
PART 1
सावित्री माथुर की 7 महीने की गर्भवती बेटी काँच की शव-पेटिका में पड़ी थी, और उसी वक्त उसका पति अपनी प्रेमिका का हाथ पकड़े हँसता हुआ शोक-सभा में दाखिल हुआ।
दिल्ली के लाजपत नगर वाले बड़े सामुदायिक भवन में सफेद फूलों की माला, अगरबत्ती का धुआँ और धीमे भजन की आवाज़ मिलकर ऐसा सन्नाटा बना रहे थे, जिसमें किसी माँ की साँस भी अपराध जैसी लगती थी। बीच में रखी शव-पेटिका में 29 साल की अनन्या माथुर शांत पड़ी थी। उसके पीले चेहरे पर हल्का सा मेकअप था, माथे पर छोटी सी बिंदी, और दोनों हाथ पेट पर टिके हुए, जैसे वह मौत के बाद भी अपने अजन्मे बच्चे को दुनिया की बेरहमी से बचाना चाहती हो।
सावित्री उसके सिरहाने बैठी थी। उसकी उंगलियाँ अपनी बेटी की साड़ी के किनारे को छू रही थीं। वह रो नहीं रही थी। शायद आँसू शरीर छोड़ चुके थे। शायद दर्द इतना भारी था कि बाहर आने की जगह भीतर पत्थर बन गया था।
तभी दरवाजे की तरफ से हँसी सुनाई दी।
हल्की नहीं। शर्मिंदा नहीं। खुली, साफ, बेफिक्र हँसी।
पूरा हॉल पलटकर देखने लगा।
दरवाजे पर राघव मल्होत्रा खड़ा था, अनन्या का पति। काला बंदगला, चमकते जूते, महँगी घड़ी और चेहरे पर वही बनावटी दुख, जिसे वह कैमरों के सामने पहनना जानता था। उसके साथ थी निशा कपूर, वही औरत जिसके नाम ने पिछले 6 महीने में अनन्या की मुस्कान, नींद और आवाज़ छीन ली थी।
निशा काली साड़ी में आई थी, लेकिन उसका चलना शोक में आई औरत जैसा नहीं था। वह ऐसे कदम रख रही थी जैसे यह अंतिम दर्शन नहीं, किसी अमीर घर की पार्टी हो। उसने सावित्री की ओर देखा, होंठों पर पतली मुस्कान लाई और राघव की बाँह और कसकर पकड़ ली।
सावित्री की छोटी बहन कमला ने उसका कंधा थाम लिया।
“दीदी, अभी कुछ मत बोलना। लोग देख रहे हैं।”
सावित्री ने कोई जवाब नहीं दिया।
राघव शव-पेटिका के पास आया। उसने एक पल के लिए अनन्या को देखा, फिर आँखें झुका लीं। जो आदमी घर में उसकी बेटी को घंटों चुप कराता था, वही अब सबके सामने दुखी विधुर बनने का अभिनय कर रहा था।
“माँजी,” उसने धीमे स्वर में कहा, “यह सब बहुत अचानक हो गया। डॉक्टर भी नहीं बचा पाए।”
सावित्री ने उसकी तरफ देखा। उसके चेहरे पर क्रोध नहीं था। बस एक ऐसी ठंडी दृष्टि थी, जिससे राघव एक पल को असहज हो गया।
निशा आगे झुकी। उसके इत्र की तेज खुशबू सावित्री के गले में अटक गई।
“आखिर में जीत मेरी ही हुई,” निशा ने कान के पास फुसफुसाया।
सावित्री की मुट्ठी कस गई। एक क्षण को उसे लगा कि वह इसी जगह निशा का चेहरा पकड़कर सबके सामने उसकी मुस्कान नोच ले। वह चीखना चाहती थी कि उसकी बेटी पागल नहीं थी, कमजोर नहीं थी, और गर्भावस्था की वजह से भ्रम में नहीं थी। वह मार दी गई थी। धीरे-धीरे, योजना बनाकर, अपमान और डर में डुबोकर।
