
PART 1
“उस कुर्सी से उठो, वह मेरी असली माँ के लिए है, किसी खरीदी हुई औरत के लिए नहीं!”
अर्जुन की आवाज़ जयपुर के उस आलीशान पैलेस होटल के संगमरमर वाले हॉल में गूँज गई, जहाँ 200 मेहमान उसकी शादी की दावत शुरू होने का इंतज़ार कर रहे थे।
मीरा कपूर मुख्य मेज़ पर बैठी थी। उसके सामने सुनहरे अक्षरों वाला छोटा-सा कार्ड रखा था—दूल्हे की माँ।
5 साल तक उसने सचमुच वही भूमिका निभाई थी, बस किसी ने उसे उस नाम से पुकारने की इज़्ज़त नहीं दी थी।
मीरा 43 साल की थी, दिल्ली में उसकी अपनी इंटीरियर और प्रॉपर्टी कंसल्टेंसी कंपनी थी। जब उसकी शादी राजीव मल्होत्रा से हुई थी, तब राजीव ने खुद को जयपुर के पुराने कारोबारी परिवार का संभला हुआ, शालीन और टूटे हुए विवाह से थका हुआ आदमी बताया था। शादी के कुछ महीनों बाद मीरा को पता चला कि शान बस बाहर की थी। अंदर से कारोबार कर्ज़ में डूबा था, हवेली बैंक की नज़र में थी, और राजीव का बेटा अर्जुन 26 साल का होकर भी पिता के नाम, सौतेली माँ के पैसों और अपनी माँ की झूठी ममता पर जी रहा था।
अर्जुन की माँ संजना थी। वह जब चाहती थी, बेटे को भावनाओं में डुबो देती थी, और जब ज़िम्मेदारी आती थी, किसी नए आदमी, नए शहर या नए बहाने के साथ गायब हो जाती थी। अर्जुन के लिए संजना देवी थी। मीरा उसके लिए बस वह औरत थी जिसने उसके घर में प्रवेश करने की हिम्मत की थी।
मीरा ने अर्जुन की पुरानी कॉलेज फीस चुकाई थी। उसने उसकी कार बदली थी जब उसने रात की पार्टी के बाद नशे में पहली कार डिवाइडर से टकरा दी थी। उसने राजीव की पुश्तैनी हवेली बचाई थी, जब बैंक वाले नीलामी की तारीख तय कर चुके थे।
और अब उसी ने यह शादी भी करवाई थी।
श्रेया का लहंगा, फूलों की सजावट, राजस्थानी लोकगायक, 7 तरह की मिठाइयाँ, 200 लोगों का भोजन, घोड़ी, फोटोग्राफर, होटल का एडवांस, यहाँ तक कि अर्जुन की काली शेरवानी भी मीरा के पैसे से आई थी। वही शेरवानी पहनकर वह अब मीरा को ऐसे देख रहा था जैसे वह दावत की थाली में गिरा कोई कीड़ा हो।
मीरा उस कुर्सी पर इसलिए बैठी थी क्योंकि संजना आई ही नहीं थी। शादी शुरू होने से 2 घंटे पहले राजीव के फोन पर उसका संदेश आया था—“मैं उदयपुर जा रही हूँ। अर्जुन को आशीर्वाद दे देना। मेरा मूड नहीं है इतने रिश्तेदारों को झेलने का।”
मीरा ने वह संदेश पढ़ा था। राजीव ने फोन जेब में रख लिया था और बस इतना कहा था, “अभी अर्जुन को मत बताना, उसका मूड खराब हो जाएगा।”
जब मीरा ने मुख्य मेज़ पर वह कार्ड देखा, तो उसके भीतर एक नन्ही-सी उम्मीद जगी थी। शायद राजीव ने पहली बार सच स्वीकार किया होगा। शायद किसी ने माना होगा कि माँ होना जन्म से नहीं, साथ निभाने से होता है।
