थी, और वह अपना कांपता हाथ छुपा रही थीं। उसे लगा जैसे किसी ने उसके सीने में पत्थर रख दिया हो। अगले दिन वह काम से जल्दी लौटा। दरवाजा आधा खुला था। अंदर से प्रिया की आवाज आई कि बूढ़ी चोर फिर फ्रिज से खाना निकाल रही है। राजीव दरवाजे पर ठिठक गया। उसने देखा, सरला देवी आधी रोटी हाथ में लिए बच्चे की तरह डरी खड़ी थीं। प्रिया ने कहा कि वह बिना पूछे खा रही थीं। राजीव ने फ्रिज खोला, फिर माँ के चेहरे को देखा, फिर पत्नी को। उसके मुंह से बस इतना निकला कि क्या इस घर में उसकी माँ को खाने के लिए इजाजत चाहिए। प्रिया ने बात को छोटा बताना चाहा, मगर राजीव की आंखें बदल चुकी थीं। उसने कहा कि 1 साल से वह अंधा था, अब नहीं रहेगा। प्रिया ने रोने की कोशिश की, पर वह नहीं पिघला। उसने माँ को अपने कमरे में बैठाया, पानी दिया, और पहली बार उनसे पूछा कि सच-सच बताइए, आपने कब से भरपेट खाना नहीं खाया। सरला देवी चुप रहीं, लेकिन विवान रोते हुए दौड़ा और बोला कि दादी कई रातें भूखी सोती हैं। आरव ने अपने बैग से खाली डिब्बे दिखाए और बताया कि वह कई बार अपना टिफिन दादी को देता था। उसी पल राजीव ने अपनी माँ के पैरों पर सिर रख दिया। बाहर खड़ी प्रिया ने सुना कि वह कह रहा था, कल सुबह से इस घर का नियम बदलेगा। और प्रिया को पहली बार डर लगा, क्योंकि उसे समझ आ गया कि इस बार बात सिर्फ झगड़े की नहीं, फैसले की है।❤️नमस्ते, प्यारे रीडर्स! अगर आप अगले पार्ट के लिए तैयार हैं, तो प्लीज़ नीचे “Yes” लिखें, और मैं इसे तुरंत भेज दूँगा। मैं उन सभी के अच्छे स्वास्थ्य और खुशी की कामना करता हूँ जिन्होंने यह कहानी पढ़ी और पसंद की है! 💚
भाग 3
सुबह 9 बजे 2 मजदूर एक नया पलंग, छोटा फ्रिज, अलमारी और पूजा की छोटी मेज लेकर आए। प्रिया बाथरूम से निकली तो उसके गीले बाल कंधों से चिपके थे और चेहरा गुस्से से जल रहा था। उसने पूछा कि यह सब क्या है। राजीव ने शांत स्वर में कहा कि यह माँ का कमरा बनेगा। प्रिया चीखी कि यह उनका बेडरूम है। राजीव ने कहा कि था, अब नहीं। मजदूरों ने सामान अंदर रखा। राजीव ने प्रिया के कपड़े सूटकेस में रखकर साफ-सुथरे ढंग से गलियारे के पास रख दिए। प्रिया रोने लगी कि वह पागल हो गया है। राजीव ने कहा कि पागल वह तब था जब माँ को जूतों के पास सुला रहा था। सरला देवी ने घबराकर कहा कि बेटा, उनके कारण घर मत तोड़ो। राजीव उनके सामने घुटनों पर बैठ गया और बोला कि घर तब टूट गया था जब उसकी माँ भूखी थी और वह चैन से खाना खा रहा था। उसने प्रिया से साफ कहा कि माँ की पेंशन का कार्ड अब उनके पास रहेगा, माँ का खाना पहले बनेगा, और वह इस फ्लैट को बेचकर 2 छोटे घर लेने की कोशिश करेगा, 1 माँ के लिए और 1 अपने परिवार के लिए। उस रात प्रिया उसी गलियारे में सोई जहाँ सरला देवी 1 साल सोई थीं। ठंड फर्श से हड्डियों तक आई। जूतों की गंध, बाथरूम की आवाज, सुबह बच्चों की भागदौड़ और दीवार की सीलन ने उसे भीतर तक हिला दिया। वह तुरंत नहीं बदली, क्योंकि अहंकार एक रात में नहीं मरता, लेकिन उसके भीतर कहीं दर्द ने जगह बना ली। सरला