लेकिन उसने अनन्या को देखा।
शांत। ठंडी। हमेशा के लिए मौन।
और उसी मौन ने सावित्री को रोक लिया।
क्योंकि राघव यही चाहता था। वह चाहता था कि सावित्री टूट जाए, चिल्लाए, लोगों के सामने बिखर जाए। फिर वह कह सके कि बेटी की मौत से पागल हुई माँ झूठे आरोप लगा रही है। वह चाहता था कि समाज उसे सफल उद्योगपति, दुखी पति और मजबूर बेटा माने।
पर उसे एक बात नहीं पता थी।
अनन्या ने अपनी माँ को पहले ही तैयार कर दिया था।
मौत से 18 दिन पहले, एक बरसाती रात अनन्या ऑटो से सावित्री के घर आई थी। वह नंगे पाँव थी, भीगी हुई थी, पेट पकड़कर काँप रही थी। दरवाजा खुलते ही वह माँ की बाँहों में गिर गई थी।
“माँ,” उसने टूटी आवाज़ में कहा था, “अगर मेरे साथ कुछ हो जाए, तो पहले मत रोना।”
सावित्री की छाती फट गई थी।
“फिर क्या करूँ, बिटिया?”
अनन्या ने आँसू पोंछे थे। उसकी आँखों में डर था, लेकिन डर से बड़ा निर्णय था।
“उनसे ज़्यादा समझदारी से लड़ना।”
अब उसी शोक-सभा में, भीड़ को चीरता हुआ एक आदमी आगे बढ़ा। वह था अधिवक्ता अरविंद सूरी, अनन्या का वकील। उसके हाथ में हल्के पीले रंग का लिफाफा था, जिस पर अनन्या की लिखावट साफ दिख रही थी।
राघव की आँखें सिकुड़ गईं।
“यह क्या है?” उसने कठोर स्वर में पूछा।
अरविंद ने चश्मा ठीक किया।
“स्वर्गीय अनन्या माथुर मल्होत्रा के स्पष्ट निर्देश के अनुसार, उनका अंतिम बयान और वसीयत अंतिम संस्कार से पहले सार्वजनिक रूप से पढ़ी जाएगी।”
हॉल में ऐसा सन्नाटा छा गया कि अगरबत्ती की राख गिरने की आवाज़ तक सुनाई दे सकती थी।
निशा हँस पड़ी।
“वसीयत? उसके पास था ही क्या?”
अरविंद ने लिफाफा खोला।
“अनन्या अपनी माँ सावित्री माथुर को अपनी निजी बचत, बीमा राशि, गुरुग्राम वाला फ्लैट और मल्होत्रा हेल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड के 13 प्रतिशत शेयर सौंपती हैं।”
राघव का चेहरा पहली बार उतर गया।
“झूठ। अनन्या के पास कंपनी के शेयर नहीं थे।”
अरविंद ने कागज ऊपर किया।
“उनके ससुर, दिवंगत सुरेश मल्होत्रा ने मृत्यु से 4 महीने पहले यह हिस्सेदारी उनके नाम की थी।”
राघव की आवाज़ भारी हो गई।
“मेरे पिता आखिरी दिनों में दिमागी तौर पर ठीक नहीं थे।”
सावित्री पहली बार बोली।
“तुम्हारे पिता बीमार नहीं थे, राघव। वह तुमसे डरते थे।”
लोगों के चेहरों पर शक और भय साथ-साथ उभरे।
राघव उसके करीब आया।
“आप नहीं जानतीं कि आप किससे उलझ रही हैं।”
सावित्री ने अनन्या के पेट पर रखे हाथों को देखा।
“इस बार जानकर ही आई हूँ।”
अरविंद ने गहरी साँस ली।
“इसमें और भी है।”
राघव की गर्दन की नसें तन गईं।
और उसी पल पूरे हॉल को समझ आ गया कि अनन्या का अंतिम संस्कार सिर्फ विदाई नहीं था।
