
भाग 1
—तुम कभी मेरी बेटी नहीं थीं, सानवी। तुम तो बस चलती-फिरती बैंक पासबुक थीं।
राजेंद्र मल्होत्रा ने यह बात अपनी ही बेटी को थप्पड़ मारने के बाद कही, जब उसने उसके मोबाइल से 620,000 रुपये अपने खाते में ट्रांसफर कर लिए थे। सानवी फर्श पर गिरी हुई थी, उसके होंठ से खून बह रहा था, और उसके कानों में पिता की आवाज हथौड़े की तरह बज रही थी।
उस शाम गुरुवार था। जयपुर के वैशाली नगर में अपने छोटे से किराए के फ्लैट में सानवी थकी हुई लौटी थी। वह एक बीमा कंपनी के क्लेम विभाग में काम करती थी, जहां दिन भर लोगों के रोने, गुस्से और कागजी झंझटों से जूझना पड़ता था। उसने 5 साल में एक-एक रुपया बचाया था। कभी नई साड़ी नहीं खरीदी, कभी दोस्तों के साथ महंगी जगह नहीं गई, कभी अपने लिए सोने की छोटी चेन तक नहीं ली। उसका सपना था कि किसी दिन वह अपना छोटा सा घर खरीदेगी, जहां कोई उसके एहसान गिनाकर उसे छोटा न कर सके।
लेकिन जैसे ही उसने दरवाजा खोला, उसका सपना बैठक में बैठा उसका इंतजार कर रहा था, पिता के हाथों में टूटा हुआ।
राजेंद्र सोफे पर बैठा था। एक हाथ में उसके फ्लैट की डुप्लिकेट चाबी थी और दूसरे हाथ में उसकी बैंक पासबुक।
सानवी के पैर वहीं जम गए।
—आप यहां कैसे आए?
राजेंद्र ने बिना शर्माए चाबी हवा में हिलाई।
—तूने इमरजेंसी के लिए चाबी दी थी। आज इमरजेंसी है।
—किस बात की इमरजेंसी?
उसने बहुत भारी आवाज में कहा कि उसकी मां, माया, को अग्न्याशय में ट्यूमर है। डॉक्टरों ने कहा है कि तुरंत निजी अस्पताल में ऑपरेशन न हुआ, तो 3 महीने के अंदर जान जा सकती है। वह बोला कि सरकारी अस्पताल में तारीख नहीं मिल रही, रिश्तेदारों ने मुंह मोड़ लिया, और अब केवल सानवी ही मां को बचा सकती है।
सानवी के हाथ कांपने लगे। माया उसकी मां थी। चाहे मां ने हमेशा छोटे भाई आरव को ज्यादा प्यार दिया हो, चाहे हर त्योहार पर सानवी से पैसे मांगे हों और बदले में ताने दिए हों, फिर भी वह मां ही थी।
—कौन सा अस्पताल? डॉक्टर का नाम बताइए। मैं अभी चलती हूं। पैसे देने से पहले रिपोर्ट देखनी पड़ेगी।
राजेंद्र का चेहरा तुरंत बदल गया। दुख गायब हो गया, आंखों में गुस्सा उतर आया।
—तेरी मां मर रही है और तुझे रिपोर्ट चाहिए?
—मैं मना नहीं कर रही, पापा। बस जानना चाहती हूं कि पैसा किसे देना है।
—तू हमेशा ऐसी ही थी। शक करने वाली, कंजूस, अपने ही घरवालों से हिसाब मांगने वाली।
—ये मेरी पूरी जमा पूंजी है। मैं बस—
थप्पड़ उसकी बात पूरी होने से पहले पड़ा। सानवी सोफे के पास गिर गई। कुछ सेकंड तक उसे छत घूमती हुई दिखाई दी। उसके कान सुन्न हो गए। फिर राजेंद्र ने उसका मोबाइल उठा लिया।
—बैंक ऐप खोल।
—पापा, प्लीज—
उसने मुट्ठी उठाई।
—खोल, वरना अगला थप्पड़ याद रहेगा।
डर ने सानवी की आवाज छीन ली। उसने पासवर्ड बताया। राजेंद्र ने खाते में रखे 620,000 रुपये अपने खाते में ट्रांसफर कर लिए। स्क्रीन पर रकम घटकर लगभग खाली दिखी, और सानवी को लगा जैसे किसी ने उसके पिछले 5 साल नोचकर फेंक दिए हों।
—हो गया —राजेंद्र ने मोबाइल जेब में डालते हुए कहा— आज पहली बार तूने इस परिवार के काम की कोई चीज की है।
सानवी ने फर्श से उठने की कोशिश की।
—मुझे मां से मिलना है।
राजेंद्र हंसा। वह हंसी किसी अजनबी की नहीं, उसी आदमी की थी जिसे वह बचपन में स्कूल फंक्शन में ढूंढ़ती थी।
—तेरी मां बिल्कुल ठीक है। कल हम गोवा जा रहे हैं। उसके बाद मुंबई से क्रूज है। महीनों से प्लान बना रखा था, बस पैसे कम पड़ रहे थे।
सानवी का चेहरा पीला पड़ गया।
—आपने बीमारी का झूठ बोला?
