मैंने 1985 की मुंबई की जलती दोपहर में एक डॉन को 9 कुल्फियाँ मुफ्त दीं… अगले दिन उसने मेरी बीमार पत्नी और भूखे बच्चों की जिंदगी बदल दी, लेकिन बदले में जो राज मिला उसने हमें मौत के मुँह तक पहुँचा दिया

भाग 1

उस रात जब शर्मा परिवार फर्श पर बिछे पुराने गद्दों पर भूखा सो रहा था, किसी ने उनके टूटे दरवाजे के नीचे 18,000 रुपये नहीं, बल्कि उनकी पूरी किस्मत सरका दी थी।

1985 की गर्मियों में मुंबई आग की भट्ठी बनी हुई थी। धारावी की गलियों में टीन की छतें तप रही थीं, नालों से उठती बदबू हवा में चिपकी थी, और लोग दोपहर होते ही अपने कमरों में ऐसे बंद हो जाते जैसे बाहर कोई मौत घूम रही हो। उसी दिन तापमान 38ºC तक पहुँच गया था, और विक्रम शर्मा अपने पुराने आइसक्रीम ठेले को धकेलता हुआ बांद्रा की अमीर बस्तियों की तरफ निकल पड़ा था।

विक्रम 43 साल का था। रंग धूप से सांवला पड़ चुका था, हथेलियाँ फटकर खुरदरी हो गई थीं, मगर चेहरे पर ऐसी नम्र मुस्कान रहती थी जैसे गरीबी ने उससे सब कुछ छीना हो, पर इंसानियत नहीं। उसके ठेले पर नीले रंग से टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था, “शर्मा कुल्फी हाउस।” अंदर आम, संतरा, गुलाब, नारियल, चॉकलेट और मलाई कुल्फी रखी थी। आम दिनों में इस समय तक वह 30 से ज्यादा कुल्फी बेच चुका होता, मगर उस दिन सिर्फ 6 बिकी थीं।

घर में उसकी पत्नी सुशीला तेज बुखार में पड़ी थी। खाँसी इतनी भयानक थी कि बच्चों की नींद टूट जाती। डॉक्टर ने दवा लिखी थी, लेकिन दवा 400 रुपये की थी। घर में 90 रुपये भी पूरे नहीं थे। उसके 4 बच्चे—पूजा, मोहन, राजू और छोटी मीना—सुबह से सिर्फ चावल का पानी पीकर बैठे थे।

विक्रम ने एक पेड़ की पतली छाँव में ठेला रोका, माथे का पसीना गमछे से पोंछा और धीरे से बोला,

—हे भगवान, आज कोई रास्ता दिखा दे।

बेचैनी में उसने बांद्रा की उस कॉलोनी में जाने का फैसला किया जहाँ वह कभी नहीं जाता था। ऊँची दीवारें, लोहे के गेट, विदेशी कारें और बड़े-बड़े बंगले। उसे लगता था उसका ठेला वहाँ गंदा दिखेगा। लेकिन उस दिन उसके पास शर्म से ज्यादा मजबूरी थी।

—कुल्फी ले लो! ठंडी कुल्फी!

करीब आधे घंटे तक किसी ने उसे नहीं रोका। तभी उसने सड़क के किनारे 6 आदमियों को देखा। 5 आदमी तने हुए बदन, काली शर्ट और चौकन्नी आँखों वाले थे। छठा आदमी सफेद कुरता-पायजामा पहने था, गले में सोने की चेन, घनी मूँछें और आँखों में अजीब-सी थकान। उसके आसपास खड़े लोगों की उँगलियाँ बार-बार कमर के पास जा रही थीं।

विक्रम समझ गया, ये सामान्य लोग नहीं हैं। फिर भी वह पास गया।

—साहब, कुल्फी ठंडी है। इस गर्मी में थोड़ी राहत मिल जाएगी।

एक आदमी अचानक आगे बढ़ा।

—दूर रह!

विक्रम का गला सूख गया। मगर मूँछों वाला आदमी हाथ उठाकर बोला,

—छोड़ो उसे। गरीब आदमी है, धंधा कर रहा है।

उसने विक्रम को देखा।

—क्या है तेरे पास?