यह किसी छिपे हुए सच की शुरुआत थी।
PART 2
अरविंद सूरी ने अगला पन्ना खोला तो राघव की आँखों में डर की पहली झिलमिलाहट साफ दिखी।
“यदि मेरी मृत्यु अचानक, संदिग्ध या किसी चिकित्सकीय लापरवाही के नाम पर छिपाई जाए,” अरविंद ने पढ़ा, “तो मेरी माँ सावित्री माथुर को मेरे सभी मेडिकल रिकॉर्ड, निजी संदेश, रिकॉर्डिंग और कंपनी से जुड़े दस्तावेज़ पुलिस तथा अदालत को सौंपने का पूरा अधिकार होगा।”
भीड़ में खुसर-पुसर उठी। मल्होत्रा परिवार के रिश्तेदार, जो अब तक राघव के पास बैठे थे, धीरे-धीरे एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
निशा ने होंठ भींचे।
“गर्भवती औरतें बहुत भावुक हो जाती हैं। वह सबको गलत समझ रही थी।”
सावित्री ने उसकी ओर देखा।
“भावुक औरत छिपकर रिकॉर्डिंग करना भी सीख सकती है।”
निशा का चेहरा एक पल को सफेद पड़ गया।
राघव ने दाँत भींचे।
“बस कीजिए।”
सावित्री आगे बढ़ी।
“बस तो उस रात होना चाहिए था, जब मेरी बेटी ने आधी रात को फोन किया और सिर्फ रोती साँसों की आवाज़ सुनाई दी। बस तब होना चाहिए था, जब वह मई की गर्मी में भी पूरी बाँह के कपड़े पहनती थी। बस तब होना चाहिए था, जब तुम हर डॉक्टर से कहते थे कि अनन्या को गर्भ की वजह से घबराहट के दौरे पड़ते हैं।”
हॉल में बैठे कई लोग सिर झुका चुके थे।
तभी दरवाजे के पास खड़े 2 साधारण कपड़ों वाले अधिकारी आगे आए। उनमें से एक निरीक्षक विराज राणा था।
राघव पीछे हट गया।
“यहाँ पुलिस क्यों है?”
सावित्री ने शांत स्वर में कहा।
“मेरी बेटी की अर्थी उठाने नहीं। तुम्हें रोकने।”
अरविंद ने बैग से एक छोटी काली पेन-ड्राइव निकाली।
“अनन्या ने अंतिम निर्देश छोड़ा था। यदि राघव मल्होत्रा उनके अंतिम संस्कार में निशा कपूर के साथ आए, तो ‘प्रार्थना सभा’ नाम की फाइल सबके सामने चलाई जाए।”
निशा काँप गई।
राघव गरजा।
“अरविंद, यह मत करना। सब डूब जाएँगे।”
निरीक्षक राणा ने इशारा किया। हॉल की आवाज़ व्यवस्था से पेन-ड्राइव जोड़ दी गई।
फाइल स्क्रीन पर उभरी।
“प्रार्थना सभा.mp3”
राघव ने पहली बार सचमुच डरकर कहा—
“अगर वह बूढ़ी यह सुन लेगी, तो हमें कोई नहीं बचा पाएगा।”
और फिर अनन्या की आवाज़ पूरे हॉल में फैल गई।
PART 3
पहले कुछ क्षण सिर्फ खराश भरी आवाज़ आई। फिर एक धीमी, टूटी हुई साँस। सावित्री की उंगलियाँ शव-पेटिका के किनारे पर जम गईं।
रिकॉर्डिंग में अनन्या की आवाज़ काँप रही थी।
“राघव… गला जल रहा है… साँस नहीं आ रही…”
फिर राघव की आवाज़ आई। वही आवाज़, जो शोक-सभा में अभी तक दुखी पति की तरह मुलायम थी, रिकॉर्डिंग में बर्फ जैसी ठंडी लग रही थी।
“ड्रामा मत करो। चाय पी लो।”
“इसका स्वाद अजीब है…”
“निशा लाई है। आयुर्वेदिक काढ़ा है। डॉक्टर ने आराम करने को कहा है न?”