लेकिन वह उम्मीद कुछ ही मिनटों में सबके सामने कुचल दी गई।
अर्जुन ने उसके कंधे को इतनी ज़ोर से पकड़ा कि उसकी उंगलियाँ मीरा की त्वचा में धँस गईं।
“उठो,” उसने दाँत भींचकर कहा।
“अर्जुन, शांति से बात करो। तुम्हारी माँ नहीं आ रही…”
वह वाक्य पूरा नहीं कर पाई।
अर्जुन ने उसे कुर्सी से झटका देकर खींचा। मीरा का पैर गलीचे में उलझा और वह लगभग पास की काँच की मेज़ से टकरा गई। चाँदी के गिलास खनक उठे। कुछ औरतों ने मुँह पर हाथ रख लिए। बुज़ुर्ग मेहमानों की गर्दनें एक साथ घूमीं।
मीरा ने राजीव को ढूँढ़ा।
वह सिर्फ 10 कदम दूर खड़ा था। हाथ में व्हिस्की का गिलास था। नज़रें नीचे थीं। चेहरा ऐसा जैसे उसने कुछ सुना ही न हो।
अर्जुन ने भीड़ के सामने और ऊँची आवाज़ में कहा, “मेरी माँ आने वाली थी। तू ही उसे रोकना चाहती थी। तू चाहती है सबको लगे कि तूने मेरी ज़िंदगी संभाली है। पर याद रख, तू मेरी माँ नहीं है। तेरी जगह इस मेज़ पर नहीं, कूड़े के पास है।”
मीरा की साँस भीतर अटक गई। फिर भी उसने आखिरी बार उसे बचाने की कोशिश की।
“मैं झूठ नहीं बोल रही, अर्जुन। संजना जी ने खुद संदेश भेजा है। वह शादी में नहीं आएँगी।”
अर्जुन की आँखों में नशा, अहंकार और टूटे हुए बचपन की अंधी आग एक साथ भर आई।
उसने हाथ उठाया।
थप्पड़ इतना तेज़ था कि मीरा का चेहरा एक तरफ घूम गया। पूरे हॉल में सन्नाटा जम गया। उसके होंठ के कोने से खून की पतली लकीर निकली। उसकी आँखों में आँसू नहीं आए। सिर्फ भीतर कुछ टूट गया।
दिल नहीं।
धैर्य।
5 साल तक उसने एक ऐसे परिवार को अपना समझा जो उसे सिर्फ चेकबुक समझता रहा। उसने सोचा था कि एक दिन प्रेम, सेवा और त्याग से जगह मिल जाती है।
उस रात उसे समझ आ गया कि कुछ लोग घर नहीं बनाते, बस किसी और की छत पर कब्ज़ा करके रहते हैं।
मीरा ने अंगूठे से होंठ का खून पोंछा। उसने अर्जुन को देखा। फिर राजीव को।
दोनों की असलियत एक ही मेज़ पर खड़ी थी।
वह बिना एक शब्द बोले हॉल से बाहर चल दी।
सबने सोचा, वह रोने के लिए बाथरूम जा रही है।
किसी को नहीं पता था कि वह उसी शादी को खत्म करने जा रही थी, जिसे उसके पैसों ने खड़ा किया था।
PART 2
“मीरा, तमाशा मत बनाओ,” राजीव पार्किंग तक उसके पीछे भागता हुआ आया।
उसने यह नहीं पूछा कि गाल जल रहा है या नहीं। उसने यह नहीं देखा कि होंठ से खून निकला था। उसे बस डर था कि 200 मेहमानों के सामने उसकी इज़्ज़त उतर जाएगी।
“अर्जुन बच्चा है,” राजीव हाँफते हुए बोला। “संजना उसे हमेशा तोड़ देती है। आज शादी का दिन है। अंदर चलो, मुस्कुरा दो। बाद में बात करेंगे।”
मीरा ने कार का दरवाज़ा खोला और ड्राइविंग सीट पर बैठ गई।
“26 साल का आदमी जिसने मुझे सबके सामने मारा, वह बच्चा है?”