विक्रम ने काँपते हाथों से ढक्कन खोला।

—आम, मलाई, गुलाब, चॉकलेट, नारियल, साहब।

उस आदमी ने आम की कुल्फी ली। फिर बाकी लोगों ने भी ले ली। कुल 9 कुल्फियाँ हुईं। विक्रम ने हिसाब लगाया।

—साहब, 18,000 रुपये होंगे।

मूँछों वाले आदमी ने जेब टटोली। फिर दूसरी। फिर पीछे की जेब। उसका चेहरा बदल गया।

—अरे… मेरे पास पैसे नहीं हैं।

उसने अपने लोगों की तरफ देखा।

—किसी के पास कैश है?

सभी ने जेबें देखीं। किसी के पास पैसा नहीं था।

विक्रम के भीतर जैसे कुछ टूट गया। 18,000 रुपये उसके लिए दवा, राशन और 4 बच्चों की रात का खाना थे। कुल्फियाँ उनके हाथों में थीं। वे खा चुके थे।

मूँछों वाला आदमी सचमुच शर्मिंदा लगा।

—भाई, नाम बता। कहाँ मिलता है तू? कल दोगुना दे दूँगा।

विक्रम ने अपने ठेले को देखा, फिर उन आदमियों को, जो इस आग जैसे दिन में कुछ पलों की ठंडक से राहत महसूस कर रहे थे। उसे सुशीला का तपता माथा याद आया। बच्चों का खाली पेट याद आया। फिर भी उसके मुँह से निकला,

—रहने दीजिए साहब। गर्मी सबके लिए एक जैसी होती है। आज मेरी तरफ से समझिए।

मूँछों वाला आदमी चौंक गया।

—तू पक्का बोल रहा है?

—हाँ साहब। भगवान आपका भला करे।

उस आदमी ने उसका हाथ पकड़ा।

—नाम क्या है तेरा?

—विक्रम शर्मा।

—मैं आरिफ हूँ।

विक्रम ने सिर झुकाया और ठेला लेकर आगे बढ़ गया। दिन खत्म हुआ तो उसके पास सिर्फ 320 रुपये थे। दवा 400 रुपये की थी, खाना अलग। वह रात को अपने छोटे भाई रमेश के पास गया और उधार माँगा। रमेश खुद टैक्सी चलाता था, मगर उसने जेब से आखिरी नोट निकालकर दे दिए।

—भाभी पहले ठीक होनी चाहिए। बाकी बाद में देखेंगे।

उस रात सुशीला दवा पीकर लेटी रही। बच्चे फर्श पर बिछे पतले गद्दों पर सो गए। विक्रम ने धीरे से सच बताया।

—आज मैंने 18,000 रुपये की कुल्फी मुफ्त दे दी।

सुशीला ने कमजोर आँखों से उसे देखा।

—क्यों?

—उनके पास पैसे नहीं थे। और पता नहीं क्यों, मुझे लगा उनसे पैसे माँगना ठीक नहीं होगा।

सुशीला ने उसका हाथ पकड़ लिया।

—तू गरीब है विक्रम, मगर छोटा आदमी नहीं है।

अगली दोपहर विक्रम कम सामान लेकर निकला, क्योंकि माल भरने के पैसे नहीं थे। वह माहिम के पास पहुँचा ही था कि एक काली जीप उसके ठेले के सामने रुक गई। वही लोग उतरे। विक्रम का दिल जोर से धड़कने लगा।

—साहब बुला रहे हैं।

उसे बांद्रा के एक सुनसान बंगले में ले जाया गया। अंदर वही मूँछों वाला आदमी बैठा था। इस बार उसके आसपास और भी हथियारबंद लोग थे।

वह मुस्कुराया।

—आ गया हमारा कुल्फीवाला।

फिर उसने टेबल पर एक बड़ा बैग रखा।

—कल तूने 18,000 रुपये छोड़े थे। आज मैं तेरा हिसाब पूरा करता हूँ।

विक्रम ने बैग खोला। अंदर नोटों की गड्डियाँ, घर के कागज और एक नई सफेद वैन की चाबी रखी थी।

विक्रम के होंठ काँपे।

—साहब… ये क्या है?