एक कप गिरने की आवाज़ आई। फिर अनन्या की घबराई हुई साँसें तेज हो गईं।
“बच्चा बहुत हिल रहा है… मुझे अस्पताल चलना है…”
राघव ने हँसकर कहा।
“क्यों? ताकि फिर सबको बताओ कि तुम्हारा पति तुम्हें मार रहा है? कोई नहीं मानेगा, अनन्या। सबको पता है तुम गर्भ के बाद से अस्थिर हो।”
शोक-सभा में बैठी एक बुजुर्ग महिला ने मुँह पर हाथ रख लिया। पीछे किसी ने भगवान का नाम लिया। सावित्री की बहन कमला रोने लगी, लेकिन सावित्री स्थिर रही। उसकी आँखें बंद थीं, जैसे वह अपनी बेटी की हर साँस को अपनी छाती में उतार रही हो।
रिकॉर्डिंग आगे बढ़ी।
अनन्या की आवाज़ कमजोर थी, मगर शब्द साफ थे।
“तुम कंपनी नहीं ले पाओगे। मुझे शेयरों के बारे में पता है। पापा जी ने मुझे सब बताया था।”
कुछ पल चुप्पी रही।
फिर राघव की आवाज़ बदल गई। उसमें नकली प्यार नहीं, नंगे गुस्से की धार थी।
“बेवकूफ। सच में लगा था कि तुम इतनी देर जिंदा रहोगी कि उनका इस्तेमाल कर सको?”
हॉल में जैसे किसी ने हवा खींच ली।
रिकॉर्डिंग में अब निशा की आवाज़ आई।
“राघव, आवाज़ धीमी रखो। नौकरानी बाहर है।”
अनन्या कराह रही थी।
“निशा… मेरा बच्चा…”
निशा की आवाज़ में घृणा थी।
“यही बच्चा तो सब बिगाड़ रहा है। इसके बाद तुम्हें घर से निकालना मुश्किल हो जाता।”
सावित्री ने आँखें खोलीं। सामने निशा काँप रही थी। उसकी लाल लिपस्टिक अब फैल चुकी थी। वह अब शोक में आई प्रेमिका नहीं, पकड़ी गई अपराधी लग रही थी।
रिकॉर्डिंग में फिर राघव बोला।
“सुबह कह देंगे कि उसे दौरा पड़ा था। डॉक्टर शर्मा रिपोर्ट संभाल लेंगे। माँ को ज्यादा पास मत आने देना। वह औरत शक करती है।”
अनन्या की आवाज़ बहुत धीमी हो गई।
“मेरी माँ आएगी…”
राघव हँसा।
“तुम्हारी माँ? वह विधवा औरत क्या कर लेगी?”
रिकॉर्डिंग अचानक बंद हो गई।
कुछ सेकंड तक किसी ने साँस तक नहीं ली। शोक-सभा का हॉल अब अदालत बन चुका था। सफेद फूल गवाह थे। शव-पेटिका गवाही दे रही थी। और अनन्या की चुप देह सबको देखती लग रही थी।
निरीक्षक विराज राणा आगे बढ़े।
“राघव मल्होत्रा, आपको अनन्या माथुर मल्होत्रा और उनके अजन्मे बच्चे की हत्या, साजिश और मेडिकल सबूतों से छेड़छाड़ के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है।”
राघव ने पीछे हटकर आवाज़ ऊँची की।
“यह नकली रिकॉर्डिंग है। यह सब एडिट किया गया है।”
राणा ने ठंडे स्वर में कहा।
“फॉरेंसिक जांच हो चुकी है। स्वतंत्र विष-विज्ञान रिपोर्ट भी है। अनन्या के बालों और खून के नमूनों में वही रसायन मिला, जिसकी अवैध खरीद आपके सहायक के खाते से हुई। डॉक्टर शर्मा के झूठे पर्चे, निशा कपूर के संदेश और बैंक ट्रांसफर भी हमारे पास हैं।”
2 पुलिसकर्मी आगे आए। राघव ने छूटने की कोशिश की, लेकिन भीड़ अब उसके पक्ष में नहीं थी। वही लोग जो कुछ मिनट पहले उसे सहानुभूति दे रहे थे, अब पीछे हट रहे थे, जैसे उसके स्पर्श से भी पाप लग जाएगा।
उसकी माँ, जो पहली पंक्ति में बैठी थी, रोते हुए बोली।
“राघव, तूने यह क्या कर दिया?”