—परिवार में झूठ नहीं होता, जरूरत होती है।
—आपने मुझे मारा। मेरा पैसा चुराया।
राजेंद्र झुककर उसके चेहरे के पास आया।
—परिवार चोरी नहीं करता। परिवार बांटता है। और पुलिस गई न, तो कहेंगे तूने खुशी से पैसे दिए, बाद में पछताकर नाटक किया। सबको पता है तू कितनी जिद्दी है।
दरवाजे तक पहुंचकर उसने आखिरी वार किया।
—हॉलिडे के लिए शुक्रिया, बेटी।
दरवाजा बंद हुआ तो घर में ऐसी खामोशी फैल गई जैसे किसी ने सांस रोक दी हो। सानवी बहुत देर तक फर्श पर बैठी रही। फिर वह बाथरूम गई। आईने में उसका चेहरा सूजा हुआ था, होंठ फटा था, बांह पर उंगलियों के निशान थे। पहली बार उसे साफ दिखा कि यह सिर्फ एक थप्पड़ नहीं था। यह वर्षों से चल रहा हिसाब था, जिसमें वह बेटी नहीं, एटीएम थी।
उसने अपने ऑफिस की एक कानूनी सेमिनार से मिला नंबर निकाला। वकील का नाम था अधिवक्ता कबीर मेहरा।
—मेरे पिता ने मुझे मारा और मेरी सारी बचत ले ली —उसने कांपती आवाज में कहा— मुझे अपना पैसा वापस चाहिए। और मुझे उनसे बचना है।
कबीर 1 घंटे में एक महिला डॉक्टर के साथ पहुंचा। डॉक्टर ने चोटों की तस्वीरें लीं, मेडिकल रिपोर्ट बनाई, फिर उसे अस्पताल ले जाया गया। रास्ते में सानवी के मोबाइल पर माया का संदेश आया।
“तुम्हारे पापा ने बताया कि आखिर तुमने हमारी मदद कर दी। बीच से फोटो भेजूंगी।”
सानवी ने लिखा कि पापा ने उसे मारा, धमकाया और झूठ बोलकर पैसे ले गए।
माया का जवाब देर से आया, लेकिन हर शब्द जहर था।
“झूठ मत बोलो। तुमने खुद को चोट पहुंचाई होगी ताकि हमें बदनाम कर सको।”
सानवी ने वहीं समझ लिया कि मां अंधेरे में नहीं थी। मां भी उसी खेल का हिस्सा थी।
अगली सुबह जब राजेंद्र और माया एयरपोर्ट जाने की तैयारी कर रहे थे, कबीर ने पुलिस शिकायत दर्ज कराई, बैंक को ट्रांजैक्शन रोकने का आवेदन दिया और अदालत से खाते फ्रीज करने की अर्जेंट मांग की।
लेकिन जब बैंक स्टेटमेंट आया, कबीर का चेहरा गंभीर हो गया।
पैसा राजेंद्र के खाते में अब था ही नहीं।
सानवी ने स्क्रीन पर नजर टिकाई। 620,000 रुपये 18 मिनट में 4 हिस्सों में गायब कर दिए गए थे।
और फिर कबीर ने धीमी आवाज में कहा—
—सानवी, बात सिर्फ चोरी की नहीं है। तुम्हारी मां के खाते में भी पैसा गया है।
सानवी को लगा जैसे दूसरी बार जमीन खिसक गई।
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भाग 2
कबीर ने पूरी रात बैंक रिकॉर्ड खंगाले और सुबह सानवी को बताया कि राजेंद्र ने 620,000 रुपये में से क्रूज की बुकिंग की, पुराने क्रेडिट कार्ड चुकाए, एक ट्रैवल एजेंसी को एडवांस दिया और 210,000 रुपये सीधे माया के खाते में भेजे। इसका मतलब था कि माया सिर्फ जानकार नहीं, बल्कि धोखे की हिस्सेदार भी बन सकती थी। कबीर ने कहा —हमें उन्हें बोलने देना होगा, ताकि वे खुद सच