माता सीता ने मेघनाथ को बताया अशोक वाटिका का सबसे बड़ा सच 😱 | 99% लोग नहीं जानते!

माता सीता 6 महीने से लंका में बंदी थी, लेकिन एक रात मेघनाथ चुपचाप अशोक वाटिका पहुंचा और उसने जो सुना, उसने उसकी पूरी दुनिया बदल दी। वो सच जो आज तक किसी ने नहीं बताया। सुनिए इस कथा में। मित्रों, लंका की रातें बाकी दुनिया से अलग होती थी। यहां रात में भी सोने [संगीत] की चमक थी। हाथियों की चिंघाड़ थी, रथों की गड़गड़ाहट थी। लेकिन उस रात जब पूरी लंका जश्न में डूबी [संगीत] थी और रावण के दरबार में मदिरा के प्याले छलक रहे थे। एक योद्धा चुपचाप अशोक वाटिका की ओर चला जा रहा था। वो कोई साधारण सैनिक नहीं था। वो था मेघनाथ। रावण का ज्येष्ठ पुत्र इंद्रजीत जिसने स्वयं इंद्र को बंदी बनाया था। मेघनाथ के मन में उस रात एक अजीब बेचैनी थी। उसने युद्ध के मैदान देखे थे। देवताओं को हराया था। ब्रह्मास्त्र चलाया था। लेकिन आज उसके कदम किसी और वजह से भारी थे। बात यह थी कि उसके पिता रावण ने माता सीता को लाने के छ महीने बीत चुके थे। और उन छ महीनों में सीता माता ने ना कुछ खाया था ना किसी से बात की थी। हर दिन राक्षसियां आकर यही खबर लाती थी। वह देवी अभी भी वैसी ही बैठी हैं। मेघनाथ को यह समझ नहीं आ रहा था। उसने दुनिया में बहुत सी स्त्रियां देखी थी। रोती हुई, गिड़गिड़ाती हुई, समय के साथ टूटती हुई।

लेकिन यह स्त्री टूट नहीं रही थी। यह स्त्री तो जैसे पत्थर से भी ज्यादा मजबूत थी। उसके मन में एक जिज्ञासा थी। आखिर इस स्त्री में ऐसी कौन सी शक्ति है जो इसे टूटने नहीं दे रही? क्या यह सिर्फ राम का प्रेम है? या इसके पीछे कोई और सच है? अशोक वाटिका में प्रवेश करते ही मेघनाथ रुक गया। वहां का वातावरण ही अलग था। बाकी लंका में जो तेज और घमंड का भाव था वह यहां नहीं था। यहां एक अजीब सी शांति थी। जैसे किसी तपस्वी के आश्रम में होती है। अशोक के पेड़ों की छाया में एक छोटी सी शिला पर माता सीता बैठी थी। उनके हाथ जोड़े हुए थे। होठ हिल रहे थे। वह राम नाम

जप रही थी। उनके चेहरे पर ना भय था ना घबराहट। बस एक गहरी अटूट स्थिरता थी। मेघनाथ ने पहले कभी माता सीता को इतने करीब से नहीं देखा था। उसने सोचा था कि वह एक साधारण मनुष्य की पत्नी है। सुंदर हां लेकिन आखिर मनुष्य ही तो हैं। लेकिन आज उनके पास खड़े होकर उसे एक अजीब अनुभव हुआ। उनके इर्दगिर्द एक अदृश्य तेज था। जैसे किसी दीपक के चारों तरफ प्रकाश का घेरा होता है। मेघनाथ अनजाने में ही एक कदम पीछे हट गया। कौन है वहां? माता सीता ने आंखें खोले बिना ही पूछा। मेघनाथ एक पल के लिए हिचकिचाया। फिर उसने अपना परिचय दिया। मैं मेघनाथ हूं देवी। रावण का

पुत्र। माता सीता ने धीरे से आंखें खोली। उनकी आंखों में ना क्रोध था ना भय। बस एक शांत दृष्टि थी जो मेघनाथ को भीतर तक देख रही थी। उन्होंने कहा, “मैं जानती थी तुम आओगे।” बैठो।” मेघनाथ चौंक गया। उसने ऐसे स्वागत की उम्मीद नहीं की थी। [संगीत] वह धीरे से एक पत्थर पर बैठ गया। लंका के सबसे भयंकर योद्धा की तरह नहीं बल्कि एक जिज्ञासु की तरह। तुम यहां क्यों आए? सीता माता ने पूछा। मेघनाथ ने सच बोला। यह जानने कि तुम टूटती क्यों नहीं? सीता माता के होठों पर एक हल्की मुस्कान आई। उन्होंने कहा, “यह प्रश्न पूछने के लिए तुम्हें साहस चाहिए था मेघनाथ और इस साहस

के लिए मैं तुम्हें उत्तर दूंगी। लेकिन उत्तर सुनने के बाद शायद तुम्हारी दुनिया बदल जाए। मेघनाथ ने गहरी सांस ली और बोला, मैं सुनने को तैयार हूं। लेकिन दर्शक बंधु माता सीता और मेघनाथ की इस दिव्य कथा को आगे बढ़ाने से पहले एक अत्यंत गंभीर और आवश्यक बात जान लेना बहुत जरूरी है। हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथों में स्पष्ट कहा गया है कि सीता माता और श्री राम से जुड़ी किसी भी पावन कथा को यदि बीच में छोड़ दिया जाए तो वह केवल अधूरा ज्ञान ही नहीं देती बल्कि मन में शंका, भ्रम और अधूरा सत्य छोड़ जाती है। [संगीत] यह कथा केवल एक कहानी नहीं है। यह माता सीता की