राजीव की आवाज़ धीमी हो गई। “तुम बड़ी हो। समझदारी दिखाओ। मेरे बेटे की शादी मत बिगाड़ो।”
उसी पल मीरा को समझ आया कि राजीव कमजोर नहीं था। वह कायर होना चुनता था, क्योंकि कायरता से उसे हमेशा फायदा मिला था।
मीरा ने कार लॉक की, फोन निकाला और होटल के इवेंट मैनेजर देवेंद्र सिंह को कॉल किया।
“मैडम, अभी खाना सर्व होने वाला है,” उधर से आवाज़ आई।
“देवेंद्र जी, ध्यान से सुनिए। दूल्हे ने मुझे आपके हॉल में 200 लोगों के सामने मारा है। इस कार्यक्रम की बाकी हर भुगतान अनुमति मैं अभी रोक रही हूँ। भोजन, संगीत, बार, मिठाई, सब।”
कुछ सेकंड सन्नाटा रहा।
“मैडम, मेहमान बैठे हैं…”
“तो वे सच भी सुनेंगे। अगर अर्जुन मल्होत्रा शादी जारी रखना चाहता है, तो बिल खुद चुकाए।”
मीरा ने कॉल काटी। बैंक ऐप खोली। कॉर्पोरेट कार्ड ब्लॉक किया। राजीव के इस्तेमाल वाली साझा खाते की पहुँच बंद की। अर्जुन की कार इंश्योरेंस से अपना नाम हटाया। फिर राजीव और अर्जुन दोनों को ब्लॉक कर दिया।
ठीक 8:30 बजे हॉल की पीली रोशनी बंद हुई और सफेद सफाई वाली लाइटें जल उठीं।
ढोल रुक गया।
वेटर खाने की प्लेटों के साथ नहीं, खाली ट्रे लेकर आए।
देवेंद्र सिंह 2 सुरक्षाकर्मियों के साथ मंच के सामने खड़े हुए।
“श्री अर्जुन मल्होत्रा,” उन्होंने साफ आवाज़ में कहा, “जिस व्यक्ति ने इस शादी का भुगतान किया था, उसके साथ आपकी शारीरिक हिंसा के कारण सारी भुगतान अनुमति रद्द हो चुकी है। बकाया राशि अभी देनी होगी।”
श्रेया ने अर्जुन की तरफ देखा।
“मतलब? तुमने कहा था शादी तुम्हारे पैसे से हो रही है।”
अर्जुन का चेहरा राख हो गया।
और फिर देवेंद्र ने फाइल खोलकर कहा, “बकाया 38 लाख रुपये है।”
PART 3
38 लाख सुनते ही हॉल में ऐसा सन्नाटा फैला जैसे किसी ने शादी के मंडप में शोकसभा बिछा दी हो।
श्रेया के हाथ से फूलों वाला कंगन छूटकर फर्श पर गिरा। उसकी माँ, जो कुछ देर पहले तक रिश्तेदारों को अपने दामाद के बड़े कारोबार के किस्से सुना रही थी, कुर्सी से उठ खड़ी हुई। श्रेया के पिता महेश अग्रवाल, जयपुर के जाने-माने वकील, धीरे-धीरे मंच की ओर बढ़े। उनके चेहरे पर गुस्से से ज्यादा अपमान था।
“अर्जुन,” उन्होंने भारी आवाज़ में पूछा, “यह क्या है?”
अर्जुन ने तुरंत राजीव की तरफ देखा। वही राजीव जो कुछ मिनट पहले मीरा को समझदारी सिखा रहा था, अब अपने फोन में बैंक ऐप खोलने की नाकाम कोशिश कर रहा था। स्क्रीन पर बार-बार वही संदेश आ रहा था—एक्सेस डिनाइड।
“बस एक छोटी-सी गड़बड़ है,” अर्जुन ने हकलाते हुए कहा। “मीरा आंटी भावुक हो गई हैं। वह… वह मुझे कंट्रोल करना चाहती हैं।”
श्रेया की आँखें फैल गईं। “आंटी? जिस औरत ने शादी के पैसे दिए, जिसे तुमने सबके सामने मारा, वह सिर्फ आंटी है?”
अर्जुन भड़क उठा। “तुम नहीं समझोगी। वह मेरे घर में घुसी थी। मेरी माँ की जगह लेना चाहती थी।”
श्रेया ने धीमे मगर साफ शब्दों में कहा, “और तुम्हारी असली माँ कहाँ है?”