स्वीकार करें। सानवी ने भारी मन से मां को संदेश भेजा कि वह बस समझना चाहती है कि पैसा ऑपरेशन के लिए था या यात्रा के लिए। माया ने घमंड में जवाब दिया कि राजेंद्र ने पहले ही कहा था कि सानवी से विनती करने का कोई फायदा नहीं, उसे दबाना पड़ेगा, और वैसे भी यह पैसा एक दिन माता-पिता का ही होना था। कबीर ने वे संदेश प्रमाणित कराए, मेडिकल रिपोर्ट, बैंक रिकॉर्ड और चोटों की तस्वीरों के साथ अदालत में रखे। उसी दिन ट्रैवल एजेंसी को कानूनी नोटिस गया। गोवा की फ्लाइट से पहले ही राजेंद्र और माया को सूचना मिली कि उनकी बुकिंग जांच के कारण रोक दी गई है। फिर परिवार में तूफान आ गया। बुआ, मौसी, चचेरे भाई, पुराने पड़ोसी सब सानवी को फोन कर-करके गालियां देने लगे। माया ने परिवार के व्हाट्सऐप ग्रुप में लिखा कि बेटी ने मां-बाप को गिफ्ट दिया था और अब बदनाम कर रही है। राजेंद्र ने कहा कि उसने सानवी को छुआ तक नहीं। सानवी टूटने ही वाली थी कि मां की चचेरी बहन नीलिमा का संदेश आया, “मैं तुम्हें मानती हूं। उसने हमारे साथ भी यही किया था।” नीलिमा ने बताया कि राजेंद्र ने सालों पहले उसके पति से 300,000 रुपये कारोबार के नाम पर लिए थे, फिर कभी लौटाए नहीं। माया ने तब भी रो-रोकर शिकायत रोकवाई थी, कहकर कि परिवार की इज्जत बर्बाद हो जाएगी। धीरे-धीरे पुराने जख्म खुलने लगे। किसी ने नकली साइन की बात कही, किसी ने उधार की, किसी ने जमीन बेचकर पैसा गायब होने की। अदालत में राजेंद्र मुस्कुराते हुए पहुंचा, जैसे उसकी बात ही कानून हो। उसके वकील ने कहा कि यह बेटी द्वारा दिया गया स्वैच्छिक कर्ज था। कबीर ने माया के संदेश, डॉक्टर की रिपोर्ट और पैसे के रास्ते सामने रखे। जज ने तुरंत बचे हुए पैसे फ्रीज किए, ट्रैवल एजेंसी से रिफंड रोकने को कहा और राजेंद्र-माया को सानवी से संपर्क करने से रोका। कुछ दिनों में 587,000 रुपये सानवी के खाते में लौट आए। 33,000 रुपये पहले ही कर्ज चुकाने में खर्च हो चुके थे। राजेंद्र ने हार मानने के बजाय 2,000,000 रुपये की मानहानि का केस ठोक दिया, लेकिन अदालत ने उसे खारिज कर दिया और चेतावनी दी कि ऐसी हरकत दोबारा हुई तो इसे कानूनी उत्पीड़न माना जाएगा। सानवी को लगा कि अब शायद सब खत्म हो गया है। लेकिन 4 महीने बाद, उसका छोटा भाई आरव उसके ऑफिस के बाहर फटे बैग और लाल आंखों के साथ खड़ा मिला। वह हमेशा मां-बाप का लाड़ला था, वही जिसके लिए घर में मिठाई आती थी, वही जिसकी गलतियां भी “लड़कों से हो जाती हैं” कहकर माफ हो जाती थीं। उसने सानवी को देखते ही कहा —दीदी, मम्मी ने मुझसे 400,000 रुपये का लोन लेने को कहा। मैंने मना किया तो पापा ने गुस्से में तुम्हारे पैसों को लेकर ऐसी बात कह दी, जो तुमसे 12 साल छिपाई गई थी। सानवी के हाथ ठंडे पड़ गए। आरव ने बैग से नीली फाइल निकाली। उसमें पुराने बैंक पेपर, निवेश पॉलिसी और सानवी के नाम पर बने दस्तावेज थे। सबसे ऊपर उसकी दादी की लिखावट में एक पन्ना था, जिसमें लिखा था कि 250,000 रुपये सानवी की पढ़ाई के लिए रखे गए हैं।