
भाग 1
रोके की थाली सजने से पहले ही शालिनी ने सबके सामने चिल्लाकर कह दिया कि वह अपने देवर को किसी अमीर लड़की के घर का घर-जमाई बनते हुए मरते दम तक नहीं देखेगी।
जयपुर के पुराने लेकिन इज्जतदार मोहल्ले में खड़े उस दोमंजिला घर की दीवारें जैसे अचानक कांप गईं। आंगन में बैठी 68 साल की शारदा देवी का चेहरा सफेद पड़ गया। पास ही शालिनी का पति मोहित चुप खड़ा था, और घर का सबसे छोटा बेटा राघव दरवाजे के पास सिर झुकाए खड़ा था, जैसे किसी ने उसके सीने से सांस निकाल ली हो।
राघव को शालिनी ने देवर से ज्यादा बेटे की तरह पाला था। शादी के 12 साल बाद भी शालिनी की गोद खाली रही, मगर उसने कभी अपनी कमी का रोना नहीं रोया। उसने राघव के लिए टिफिन बनाया, उसकी पढ़ाई की फीस बचाकर भरी, बीमारी में रात-रात भर जागी और हर त्योहार पर उसे सबसे पहले तिलक लगाया। घर में सब मजाक में कहते थे कि राघव की असली मां 2 हैं, एक शारदा और दूसरी शालिनी।
कुछ महीनों से शालिनी को राघव में बदलाव दिख रहा था। वह रात को छत पर जाकर धीरे-धीरे बात करता, नए कपड़े पहनकर मंदिर के बहाने निकलता और लौटते वक्त उसकी आंखों में वैसी चमक होती जो नौकरी की तनख्वाह से नहीं आती। एक दिन शालिनी ने बाजार में उसे एक लड़की के साथ देखा था। लड़की ने हल्के पीले रंग का सलवार सूट पहन रखा था, माथे पर छोटी सी बिंदी थी और राघव उसके लिए सड़क पार करते वक्त हाथ आगे बढ़ाकर खड़ा हो गया था। शालिनी ने दूर से ही सब समझ लिया।
उस रात खाने की मेज पर उसने मुस्कुराकर कहा,
—राघव, लड़की अच्छी है तो घर वालों से छुपाने की क्या जरूरत है? मैं तेरी भाभी हूं, दुश्मन नहीं।
राघव पहले घबरा गया, फिर सबके सामने बोला कि वह अवनि से प्यार करता है। अवनि उदयपुर के एक नामी कपड़ा व्यापारी की बेटी थी। उसके पिता का देहांत हो चुका था और उसकी मां वैदेही अकेली रहती थी। अगले ही दिन शारदा, शालिनी, मोहित और राघव अवनि के घर रिश्ता लेकर गए।
वैदेही ने सबका बहुत सम्मान किया। चांदी की थाली में मिठाई रखी गई, केसर वाली चाय आई, और अवनि शर्माकर अंदर से आई तो शारदा देवी के चेहरे पर भी हल्की मुस्कान आ गई। लड़की सुंदर थी, सलीकेदार थी, पढ़ी-लिखी थी और बातों में घमंड नहीं था।
लेकिन मिठाई मुंह तक पहुंचती, उससे पहले वैदेही ने धीमी आवाज में कहा,
—मेरी एक ही शर्त है। अवनि मेरी इकलौती संतान है। मेरे पति के बाद यह घर, कारोबार, सब उसी का है। मैं चाहती हूं कि शादी के बाद राघव कुछ साल हमारे साथ रहे। मैं अपनी बेटी को अपने जीते-जी अकेला विदा नहीं कर सकती।
शब्द कम थे, मगर असर बिजली जैसा था।
शारदा की आंखें फैल गईं। मोहित ने राघव की तरफ देखा। राघव ने हिम्मत करके कहा,
