नई बहू ने जिस अनाथ देवर को बेटे जैसा अपनाया, उसी पर घरवालों ने ताने और जुल्म किए… फिर 5 मिनट की एक गलती ने बता दिया कि असली बोझ कौन था

भाग 1

रात के 2 बजे, जब पूरे घर में नींद पसरी थी, 18 साल का आरव रसोई के फर्श पर बैठा बासी रोटियों के टुकड़े पानी में भिगोकर खा रहा था, और ऊपर कमरे में उसका चचेरा भाई विक्रम हंसते हुए कह रहा था कि ऐसे अनाथ लड़कों को घर में रखना भी पाप है।

आरव ने वह बात साफ-साफ सुन ली थी, मगर उसने सिर नहीं उठाया। उसकी आंखों में आंसू थे, पर आवाज नहीं। उसकी आदत हो चुकी थी। मां उसके जन्म के समय चली गई थी, पिता सड़क हादसे में मरे थे, और तब उसके चाचा शरद उसे अपने घर ले आए थे। शरद दिल के बुरे नहीं थे, मगर बीमारी ने उन्हें कमजोर बना दिया था। घर की असली मालिक बन चुकी थीं उसकी चाची कमला देवी और उनका बेटा विक्रम।

सुबह होते ही कमला देवी की आवाज गूंजी।

—आरव! अभी तक चाय नहीं बनी? क्या तेरे बाप का नौकरखाना है यह?

आरव घबराकर उठा। आधी नींद में दूध उबलकर गिर गया तो कमला देवी ने उसका कान इतनी जोर से मरोड़ा कि वह चीख पड़ा।

—चाची, छोड़ दीजिए, दर्द हो रहा है।

—दर्द? मुफ्त की रोटी खाते हुए दर्द नहीं होता?

शरद कमरे से बाहर आए।

—कमला, बच्चा है। इतना मत डांटो।

—बच्चा? 18 साल का जवान लड़का बच्चा है? तुम्हारे इलाज का पैसा भी मेरा बेटा देता है, और यह घर में राजा बनकर रहेगा?

आरव ने चाचा की तरफ देखा। शरद की आंखें झुक गईं। वह कुछ कहना चाहते थे, पर कह नहीं पाए।

विक्रम नीचे आया, महंगा सूट पहने, ऑफिस जाने को तैयार।

—मेरी ब्लैक कॉफी कहां है?

आरव ने कप आगे किया। विक्रम ने एक घूंट लिया और कप मेज पर पटक दिया।

—इसमें दूध किसने डाला? तुझे 100 बार कहा है मुझे बिना दूध की कॉफी चाहिए। दिमाग नहीं है तेरे पास?

आरव ने धीमे से कहा।

—भैया, गलती हो गई।

विक्रम हंसा।

—मुझे भैया मत बोल। नौकर नौकर ही अच्छा लगता है।

उसी दिन दोपहर में घर में हलचल शुरू हुई। विक्रम की शादी तय हो चुकी थी। लड़की का नाम सिया था, जयपुर के एक मध्यमवर्गीय लेकिन संस्कारी परिवार की बेटी। वह पढ़ी-लिखी थी, शांत थी, और उसकी आंखों में ऐसा अपनापन था जो आरव ने बरसों से नहीं देखा था।

शादी के दिन जब सिया दुल्हन बनकर घर आई, कमला देवी ने आरव को आवाज दी।

—अरे अनाथ, आरती की थाली ला!

आरव भागा, पर सीढ़ियों के पास रखे तार में पैर अटक गया। थाली गिर गई, चावल बिखर गए, दीया बुझ गया। कमला देवी का चेहरा क्रोध से लाल हो गया।

—शगुन बिगाड़ दिया तूने!

सिया ने तुरंत घूंघट थोड़ा हटाया और आरव के पास झुक गई।

—चोट लगी क्या?

आरव चौंक गया। इतने लोगों के बीच किसी ने पहली बार उससे पूछा था कि उसे दर्द हुआ या नहीं।

गृहप्रवेश के बाद कमला देवी ने कहा।

—बहू, यह तुम्हारा छोटा देवर है। ज्यादा सिर पर मत चढ़ाना, वरना घर खा जाएगा।

आरव झिझकते हुए सिया के पैर छूने लगा, मगर सिया ने उसका हाथ पकड़ लिया।

—देवर पैर नहीं छूते, आशीर्वाद लेते हैं। और मेरे लिए तो तुम छोटे भाई जैसे हो।

उसने अपने पर्स से 500 का नोट निकालकर आरव के हाथ में रख दिया। कमला देवी का चेहरा बिगड़ गया। विक्रम भी नाराज हुआ, मगर सिया मुस्कुराती रही।

रात में जब सभी सोने चले गए, आरव भी अपने छोटे से कमरे की तरफ बढ़ा। तभी कमला देवी ने उसे रोक लिया।

—कहां जा रहा है? पहले पूरी रसोई साफ कर, फिर सोना।

—चाची, आज बहुत काम किया है। थोड़ा आराम कर लूं?