❤️नमस्ते, प्यारे रीडर्स! अगर आप अगले पार्ट के लिए तैयार हैं, तो प्लीज़ नीचे “Yes” लिखें, और मैं इसे तुरंत भेज दूँगा। मैं उन सभी के अच्छे स्वास्थ्य और खुशी की कामना करता हूँ जिन्होंने यह कहानी पढ़ी और पसंद की है! 💚
भाग 3
नीली फाइल सानवी की जिंदगी की सबसे खामोश चीख थी। कागज पुराने थे, किनारे पीले पड़ चुके थे, लेकिन उन पर लिखा सच ताजा घाव की तरह जल रहा था। जब सानवी 19 की थी, उसकी दादी, कमला देवी, ने अजमेर के पास का एक छोटा खेत बेचकर अपने 2 पोतों-पोती के लिए पैसा रखा था। 250,000 रुपये सानवी की पढ़ाई के लिए और 250,000 रुपये आरव के लिए। राजेंद्र को केवल देखरेख करनी थी, जब तक दोनों बच्चे कॉलेज खत्म न कर लें।
लेकिन दस्तावेज बता रहे थे कि सानवी का हिस्सा कई किश्तों में निकाला गया था। हर निकासी पर सानवी के नकली हस्ताक्षर थे।
सानवी ने फाइल पकड़े-पकड़े पूछा—
—ये तुम्हें कहां मिला?
आरव ने सिर झुका लिया।
—मम्मी ने अलमारी में छिपाकर रखा था। जब मैंने लोन लेने से मना किया, पापा बोले कि बच्चे मां-बाप के लिए कर्ज उठाते ही हैं। फिर मम्मी चिल्लाईं कि पहले ही सानवी की यूनिवर्सिटी वाले पैसे ने घर में बहुत झगड़ा कराया था। उसी रात मैंने फाइल ढूंढ़ी।
सानवी को अपने पुराने दिन याद आए। रात में कैफे में काम करना, सुबह नींद से भारी आंखों के साथ क्लास जाना, फीस जमा करने के लिए अपनी चूड़ियां बेचना, और हर बार पिता का कहना—
—हमारे पास पैसे नहीं हैं। पढ़ना है तो खुद कमाओ।
उस समय उसने सोचा था कि घर गरीब है। अब पता चला, घर गरीब नहीं था, पिता बेईमान था।
कबीर ने केस बढ़ाया। जांच में पता चला कि राजेंद्र ने सानवी के नाम का इस्तेमाल करके 2 व्यापारिक कर्जों में गारंटी भी दी थी। कुल रकम 1,000,000 रुपये से ऊपर जा रही थी। यह एक बार का लालच नहीं था। यह सालों से चल रहा आर्थिक शोषण था।
पहली बार माया ने सानवी से अकेले मिलने की मांग की। सानवी ने साफ कहा कि मुलाकात केवल मध्यस्थता कक्ष में होगी, कबीर की मौजूदगी में।
माया अंदर आई तो पहले जैसी तेज और सजधज वाली औरत नहीं लग रही थी। चेहरा बुझा था, बाल बिखरे थे, आंखों में डर था।
—मैं सब नहीं जानती थी —माया ने धीमे कहा।
सानवी ने उसकी तरफ सीधे देखा।
—लेकिन दादी के पैसों के बारे में जानती थीं?
माया चुप रही।
—बोलिए, मम्मी।
—हां। पर तुम्हारे पापा ने कहा था वापस कर देंगे।
—मेरी फीस भरने के बजाय आपने मुझे रात में काम करते देखा।
—मुझे डर लगता था। घर में रोज लड़ाई होती थी।
—और जब उन्होंने मुझे मारा?