राघव ने उसे देखा भी नहीं। उसकी आँखें सिर्फ सावित्री पर थीं।
“आप सोचती हैं कि जीत गईं? कंपनी मेरी थी, मेरी रहेगी।”
सावित्री ने पहली बार शव-पेटिका से हाथ हटाया और सीधी खड़ी हुई।
“कंपनी तुम्हारी नहीं थी। तुम्हारे पिता ने मेहनत से बनाई थी। मेरी बेटी ने सच बचाया। तुमने सिर्फ लालच सीखा।”
पुलिस ने उसके हाथों में हथकड़ी डाल दी।
तभी निशा तेजी से साइड वाले दरवाजे की ओर भागी। उसकी चूड़ियाँ खनकीं, साड़ी का पल्लू कुर्सी में अटका, पर वह किसी तरह छूटकर दरवाजे तक पहुँची ही थी कि एक महिला अधिकारी ने उसका रास्ता रोक लिया।
“निशा कपूर, आपको हत्या की साजिश, धोखाधड़ी, धमकी और चिकित्सा रिपोर्ट में हेरफेर के आरोप में हिरासत में लिया जाता है।”
निशा घुटनों पर गिर गई।
“मुझे राघव ने मजबूर किया था। मैं कुछ नहीं चाहती थी। उसने कहा था कि अनन्या खुद मर जाएगी…”
राघव ने पलटकर चीखा।
“चुप रहो!”
निशा भी टूट गई।
“तुमने कहा था कि बच्चा पैदा हुआ तो शेयर उसके नाम चले जाएँगे। तुमने कहा था कि वह और उसकी माँ हमें बर्बाद कर देंगी।”
भीड़ में आक्रोश फैल गया। किसी ने कहा, “शर्म करो।” किसी ने अपना फोन बंद कर दिया। कुछ लोग बाहर भागे, शायद पत्रकारों को खबर देने या अपने चेहरे बचाने।
सावित्री वहीं खड़ी रही। वह न चिल्लाई, न गिरी, न किसी को कोसा। उसकी बेटी की मौत का सच सबके सामने था, लेकिन सच भी कभी-कभी मरहम नहीं बनता। वह सिर्फ घाव को नाम दे देता है।
राघव और निशा को हॉल से बाहर ले जाया गया। जाते-जाते राघव ने शव-पेटिका की ओर एक बार भी नहीं देखा। निशा रो रही थी, पर उस रोने में पछतावा कम, डर ज्यादा था।
बाहर टीवी चैनलों की गाड़ियाँ रुक चुकी थीं। मल्होत्रा हेल्थकेयर के बोर्ड सदस्य फोन पर चीख रहे थे। किसी ने कहा कि आपात बैठक बुलानी होगी। किसी ने कहा कि शेयर बाजार में असर पड़ेगा। किसी ने कहा कि परिवार की इज्जत मिट्टी में मिल गई।
सावित्री ने इन सब आवाज़ों को दूर से सुना। जैसे कोई और दुनिया हो।
जब भीड़ कम हुई, वह धीरे-धीरे अनन्या के पास लौटी। उसने काँच पर हाथ रखा। ठंडक उसकी हथेली से होकर सीधे दिल तक उतर गई।
“बिटिया,” उसने फुसफुसाकर कहा, “माफ कर दे। माँ तुझे उस घर से पहले नहीं निकाल पाई।”
कमला ने पीछे से रोते हुए उसका कंधा पकड़ा, पर सावित्री ने सिर नहीं मोड़ा।
अरविंद सूरी उसके पास खड़े थे। उनकी आँखें भीगी थीं।
“अनन्या जानती थी कि आप हार नहीं मानेंगी।”
सावित्री की पलकों से आँसू आखिर गिर पड़े। वह पहली बार टूटी। लेकिन वह टूटना हार का नहीं था। वह उस पहाड़ के गिरने जैसा था, जिसे किसी माँ ने अंतिम क्षण तक अपने भीतर रोके रखा हो।