—आराम? तेरी औकात देखी है?

आरव चुपचाप रसोई में लग गया। रात के 1 बजे तक वह बर्तन मांजता रहा। उसकी उंगलियां छिल गई थीं।

अगली सुबह सिया जल्दी उठी तो उसने देखा, आरव आंगन में बैठा अपना हाथ छिपा रहा था। उसके हाथों में छाले थे। सिया की आंखें भर आईं।

—आरव, ये किसने किया?

आरव ने झूठ बोला।

—कुछ नहीं भाभी, बर्तन मांजते समय हो गया।

सिया ने उसके हाथ पर हल्दी लगाई। फिर उसने पूछा।

—तुम कॉलेज कब जाते हो?

आरव का चेहरा बुझ गया।

—मैं कॉलेज नहीं जाता।

—क्यों?

आरव कुछ बोलता, उससे पहले विक्रम आ गया।

—सिया, इसे ज्यादा सवाल मत पूछो। इसे पढ़ाकर क्या आईएएस बनाना है?

सिया ने पहली बार पति की आंखों में सीधे देखा।

—क्यों नहीं? अगर उसकी उम्र पढ़ने की है तो वह पढ़ेगा।

घर में सन्नाटा छा गया। कमला देवी ने दरवाजे से सुन लिया था। उनके चेहरे पर ऐसा गुस्सा था जैसे सिया ने घर की दीवारें हिला दी हों।

भाग 2

उस रात सिया ने विक्रम से साफ कहा कि आरव को दोबारा पढ़ाई में भेजना ही होगा। विक्रम पहले हंसा, फिर बोला कि घर का खर्च कोई सपना नहीं होता। सिया ने अपनी शादी में मिले 2 सोने के कंगन उतारकर मेज पर रख दिए। —अगर खर्च की बात है तो इन्हें बेच दीजिए, मगर एक बच्चे का भविष्य मत बेचिए। विक्रम चुप हो गया। अगले दिन सिया खुद आरव को पास के ओपन स्कूल में दाखिला दिलाने ले गई। आरव नए कपड़े पहने था, पर उसके चेहरे पर डर था। उसे लगता था कि लौटते ही चाची मारेंगी। सच में, कमला देवी ने दरवाजे पर ही कहा, —अब यह पढ़ेगा और हम सब इसकी सेवा करेंगे? सिया ने शांत आवाज में जवाब दिया, —नहीं मां जी, यह पढ़ेगा ताकि कल किसी पर बोझ न रहे। पढ़ाई शुरू हुई तो आरव बदलने लगा। वह देर रात तक पढ़ता, दिन में घर का काम भी करता, और सिया उसे अंग्रेजी के शब्द, दवाइयों के नाम, बैंक फॉर्म भरना सब सिखाती। धीरे-धीरे वह सिया को सिर्फ भाभी नहीं, मां की जगह मानने लगा। लेकिन कमला देवी और विक्रम के भीतर जलन बढ़ती गई। एक दिन विक्रम ने गुस्से में उसकी किताबें छत से फेंक दीं। आरव चुपचाप उन्हें उठाता रहा। उसी शाम शरद को अचानक सीने में तेज दर्द उठा। घर में अफरा-तफरी मच गई। कमला देवी रोने लगीं, विक्रम डॉक्टर को फोन मिलाते-मिलाते घबरा गया। सिया मंदिर गई हुई थी। तभी आरव ने शरद की नब्ज देखी, उन्हें सीधा लिटाया, दवा की पट्टी पढ़ी, जीभ के नीचे वाली गोली दी और एम्बुलेंस को सही पता बताया। डॉक्टर आए तो बोले, —जिसने यह 5 मिनट में किया, उसी ने इनकी जान बचाई। विक्रम मुड़ा, और सामने किताबों के साथ खड़ा आरव था।