—मां, घर सिर्फ 7 किलोमीटर दूर है। मैं रोज आ सकता हूं।
शालिनी की मुट्ठियां कस गईं।
—बस, एक शब्द और नहीं, उसने कांपती आवाज में कहा। जिस बच्चे को मैंने अपने बेटे की तरह सीने से लगाया, उसे कोई सौदे की तरह अपने घर में रखेगा? हमारा राघव दामाद रहेगा, नौकर नहीं। यह रिश्ता यहीं खत्म।
राघव ने पहली बार अपनी भाभी की आंखों में देखकर कहा,
—अगर मैं अवनि से शादी नहीं कर पाया, तो मैं किसी से शादी नहीं करूंगा।
उसके शब्दों के बाद कमरे में ऐसी चुप्पी छा गई जैसे किसी ने घर की छत पर रखा पानी का घड़ा तोड़ दिया हो। उसी रात राघव ने अपने कमरे का दरवाजा बंद कर लिया, और सुबह जब शालिनी खाने की थाली लेकर पहुंची, तो अंदर से कोई आवाज नहीं आई।
भाग 2
तीसरे दिन तक राघव ने ठीक से खाना नहीं खाया। शारदा देवी ने गुस्से और डर में मोहल्ले की 4 लड़कियों की तस्वीरें मंगवा लीं। शालिनी ने खुद उन तस्वीरों को लेकर राघव के सामने रखा और बोली,
—देख, ये सब अच्छे घरों की बेटियां हैं। किसी की ऐसी शर्त नहीं कि दामाद को अपने घर बैठा लें।
राघव ने तस्वीरों को हाथ में लिया। शारदा को लगा शायद बेटा मान गया, मगर अगले ही पल उसने सारी तस्वीरें बीच से फाड़ दीं।
—मैं आपकी मरजी के खिलाफ भागकर शादी नहीं करूंगा, मगर अपने दिल को धोखा भी नहीं दूंगा।
शारदा ने उसी शाम बीमारी का नाटक किया। वह बिस्तर पर लेट गईं, माथे पर गीला कपड़ा रख लिया और राघव का हाथ पकड़कर रोने लगीं।
—अगर तू मुझे जिंदा देखना चाहता है तो हमारी पसंद की लड़की से शादी कर ले।
मां की हालत देखकर राघव टूट गया। उसने हां कह दी, मगर हां बोलते ही जैसे उसकी आंखों की रोशनी बुझ गई। वह कार्यालय गया, लौटा, चुपचाप कमरे में बंद हो गया। शालिनी रात को दरवाजे के बाहर खड़ी उसकी दबाई हुई सिसकियां सुनती रही, पर उसका अहंकार उसे अंदर जाने नहीं देता था।
उधर अवनि ने भी खाना छोड़ दिया था। वैदेही ने रोते हुए शालिनी को फोन किया, मगर शालिनी ने फोन काट दिया। अगले दिन छोटी ननद मीरा ने शालिनी को एक संदेश दिखाया, जिसमें अवनि ने लिखा था कि वह अपनी मां को अकेला छोड़ना नहीं चाहती, जैसे राघव अपनी मां को नहीं छोड़ना चाहता।
उस एक पंक्ति ने शालिनी का दिल चीर दिया।
रात को जब सब सो गए, शालिनी चुपचाप वैदेही के घर पहुंची। दरवाजा खुला, तो सामने अवनि नहीं, वैदेही जमीन पर गिरी हुई थीं।
भाग 3
वैदेही के घर का बड़ा सा बैठक कमरा रोशनी से भरा था, मगर उस रात वहां सिर्फ डर फैला हुआ था। वैदेही फर्श पर पड़ी थीं, उनके हाथ से दवा की शीशी दूर लुढ़क गई थी। शालिनी ने बिना एक पल गवाए दौड़कर उनका सिर अपनी गोद में लिया और जोर से चिल्लाई,
—अवनि! कोई है? जल्दी पानी लाओ!