मूँछों वाले आदमी ने धीरे से कहा,

—मेरा पूरा नाम आरिफ कासिम है।

विक्रम के पैरों से जमीन खिसक गई। यह वही नाम था जिससे मुंबई के पुलिसवाले काँपते थे, अखबार डरते हुए छापते थे, और लोग दरवाजे बंद कर लेते थे।

आरिफ कासिम ने उसकी आँखों में डर पढ़ लिया।

—हाँ, वही आरिफ। अब सुन, विक्रम शर्मा… तूने कल यह जाने बिना मदद की कि मैं कौन हूँ। ऐसे लोग इस शहर में बहुत कम बचे हैं। इसलिए आज तेरे लिए 1 घर है, तेरी पत्नी का इलाज है, तेरे बच्चों की पढ़ाई है और यह वैन है। मगर इसके साथ एक राज भी आएगा… ऐसा राज, जो अगर बाहर गया, तो तेरी पूरी दुनिया जल जाएगी।

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भाग 2

विक्रम उस रात नई वैन लेकर धारावी पहुँचा तो पूरी गली बाहर आ गई। बच्चे तालियाँ बजा रहे थे, औरतें फुसफुसा रही थीं, पुरुष शक से देख रहे थे। सुशीला दरवाजे पर खड़ी थी, बुखार से पीली, मगर आँखों में डर साफ था। —ये सब कहाँ से आया, विक्रम? विक्रम ने बच्चों को अंदर भेजा और धीरे से बोला, —जिस आदमी को मैंने कल कुल्फी दी थी… वह आरिफ कासिम था। सुशीला का चेहरा सफेद पड़ गया। —तू पागल हो गया है? उस आदमी का नाम भी घर में मत लेना। —उसने कोई शर्त नहीं रखी। बस कहा कि बच्चों को पढ़ाऊँ, तुझे इलाज करवाऊँ। —ऐसे लोग बिना शर्त कुछ नहीं देते। बात सच निकली। अगले 10 दिन सपने जैसे थे। सुशीला को निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ डॉक्टर ने कहा कि उसकी छाती का संक्रमण गंभीर है; 2 हफ्ते और देर होती तो जान जा सकती थी। बच्चों का दाखिला एक अच्छे स्कूल में हो गया। बांद्रा की एक छोटी मगर पक्की चॉल-नुमा इमारत में उन्हें 2 कमरों का घर मिला। वैन में फ्रीजर लगा, नया बोर्ड लगा—“विक्रम आइसक्रीम सर्विस।” कमाई इतनी बढ़ी कि 1 महीने में उसने पहली बार घर में पंखा खरीदा। मगर हर खुशी के पीछे आरिफ की छाया खड़ी थी। एक रात 2 आदमी आए। —भाई बुला रहे हैं। विक्रम को मझगाँव की एक पुरानी हवेली में ले जाया गया। आरिफ खिड़की के पास खड़ा था। बाहर बारिश हो रही थी। —मेरे दुश्मन बढ़ गए हैं, पुलिस भी पीछे है। मेरी बीवी नजमा और मेरे दोनों बच्चे छिपे हुए हैं। मुझे किसी ऐसे आदमी की जरूरत है जिस पर कोई शक न करे। —मैं अपराधी नहीं हूँ साहब। —मैंने तुझसे अपराध नहीं माँगा। बस संदेश पहुँचाने हैं। बच्चों को दवा, कपड़े, स्कूल की किताबें। तू कुल्फीवाला है। कोई शक नहीं करेगा। विक्रम जानता था कि यह रास्ता खतरनाक है। मगर उसे अस्पताल में सुशीला की साँसें याद आईं, बच्चों की स्कूल ड्रेस याद आई, फर्श से उठकर पहली बार बिस्तर पर सोती मीना याद आई। —मैं करूँगा, मगर हथियार, पैसा या गलत सामान नहीं छुऊँगा। आरिफ मुस्कुराया। —इसीलिए तो चुना है तुझे। इसके बाद विक्रम की जिंदगी दो हिस्सों में बँट गई। दिन में वह बच्चों को आइसक्रीम बेचता, रात में नजमा तक चिट्ठियाँ पहुँचाता। नजमा कोई रानी नहीं थी; वह डरी हुई