हरिनारायण वहीं जमीन पर बैठ गया। बाहर बारिश टीन की छत पर ऐसी गिर रही थी जैसे कोई दरवाज़ा पीट रहा हो।

हरिनारायण वहीं जमीन पर बैठ गया। बाहर बारिश टीन की छत पर ऐसी गिर रही थी जैसे कोई दरवाज़ा पीट रहा हो। पर्ची अनन्या की लिखावट में थी, मगर हर अक्षर डर से कांपता हुआ लग रहा था। उसने लिखा था कि विक्रम वैसा आदमी नहीं था जैसा शादी से पहले दिखता था। शादी के बाद उसने उसका फोन अपने पास रखना शुरू कर दिया, बैंक पासवर्ड बदल दिए, ऑफिस के ईमेल तक पढ़ने लगा। धीरे-धीरे अनन्या को पता चला कि विक्रम उसकी कंपनी के नाम पर नकली बिल बना रहा था, ट्रकों में अवैध माल भेज रहा था और कई कागज़ों पर उसके हस्ताक्षर करवाकर उसे ही फंसा रहा था।
एक रात जब अनन्या ने विरोध किया, विक्रम ने उसका हाथ इतनी ज़ोर से पकड़ा कि कलाई नीली पड़ गई।
—तुम्हारे बाबा बूढ़े हैं, अनन्या। उन्हें बचाने की कोशिश मत करना, वरना सबसे पहले उन्हीं को दर्द होगा।
इसीलिए उसने जूते साइज 7 खरीदे थे। वह विक्रम का नंबर था। अगर पार्सल उसके हाथ लग जाता, तो वह समझता कि यह उसी के लिए भेजा गया तोहफा है। मगर असल में जूतों के भीतर सबूत छिपे थे—नकली बिल, बैंक की कॉपियां, ट्रक नंबर, रिकॉर्डिंग और थोड़े-थोड़े करके बचाए गए पैसे।
डिब्बे के कोने में एक छोटा लिफाफा और था। उसमें अस्पताल की रिपोर्ट थी।
हरिनारायण की आंखों से आंसू चुपचाप गिरने लगे। उसे अपनी बच्ची की वे छोटी उंगलियां याद आईं जो कभी उसकी उंगली पकड़कर गंगा किनारे चलती थीं।
सुबह होते ही वह थाने पहुंचा। पहले सिपाही ने उसे बूढ़ा समझकर टालना चाहा, लेकिन जब पेन ड्राइव में विक्रम की आवाज़ चली, तो कमरे का माहौल बदल गया।
—साइन कर दो चुपचाप। पत्नी हो मेरी, अक्ल मत सिखाओ।
दूसरी रिकॉर्डिंग में ट्रकों के नंबर और माल की बात थी। तीसरी में अनन्या की धीमी आवाज़ थी—
—बाबा, अकेले मत आना। वह मुस्कुराकर भी चोट पहुंचा सकता है।
—बाबा, अकेले मत आना। वह मुस्कुराकर भी चोट पहुंचा सकता ह

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