उसे अनन्या की कई बातें याद आने लगीं। बचपन में पीली फ्रॉक पहनकर छत पर पतंग पकड़ने दौड़ती हुई अनन्या। कॉलेज के पहले दिन डरते-डरते माँ का हाथ छोड़ती हुई अनन्या। शादी के दिन लाल लहंगे में मुस्कुराती हुई अनन्या, जब उसने सावित्री से कहा था कि नया घर भी अपना ही लगेगा।
सावित्री को याद आया कि शादी के बाद कैसे राघव ने धीरे-धीरे अनन्या को माँ से दूर किया। पहले फोन कम हुए। फिर त्योहारों पर आना कम हुआ। फिर हर बातचीत में राघव की अनुमति दिखने लगी। जब सावित्री पूछती कि सब ठीक है या नहीं, अनन्या मुस्कुराकर कहती, “हाँ माँ, बस काम ज्यादा है।”
पर उसकी आँखें झूठ नहीं बोल पाती थीं।
गर्भ ठहरने के बाद सावित्री को लगा था सब बदल जाएगा। बच्चा घर में खुशी लाएगा। मगर वही बच्चा राघव के लालच के रास्ते की सबसे बड़ी दीवार बन गया। सुरेश मल्होत्रा ने अपनी मृत्यु से पहले कंपनी के 13 प्रतिशत शेयर अनन्या को दिए थे, और शर्त रखी थी कि अनन्या के बच्चे के जन्म के बाद उन शेयरों का उत्तराधिकार सुरक्षित रहेगा। राघव को यह बात देर से पता चली। तब तक वह निशा के साथ नए जीवन, पूरी कंपनी और विदेश भागने की योजना बना चुका था।
अनन्या ने सब समझ लिया था।
वह डरती रही, पर चुप नहीं रही। उसने पुराने फोन में कॉल रिकॉर्डर लगाया। दवाइयों की तस्वीरें खींचीं। नौकरानी मीना से सच लिखवाकर सुरक्षित रखा। डॉक्टर शर्मा के पर्चों की कॉपी माँ को भेजी। बैंक ट्रांसफर की जानकारी अरविंद को दी। और आखिरी रात, जब उसे शक हुआ कि चाय में कुछ मिलाया गया है, उसने फोन रिकॉर्डिंग चालू कर दी।
वह खुद नहीं बच पाई।
पर उसने सच बचा लिया।
अगले दिन दिल्ली की हर बड़ी खबर में मल्होत्रा परिवार का नाम था। डॉक्टर शर्मा को मेडिकल काउंसिल ने निलंबित किया। राघव के निजी सहायक को भी हिरासत में लिया गया। कंपनी के बोर्ड ने सावित्री को शेयरों की अस्थायी संरक्षक मानने से बचने की कोशिश की, लेकिन अरविंद ने अदालत में अनन्या के दस्तावेज़ रख दिए। न्यायालय ने अनन्या की संपत्ति और हिस्सेदारी पर सावित्री का वैधानिक अधिकार सुरक्षित किया और कंपनी के वित्तीय लेन-देन की स्वतंत्र जांच का आदेश दिया।
सावित्री पहली बार मल्होत्रा हेल्थकेयर के बोर्डरूम में पहुँची तो लोग उसे एक टूटी हुई माँ समझ रहे थे। बड़े टेबल के चारों ओर बैठे पुरुषों ने धीमी आवाज़ में सलाह दी कि वह “सम्मानजनक समझौता” कर ले। एक ने कहा कि इतनी बड़ी कंपनी संभालना उसके बस की बात नहीं। दूसरे ने कहा कि पैसा लेकर शांत हो जाना ही परिवार की इज्जत के लिए अच्छा होगा।