उस अटूट शक्ति का रहस्य है जो अशोक वाटिका में भी नहीं टूटी और अधूरी कथा उस रहस्य को कभी नहीं खोलती [संगीत] जिससे व्यक्ति उस गहरे सत्य से वंचित रह जाता है जो उसके अपने जीवन की दिशा बदल सकता था। इसीलिए आपसे विनम्र निवेदन है कि माता सीता मेघनाथ और श्री राम की इस पावन कथा को अंत तक अवश्य सुने क्योंकि यह केवल एक प्रसंग नहीं बल्कि जीवन का दर्पण है। इसमें आप अपने कर्मों का, अपने अहंकार का और अपने धर्म का परिणाम देखेंगे। हो सकता है इस कथा का कोई एक वाक्य, कोई एक संवाद आपके रुके हुए जीवन को नई दिशा दे दे। आपको भ्रम, क्लेश और मानसिक अशांति से बाहर

निकाल लें। और यदि आप स्वयं को एक सच्चा सनातनी मानते हैं तो यह आपका भी धर्म बनता है कि माता सीता की इस दिव्य शिक्षा को केवल अपने तक सीमित ना रखें। इसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं। इसलिए इस वीडियो [संगीत] को लाइक करें। अपने मित्रों और परिवार के साथ शेयर करें और हमारे चैनल अनमोल महाभारत को सब्सक्राइब करना ना भूलें ताकि माता सीता और श्री राम की कृपा से धर्म सत्य और जीवन की गहरी शिक्षाएं आपको निरंतर प्राप्त होती रहे। तो आइए श्रद्धा, संयम और विश्वास के साथ इस पावन कथा को अब आगे बढ़ाते हैं। वाटिका में रात का सन्नाटा और गहरा हो गया था। दूर कहीं

से लंका के उत्सव की आवाजें आ रही थी। लेकिन यहां जैसे समय थम गया हो। माता सीता ने एक पल मेघनाथ को देखा। फिर बोलना शुरू किया। उनकी आवाज शांत थी। लेकिन उसमें एक गहराई थी जो मेघनाथ को अंदर तक छू रही थी। मेघनाथ तुमने पूछा कि मैं टूटती क्यों नहीं? इसका उत्तर यह है कि मैं यहां बंदी बनकर नहीं आई हूं। मैं यहां अपनी इच्छा से हूं। मेघनाथ की भौहें चढ़ गई। अपनी इच्छा से देवी मेरे पिता ने तुम्हें बलपूक यहां लाया है। यह तो सारा संसार जानता है। सीता माता ने धीरे से सिर हिलाया। नहीं मेघनाथ तुम्हारे पिता का रथ मेरे शरीर को यहां ले

आया। यह सच है। लेकिन मेरी आत्मा मेरी आत्मा वहीं है जहां राम है। और जहां आत्मा है वहीं तो असली स्त्री है। जो यहां बैठी है वह केवल एक देह है और देह को बंदी बनाया जा सकता है। आत्मा को नहीं। मेघनाथ ने यह बात पहले कभी किसी से नहीं सुनी थी। उसने युद्ध शास्त्र पढ़ा था, वेद पढ़े थे, तंत्र मंत्र सीखे थे। लेकिन यह दर्शन यह उसे विचलित कर रहा था। उसने कहा, लेकिन देवी तुम यहां कष्ट में हो। यह तो दिखता है। कष्ट सीता माता ने हल्के से कहा, मेघनाथ जिसने अपना मन किसी एक में लगा दिया हो, उसे बाहरी कष्ट छूते नहीं। मुझे भूख [संगीत] नहीं लगती क्योंकि राम का नाम

मेरे लिए भोजन है। मुझे नींद नहीं आती क्योंकि उनका ध्यान मेरे लिए विश्राम है और मुझे डर नहीं लगता क्योंकि उनका विश्वास मेरे लिए कवच है। लेकिन मेघनाथ ने बात काटी अगर राम इतने शक्तिशाली हैं, इतने महान हैं तो वह तुम्हें बचाने अब तक क्यों नहीं आए? छ महीने हो गए हैं। तुम यहां अकेली हो और वो सीता माता ने हाथ उठाया और मेघनाथ रुक गया। उनकी आंखों में एक अजीब चमक आई। वह चमक जो किसी मां की आंखों में होती है जब उसके बच्चे को कोई नहीं समझता। यही तो तुम्हारी भूल है मेघनाथ। तुम समय की गणना से राम को नाप रहे हो। राम समय के बंधन में नहीं है। राम

स्वयं काल हैं। उनके आने का समय निश्चित है और जब वह आएंगे तब जो होगा उसे संसार युगों तक याद रखेगा। मेघनाथ एक पल के लिए चुप हो गया। फिर उसने वह प्रश्न पूछा जो उसके मन में सबसे गहरा था। देवी मैं एक बात और जानना चाहता हूं। तुम माता हो। इस धरती पर सबसे पवित्र शक्ति का रूप। तो क्या कभी तुम्हें क्रोध नहीं आया? क्या कभी तुम्हारे मन में यह नहीं आया कि तुम श्राप दे दो रावण को, लंका को, इन राक्षसियों को? यह सुनकर माता सीता एकदम से चुप हो गई। वह एक गहरी सांस लेती रही। फिर उन्होंने जो कहा वह सुनकर मेघनाथ के रोंगटे खड़े हो गए। हां मेघनाथ क्रोध आया