अर्जुन चुप हो गया।
मेहमानों के बीच कानाफूसी लहर की तरह फैल गई। किसी ने कहा संजना तो उदयपुर चली गई है। किसी ने कहा उसे पहले भी बेटे की परवाह नहीं थी। किसी ने वीडियो बनाना शुरू कर दिया। कुछ लोगों के फोन पर वही थप्पड़ वाला दृश्य पहले ही घूमने लगा था।
देवेंद्र ने मशीन आगे बढ़ाई। “सर, भुगतान कीजिए। नहीं तो हमें अनुबंध के अनुसार कानूनी प्रक्रिया शुरू करनी पड़ेगी।”
अर्जुन ने अपनी डेबिट कार्ड निकाली। उसका हाथ काँप रहा था। कार्ड मशीन में गया। कुछ सेकंड बाद लाल रोशनी जली।
डिक्लाइंड।
दूसरी कार्ड।
डिक्लाइंड।
राजीव ने अपना कार्ड दिया।
डिक्लाइंड।
हॉल में बैठी भीड़ अब मेहमान नहीं रही थी। वे गवाह बन चुके थे। उस नकली शान, झूठी अमीरी और उधार के अभिमान के गवाह।
श्रेया ने अपने सिर से दुपट्टा हटाया। उसके माथे की बिंदी पसीने से हल्की टेढ़ी हो गई थी। उसकी आँखों में आँसू थे, पर वे प्रेम के नहीं थे। वे अपमान के थे।
“तुमने मुझसे झूठ बोला,” उसने कहा। “तुमने कहा तुम्हारा बिज़नेस है। तुमने कहा शादी तुम करवा रहे हो। तुमने कहा तुम्हारा परिवार सम्मानित है। लेकिन तुम उस औरत के पैसों पर राजा बन रहे थे जिसे तुमने सबके सामने कूड़ा कहा।”
“श्रेया, मेरी बात सुनो…”
“नहीं,” उसने पीछे हटते हुए कहा। “आज से मेरा तुम्हारे साथ कोई रिश्ता नहीं।”
अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ना चाहा। महेश अग्रवाल बीच में आ गए।
“मेरी बेटी को छूना मत,” उन्होंने सख्ती से कहा। “जिस आदमी को अपनी उम्र की औरत पर हाथ उठाने में शर्म नहीं, वह मेरी बेटी की इज़्ज़त कभी नहीं करेगा।”
श्रेया मंच से उतरी। उसकी सहेलियाँ उसके पीछे भागीं। उसकी माँ रोती हुई उसका पल्लू संभाल रही थी। दुल्हन का भारी लहंगा, जो कुछ घंटे पहले रानी जैसा लग रहा था, अब बोझ जैसा दिख रहा था।
20 मिनट में शादी का हॉल खाली होने लगा। बुज़ुर्ग लोग सिर हिलाते हुए बाहर निकले। जवान लोग वीडियो भेजते रहे। महिलाएँ धीरे-धीरे वही वाक्य दोहराती रहीं—“जिसने खिलाया, उसी को मारा।”
रात के अंत में अर्जुन और राजीव होटल के ऑफिस में बैठे थे। सामने अनुबंध था। बकाया बिल, कैंसलेशन चार्ज, नुकसान, स्टाफ फीस और कानूनी चेतावनी। मीरा ने सिर्फ अपना भुगतान रोका था, लेकिन कार्यक्रम का नाम अब भी मल्होत्रा परिवार पर था।
महेश अग्रवाल ने अलग से नोटिस भेजने की धमकी दी। झूठी आर्थिक स्थिति बताकर रिश्ता तय करने, दहेज जैसी मांगों को शान के नाम पर छिपाने और बेटी को धोखे में रखने का मामला छोटा नहीं था।
राजीव ने होटल के सामने हाथ जोड़ दिए। अर्जुन पहली बार चुप था। आखिर दोनों ने उधारी के कागज़ों पर हस्ताक्षर किए। राजीव ने बची हुई हवेली का हिस्सा गिरवी रखा। अर्जुन ने अपने नाम की कार बेचने की लिखित सहमति दी, वही कार जिसका इंश्योरेंस कुछ देर पहले तक मीरा भर रही थी।
उसी रात मीरा दिल्ली लौट गई।
सुबह उसके गाल पर हल्की सूजन थी। होंठ के पास छोटा कट था। उसने मेकअप नहीं लगाया। वह सीधे अपने ऑफिस गई। 32वें फ्लोर की खिड़की से नीचे भागती दिल्ली को देखा और अपने वकील को फोन किया।
“तलाक की अर्जी आज फाइल करनी है,” उसने कहा।
वकील कुछ पल चुप रहे। “क्या सबूत हैं?”