माँ थी, जो हर आवाज पर काँप जाती। उसका बेटा समीर पिता की फोटो देखकर चुप रहता, बेटी आयशा पूछती, —अंकल, अब्बू कब आएँगे? विक्रम के पास जवाब नहीं होता। सुशीला ने कुछ ही दिनों में सब समझ लिया। —तू हमें बचाने के चक्कर में हमें मरवा देगा। —मैं किसी का खून नहीं कर रहा, सुशीला। बस एक माँ और बच्चों की मदद कर रहा हूँ। —वह माँ एक डॉन की पत्नी है। —बच्चे डॉन नहीं हैं। सुशीला रो पड़ी। —तेरी अच्छाई मुझे डराती है। 1993 आया, और मुंबई फट पड़ी। धमाके, गोलियाँ, पुलिस की रेड, गैंगवार, हर गली में शक। आरिफ का नाम हर अखबार में था। विक्रम ने दूरी बनानी चाही, मगर एक दिन समीर की हालत खराब हो गई। नजमा का फोन आया। —भाईजान, बच्चे को तेज बुखार है। कोई डॉक्टर नहीं आ रहा। विक्रम दवा लेकर पहुँचा, मगर लौटते वक्त पुलिस ने उसकी वैन रोक ली। अंदर से आरिफ की लिखी चिट्ठी गिर गई। एक इंस्पेक्टर ने उसे पढ़ा और विक्रम के गाल पर थप्पड़ मार दिया। —तो तू डॉन का आदमी है? विक्रम को थाने ले जाया गया। 2 रातें उसे पीटा गया। —कहाँ छिपा है आरिफ? —मुझे नहीं पता। —झूठ बोलता है कुल्फीवाले! तीसरी रात रमेश उसे छुड़ाने आया। उसने पुलिसवालों को पैसे दिए, अपना टैक्सी परमिट गिरवी रखा। घर लौटकर उसने विक्रम को धक्का दिया। —तूने हमारी इज्जत मिट्टी में मिला दी। जिस आदमी ने तुझे उठाया, वही तुझे कब्र में डालेगा। विक्रम चुप रहा। उसी रात सुशीला ने कहा, —कसम खा कि अब उस परिवार से नहीं मिलेगा। विक्रम ने बच्चों की तरफ देखा। पूजा डॉक्टर बनने का सपना देख रही थी, मोहन मास्टर, राजू मशीनें खोलता रहता था, मीना समाजसेविका बनने की बातें करती थी। वह टूट गया। —कसम खाता हूँ। मगर किस्मत ने उसे कसम निभाने ही नहीं दी। दिसंबर की एक शाम उसके ठेले पर एक बच्चा पर्ची छोड़ गया—“आज आखिरी बार। अगर दोस्ती सच थी, तो आना।” विक्रम काँप गया। पता अंधेरी के एक पुराने मकान का था। जब वह पहुँचा, आरिफ पहले जैसा नहीं था। दाढ़ी बढ़ी, आँखों के नीचे काले घेरे, हाथ में बंदूक नहीं, बच्चे की पुरानी फोटो थी। —वे मुझे आज या कल मार देंगे। यह नजमा और बच्चों को देना। उसने एक लिफाफा विक्रम के हाथ में रखा। —इसमें पैसे नहीं, सच है। मेरे दुश्मनों, मेरे सौदों, मेरे गुनाहों की सूची। अगर मेरे लोग मेरे परिवार को मारने आएँ, तो इसे सही हाथों में देना। विक्रम पीछे हटा। —मैं यह नहीं ले सकता। —तू ही ले सकता है। क्योंकि तू मेरे गिरोह का आदमी नहीं, मेरा आईना है। तभी बाहर ब्रेकों की चीख सुनाई दी। गोलियों की आवाज गूँजी। आरिफ ने विक्रम को धक्का देकर पीछे के दरवाजे से बाहर किया। —भाग! और इस बार मेरी मदद नहीं, मेरे पापों से मेरे बच्चों को बचा। ❤️नमस्ते, प्यारे रीडर्स! अगर आप अगले पार्ट के लिए तैयार हैं, तो प्लीज़ नीचे “Yes” लिखें, और मैं इसे तुरंत भेज दूँगा। मैं उन सभी के अच्छे स्वास्थ्य और खुशी की कामना करता हूँ जिन्होंने यह कहानी पढ़ी और पसंद की है! 💚