था। एक दिन नहीं कई दिन। जब पहली बार इन राक्षसियों ने मुझे डराया तब मेरे मन में आया कि मैं इन्हें भस्म कर दूं। मेरे पास शक्ति थी। मैं जनक नंदिनी हूं। धरती [संगीत] की पुत्री हूं। मेरे एक संकल्प से यह पूरी लंका जल सकती थी। मेघनाथ की सांस रुक गई। वह जानता था कि यह सच था। फिर उसने धीमे से पूछा। सीता माता ने कहा, फिर मुझे राम की बात याद आई। उन्होंने एक बार कहा था, सीता शक्ति का उपयोग तभी करो जब वह धर्म की रक्षा के लिए हो। अपने दुख के लिए नहीं और मैं रुक गई। क्योंकि अगर मैं अपनी शक्ति से लंका जला देती तो तो राम का

धर्म युद्ध का उद्देश्य ही नष्ट हो जाता। दुनिया को यह दिखाना था कि बुराई का अंत धर्म के मार्ग से होता है। किसी एक के क्रोध से नहीं। मेघनाथ के मन में एक हलचल हुई। उसने कहा, तो तुमने अपनी शक्ति को रोक कर राम का मार्ग आसान किया? नहीं। सीता माता ने कहा, मैंने अपनी शक्ति को रोक कर यह सिखाया कि असली बल वह नहीं जो तोड़े। असली बल वह है जो सहे और फिर भी ना झुके। रात और गहरी हो गई थी। ऊपर आकाश में तारे थे। वही तारे जो अयोध्या से भी दिखते थे जो दंडकारण्य से भी दिखते थे। मेघनाथ को पहली बार लगा कि शायद यह आकाश सबके लिए एक ही है। राम के लिए भी, रावण के लिए भी,

सीता के लिए भी। और शायद यही वह धागा है जो सबको एक सूत्र में बांधता है। उसने माता सीता से कहा देवी मैं एक बात और जानना चाहता हूं। मेरे पिता रावण वो महापंडित हैं। शिव भक्त हैं। तीनों लोकों के विजेता हैं। लेकिन फिर भी उन्होंने यह काम किया। क्या उनकी भक्ति झूठी थी? क्या उनका ज्ञान झूठा था? माता सीता के चेहरे पर एक गहरी उदासी आई। उन्होंने कहा, मेघनाथ यही तो सबसे बड़ा दुख है। रावण का ज्ञान सच्चा था। उनकी भक्ति सच्ची थी। लेकिन उनका अहंकार उनसे भी बड़ा था। जानते हो ज्ञान और अहंकार जब साथ आते हैं तो इंसान सबसे ज्यादा खतरनाक बन जाता है

क्योंकि वह गलत काम करता है लेकिन उसे लगता है कि वह सही कर रहा है। क्या मेरे पिता को पता नहीं था कि वह गलत कर रहे हैं? मेघनाथ ने पूछा। पता था। सीता माता ने सीधे कहा। मेघनाथ जिस दिन तुम्हारे पिता ने मुझे इस रथ में बिठाया था उस दिन उनकी आंखों में मैंने देखा था। वहां एक छोटी सी आग थी। ग्लानी की आग। वह जानते थे। लेकिन तब तक उनका अहंकार इतना बड़ा हो चुका था कि वह पीछे हटने को अपनी हार मान रहे थे। मेघनाथ ने यह सुना और उसकी आंखें भर आई। उसने कभी अपने पिता को कमजोर नहीं सोचा था। लेकिन आज पहली बार उसे लगा कि उसके पिता एक बहुत बड़े जाल में फंसे हैं

और वह जाल किसी और ने नहीं उन्होंने खुद बुना है। देवी मेघनाथ ने धीमे से कहा क्या अब कोई रास्ता नहीं है? सीता माता ने लंबी सांस ली। उन्होंने कहा रास्ता हमेशा होता है मेघनाथ। लेकिन उस रास्ते पर चलने के लिए जो चाहिए वह है अहंकार छोड़ने की हिम्मत। और यह हिम्मत शायद सबसे कठिन है। तलवार उठाना आसान है। अहंकार रखना आसान है। लेकिन शीश झुकाना वह सबसे बड़ी वीरता है। मेघनाथ एक पल के लिए चुप रहा। फिर उसने वह बात कही जो उसके दिल में बहुत गहरे दबी थी। देवी मैं आपसे सच बोलूंगा। कभी-कभी मुझे लगता है कि यह युद्ध नहीं होना चाहिए। कभी-कभी मुझे लगता है कि मेरे