मीरा ने लैपटॉप खोला। 5 साल की बैंक स्टेटमेंट्स, राजीव के नाम ट्रांसफर, अर्जुन की फीस, कार भुगतान, हवेली की किस्तें, शादी का कॉन्ट्रैक्ट, संजना को भेजे गए पैसे, और सबसे ऊपर वह वीडियो जिसमें अर्जुन उसे सबके सामने थप्पड़ मार रहा था।
सब कुछ था।
2 दिन बाद राजीव ने किसी अनजान नंबर से कॉल किया।
“मीरा, प्लीज़,” उसकी आवाज़ टूटी हुई थी। “मुझसे गलती हो गई। अर्जुन बरबाद हो गया है। श्रेया वाले केस करेंगे। होटल का कर्ज़ अलग है। मैं उसे तुम्हारे पैरों पर गिराकर माफी मंगवा दूँगा।”
मीरा ने कुर्सी पर सीधी होकर बैठते हुए कहा, “मुझे पैरों पर गिरा हुआ बेटा नहीं चाहिए, राजीव। मुझे ऐसा पति चाहिए था जो थप्पड़ पड़ते ही मेरे सामने खड़ा होता। वह तुम कभी थे ही नहीं।”
“हम परिवार हैं,” राजीव रो पड़ा। “5 साल साथ रहे हैं।”
“नहीं,” मीरा की आवाज़ शांत थी। “मैं तुम्हारा परिवार नहीं थी। मैं तुम्हारी एटीएम मशीन थी। तुम्हारा बेटा मुझे माँ नहीं मानता था, और तुम मुझे पत्नी नहीं मानते थे। तुम दोनों मुझे सुविधा मानते थे।”
राजीव कुछ कहने ही वाला था कि मीरा ने अगला वार किया।
“और हाँ, संजना को 6 महीने से जो पैसे भेज रहे थे, उसके कागज़ मेरे पास हैं। मेरे खाते से निकाले गए पैसे से तुम अपने बेटे की ‘असली माँ’ की छुट्टियाँ चला रहे थे। कितनी सुंदर व्यवस्था थी तुम्हारी। बेटा मुझे गाली दे, माँ पैसे ले, और पति चुप रहे।”
राजीव की साँस अटक गई।
“मीरा, वह मजबूर थी…”
“हर झूठ के पीछे तुम लोग मजबूरी रख देते हो। अर्जुन का अहंकार मजबूरी। संजना की गैरज़िम्मेदारी मजबूरी। तुम्हारी कायरता मजबूरी। और मेरा त्याग? वह तो तुम लोगों का अधिकार था, है ना?”
फोन पर सन्नाटा छा गया।
“तलाक की अर्जी फाइल हो चुकी है,” मीरा ने कहा। “प्रीनप वैध है। कंपनी, घर, खाते, सब मेरे नाम सुरक्षित हैं। तुम वही लेकर जाओगे जो तुम लाए थे—कर्ज़, झूठ और वह बेटा जिसे तुमने सिखाया कि जो औरत संभाले, उसे नीचा दिखाओ।”
राजीव ने आखिरी कोशिश की। “तुम हमें सड़क पर छोड़ दोगी?”