भाग 3

डॉक्टर की बात सुनकर पूरे घर में ऐसी खामोशी छा गई जैसे किसी ने वर्षों से बंद पड़ा सच अचानक दरवाजे पर पटक दिया हो। कमला देवी, जो हमेशा आरव को बोझ कहती थीं, उसी आरव की तरफ देख रही थीं जिसने उनके पति की सांसें बचा ली थीं। विक्रम का चेहरा पीला पड़ गया था। वह वही आदमी था जिसने सुबह आरव की किताबें छत से फेंकी थीं, और शाम को उसी किताबों से सीखी समझ ने उसके पिता को मौत से खींच लिया था।

शरद को अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने कहा कि समय पर प्राथमिक इलाज न मिलता तो बात बहुत बिगड़ सकती थी। सिया अस्पताल पहुंची तो आरव दरवाजे के बाहर खड़ा था। उसके हाथ कांप रहे थे। उसने सिया को देखते ही धीरे से कहा।

—भाभी, मैंने वही किया जो आपने मुझे सिखाया था। दवा का नाम पढ़ लिया था। स्कूल में फर्स्ट एड भी बताया था।

सिया ने बिना किसी की परवाह किए उसे गले लगा लिया।

—तुमने अपने चाचा की जान बचाई है, आरव। आज तुमने साबित कर दिया कि इंसान की कीमत उसके जन्म से नहीं, उसके कर्म से होती है।

आरव रो पड़ा। वह बच्चे की तरह रो रहा था। बरसों का दबा हुआ दर्द बहने लगा। अस्पताल के कॉरिडोर में खड़े लोग उन्हें देखने लगे, मगर सिया ने उसे अलग नहीं किया।

विक्रम दूर खड़ा सब देख रहा था। उसके भीतर शर्म और पछतावे की आग लग चुकी थी। उसे याद आया कि पिता ने बचपन में कितनी बार कहा था कि आरव उसका भाई है, जिम्मेदारी नहीं। मगर उसने उसे हर दिन पराया साबित किया। उसने उसे नाम से बुलाया, नौकर कहा, अनाथ कहा, मगर कभी भाई नहीं कहा।

अगली सुबह शरद की हालत स्थिर हुई। डॉक्टर ने परिवार को मिलने दिया। शरद ने सबसे पहले आरव को बुलाया। आरव डरते-डरते आगे बढ़ा।

—चाचा, अब ठीक हैं आप?

शरद ने उसका हाथ पकड़ लिया।

—बेटा, तूने आज मेरा नहीं, मेरी आत्मा का बोझ हल्का किया है। मैं हमेशा जानता था कि तेरे साथ गलत हो रहा है, पर मैं कमजोर पड़ गया। मुझे माफ कर दे।

आरव तुरंत उनके पैरों के पास बैठ गया।

—चाचा, ऐसा मत कहिए। आपने मुझे घर दिया। मेरे लिए वही बहुत था।

सिया ने यह सुना तो उसकी आंखें भर आईं। घर देना काफी नहीं होता, अपनापन भी देना पड़ता है—यह बात वह कहना चाहती थी, मगर उसने चुप रहना बेहतर समझा। कभी-कभी सन्नाटा शब्दों से ज्यादा चोट करता है।

कमला देवी कमरे के कोने में खड़ी थीं। वह पहली बार उतनी कठोर नहीं दिख रही थीं। उनके हाथ कांप रहे थे। उन्होंने धीमे से कहा।

—आरव, मैंने तुझे बहुत सताया। मैं सोचती रही कि तू हमारे घर का बोझ है। सच तो यह है कि बोझ मेरा अहंकार था।

आरव ने सिर झुका लिया।

—चाची, आप बड़ी हैं। माफी मत मांगिए।

—नहीं, आज मांगनी पड़ेगी। क्योंकि आज अगर तू नहीं होता तो मैं विधवा हो जाती।

कमला देवी रो पड़ीं। वह रोना दिखावे का नहीं था। उसमें भय था, पछतावा था, और वह सच था जिसे उन्होंने वर्षों तक दबाकर रखा था। उन्होंने आरव के सिर पर हाथ रखा। यह स्पर्श आरव के लिए नया था। वही हाथ, जिसने कभी उसका कान मरोड़ा था, आज उसके बाल सहला रहा था।

विक्रम अब तक कुछ नहीं बोला था। वह धीरे-धीरे आरव के पास आया। उसकी आंखों में नींद नहीं, अपराध था।