पिता ने जो किया वह गलत था। लेकिन उसकी आवाज कांपी। वह मेरे पिता हैं। मैं उनके विरुद्ध कैसे जाऊं? एक पुत्र का धर्म क्या है? यह सुनकर माता सीता की आंखें भर आई। उन्होंने मेघनाथ को देखा और उनमें एक मां की ममता थी। उन्होंने कहा मेघनाथ पुत्र का धर्म है कि वह पिता का सम्मान करें। लेकिन सम्मान का अर्थ यह नहीं कि हर गलत काम में साथ दो। असली सम्मान तो वह होता है जब पुत्र पिता को उनकी गलती से बचाने की कोशिश करें। तुमने कभी अपने पिता को रोकने की कोशिश की? मेघनाथ ने सिर झुका लिया। की थी देवी एक बार जब वह तुम्हें यहां लाए तो
मैंने कहा था यह उचित नहीं है। लेकिन उन्होंने मुझे कमजोर कहा। तुम कमजोर नहीं थे मेघनाथ। सीता माता ने कहा तुम उस दिन सबसे बड़े वीर थे। जो सच बोले वही असली क्षत्रिय है। मेघनाथ के गले में कुछ अटक गया। उसने ऊपर देखा आंसू रोकने की कोशिश करते हुए। अब रात का सबसे शांत पहर था। वह समय जब सारी दुनिया सो जाती है और केवल सत्य जागता है। माता सीता और मेघनाथ के बीच अब कोई औपचारिकता नहीं थी। एक तरफ थी एक मां जैसी आत्मा। दूसरी तरफ था एक ऐसा पुत्र जो पहली बार खुद से सच बोल रहा था। मेघनाथ ने कहा देवी मैंने आज तक बहुत से युद्ध लड़े इंद्र को हराया देवताओं को

परास्त किया लेकिन आज यहां तुम्हारे सामने बैठकर मुझे लग रहा है कि मैंने जो लड़ाईयां जीती वह कुछ भी नहीं थी। असली युद्ध तो वह है जो भीतर चल रहा है और वह युद्ध मैं हारता जा रहा हूं। सीता माता ने कहा मेघनाथ यह जो तुमने अभी कहा यही सबसे बड़ी जागृति है। जिस दिन इंसान यह समझ जाए कि असली शत्रु बाहर नहीं भीतर है उस दिन से उसका जीवन बदल जाता है। लेकिन देवी मेरे भीतर का युद्ध कभी खत्म होगा? होगा। सीता माता ने कहा जिस दिन तुम यह स्वीकार कर लोगे कि तुम्हारे पिता गलत हैं और फिर भी उनसे प्रेम करते हुए सत्य के पथ पर खड़े रहो उस दिन तुम्हारा भीतरी युद्ध
समाप्त हो जाएगा। मेघनाथ ने कहा यह बहुत कठिन है देवी। हां है। माता सीता ने सीधे कहा धर्म का मार्ग कभी आसान नहीं होता। अगर आसान होता तो उसे धर्म नहीं कहते। रास्ते पर कांटे होते हैं। लेकिन उस रास्ते पर चलने के बाद जो मंजिल मिलती है, वह किसी और मार्ग से नहीं मिल सकती। फिर एक पल रुक कर सीता माता ने कहा, मेघनाथ, मैं तुमसे एक प्रश्न पूछूंगी और इसका उत्तर सोच कर देना। [संगीत] मेघनाथ ने सिर हिलाया। तुम्हें जब मां मंदोदरी ने जन्म दिया था, उस दिन उनके मन में क्या होगा? क्या उन्होंने सोचा होगा कि मेरा पुत्र किसी निर्दोष स्त्री को

बंदी बनाने में सहायक बनेगा? यह तीर सीधे मेघनाथ के सीने में उतर गया। उसने एक पल के लिए आंखें बंद कर ली। उसकी मां मंदोदरी जो खुद एक पवित्र और धर्मनिष्ठ स्त्री थी। उन्होंने कितनी बार उसे समझाया था। [संगीत] कितनी बार रोई थी। देवी मेरी मां ने मुझे रोका था। मेघनाथ की आवाज भारी हो गई। तो तुम्हारे घर में भी धर्म की आवाज थी। सीता माता ने कहा, बस उसे सुनने की जरूरत थी। फिर क्या करूं मैं? मेघनाथ ने पूछा और उसकी आवाज में एक बच्चे की तरह की बेबसी थी। सीता माता ने जो अब कहा वह इस पूरे संवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था। मेघनाथ सुनो जो हो चुका है उसे बदला नहीं
जा सकता। लेकिन जो होने वाला है उसे दिशा दी जा सकती है। तुम एक महान योद्धा हो। लेकिन योद्धा की असली पहचान यह नहीं कि वह किसके लिए लड़ता है बल्कि यह है कि वह किस सत्य के लिए लड़ता है। अगर तुम्हारे पिता गलत पथ पर हैं तो उनसे विरोध करना विश्वासघात नहीं है। यह तो असली भक्ति है क्योंकि जो प्रेम करता है वह कभी अपने प्रियजन को विनाश की ओर जाते नहीं देखता। मेघनाथ ने कहा देवी क्या तुम्हें नहीं लगता कि यह युद्ध अब रुक सकता है? माता सीता ने कहा युद्ध तब रुकता है जब कोई एक पक्ष सत्य को स्वीकार करें। लेकिन जब तक अहंकार बचा है तब तक युद्ध रुकेगा नहीं।