भाग 3

विक्रम लिफाफा छाती से चिपकाए भागा। पीछे से गोलियाँ, पुलिस की सीटी और लोगों की चीखें सुनाई दे रही थीं। आधे घंटे बाद रेडियो पर खबर आई—“मुंबई पुलिस की मुठभेड़ में कुख्यात आरिफ कासिम मारा गया।” विक्रम सड़क किनारे बैठ गया। उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े। वह जानता था आरिफ ने बहुत घर उजाड़े थे, मगर यह भी सच था कि उसी ने उसके घर की साँस बचाई थी। उसी रात वह नजमा के ठिकाने पहुँचा। नजमा बच्चों को पकड़े रेडियो सुन रही थी। —वह चला गया? विक्रम ने सिर झुका दिया। समीर पत्थर की तरह खड़ा रहा। आयशा जोर-जोर से रोने लगी। विक्रम ने लिफाफा नजमा को दिया। अंदर आरिफ की चिट्ठियाँ थीं, कुछ गुप्त खाते, दुश्मनों के नाम और सबसे बड़ी बात—उन पुलिसवालों और गिरोह के लोगों की सूची जो आरिफ की मौत के बाद नजमा और बच्चों को खत्म करना चाहते थे। आरिफ ने लिखा था, “विक्रम, अगर तू यह पढ़ रहा है तो समझ ले मैं हार गया। मेरे बच्चों को मेरे नाम की सजा मत भुगतने देना।” विक्रम ने उसी रात फैसला लिया। उसने लिफाफे की कॉपी बनवाई और एक ईमानदार पत्रकार को भेज दी, जिसका नाम सीमा देशमुख था। सीमा ने सबूत सार्वजनिक किए। शहर में हड़कंप मच गया। आरिफ के गिरोह के कई लोग पकड़े गए, कुछ पुलिस अफसर निलंबित हुए, और नजमा के बच्चों को सरकारी सुरक्षा मिली। मगर इसके बाद विक्रम पर हमला हुआ। एक रात उसकी आइसक्रीम वैन में आग लगा दी गई। रमेश घायल हुआ। सुशीला ने रोते हुए कहा, —देखा? मैंने कहा था न, यह आग हमारे घर आएगी। विक्रम ने पहली बार टूटकर जवाब दिया, —हाँ, आग आई है। पर अगर हम चुप रहे तो यह आग उन बच्चों को जला देगी जिनका कोई दोष नहीं। सुशीला ने देर तक उसे देखा, फिर धीरे से बोली, —तो इस बार मैं भी तेरे साथ हूँ। उन्होंने नजमा और बच्चों को छिपाने में मदद की। कुछ महीनों बाद वे भारत छोड़कर खाड़ी देश चले गए। जाते समय नजमा ने विक्रम के पैर छूने चाहे, मगर विक्रम पीछे हट गया। —ऐसा मत कीजिए बहन। —आपने हमें उस नाम से नहीं देखा जिससे दुनिया हमें नफरत करती है। आपने हमें इंसान समझा। साल बीतते गए। विक्रम ने फिर से वैन खरीदी। फिर 2, फिर 5, फिर 12। उसने अपना धंधा बढ़ाया, लेकिन हर गाड़ी में 1 नियम लिखा था—“हर दिन 20 गरीब बच्चों को मुफ्त आइसक्रीम।” पूजा डॉक्टर बनी और झुग्गियों में इलाज करने लगी। मोहन सरकारी स्कूल में शिक्षक बना। राजू ने सस्ती कोल्ड स्टोरेज मशीनें बनाईं ताकि छोटे विक्रेता माल बचा सकें। मीना ने हिंसा से प्रभावित परिवारों के लिए संस्था बनाई—“नई रोशनी।” रमेश, जिसने कभी उसे डाँटा था, अब कहता था, —भैया, तू पागल था, मगर अच्छे कारण से। 