—आरव…

आरव ने उसकी तरफ देखा। विक्रम की आवाज टूट गई।

—मैंने तुझे भाई कहलाने लायक कभी समझा ही नहीं। तुझे हमेशा नीचा दिखाया। पर आज मुझे समझ आया कि नीचा तू नहीं था, मैं था। अगर तू चाहे तो मुझे कभी माफ मत करना, पर मुझे एक बार भैया कहने का अधिकार वापस दे दे।

आरव के होंठ कांपे। वह बहुत कुछ कहना चाहता था। उसे याद आए वे दिन जब विक्रम की गलत कॉफी पर उसे अपमानित किया गया था, जब उसे टेबल पर बैठने नहीं दिया गया, जब उसकी किताबें फेंकी गईं, जब उसे कहा गया था कि अनाथ आश्रम भेज देना चाहिए। मगर उसे सिया का चेहरा भी याद आया, जिसने उसे सिखाया था कि इंसान अपने दर्द से बड़ा हो सकता है।

आरव ने धीरे से कहा।

—भैया, मैंने आपको कभी भैया कहना छोड़ा ही नहीं था। आपने सुनना बंद कर दिया था।

विक्रम रो पड़ा। उसने आरव को गले लगा लिया। कमरे में मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम थीं। सिया ने सिर झुका लिया, जैसे उसने कोई पूजा पूरी होते देखी हो।

कुछ दिनों बाद शरद अस्पताल से घर लौटे। लेकिन घर वैसा नहीं रहा। रसोई का ताला हट गया। खाने की मेज पर 4 नहीं, 5 प्लेटें लगने लगीं। आरव अब सबसे बाद में नहीं, सबके साथ बैठकर खाना खाता। कमला देवी उसे अपने हाथ से परोसतीं। पहली बार जब उन्होंने कहा, —बेटा, और दाल लेगा? तो आरव की आंखें भर आईं। वह सिर्फ दाल नहीं थी, वह स्वीकार था।

सिया ने आरव की पढ़ाई को व्यवस्थित कर दिया। सुबह वह कोचिंग जाता, दोपहर में घर लौटकर चाचा की दवा का समय देखता, शाम को सिया के साथ बैठकर पढ़ता। विक्रम ने उसके लिए पुराना लैपटॉप ठीक करवाया। पहले आरव उसे छूने से डरता था। उसे लगता था कहीं गलती से कुछ टूट गया तो फिर ताने सुनने पड़ेंगे। लेकिन विक्रम ने कहा।

—टूटे तो नया लेंगे। पर तेरा आत्मविश्वास टूटना नहीं चाहिए।

यह वही विक्रम था जिसने कभी उसके हाथ से कप छीनकर कहा था कि वह किसी काम का नहीं। आरव को विश्वास करने में समय लगा, पर घाव भी समय से ही भरते हैं।

मोहल्ले वालों ने भी बदलाव देखा। पहले वे कहते थे कि शरद के घर में अनाथ लड़का नौकर की तरह रहता है। अब वही लोग कहते थे कि आरव तो घर का सबसे समझदार लड़का है। कमला देवी जब यह सुनतीं तो चुपचाप भीतर चली जातीं। तारीफ सुनकर भी उन्हें अपने पुराने शब्द याद आ जाते थे।

एक दिन स्कूल में फर्स्ट एड प्रतियोगिता हुई। सिया ने आरव को जाने के लिए तैयार किया। उसने साफ कुर्ता पहना, बाल संवारे, और हाथ में फाइल ली। जाते समय वह सिया के कमरे के बाहर रुक गया।

—भाभी, आशीर्वाद दीजिए।

सिया ने मुस्कुराकर उसके माथे पर तिलक लगाया।

—जीतकर आना जरूरी नहीं, खुद पर भरोसा करके आना जरूरी है।

आरव ने प्रतियोगिता में पहला स्थान जीता। जब मंच से उसका नाम पुकारा गया तो उसने पुरस्कार लेने से पहले दर्शकों में बैठी सिया को ढूंढा। सिया पीछे खड़ी थी, आंखों में आंसू और चेहरे पर गर्व। आरव ने माइक पकड़ा। पूरा हॉल शांत हो गया।

—मैं यह पुरस्कार अपनी भाभी सिया को देना चाहता हूं। क्योंकि उन्होंने मुझे पढ़ाया नहीं, मुझे इंसान होने का सम्मान वापस दिया। लोग कहते हैं मां जन्म देती है। मेरे लिए मेरी भाभी ने मुझे दूसरी जिंदगी दी है।

हॉल तालियों से गूंज उठा। सिया रो पड़ी। कमला देवी, जो पहली बार उसके कार्यक्रम में आई थीं, अपनी साड़ी के पल्लू से आंखें पोंछने लगीं। विक्रम ने सिर झुका लिया, मगर इस बार शर्म से नहीं, गर्व से।