फिर उन्होंने एक बात और कही जो मेघनाथ को बहुत गहरी लगी। और मेघनाथ इस युद्ध का परिणाम मैं जानती हूं। राम आएंगे और जब वह आएंगे तो वह केवल मुझे लेने नहीं आएंगे। वह उन सबको मुक्ति देने आएंगे जो इस अहंकार के जाल में फंसे हैं। रावण को भी मेघनाथ ने चौंक कर पूछा मुक्ति मेरे पिता को हां सीता माता ने शांत स्वर में कहा राम शत्रु का वध नहीं करते वह मुक्ति देते हैं रावण महापंडित हैं वह जीवन भर जिस परमात्मा को ढूंढते रहे राम के हाथों से उन्हें वह मिल जाएगा यही इस कथा का सबसे बड़ा रहस्य है भोर होने से पहले का वह समय था जब आकाश ना पूरी तरह रात था ना पूरी
तरह दिन [संगीत] एक संध्याल और और उस संध्याल में माता सीता और मेघनाथ के बीच जो अंतिम बातें हुई वो किसी ग्रंथ में नहीं लिखी गई लेकिन जो उस क्षण को महसूस कर ले उसे किसी ग्रंथ की जरूरत नहीं। मेघनाथ उठने को हुआ लेकिन माता सीता ने कहा एक बात और सुनो। मेघनाथ बैठ गया। तुमने पूछा था कि मैं यहां क्यों रह रही हूं? टूटती क्यों नहीं? तो सुनो सच यह है। सीता माता की आंखों में एक अलग ही ज्योति थी। मैं यहां इसलिए हूं क्योंकि यह मेरी नियति थी। जब मैं जनक जी की पुत्री बनी, जब मैंने राम से विवाह किया, जब हम वन गए, हर कदम पर मुझे लगता था कि यह मेरे साथ

क्यों हो रहा है? लेकिन आज मुझे समझ आ गया है। क्या समझ आया? मेघनाथ ने पूछा यह कि दुनिया में जो सबसे पवित्र संदेश है धर्म का, सत्य का, भक्ति का उसे तब तक दुनिया नहीं सुनती जब तक उसे कोई कष्ट से गुजर कर ना सिखाए। अगर मेरा जीवन सुख से भरा होता। अगर मैं महलों में रहती तो दुनिया की कोई स्त्री मेरी बात नहीं सुनती। [संगीत] लेकिन अब जब दुनिया देखेगी कि एक स्त्री इतने कष्ट में भी ना टूटी ना झुकी ना अपना धर्म छोड़ा तो युगों तक वह स्त्री का आदर्श बनेगी। यही मेरे यहां रहने का सच है मेघनाथ। मेघनाथ के मुंह से कोई शब्द नहीं

निकला। वह बस देखता रहा और पहली बार उसे समझ आया कि यह स्त्री वाकई साधारण नहीं है। यह कोई मनुष्य की पत्नी नहीं है। यह साक्षात शक्ति का अवतार है। यह धरती की पुत्री है जो यह सिखाने आई है कि जीवन में कितना भी अंधेरा हो। अगर भीतर का दीपक जल रहा हो तो कोई अंधेरा टिक नहीं सकता। देवी मेघनाथ ने उठते हुए कहा, आज से मेरा जीवन बदल गया। सीता माता ने कहा जाओ मेघनाथ और जब कल तुम युद्ध के मैदान में हो तो एक बार यह जरूर सोचना कि तुम किस सत्य के लिए लड़ रहे हो। मेघनाथ ने झुककर प्रणाम किया जैसे किसी मां को प्रणाम करते हैं। और जाते-जाते उसने पलट कर एक बार और देखा
माता सीता फिर से राम नाम जप रही थी। वही शांति, वही स्थिरता, वही अटूट विश्वास। मेघनाथ लंका की गलियों से होता हुआ अपने महल की ओर चला गया। लेकिन [संगीत] उसके कदमों में अब वह अकड़ नहीं थी जो पहले थी। अब उसके कदमों में एक भार था सत्य का भार। और सत्य का भार वैसा नहीं होता जो इंसान को तोड़े। यह वह भार होता है जो इंसान को गहरा करे। इस पूरे संवाद में माता सीता ने जो बातें कही वह केवल मेघनाथ के लिए नहीं थी। वह हम सबके लिए थी। पहली बात शरीर को बंदी बनाया जा सकता है आत्मा को नहीं। जब तक आपका मन, आपका विश्वास, आपकी आस्था

अपनी जगह पर है। कोई आपको वाकई हरा नहीं सकता। दूसरी बात अहंकार ज्ञान का सबसे बड़ा शत्रु है। रावण के पास सब कुछ था लेकिन अहंकार ने सब नष्ट किया। तीसरी बात असली [संगीत] वीरता वह है जो सह सके और फिर भी ना झुके। चौथी बात पुत्र का धर्म है पिता का सम्मान करना। लेकिन असली सम्मान वह है जो पिता को गलत रास्ते पर जाने से रोके। और पांचवी और सबसे बड़ी बात हर कष्ट एक उद्देश्य के साथ आता है। जो उस उद्देश्य को समझ ले वह कभी टूटता नहीं। माता सीता ने अशोक वाटिका में रहकर यह नहीं दिखाया कि वह कमजोर है। उन्होंने यह दिखाया कि जब एक स्त्री के भीतर श्रद्धा,
धर्म और प्रेम हो तो दुनिया की कोई भी शक्ति उसे झुका नहीं सकती। मित्रों अभी आपने माता सीता और मेघनाथ के उस दिव्य संवाद को सुना जो हमें यह सिखाता है कि जीवन में चाहे कितना भी अंधेरा हो सत्य और भक्ति का दीपक कभी नहीं बुझता और अब हम उन्हीं श्री राम की वाणी सुनेंगे जिनके नाम की शक्ति से [संगीत] माता सीता ने लंका में भी अपना धर्म नहीं छोड़ा। श्री राम केवल एक राजा नहीं थे। [संगीत] केवल एक पति नहीं थे। वह मर्यादा पुरुषोत्तम थे। यानी वह पुरुष जिसने हर परिस्थिति में मर्यादा को सर्वोच्च रखा। उनकी हर बात में एक गहरी सीख है जो आज भी उतनी ही