देवी नए कमरे में आ गईं। उन्होंने छोटे फ्रिज में दूध, फल, मिठाई और बच्चों के लिए रसगुल्ले रखे। आरव और विवान स्कूल से लौटते ही उनके कमरे में बैठ जाते, होमवर्क करते, पुरानी कहानियां सुनते और दादी की प्लेट में जबरदस्ती 2 रोटियां रख देते। प्रिया बाहर से सुनती रहती। कोई उसे निकाल नहीं रहा था, पर कोई उसे बुला भी नहीं रहा था। शनिवार को मीना आई। उसने पीली साड़ी पहनी थी, हाथ में बड़ा डिब्बा था और आवाज में वही पुरानी दोस्ती। उसने कहा कि वह अपनी सरला को लेने आई है। दोनों सहेलियां गले मिलीं तो सरला देवी वर्षों बाद बच्ची की तरह रो पड़ीं। रात भर वे पुरानी गलियों, सावन के झूलों, करवा चौथ की मेहंदी और अधूरी इच्छाओं की बातें करती रहीं। राजीव ने माँ को हंसते देखा तो उसे महसूस हुआ कि उसने उनकी उम्र से 1 साल नहीं, शायद कई साल चुरा लिए थे। अगले दिन मीना ने कहा कि अगर राजीव को आपत्ति न हो तो सरला उसके साथ रहेगी, 2 बूढ़ी औरतें मिलकर अकेलेपन से बेहतर लड़ लेंगी। राजीव का गला भर आया। उसने कहा कि यह भी माँ का घर है। सरला देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा और बोलीं कि उन्हें यह पता है, लेकिन अब उन्हें शांति चाहिए, और राजीव को अपना घर ठीक करना है। दरवाजे के पीछे खड़ी प्रिया ने सब सुना। जब सरला देवी छोटी-सी अटैची लेकर निकलने लगीं, प्रिया उनके सामने आकर खड़ी हो गई। उसका चेहरा टूटा हुआ था। उसने पहली बार सास के पैर छुए और रोते हुए कहा कि उसे माफ कर दें, उसे समझ नहीं आया कि वह कब इतनी कठोर हो गई। सरला देवी ने उसे उठाया। उनकी आंखों में दर्द था, पर नफरत नहीं। उन्होंने कहा कि वह उसे बर्बाद देखना नहीं चाहतीं, बस इतना चाहती हैं कि वह याद रखे, एक दिन हर चेहरा बूढ़ा होता है और हर हाथ कांपता है। घर कुछ दिन खाली-खाली रहा। फिर 1 रविवार प्रिया ने खीर, पूरी और आलू की सब्जी बनाई। राजीव ने पूछा कि किसके लिए। उसने धीमे से कहा कि माँ के लिए, अगर वह आने दे। मीना के घर पहुंचने पर दरवाजे पर तुलसी थी, अंदर चाय की खुशबू और मेज पर सादगी के साथ सम्मान रखा था। बच्चों ने दादी को घेर लिया। प्रिया ने बिना दिखावे के थाली लगाई। किसी ने पुराने घावों का नाम नहीं लिया, पर सब जानते थे कि वे वहीं बैठे हैं। शाम को राजीव बाहर निकला तो गली के मोड़ पर 1 छोटा घर बिकता दिखा, नीला दरवाजा, छोटा आंगन और कोने में आम का पौधा। वह देर तक देखता रहा। लौटकर उसने माँ से कहा कि शायद फिर से शुरू किया जा सकता है। प्रिया ने सरला देवी का हाथ पकड़ा और बोली कि इस बार बिना गलियारे, बिना भूख और बिना अपमान के। सरला देवी ने तुरंत जवाब नहीं दिया। उन्होंने बच्चों को आंगन में हंसते देखा, बेटे की झुकी आंखें देखीं, बहू की सच्ची शर्म देखी और समझ गईं कि न्याय हमेशा शोर मचाकर नहीं आता, कभी-कभी वह एक भरी हुई थाली, एक बंद दरवाजा खोलने और किसी को उसकी जगह वापस देने से आता है। उस दिन सरला देवी ने 1 साल बाद पेट भरकर खाना खाया, और उनकी आंखों से गिरा आखिरी आंसू दुख का नहीं, लौटती हुई इज्जत का था।