उस रात घर में मिठाई आई। कमला देवी ने अपने हाथ से आरव को रसगुल्ला खिलाया।

—बेटा, आज से यह घर जितना विक्रम का है, उतना ही तेरा भी है।

आरव ने धीरे से कहा।

—चाची, घर दीवारों से नहीं बनता। आज पहली बार मुझे लगा कि मेरा घर है।

शरद ने कांपते हाथ से उसके सिर पर हाथ रखा। विक्रम ने सिया की तरफ देखकर कहा।

—तुम इस घर में बहू बनकर आई थीं, पर तुमने हमें परिवार बनना सिखा दिया।

सिया ने मुस्कुराकर आरव को देखा।

—मैंने कुछ नहीं किया। बस उसे वही दिया जो हर बच्चे को मिलना चाहिए था।

साल बीतते गए। आरव ने पढ़ाई पूरी की, नर्सिंग और आपात चिकित्सा में प्रशिक्षण लिया, और शहर के सरकारी अस्पताल में नौकरी करने लगा। उसके नाम के आगे अब लोग सम्मान से “आरव जी” लगाते थे। लेकिन जब भी वह घर लौटता, सबसे पहले रसोई में जाकर सिया से पूछता।

—भाभी मां, चाय बनाऊं?

सिया हर बार हंसती।

—अब भी वही पुरानी आदत?

आरव कहता।

—कुछ आदतें सेवा की नहीं, प्रेम की होती हैं।

एक दिन कमला देवी ने पुरानी अलमारी साफ करते हुए आरव की फटी हुई स्कूल कॉपी पाई, वही कॉपी जिसके पन्ने कभी विक्रम ने छत से फेंक दिए थे। उस पर छोटे-छोटे अक्षरों में लिखा था, “एक दिन मैं साबित करूंगा कि मैं बोझ नहीं हूं।”

कमला देवी देर तक उस कॉपी को सीने से लगाए बैठी रहीं। उन्हें समझ आया कि किसी बच्चे को रोटी देना काफी नहीं होता, उसे यह महसूस कराना भी जरूरी होता है कि वह उस रोटी के लायक है।

शाम को जब आरव अस्पताल से लौटा तो कमला देवी ने वह कॉपी उसे दी।

—बेटा, तूने साबित कर दिया। मगर हमें इंसान बनने में देर लग गई।

आरव ने कॉपी ली, फिर सिया की तरफ देखा। उसकी आंखों में वही चमक थी जो शादी के दिन पहली बार उसे मिली थी।

उसने धीमे से कहा।

—मेरे हिस्से की मां शायद भगवान ने जल्दी ले ली थी, लेकिन उन्होंने मुझे खाली नहीं छोड़ा। उन्होंने मुझे भाभी मां भेज दी।

उस रात घर के मंदिर में दीया देर तक जलता रहा। बाहर हल्की बारिश थी, भीतर सब साथ बैठे थे। आरव ने पहली बार बिना डर, बिना झिझक, बिना आंसू छिपाए खाना खाया। और सिया ने उसकी थाली में गरम रोटी रखते हुए सिर्फ इतना कहा।

—अब कभी भूखे मत सोना, बेटा।

आरव ने रोटी हाथ में ली, पर खा नहीं पाया। उसकी आंखों से आंसू गिरते रहे, क्योंकि कभी-कभी पेट से पहले आत्मा को भोजन मिलता है।

Related Post

हरिनारायण वहीं जमीन पर बैठ गया। बाहर बारिश टीन की छत पर ऐसी गिर रही थी जैसे कोई दरवाज़ा पीट रहा हो।

हरिनारायण वहीं जमीन पर बैठ गया। बाहर बारिश टीन की छत पर ऐसी गिर रही...

माता सीता ने मेघनाथ को बताया अशोक वाटिका का सबसे बड़ा सच 😱 | 99% लोग नहीं जानते!

माता सीता 6 महीने से लंका में बंदी थी, लेकिन एक रात मेघनाथ चुपचाप अशोक...

जिस बेटे ने मुझसे जबरन वृद्धाश्रम के कागज़ पर साइन करवाए, उसे पता ही नहीं था कि मैंने पहले ही कंपनी उसके हाथों से छीन ली थी

जिस बेटे ने मुझसे जबरन वृद्धाश्रम के कागज़ पर साइन करवाए जिस बेटे ने मुझसे...