अवनि भीतर के कमरे से भागती हुई आई। उसकी आंखें सूजी हुई थीं, बाल बिखरे थे, चेहरा पीला पड़ चुका था। उसने मां को उस हालत में देखा तो उसका गला सूख गया। शालिनी ने तुरंत मोहित को फोन लगाया, फिर पास के चिकित्सक को बुलाया। कुछ ही मिनटों में घर में अफरातफरी मच गई। डॉक्टर ने बताया कि वैदेही ने कई घंटे से दवा और खाना ठीक से नहीं लिया था। तनाव में उनका रक्तचाप बहुत गिर गया था।
अवनि मां के पैरों के पास बैठकर फूट-फूटकर रोने लगी।
—मां, मैंने कहा था न, मैं शादी नहीं करूंगी। आप मेरे लिए खुद को क्यों मार रही हैं?
शालिनी यह सुनकर पत्थर सी रह गई। जिस लड़की को वह अपने घर का सुख छीनने वाली समझ रही थी, वह तो खुद अपनी मां की सांसों से बंधी हुई थी। अवनि ने आंखें पोंछते हुए कहा,
—आंटी, मैंने राघव से कभी नहीं कहा कि वह अपने घर को छोड़ दे। मां डरती हैं। पापा के जाने के बाद रिश्तेदारों ने कारोबार हथियाने की कोशिश की थी। रात को लोग दरवाजे पर आकर धमकाते थे। मां ने मुझे पढ़ाया, संभाला, और अब उन्हें लगता है कि शादी के बाद मैं चली गई तो वे फिर अकेली रह जाएंगी। क्या बेटी को अपनी मां की चिंता करने का हक नहीं?
शालिनी के पास कोई जवाब नहीं था। उसे अपने ही शब्द याद आए, “मैंने राघव को बेटे की तरह पाला है।” फिर अचानक उसे लगा, अगर कोई उससे राघव को छीनने आए तो वह भी तो इसी तरह टूट जाएगी। वैदेही भी वही दर्द जी रही थीं, बस उसका नाम अलग था।
डॉक्टर के जाने के बाद वैदेही को कमरे में लिटाया गया। शालिनी बाहर बरामदे में खड़ी रही। सामने तुलसी का चौरा था, जिसकी लौ हवा में कांप रही थी। अवनि धीरे से उसके पास आई।
—आप मुझे गलत समझती हैं, आंटी। मैं आपकी जगह होती तो शायद मैं भी यही सोचती। मगर मैं राघव को आपसे दूर नहीं करना चाहती। मैं सिर्फ अपनी मां को अकेला मरते देखने से डरती हूं।
उसकी आवाज में ऐसी सच्चाई थी कि शालिनी की आंखें भर आईं। उसने पहली बार अवनि को बहू की तरह नहीं, एक बेटी की तरह देखा। वही बेटी जो अपनी मां के लिए समाज से लड़ने को तैयार थी। वही बेटी, जिसे लोग स्वार्थी कह रहे थे क्योंकि वह अपने पिता के घर की आखिरी जिम्मेदारी निभाना चाहती थी।
शालिनी घर लौटी तो सुबह होने वाली थी। आंगन में शारदा देवी बैठी थीं। उनके सामने पूजा की थाली पड़ी थी, मगर दीपक बुझ चुका था। राघव का कमरा अब भी बंद था। शालिनी ने पहली बार बिना डर के शारदा के सामने कहा,
—मांजी, हमने गलती की है।
शारदा ने तेज नजरों से देखा।
—किस बात की गलती? क्या अब तू भी कहेगी कि मेरा बेटा घर-जमाई बन जाए?
—नहीं, मांजी, मैं कहूंगी कि हमारा बेटा इंसान बने। और इंसान अपने प्यार की मां को अकेला छोड़कर सुखी नहीं रह सकता।
शारदा का चेहरा कठोर हो गया।
—बहू, समाज क्या कहेगा? लोग कहेंगे शारदा का बेटा ससुराल में बैठ गया।
शालिनी ने पहली बार सास की बात काट दी।
—समाज ने तब क्या कहा था जब मेरी कोख खाली रही? समाज ने क्या मेरे आंसू पोंछे थे? समाज ने क्या राघव को पढ़ाया था? अगर नहीं, तो आज समाज हमारे बच्चे की जिंदगी का फैसला क्यों करेगा?