माया की आंखों से आंसू निकले।
—मुझे डर था कि वह जेल चले जाएंगे।
सानवी की आवाज टूट गई, लेकिन वह कमजोर नहीं पड़ी।
—उन्हें बचाने के लिए आपने मुझे झूठी कहा।
—वह तुम्हारे पिता हैं।
—और मैं आपकी बेटी थी।
कमरे में सन्नाटा छा गया। माया रोती रही, मगर सानवी ने हाथ नहीं बढ़ाया। उसे पहली बार समझ आया कि किसी का डर वास्तविक हो सकता है, लेकिन उससे किए गए अन्याय छोटे नहीं हो जाते।
अदालत ने समझौते का मौका दिया। राजेंद्र अगर पढ़ाई का पैसा, बचे हुए 33,000 रुपये, नकली हस्ताक्षर और धोखाधड़ी मान लेता, तो कुछ सजा कम हो सकती थी। माया अगर सच बयान देती और अपने खाते में आया पैसा लौटाती, तो उसे भी राहत मिल सकती थी।
माया टूट गई और उसने बयान दे दिया। मगर राजेंद्र ने जज के सामने गर्दन सीधी रखकर कहा—
—मैंने कुछ गलत नहीं किया। जो कुछ सानवी है, मेरी वजह से है। मैंने उसे मजबूत बनाया।
उस एक वाक्य ने सानवी के भीतर बची आखिरी उम्मीद मार दी। उसे समझ आ गया कि उसके पिता को पछतावा नहीं, गर्व है।
मुकदमा चला। रिश्तेदारों ने पुराने उधारों की गवाही दी। बैंक ने बताया कि लॉगिन राजेंद्र के फोन से हुआ था। हस्ताक्षर विशेषज्ञ ने साबित किया कि सानवी के नाम वाले दस्तावेज नकली थे। आखिरकार अदालत ने पूरी आर्थिक भरपाई का आदेश दिया। राजेंद्र की एक छोटी दुकान पर कुर्की लगी, सानवी से स्थायी दूरी का आदेश जारी हुआ, और उसे घरेलू हिंसा, धोखाधड़ी और जालसाजी में दोषी माना गया। उम्र और पहले औपचारिक अपराध न होने के कारण सजा का कुछ हिस्सा निगरानी में पूरा होना था, लेकिन उसकी इज्जत का नकली ताज वहीं टूट गया।
सानवी को लगभग सारा पैसा लौट आया। पर असली बदलाव पैसे से नहीं आया। वह थेरेपी के लिए डॉ. रिद्धिमा सेन के पास जाने लगी।
पहले दिन उसने कहा—
—उन्होंने मुझे पहले कभी नहीं मारा था।
डॉ. रिद्धिमा ने शांत स्वर में जवाब दिया—
—दुरुपयोग उस थप्पड़ से शुरू नहीं हुआ। वह तब शुरू हुआ जब आपको सिखाया गया कि प्यार पाने के लिए आपको भुगतान करना होगा।
सानवी रो पड़ी। उसे हर त्योहार याद आया, जब उसकी मेहनत को कर्तव्य कहा गया। हर जन्मदिन याद आया, जब उपहार की जगह उससे बिजली का बिल मांगा गया। हर तारीफ याद आई, जिसके अंत में कोई मांग जुड़ी होती थी।
आरव भी बदलने लगा। राजेंद्र और माया ने उसका किराया देना बंद कर दिया। उसकी गर्लफ्रेंड भी तब चली गई जब उसे पता चला कि परिवार का पैसा अब नहीं आने वाला। एक दिन वह सानवी के पास आया।
—मैं तुम पर बोझ नहीं बनना चाहता। बस सीखना चाहता हूं कि अपने पैरों पर कैसे खड़ा हुआ जाए।
सानवी ने उसे घर में नहीं रखा, क्योंकि उसे अपनी शांति बचानी थी। लेकिन उसने 35,000 रुपये कमरे के डिपॉजिट के लिए दिए और रिज्यूमे बनवाया।
—ये कर्ज है —उसने कहा— दया नहीं।
आरव ने सिर हिलाया।
कुछ महीनों में उसे एक लॉजिस्टिक कंपनी में जूनियर असिस्टेंट की नौकरी मिली। तनख्वाह कम थी, पर हर महीने वह कुछ पैसे लौटाता। एक बार उसने फोन करके कहा—