प्रासंगिक है जितनी त्रेता युग में थी। तो आइए एक-एक वचन सुनते हैं और अपने जीवन में उतारते हैं। जीवन में सबसे पहला प्रश्न यही आता है कि हम क्या करें और क्या ना करें। जब रास्ते दो हो और दोनों अपने लगे तब इंसान सबसे ज्यादा भटकता है। श्री राम ने इस भटकाव के बारे में बहुत गहरी बात कही थी। उन्होंने कहा था जो कर्म तुम्हें तत्काल सुख दे लेकिन बाद में पछतावा दे वह कर्म त्याज्य है और जो कर्म करते समय कठिन लगे लेकिन बाद में शांति दे वही धर्म का कर्म है। यह वचन आज भी हमें यह सिखाता है कि जीवन में शॉर्टकट लेने की चाहत ही सबसे
बड़ी भूल है। जो रास्ता कठिन है अक्सर वही सही होता है। श्री राम ने अपने जीवन में स्वयं इस वचन को जिया। जब उन्हें वनवास मिला तो वह चाहते तो विरोध कर सकते थे। राजा दशरथ के प्रिय पुत्र थे। अयोध्या की प्रजा उनसे प्रेम करती थी। लेकिन उन्होंने वनवास स्वीकार किया क्योंकि वह जानते थे कि पिता का वचन पूरा करना उनका धर्म है और धर्म से बड़ा कोई कर्तव्य नहीं। उन्होंने उस दिन जो सिखाया वह यह था सुख और धर्म में जब चुनाव करना पड़े तो धर्म को चुनो। सुख आएगा और जाएगा। लेकिन धर्म तुम्हारे साथ जन्मजन्म तक रहेगा। एक और वचन श्री राम ने लक्ष्मण को तब कहा था जब लक्ष्मण

वन में क्रोधित हो उठे थे। लक्ष्मण कर्तव्य वह नहीं जो तुम करना चाहते हो। कर्तव्य वह है जो इस समय इस परिस्थिति में इस स्थान पर तुमसे मांगा जा रहा है। अपनी इच्छा को कर्तव्य में मत मिलाओ वरना ना इच्छा पूरी होगी ना कर्तव्य। यह बात आज के युवाओं के लिए बहुत जरूरी है। हम अक्सर वह करना चाहते हैं जो हमें अच्छा लगे। लेकिन जीवन वह मांगता है जो उस पल जरूरी हो। इन दोनों में संतुलन ही जीवन की कला है। श्री राम का एक और अमूल्य वचन है। जो व्यक्ति दूसरों के कष्ट को देखकर भी चुप रहे वह धर्म का पालन नहीं कर रहा। वह केवल अपनी सुविधा का पालन कर रहा है। जब उन्होंने वन

में आरशियों को राक्षसों से पीड़ित देखा तो उन्होंने तुरंत उनकी रक्षा का वचन दिया। उनके लिए दूसरों का कष्ट अपना कष्ट था और यही बात उन्हें साधारण राजकुमार से मर्यादा पुरुषोत्तम बनाती है। श्री राम का सीता माता से प्रेम केवल पतिपत्नी का प्रेम नहीं था। वह एक आदर्श था। उन्होंने एक बार कहा था प्रेम वह नहीं जो सुख में साथ दे। प्रेम वह है जो दुख में भी अपने प्रिय को नहीं भूले। मैं सीता को खोज रहा हूं। इसलिए नहीं कि वह मेरी पत्नी है। बल्कि इसलिए कि जब तक वह कष्ट में हैं, मेरा हृदय शांत नहीं हो सकता। यह वचन हमें यह सिखाता है कि असली प्रेम में स्वार्थ

नहीं होता। असली प्रेम में दूसरे की पीड़ा अपनी पीड़ा बन जाती है। श्री राम ने मित्रता के बारे में भी बहुत कुछ कहा। जब सुग्रीव से मित्रता हुई तो उन्होंने कहा मित्र वह है जो तुम्हारी शक्ति में तुम्हारा साथी हो और तुम्हारी कमजोरी में तुम्हारा सहारा जो केवल तुम्हारे वैभव में आए और संकट में चला जाए वह मित्र नहीं परछाई है। आज के समय में जब दोस्ती सोशल मीडिया पर लाइक्स से नापी जाती है। यह वचन हमें असली रिश्ते की परिभाषा देता है। विभीषण जब रावण का साथ छोड़कर राम के पास आए तो बहुत से लोगों ने उन्हें अपनाने पर सवाल उठाया। उस समय राम ने जो कहा वह आज