मोहित भी बरामदे में आ चुका था। उसने धीरे से कहा,
—मां, राघव कहीं दूर नहीं जा रहा। उदयपुर नहीं, यहीं शहर के भीतर 7 किलोमीटर पर रहेगा। और मैं हूं, काजल है, शालिनी है। आपका घर खाली नहीं होगा।
छोटी बहन काजल ने भी मां का हाथ पकड़ लिया।
—मां, कल मेरी शादी होगी और अगर मेरे ससुराल वाले कहेंगे कि अपने मां-बाप को भूल जाओ, नौकरी छोड़ दो, अपने मन की कोई बात मत करो, तो आपको कैसा लगेगा? आप चाहेंगी कि आपकी बेटी रोती रहे, बस लोग खुश रहें?
यह सवाल शारदा के दिल में तीर की तरह लगा। वह बोलना चाहती थीं, मगर शब्द नहीं निकले। काजल उनकी गोद में सिर रखकर रोने लगी।
—मां, अवनि भी किसी की बेटी है।
शारदा देवी ने पहली बार लंबी सांस ली। उनकी आंखें दरवाजे की तरफ चली गईं, जहां राघव बचपन में स्कूल से लौटकर बैग फेंक देता था। उन्हें वह दिन याद आया जब शालिनी नई-नई बहू बनकर आई थी और छोटे से राघव ने उसके आंचल में मुंह छुपाकर कहा था, “भाभी, आप कहीं मत जाना।” उसी बच्चे को आज वे अपने डर के कारण तोड़ रही थीं।
सुबह होते-होते घर में फैसला बदल चुका था, लेकिन राघव को यह बात नहीं बताई गई। शालिनी ने खुद वैदेही को फोन किया और बस इतना कहा,
—बहनजी, आज शाम आप अवनि को लेकर हमारे घर आ जाइए। खाली हाथ मत आइएगा। शगुन की थाली साथ लाइएगा।
शाम को जब दरवाजा खुला, राघव कमरे से बाहर आया तो सामने का दृश्य देखकर ठिठक गया। आंगन में रंगोली बनी थी। पीतल के दीये जल रहे थे। शारदा देवी ने लाल साड़ी पहन रखी थी। मोहित मिठाई की डिब्बी लिए खड़ा था। और दरवाजे पर वैदेही, अवनि के साथ खड़ी थीं। अवनि ने हल्की गुलाबी साड़ी पहनी थी, आंखों में डर भी था और उम्मीद भी।
राघव ने शालिनी की तरफ देखा, जैसे पूछ रहा हो कि कहीं यह कोई नया इम्तहान तो नहीं।
शालिनी उसके पास आई। उसके बालों पर हाथ फेरा और पहली बार बिना रुके रो पड़ी।
—मुझे माफ कर दे, बेटा। मैं तुझे खोने से डर गई थी। मुझे लगा कोई तुझे मुझसे छीन लेगा। पर मैंने यह नहीं सोचा कि मैं खुद तेरी खुशी छीन रही हूं।
राघव की आंखों में आंसू आ गए।
—भाभी, मैं आपसे दूर नहीं जाना चाहता था। मैं बस अवनि को भी तोड़ना नहीं चाहता था।
शारदा धीरे-धीरे आगे बढ़ीं। उनके हाथ में रोली और चावल थे।
—राघव, मां का डर कभी-कभी मां को अंधा कर देता है। मुझे डर था कि लोग कहेंगे मेरा बेटा पराया हो गया। पर अब समझ आया कि बेटा घर बदलने से पराया नहीं होता, दिल बदलने से पराया होता है।
वैदेही ने हाथ जोड़ दिए।
—शारदा जी, मैं आपकी जगह होती तो शायद मुझे भी डर लगता। मैं वादा करती हूं, आपका बेटा मुझसे बेटा बनकर रहेगा, कैदी बनकर नहीं। और अवनि आपकी बहू बनकर जाएगी, मेरी बेटी रहना नहीं छोड़ेगी।