—दीदी, आज मैंने अपना बिजली बिल खुद भरा।
सानवी मुस्कुराई।
—ये छोटी बात नहीं है। तुम ऐसी जिंदगी बना रहे हो जिसे कोई तुमसे छीन नहीं सकता।
समय बीता। सानवी को ऑफिस में सुपरवाइजर बना दिया गया। उसी दौरान उसकी मुलाकात ईशान से हुई, जो पास के सरकारी स्कूल में शिक्षक था। वह रोज शाम उसी चाय की दुकान पर आता था जहां सानवी अदरक वाली चाय पीती थी। तीसरी मुलाकात पर सानवी ने उससे अपने परिवार की बात का एक हिस्सा बताया।
—मेरा परिवार बहुत उलझा हुआ है —उसने कहा।
ईशान ने बस इतना कहा—
—उनके फैसलों की जिम्मेदार तुम नहीं हो। तुम बस यह तय कर सकती हो कि अब क्या बनाना है।
सानवी को पहली बार लगा कि कोई पुरुष उसकी कहानी सुनकर उसे कमजोर नहीं, जीवित देख रहा है।
1 साल बाद अचानक अस्पताल से फोन आया। राजेंद्र को हार्ट अटैक आया था। माया ने सानवी को इमरजेंसी संपर्क में लिखवा दिया था। अस्पताल पहुंचकर माया ने बिना भूमिका के कहा—
—700,000 रुपये चाहिए। तुम्हीं कर सकती हो।
सानवी के भीतर पुराना अपराधबोध जागा। वही आवाज जो कहती थी, “बेटी हो, मदद करो।” मगर इस बार उसने उसे पहचाना।
—मैं आपको पैसे नहीं दूंगी।
—वह मर सकते हैं।
—जब आपने बीमारी का झूठ बोलकर मेरा पैसा लिया था, तब भी यही कहा था। अब बीमारी सच है, पर विश्वास झूठ से नहीं लौटता।
वह अस्पताल से चली गई, लेकिन 3 रात सो नहीं सकी। वह राजेंद्र को बचाना नहीं चाहती थी, पर खुद को भी उस अंधेरे में नहीं धकेलना चाहती थी जहां नफरत इंसान को खा जाती है।
उसने आरव से बात की।
आरव ने कहा—
—अगर मैं होता तो तुम बिना सोचे मदद करतीं, क्योंकि मैंने गलती मानी और बदलने की कोशिश की। पापा ने कभी माफी नहीं मांगी। मदद करना उन्हें बदल नहीं देगा।
आखिर सानवी ने 250,000 रुपये सीधे अस्पताल में जमा किए, माया या राजेंद्र को नहीं। बदले में कानूनी समझौता हुआ कि दोनों भविष्य में उससे कोई संपर्क, दावा या मुकदमा नहीं करेंगे। बाकी रकम दुकान की बिक्री, कुछ रिश्तेदारों और अस्पताल योजना से पूरी हुई।
ऑपरेशन सफल हुआ। राजेंद्र बच गया। उसने धन्यवाद नहीं कहा। नीलिमा ने बाद में बताया कि वह कहता था, “सानवी ने पैसे इसलिए दिए ताकि खुद को महान साबित कर सके।”
इस बार बात सानवी को नहीं चुभी। वह मुस्कुराई, क्योंकि अब उसे प्रमाण नहीं चाहिए था।
2 साल बाद ईशान ने उसी चाय की दुकान पर शादी का प्रस्ताव रखा।
—मैं परफेक्ट जिंदगी का वादा नहीं कर सकता —उसने कहा— लेकिन ईमानदार जिंदगी का वादा कर सकता हूं।
शादी छोटी थी। आरव ने सानवी का हाथ पकड़कर मंडप तक पहुंचाया। नीलिमा गवाह बनी। राजेंद्र और माया को निमंत्रण नहीं भेजा गया।
कुछ महीनों बाद सानवी और ईशान ने जयपुर के बाहर 2 कमरों का छोटा सा घर खरीदा। रजिस्ट्री पर साइन करते समय सानवी रो पड़ी।
—ये सच में हमारा है —उसने कहा— कोई इसे मेरी अनुमति के बिना गिरवी नहीं रख सकता। कोई इसे अपनी गलती छिपाने के लिए बेच नहीं सकता।