15 साल बाद दुबई से एक पत्र आया। समीर ने लिखा था कि वह इंजीनियर बन गया है, आयशा डिजाइनर है, और नजमा हर शुक्रवार विक्रम के परिवार के लिए दुआ करती है। पत्र में आरिफ की पुरानी तस्वीर भी थी। पीछे लिखा था—“विक्रम, तूने मुझे मेरी औकात दिखाई। काश मैं तेरे जैसा होता।” विक्रम देर तक उस तस्वीर को देखता रहा। वह आरिफ को संत नहीं मानता था। वह उसके अपराधों को माफ नहीं कर सकता था। लेकिन वह यह भी झूठ नहीं बोल सकता था कि एक अपराधी के भीतर कहीं एक पिता, एक गरीब अतीत और पछतावे की राख बची थी। 65 साल की उम्र में विक्रम को कॉलेज में बुलाया गया। उसने मंच पर कहा, —मैं बड़ा आदमी नहीं हूँ। मैं आइसक्रीम बेचने वाला हूँ। मैंने 9 कुल्फियाँ मुफ्त दी थीं। बदले में मुझे घर मिला, इलाज मिला, बच्चों का भविष्य मिला। लेकिन उसी उपहार के साथ डर, पुलिस, गोली और अपराध की छाया भी आई। इसलिए याद रखना, अच्छाई करो, मगर आँखें खोलकर। किसी की मदद लो, मगर अपनी आत्मा मत बेचो। असली दौलत पैसा नहीं, वह लोग हैं जिनकी जिंदगी तुम्हारे कारण थोड़ी कम अंधेरी हो जाए। 83 साल की उम्र में जब विक्रम बीमार पड़ा, उसने आखिरी इच्छा जताई। —मुझे एक बार वैन में बैठाकर पुरानी गली ले चलो। बच्चे, पोते और सुशीला, जो अब भी कमजोर मगर जिद्दी थी, उसे लेकर धारावी गए। बच्चों ने घंटी सुनी तो दौड़ पड़े। मीना ने मुफ्त आइसक्रीम बाँटी। फिर वे बांद्रा की उसी सड़क पर पहुँचे जहाँ 38ºC की गर्मी में 9 कुल्फियाँ दी गई थीं। विक्रम ने खिड़की से बाहर देखा। —यहीं से सब शुरू हुआ था। मोहन ने पूछा, —बाबा, आपको कभी पछतावा हुआ? विक्रम ने धीमी साँस ली। —अच्छा बनने का पछतावा नहीं। डर जरूर हुआ। दुख भी हुआ। पर पछतावा नहीं। उस रात उसने परिवार से कहा, —किसी इंसान को उसके सबसे बुरे काम से पूरा मत समझो, और उसके सबसे अच्छे काम से भी पूरा मत मानो। हर इंसान में रोशनी और अंधेरा दोनों होते हैं। तुम हमेशा रोशनी चुनना। उसी रात विक्रम शर्मा चला गया। उसके अंतिम संस्कार में हजारों लोग आए—आइसक्रीम खाने वाले बच्चे, उसके कर्मचारी, डॉक्टर पूजा के मरीज, मोहन के छात्र, राजू के छोटे व्यापारी, मीना की संस्था से बचाए गए परिवार। भीड़ के पीछे एक औरत काले दुपट्टे में खड़ी थी। वह नजमा थी। उसके साथ समीर और आयशा भी थे। नजमा ने सुशीला से कहा, —आपके पति ने मेरे बच्चों को मेरे पति के पापों से बचाया। दुनिया उन्हें कुल्फीवाला कहेगी, मगर मेरे लिए वे फरिश्ता थे। कुछ साल बाद उसी जगह एक छोटी पट्टिका लगाई गई—“यहाँ 1985 की गर्मी में विक्रम शर्मा ने 9 कुल्फियाँ मुफ्त दी थीं। उस छोटे कर्म ने सैकड़ों जिंदगियाँ बदल दीं। याद रहे, दया कभी छोटी नहीं होती।” और मुंबई की गलियों में आज भी जब कोई बच्चा मुफ्त आइसक्रीम पाकर मुस्कुराता है, लोग कहते हैं—यह विक्रम शर्मा की बची हुई रोशनी है।

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