मोहित ने एक समझदारी भरा प्रस्ताव रखा। अवनि और राघव शादी के बाद वैदेही के घर के पास वाले खाली फ्लैट में रहेंगे, ताकि दोनों परिवारों से जुड़े रहें। राघव रोज अपने घर आएगा, शारदा की दवाएं और पूजा का सामान वही लाएगा, और कारोबार में वैदेही की मदद भी करेगा। अवनि अपनी मां का साथ छोड़े बिना शारदा का घर भी अपना मानेगी। त्योहार एक बार यहां, एक बार वहां मनेंगे। किसी को किसी पर अधिकार साबित नहीं करना होगा, क्योंकि रिश्ता अधिकार से नहीं, अपनापन से टिकेगा।
लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी।
मोहल्ले में खबर फैलते देर नहीं लगी। अगले दिन मंदिर के बाहर 2 औरतों ने शारदा को सुनाते हुए कहा,
—बेटा पढ़ाया-लिखाया और आखिर में ससुराल भेज दिया। आजकल की बहुएं घर संभालती नहीं, लड़कों को अपने पीछे घुमा लेती हैं।
शारदा रुक गईं। पहले वाली शारदा होतीं तो शायद शर्म से सिर झुका लेतीं, लेकिन उस दिन उन्होंने सीधा जवाब दिया,
—मेरा बेटा किसी के पीछे नहीं घूम रहा। वह 2 मांओं की जिम्मेदारी निभा रहा है। जिस घर में बेटी को मां के लिए रुकने का हक है, उस घर में दामाद को भी इंसान समझने का हक है।
औरतें चुप हो गईं। शालिनी थोड़ी दूर खड़ी यह सुन रही थी। उसे पहली बार लगा कि असली इज्जत लोग क्या कहते हैं, इसमें नहीं; असली इज्जत उस दिन होती है जब घर का सच घर वाले खुद समझ लें।
रोके की रस्म बड़ी सादगी से हुई, मगर भावनाओं से भरी। शारदा ने अवनि के माथे पर तिलक लगाया। वैदेही ने राघव की कलाई में मौली बांधी। शालिनी ने दोनों के हाथों पर हल्दी लगाते हुए कहा,
—आज से एक नहीं, 2 घर हैं। मगर दिल एक ही रहेगा।
राघव ने झुककर शालिनी के पैर छुए। शालिनी ने उसे उठाकर गले से लगा लिया।
—तू चाहे जहां रहे, मेरे लिए तू वही बच्चा रहेगा जो बारिश में भीगकर घर आता था और कहता था, भाभी, गरम पराठा दो।
राघव रो पड़ा।
—और आप वही रहेंगी जो मेरे हिस्से की आखिरी रोटी खुद भूखी रहकर भी मुझे खिला देती थीं।
शादी 1 महीने बाद हुई। जयपुर की शाम रंग-बिरंगी रोशनी से चमक रही थी। बैंड की आवाज, मेहंदी की खुशबू, और रिश्तेदारों की भीड़ के बीच शालिनी ने अवनि को दुल्हन के रूप में देखा तो उसका दिल भर आया। लाल बनारसी साड़ी में अवनि सचमुच राजकुमारी लग रही थी, मगर उसकी आंखें बार-बार अपनी मां को ढूंढ रही थीं। वैदेही भी मुस्कुरा रही थीं, पर बेटी की विदाई का दर्द उनके चेहरे पर साफ था।
विदाई के समय अवनि मां से लिपटकर रोई।
—मां, मैं आपको छोड़कर नहीं जा रही। बस आपका आंगन थोड़ा बड़ा हो रहा है।
तभी शारदा आगे आईं। उन्होंने वैदेही का हाथ पकड़ा और बोलीं,
—बहन, अब रोना बंद कीजिए। आज से आपकी बेटी हमारी बहू है और हमारा बेटा आपका सहारा। अगर आप अकेली होंगी तो हम सब दोषी होंगे।