ईशान ने उसे बस गले लगा लिया।
फिर राजेंद्र को दूसरा हार्ट अटैक आया और वह मर गया। सानवी अंतिम संस्कार में नहीं गई। उसने फूल नहीं भेजे, न कोई संदेश। आरव गया, केवल माया के लिए, लेकिन रस्में खत्म होने से पहले लौट आया।
कुछ दिन बाद माया ने एक चिट्ठी भेजी। कहा गया कि राजेंद्र ने मरने से पहले लिखी थी। सानवी ने महीनों तक उसे नहीं खोला। जब खोला, तो उसमें देर से आई स्वीकारोक्ति थी। राजेंद्र ने लिखा था कि उसने लोगों को रिश्ते नहीं, साधन समझा। उसने दूसरी मौका भी बर्बाद किया। उसने हमेशा अपनी लालच का दोष दूसरों पर डाला।
उसने माफी नहीं मांगी। लिखा था कि वह माफी के लायक नहीं।
लिफाफे में 8,000 रुपये भी थे, उसकी निजी बचत का आखिरी हिस्सा।
सानवी ने वह पैसा घरेलू हिंसा से जूझ रही महिलाओं की संस्था को दे दिया। फिर चिट्ठी फाड़कर जला दी।
ईशान ने पूछा—
—शांति मिली?
सानवी ने धुएं को देखते हुए कहा—
—शांति पहले ही मिल चुकी थी। इसने बस यह पक्का कर दिया कि मेरा जाना सही था।
कुछ वर्षों बाद उनकी बेटी अनाया पैदा हुई। पहली बार उसे गोद में लेते हुए सानवी डर गई कि कहीं वह भी वही गलती न दोहरा दे।
डॉ. रिद्धिमा ने उससे कहा—
—जो लोग हिंसा दोहराते हैं, वे आमतौर पर खुद से यह सवाल नहीं पूछते कि कहीं वे अपने बच्चे को चोट तो नहीं दे रहे। तुम वर्षों से यह चक्र तोड़ रही हो।
सानवी ने अनाया को देखा और मन ही मन वादा किया कि उसे कभी प्यार खरीदना नहीं पड़ेगा। उसे कभी माता-पिता की भावनात्मक देनदारियों का बोझ नहीं उठाना पड़ेगा। उसे कभी यह साबित नहीं करना पड़ेगा कि वह प्यार के योग्य है।
आरव अच्छा मामा बना। उसने 35,000 रुपये का हर रुपया लौटाया। वह अमीर नहीं था, मगर स्वतंत्र था।
माया ने एक बार अनाया के लिए हाथ से बुना कंबल और कार्ड भेजा। कार्ड में लिखा था, “उस नातिन के लिए जिसे शायद मैं कभी न जान पाऊं। माफ करना, मैं तुम्हारी मां को बचा नहीं सकी।”
सानवी ने कंबल दान कर दिया। उस दरवाजे को खोलना उसकी बेटी की सुरक्षा से बड़ा नहीं था।
समय के साथ उसने समझा कि ठीक होना हमेशा मेल-मिलाप नहीं होता। कभी-कभी ठीक होना यह मान लेना होता है कि कुछ लोग खून के रिश्ते होकर भी आपके जीवन में वापस आने का अधिकार खो चुके हैं।
5 साल बाद सानवी के पास घर था, चुना हुआ परिवार था, आर्थिक स्थिरता थी और एक बच्ची थी जो प्यार को बलिदान समझकर बड़ी नहीं होगी। उसे अब भी उन माता-पिता का दुख था, जो उसे मिलने चाहिए थे, लेकिन वह उन लोगों को याद नहीं करती थी, जो सच में उसके माता-पिता निकले।
राजेंद्र ने सोचा था कि वह उसका पैसा, सुरक्षा और सम्मान छीनकर उसे तोड़ देगा।
असल में उसने सानवी से वह आखिरी झूठ छीन लिया, जिसने उसे बांध रखा था।
और जिस दिन सानवी ने उन लोगों से प्यार मांगना बंद किया जो उसे सिर्फ इस्तेमाल करना चाहते थे, उसी दिन उसने जाना कि खुद को बचाना स्वार्थ नहीं होता।
वह प्रेम का पहला सच्चा रूप होता है।