भी मार्गदर्शक है। जो व्यक्ति असत्य का साथ छोड़कर सत्य की शरण में आए उसे दूर धकेलना सत्य का अपमान है। मैं शत्रु के भाई को नहीं देख रहा। मैं एक ऐसे प्राणी को देख रहा हूं जिसने अपने अहंकार को छोड़कर धर्म को चुना। यही साहस है। [संगीत] यह वचन हमें यह सिखाता है कि इंसान को उसके परिवार से नहीं उसके कर्म से जानो। एक और बहुत महत्वपूर्ण वचन है जो राम ने सीता माता से कहा था जब वह पहली बार मिले। सीता तुम मेरी अर्धांगिनी हो। यानी मेरा आधा अंग। इसका अर्थ यह नहीं कि तुम मेरी छाया हो। इसका अर्थ यह है कि तुम्हारे बिना मैं अधूरा हूं। जहां मैं
हूं, वहां तुम हो और जहां तुम हो, वहां मैं हूं। यह प्रेम नहीं यह एकत्व है। यह वचन हर दांपत्य जीवन के लिए एक [संगीत] आदर्श है। जब दो लोग एक दूसरे को पूरा करें तभी असली घर बनता है। जीवन में सबसे कठिन काम है क्रोध को नियंत्रित करना। और श्री राम ने इस विषय पर बहुत गहरी बातें कही हैं। एक बार जब लक्ष्मण क्रोध में कुछ करने को उद्यत हुए तो राम ने उन्हें रोक कर कहा लक्ष्मण क्रोध एक आग की तरह है। यह पहले उसी को जलाती है जिसके भीतर होती है। तुम सोचते हो कि तुम अपने शत्रु को नष्ट कर रहे हो। लेकिन पहले तुम अपने विवेक को नष्ट करते हो। फिर अपने धर्म [संगीत] को

और अंत में अपने को। यह वचन आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक है। जब हम छोटी-छोटी बातों पर क्रोधित होकर बड़े-बड़े नुकसान कर लेते हैं। धैर्य के बारे में श्री राम ने कहा था जो व्यक्ति विपत्ति में भी शांत रहे उसकी बुद्धि पर देवता भी आश्चर्य करते हैं। घबराहट समस्या को हल नहीं करती। वह केवल समस्या को और बड़ा दिखाती है। जब मन शांत हो तभी रास्ता दिखता है। उन्होंने यह बात उस समय कही थी जब सीता माता के अपहरण के बाद चारों तरफ निराशा थी। तब भी राम ने घबराहट नहीं दिखाई। उन्होंने एक-एक कदम उठाया, एक-एक मित्र बनाया, एक-एक बाधा पार
की। मन की शांति के बारे में एक और गहरा वचन है। मन वह घोड़ा है जो बिना लगाम के सबसे खतरनाक है। लेकिन जो इस घोड़े पर लगाम लगाना सीख जाए वह संसार में कहीं भी जा सकता है। कुछ भी पा सकता है। मन को वश में करना सबसे बड़ी तपस्या है। उससे बड़ा कोई व्रत नहीं। राम ने अपने पूरे जीवन में यह दिखाया। राज सिंहासन मिला तो घमंड नहीं किया। वनवास मिला तो रोए नहीं। पत्नी का अपहरण हुआ तो टूटे नहीं। यह मन की साधना थी और इसीलिए वह पुरुषोत्तम [संगीत] कहलाए। एक और वचन जो राम ने अपने भाइयों से कहा था। जब कोई तुम्हारे बारे में गलत बोले तो उत्तर देने की जल्दी मत करो। समय

सबसे बड़ा उत्तर है। जो सत्य है वह समय के साथ सामने आएगा। और जो असत्य है वह समय के साथ टूट जाएगा। तुम्हारे कर्म तुम्हारी सफाई देंगे। तुम्हें खुद बोलने की जरूरत नहीं। श्री राम एक आदर्श राजा थे और उनके राज्य के सिद्धांत आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा था राजा वह नहीं जो अपनी प्रजा पर शासन करें। राजा वह है जो अपनी प्रजा के लिए सेवक बने। जब राजा का हृदय सेवक का हो तभी राज्य में सुख होता है। यही राम राज्य का मूल था। जहां राजा सबसे बड़ा सेवक था। न्याय के बारे में राम ने कहा था न्याय का तराजू कभी झुकना नहीं चाहिए। चाहे एक तरफ तुम्हारा प्रिय हो और
दूसरी तरफ अजनबी। जिस दिन न्याय में पक्षपात आया उस दिन न्याय नहीं रहा वह केवल शक्ति का खेल बन जाता है। यह वचन आज के समाज के लिए एक दर्पण है। जब हम अपनों के लिए नियम मोड़ते हैं और दूसरों के लिए कठोर होते हैं तो हम राम राज्य से नहीं अन्याय से जीते हैं। नेतृत्व के बारे में राम ने लक्ष्मण को समझाया था जो नेता केवल आदेश देना जाने और स्वयं ना करे वह जल्द ही अकेला हो जाता है। लेकिन जो नेता सबसे पहले खुद उठे, सबसे आगे चले, सबसे कठिन काम खुद करें, उसके लिए सेना पहाड़ भी काट दे। यही राम ने किया। समुद्र पर पुल बनाने में वह खुद शिला उठाने लगे। इसीलिए वानरों