विदाई की गाड़ी चली, मगर उस रात दुल्हन सीधे ससुराल नहीं, पहले शारदा के घर आई। आंगन में आरती हुई, काजल ने चावल की थाली रखी, और शालिनी ने अवनि के कान में धीरे से कहा,
—बहू बनकर मत डरना। बेटी बनकर बोलना।
कुछ दिन बाद राघव और अवनि अपने नए फ्लैट में रहने लगे, जो दोनों घरों के बीच था। सुबह राघव शारदा के घर जाकर चाय पीता, फिर वैदेही को बाजार के काम में मदद करता, फिर अपने कार्यालय जाता। अवनि दोपहर में शालिनी को फोन करके पूछती कि मांजी ने दवा ली या नहीं। रविवार को दोनों घरों में बारी-बारी से खाना बनता। कभी वैदेही के घर दाल बाटी बनती, कभी शारदा के घर कढ़ी चावल।
धीरे-धीरे वही लोग, जो कभी ताने मारते थे, अब कहते थे,
—अच्छा किया। आजकल बेटियों को भी सहारा चाहिए और मां-बाप को भी।
सबसे बड़ा बदलाव शालिनी के भीतर आया। वह पहले डरती थी कि राघव दूर हो जाएगा। अब उसे एहसास हुआ कि प्यार बांटने से कम नहीं होता। उसने अवनि को सिर्फ बहू नहीं माना, बल्कि अपनी अधूरी गोद का एक नया आशीर्वाद समझा। अवनि भी हर तीज पर सबसे पहले शालिनी के पैर छूती, फिर अपनी मां के पास जाती। किसी रस्म में कोई छोटा-बड़ा नहीं रहा।
एक दिन शादी के 6 महीने बाद शालिनी आंगन में बैठी थी। राघव आया, उसके हाथ में मिठाई का डिब्बा था। उसके पीछे अवनि थी, और वैदेही भी साथ थीं। शारदा ने चौंककर पूछा,
—क्या बात है? सब ऐसे मुस्कुरा क्यों रहे हो?
अवनि शर्म से सिर झुका गई। राघव ने मिठाई आगे बढ़ाई।
—भाभी, आप दादी बनने वाली हैं।
शालिनी के हाथ से पूजा की माला गिर गई। वह कुछ पल अवनि को देखती रही, फिर दौड़कर उसे गले लगा लिया। उसकी आंखों से इतने सालों का खालीपन बह निकला। उसने अवनि के पेट पर कांपता हुआ हाथ रखा और फुसफुसाई,
—इस बच्चे की 3 दादियां होंगी। कोई अकेला नहीं रहेगा।
वैदेही रो पड़ीं। शारदा ने आसमान की तरफ देखा और मन ही मन अपने दिवंगत पति को याद किया। काजल ने हंसते हुए कहा,
—अब तो मोहल्ले वालों को नया ताना मिलेगा कि इस बच्चे को कौन ज्यादा प्यार करेगा।
सब हंस पड़े।
मगर उस हंसी के पीछे 1 बड़ा सच छिपा था। जिस रिश्ते को लोग घर-जमाई कहकर छोटा कर रहे थे, वही रिश्ता 2 टूटती मांओं, 1 खाली गोद वाली भाभी, 1 जिद्दी बेटे और 1 डरी हुई बेटी को फिर से परिवार बना गया।
कभी-कभी बेटियां पराई नहीं होतीं, दामाद पराया नहीं होता, और घर सिर्फ वह नहीं होता जहां नाम की पट्टी लगी हो। घर वह होता है जहां किसी की चिंता को बोझ नहीं, प्यार समझा जाए।
उस रात शालिनी ने मंदिर में दीपक जलाया। लौ सीधी और शांत थी। उसने आंखें बंद करके बस इतना कहा,
—हे भगवान, धन्यवाद कि मेरा बेटा मुझसे दूर नहीं गया। वह तो मुझे एक और मां, एक और बेटी और एक आने वाली धड़कन दे गया।