मीरा को अचानक अर्जुन का वाक्य याद आया—तेरी जगह कूड़े के पास है।
वह हल्के से मुस्कुराई, पर मुस्कान में कोई गर्मी नहीं थी।
“जिस जगह पर तुम्हारे बेटे ने मुझे भेजा था, वहीं देख लेना। शायद अब तुम दोनों को वही जगह समझ आ जाए।”
उसने कॉल काट दी।
इसके बाद मीरा पीछे मुड़कर नहीं देखी।
मामला अदालत में गया। राजीव ने पहले बीमारी का बहाना बनाया, फिर भावनात्मक दबाव, फिर समझौते की कोशिश। लेकिन इस बार मीरा अकेली नहीं थी। उसके पास सबूत थे, अपना आत्मसम्मान था और वह चुप्पी नहीं थी जिसने 5 साल तक उसे भीतर से खाया था।
अर्जुन ने शुरू में हर जगह कहा कि मीरा ने उसकी शादी जानबूझकर तोड़ी। लेकिन वीडियो ने उसकी कहानी खत्म कर दी। लोग पूछते—“जिसने शादी करवाई, उसे मारने की क्या जरूरत थी?” उसके दोस्त धीरे-धीरे दूर हो गए। बिज़नेस पार्टनर, जिनसे वह झूठ बोलकर खुद को अमीर बताता था, गायब हो गए। श्रेया के परिवार ने रिश्ता तोड़ने के साथ कानूनी नोटिस भेजा। शादी का खर्च वापस न मिलने पर होटल ने भी कार्रवाई शुरू की।
कुछ महीनों बाद अर्जुन को जयपुर के बाहर एक वेयरहाउस में काम करना पड़ा। सुबह 9 से रात 9 तक वह माल की एंट्री करता, ट्रकों की सूची बनाता, और महीने के अंत में उसकी तनख्वाह का बड़ा हिस्सा सीधे कर्ज़ में कट जाता। जिस हाथ से उसने मीरा को थप्पड़ मारा था, उसी हाथ से वह अब भारी डिब्बों पर नंबर लिखता था।
एक बार उसने संजना को फोन किया। बोला, “माँ, मुझे कुछ दिन अपने पास रख लो।”
संजना ने लंबी साँस लेकर कहा, “बेटा, मैं अभी बहुत उलझी हूँ। और तुम अब बच्चे नहीं हो। खुद संभलो।”
कॉल कट गई।
अर्जुन देर तक फोन देखता रहा। वह पहली बार समझा कि असली माँ कहने से कोई माँ नहीं हो जाती। और सौतेली कह देने से किसी का त्याग छोटा नहीं हो जाता।
राजीव की हालत भी बदल गई। हवेली का हिस्सा बिक गया। दोस्तों ने फोन उठाना बंद कर दिया। जो रिश्तेदार कभी उसकी शान पर ताली बजाते थे, वही अब कहते—“मीरा ने तो बहुत किया था।” वह एक छोटे किराए के फ्लैट में रहने लगा, जहाँ दीवारें पतली थीं और पड़ोसियों की आवाज़ें साफ सुनाई देती थीं। रात को वह कई बार मीरा को कॉल करने की कोशिश करता, पर नंबर अब हमेशा बंद नहीं, बल्कि हमेशा दूर था।
1 साल बाद मीरा ने गोवा के पास समुद्र की ओर खुलने वाला छोटा-सा घर खरीदा। बड़ा नहीं था, लेकिन उसका था। हर कमरे में खिड़कियाँ थीं, हवा थी, चुप्पी थी, और कोई ऐसा आदमी नहीं था जिसे बचाने के लिए उसे खुद को खोना पड़े।
एक शाम बारिश के बाद आकाश नारंगी हो गया था। मीरा बालकनी में बैठी चाय पी रही थी। उसने अपने होंठ के पास बचा हल्का निशान छुआ। दर्द जा चुका था। निशान अब घाव नहीं था, याद था।
उसे याद आया कि कैसे वह 5 साल तक हर त्योहार पर अर्जुन की पसंद की मिठाई बनवाती थी। दिवाली पर उसके लिए कुर्ता चुनती थी। होली पर उसे फोन करके घर आने को कहती थी। जन्मदिन पर महँगा तोहफा देती थी और बदले में सिर्फ ठंडी मुस्कान पाती थी। वह हर बार सोचती थी, थोड़ा और प्रेम, थोड़ा और धैर्य, शायद एक दिन वह पिघल जाएगा।
लेकिन कुछ दिल प्रेम से नहीं, सुविधा से जुड़े होते हैं। जब सुविधा बंद होती है, रिश्ता भी खत्म हो जाता है।
मीरा ने अब सीखा था कि त्याग तभी सुंदर है जब सामने वाला उसे सम्मान से देखे। वरना वही त्याग धीरे-धीरे बेड़ियाँ बन जाता है।
उस रात उसने अपनी डायरी में सिर्फ 3 पंक्तियाँ लिखीं।
जिस घर में सम्मान न मिले, वहाँ रिश्ते नहीं, किराएदार रहते हैं।
जिस बच्चे को ममता का मूल्य न सिखाया जाए, वह माँ और नौकरानी में फर्क भूल जाता है।
और जिस दिन औरत अपनी कुर्सी से उठती है, कभी-कभी उसी दिन वह पहली बार अपने जीवन में सचमुच खड़ी होती है।
अर्जुन ने मीरा से माँ की जगह छीननी चाही थी।
उसे क्या पता था, उसी अपमान ने मीरा को अपनी ही ज़िंदगी वापस दे दी।