ने असंभव को संभव किया। एक और महत्वपूर्ण वचन जो शासक अपनी प्रजा की आवाज ना सुने वह शासक नहीं अत्याचारी है। और जो शासक केवल अपनी प्रजा की खुशी के लिए धर्म से हट जाए वह भी शासक नहीं कमजोर है। सच्चे शासन में प्रजा का सुख और धर्म दोनों साथ चलते हैं। यह संतुलन ही राम राज्य की आत्मा था। अंत में वह वचन जो सबसे गहरे हैं, सबसे पवित्र हैं। श्री राम ने भक्ति के बारे में कहा था, “मुझे वह भक्ति नहीं चाहिए जो केवल मंदिर में हो। मुझे वह भक्ति चाहिए जो तुम्हारे हर कर्म में हो। जब तुम किसी भूखे को भोजन दो, वह मेरी भक्ति है। जब [संगीत] तुम किसी कमजोर की
रक्षा करो वह मेरी पूजा है। जब तुम सत्य बोलो जबकि झूठ से फायदा होता वह मेरा अभिषेक है। यह वचन धर्म की उस परिभाषा को स्थापित करता है जो केवल कर्मकांड से परे है। जीवन और मृत्यु के बारे में राम ने कहा आत्मा ना जन्म लेती है ना मरती है। यह देह एक वस्त्र है जो पुराना होने पर बदल जाता है। जो इस सत्य को जान ले उसे ना जीवन से मोह रहता है ना मृत्यु का भय। वो तब जीता है जब जीना हो और चला जाता है जब जाना हो। बिना शोर के बिना शिकायत के। हनुमान जी की भक्ति के बारे में राम ने जो कहा वह बहुत अनमोल है। हनुमान ने मुझे ढूंढा नहीं बल्कि उन्होंने पहले खुद को

ढूंढा। जिस दिन उन्हें पता चला कि वह कौन है। उस दिन मैं अपने आप उनके हृदय में आ गया। भक्ति का रहस्य यही है। पहले स्वयं को जानो फिर परमात्मा अपने आप मिलते हैं। क्षमा के बारे में राम ने जो कहा वह शायद उनके सबसे बड़े वचनों में से एक है। क्षमा कमजोरों का गुण नहीं है। क्षमा सबसे बड़े शक्तिशाली का अस्त्र है। जो क्षमा कर सके वह शत्रु को भी अपना बना लेता है और जो क्षमा ना कर सके वह जीतकर भी हारा हुआ है क्योंकि उसके भीतर का बोझ कभी नहीं जाएगा। जीवन के अंतिम उद्देश्य के बारे में श्री राम ने कहा मनुष्य जन्म इसलिए मिला है कि
तुम अपने भीतर के राम को पहचानो। हर व्यक्ति के भीतर [संगीत] एक राम है। एक सत्य है, एक धर्म है, एक प्रेम है। जब तुम उसे पहचान लो तो तुम्हारा जीवन सफल है। चाहे तुम राजा रहो या रंक। मित्रों यही थी श्री राम की वाणी जो हमें हर युग में हर परिस्थिति में राह दिखाती है। जब धर्म और सुख में चुनाव करना पड़े तो राम की वाणी याद करो। जब क्रोध आए तो राम की वाणी याद करो। जब रिश्ते [संगीत] टूटते लगे तो राम की वाणी याद करो। और जब जीवन का अर्थ ना समझ आए तो राम की वाणी याद करो। श्री राम का नाम ही काफी है क्योंकि उनके नाम में पूरा जीवन दर्शन समाया है। मित्रों आज की

यह कथा यहीं पूर्ण होती है। माता सीता का वह अटूट विश्वास, मेघनाथ का वह जागरण और श्री राम की वह अनमोल वाणी यह सब केवल कहानियां नहीं है। यह हमारे जीवन का दर्पण है। जब भी जीवन में कोई मेघनाथ जैसी दुविधा आए, जब लगे कि रास्ता दिखता नहीं, जब लगे कि चारों तरफ अंधेरा है, तो माता सीता की वह बात याद कर लेना। शरीर को बंदी बनाया जा सकता है आत्मा को नहीं। और श्री राम का वह वचन याद कर लेना। धर्म का मार्ग कठिन होता है, लेकिन उस पर चलने वाला कभी अकेला नहीं होता। दर्शक बंधु अगर आज की इस कथा ने आपके मन को थोड़ी भी शांति दी हो।

अगर किसी एक वचन ने भी आपके भीतर कुछ जगाया हो तो हमारा यह प्रयास सफल हो गया। हम यहां धन के लिए नहीं धर्म के प्रचार के लिए आए हैं और यह यात्रा तभी जारी रह सकती है जब आप जैसे श्रद्धालु बंधु हमारे साथ बने रह। इसलिए विनम्र निवेदन है कृपया हमारे चैनल अनमोल महाभारत को सब्सक्राइब करें और हमारे इस परिवार का हिस्सा बने। बेल आइकन जरूर दबाइए ताकि अगली कथा की सूचना आप तक सबसे पहले पहुंचे। अगर यह कथा आपके मन को अच्छी लगी हो तो लाइक करें और अपने परिवार, मित्रों और परिचितों के साथ शेयर जरूर करें क्योंकि शायद किसी को आज इस कथा की सबसे ज्यादा जरूरत हो। हर रोज

नई कथा, नया ज्ञान, नया प्रकाश यही हमारा संकल्प है। सनातन धर्म की इस दिव्य ज्योति को हम मिलकर जलाए रखेंगे। जय श्री राम जय सियाराम जय हनुमान

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