
और फिर…
जब वे आखिरकार थोड़ा और रास्ता खोलने में सफल हुए…
कुत्ते के पीछे अंधेरे में कुछ और दिखाई दिया।
शुरुआत में किसी को यक़ीन नहीं हुआ।
वह कोई इंसान नहीं था।
न कोई दूसरा जानवर।
न कोई मलबे का टुकड़ा।
वह एक छोटा-सा कपड़े का बैग था।
फटा हुआ।
धूल और सीमेंट के चूरे से ढका हुआ।
एक कोना टूटी हुई बीम के नीचे दबा हुआ था।
—रुको… वहाँ कुछ और भी है —एक बचावकर्मी ने फुसफुसाया।
मुख्य अधिकारी ने टॉर्च उस दिशा में घुमाई।
बैग के पास एक लाल रंग की चीज़ दिखाई दी।
पहले सबको लगा कि वह कोई कपड़ा होगा।
लेकिन जब रोशनी स्थिर हुई…
सबकी साँसें थम गईं।
वह एक छोटा लाल कॉलर था।
कुत्ते का कॉलर।
बहुत पुराना।
उस पर धातु की एक छोटी प्लेट लगी हुई थी।
बचावकर्मी ने हाथ बढ़ाकर उसे सावधानी से बाहर निकाला।
प्लेट पर धूल जमी हुई थी।
उसने अंगूठे से उसे साफ़ किया।
फिर पढ़ा।
—“लूना।”
कुछ सेकंड तक कोई कुछ नहीं बोला।
लूना।
यानी यह उसका नाम था।
वही नाम जो बच्ची बार-बार बड़बड़ा रही थी।
वही नाम जिसे बचाने के लिए यह कुतिया मौत से लड़ रही थी।
लेकिन तभी बचावकर्मी की नज़र प्लेट के नीचे उकेरी गई दूसरी पंक्ति पर गई।
उसने भौंहें सिकोड़ लीं।
फिर दोबारा पढ़ा।
—यह क्या…
—क्या लिखा है? —दूसरे ने पूछा।
उसने धीरे से जवाब दिया—
—“यदि मैं खो जाऊँ, तो मुझे एमा के पास वापस ले आइए।”
स्ट्रेचर पर लेटी बच्ची ने यह सुन लिया।
उसकी बंद होती आँखों में अचानक हलचल हुई।
—एमा… मैं हूँ… —उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा।
सब समझ गए।
बच्ची का नाम एमा था।
और लूना सिर्फ उसका पालतू जानवर नहीं थी।
वह उसका परिवार थी।
शायद उसका सबसे करीबी परिवार।
लेकिन उसी समय मलबे के नीचे से एक और चीज़ दिखाई दी।
बैग के भीतर कुछ कागज़ थे।
एक बचावकर्मी ने उन्हें बाहर निकाला।
अधिकतर भीग चुके थे।
कुछ फट चुके थे।
लेकिन एक दस्तावेज़ अब भी पढ़ा जा सकता था।
वह एक स्कूल की चित्रकारी थी।
ऊपर बच्चों जैसी लिखावट में लिखा था:
“मेरा परिवार।”
चित्र में तीन आकृतियाँ थीं।
एक छोटी लड़की।
एक सुनहरे रंग की कुतिया।
और उनके ऊपर बना बड़ा-सा सूरज।
लेकिन तीसरी मानव आकृति को मोटे काले रंग से काट दिया गया था।
कई बार।
इतनी बार कि कागज़ लगभग फट गया था।
बचावकर्मी एक-दूसरे को देखने लगे।
कहानी में कुछ और भी था।
कुछ ऐसा जो अभी तक किसी को पता नहीं था।
उधर एमा की हालत बिगड़ने लगी।
पैरामेडिक्स उसे एम्बुलेंस की ओर ले जा रहे थे।
लेकिन वह बार-बार सिर घुमाकर उसी जगह देख रही थी जहाँ लूना फँसी हुई थी।
—कृपया… उसे छोड़ना मत…
—नहीं छोड़ेंगे —एक महिला बचावकर्मी ने उसका हाथ पकड़कर कहा।
एमा की आँखों से आँसू निकल पड़े।
—वह… वापस आई थी…
महिला झुक गई।
—कौन वापस आई थी?
एमा ने मुश्किल से फुसफुसाया—
—लूना…
—वह भाग गई थी… सब भाग गए थे… लेकिन वह वापस आई…
उसकी आवाज़ टूट गई।
फिर बेहोशी छाने लगी।
लेकिन उसके शब्दों ने सबको भीतर तक हिला दिया।
लूना भाग सकती थी।
भूकंप के बाद।
ढहती हुई इमारत के बीच।
जब सब कुछ टूट रहा था।
लेकिन वह वापस आई थी।
एमा के लिए।
उधर मलबे के भीतर लूना अब भी फँसी हुई थी।
उसकी साँसें और भारी हो चुकी थीं।
एक पैर बुरी तरह दबा हुआ था।
लेकिन जब भी एमा रोती…
वह सिर उठाने की कोशिश करती।
जब भी एमा की आवाज़ सुनाई देती…
उसकी पूँछ का सिरा हल्का-सा हिल जाता।
जैसे वह बार-बार एक ही बात कह रही हो—
“मैं यहाँ हूँ।”
मुख्य अधिकारी ने रेडियो उठाया।
—हमें भारी सहारा संरचना चाहिए। अभी।
—क्या स्थिति इतनी गंभीर है?
उसने लूना को देखा।
फिर ऊपर लटके हुए कंक्रीट के विशाल टुकड़े को।
—अगर हम जल्दी नहीं पहुँचे… तो देर हो जाएगी।
कुछ मिनट बाद अतिरिक्त टीम पहुँच गई।
अब पूरा अभियान सिर्फ बचाव नहीं रहा था।
यह समय के खिलाफ दौड़ बन चुका था।
धातु के सहारे लगाए गए।
हाइड्रोलिक जैक लगाए गए।
हर पत्थर मिलीमीटर-मिलीमीटर हटाया जा रहा था।
और फिर…
एक तेज़ आवाज़ गूँजी।
“क्रैक!”
ऊपरी स्लैब कुछ सेंटीमीटर खिसक गई।
सब जम गए।
किसी ने साँस तक नहीं ली।
अगर वह और खिसकती…
तो लूना वहीं खत्म हो जाती।
लेकिन उसी क्षण कुछ अविश्वसनीय हुआ।
लूना ने अपने बचे हुए बल से सिर उठाया।
सीधे उस बचावकर्मी की ओर देखा जो उसके सबसे पास था।
और धीरे से अपनी नाक आगे बढ़ा दी।
मानो कह रही हो—
“पहले बच्ची को बचाओ।”
उस आदमी की आँखें भर आईं।
उसने धीरे से लूना के सिर पर हाथ रखा।
—अब तुम्हारी बारी है, बहादुर लड़की।
और पहली बार…
लूना ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
जैसे उसे यकीन हो गया हो कि एमा सुरक्षित है।
लेकिन जब बचावकर्मियों ने आखिरकार उसका दबा हुआ शरीर पूरी तरह देखा…
तो उन्हें समझ आया कि वह पिछले कई घंटों से जिस हालत में जीवित थी…
वह किसी चमत्कार से कम नहीं था।
(जारी…)