सावित्री ने टेबल पर अनन्या की तस्वीर रखी। तस्वीर में अनन्या मुस्कुरा रही थी, पेट पर हाथ रखे, आँखों में भविष्य की रोशनी लिए।
फिर सावित्री ने कहा।
“इज्जत उस दिन खत्म हुई थी, जब तुम सबने एक गर्भवती औरत की चीख को मूड स्विंग समझकर अनदेखा किया। अब जो होगा, वह हिसाब होगा।”
उस दिन उसने कोई शेयर नहीं बेचा। उसने कंपनी के खातों की पूरी जांच शुरू करवाई। गर्भवती महिलाओं के लिए सुरक्षित शिकायत तंत्र बनाने का प्रस्ताव रखा। घरेलू हिंसा और मेडिकल गैसलाइटिंग के मामलों में मुफ्त कानूनी सहायता के लिए अनन्या फाउंडेशन की घोषणा की। कई निदेशक नाराज हुए। कुछ ने इस्तीफा दिया। कुछ के खिलाफ जांच खुली।
सावित्री हर शाम अनन्या के कमरे में जाती। वहाँ अजन्मे बच्चे के लिए खरीदा गया छोटा पीला कंबल अब भी रखा था। वह उसे गोद में लेकर बैठती और धीरे-धीरे रोती। न्याय ने उसकी बेटी वापस नहीं की। कोई अदालत उस बच्चे की पहली रोने की आवाज़ वापस नहीं ला सकती थी। कोई सजा उस खाली झूले को भर नहीं सकती थी।
पर अब अनन्या की मौत को झूठे मेडिकल कागजों में दफन नहीं किया जा सकता था।
महीनों बाद, जब राघव और निशा के खिलाफ आरोप तय हुए, सावित्री अदालत की पहली बेंच पर बैठी रही। राघव ने एक बार उसकी तरफ देखा। अब उसकी आँखों में घमंड नहीं था। सिर्फ भय था। निशा की साड़ी सादी थी, गहने गायब थे, चेहरा बुझा हुआ था। दोनों एक-दूसरे को दोष दे रहे थे। वही लोग जो साथ हँसते हुए शोक-सभा में आए थे, अब एक-दूसरे को बचाने के बजाय डुबो रहे थे।
सावित्री ने कोई संतोष महसूस नहीं किया। सिर्फ एक शांत, भारी न्याय।
शाम को वह यमुना के किनारे गई। अनन्या की अस्थियाँ वहीं बहाई गई थीं। आकाश में बादल छंट चुके थे। हवा में हल्की नमी थी। उसने पानी में फूल छोड़े और बहुत देर तक बहाव को देखती रही।
उसने मन ही मन अनन्या से कहा कि वह हारकर नहीं गई। उसने अपनी माँ को रोने से पहले लड़ना सिखाया। उसने मरकर भी उन लोगों को बेनकाब किया, जो उसे जीते-जी पागल साबित करना चाहते थे।
उस दिन सावित्री ने सिर्फ बेटी को विदा नहीं किया।
उसने उस झूठ को भी दफना दिया, जो कई घरों में बहुओं, बेटियों और गर्भवती औरतों की आवाज़ को “नाटक” कहकर दबा देता है।
और जब वह लौटने लगी, उसके कदम भारी जरूर थे, मगर झुके हुए नहीं थे।
क्योंकि एक माँ बदला नहीं चाहती थी।
वह चाहती थी कि अगली अनन्या की आवाज़ रिकॉर्डिंग में नहीं, जिंदगी में सुनी जाए।
